Uttarkashi Mountaineers News: उत्तराखंड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी के होनहार और साहसी पर्वतारोहियों ने एक बार फिर दुनिया के सामने अपनी वीरता और पर्यावरण के प्रति अटूट निष्ठा का लोहा मनवाया है। हिमालय के संरक्षण, स्वच्छता और जिम्मेदार पर्वतारोहण का एक बेहद खूबसूरत और अनुकरणीय संदेश लेकर निकले उत्तरकाशी के नौ सदस्यीय पर्वतारोही दल ने समुद्र तल से सात हजार पचहत्तर मीटर ऊंची प्रसिद्ध माउंट सतोपंथ चोटी पर सफलतापूर्वक कदम रख दिया है। हाड़ कंपा देने वाली भीषण ठंड, रास्ते में कदम-कदम पर आए भयानक बर्फीले तूफानों और शून्य से कई डिग्री नीचे गिरते पारे जैसी जानलेवा तथा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का डटकर सामना करते हुए इस दल ने न सिर्फ शिखर पर भारत का गौरवशाली तिरंगा फहराया, बल्कि एक ऐसा अनोखा काम भी किया जो आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर पर्वतारोहण के तौर-तरीकों को बदलने की प्रेरणा बनेगा।

हिमालय में पर्वतारोहियों ने अनूठी मिसाल पेश की
लगभग तीन सप्ताह तक चले इस बेहद कठिन और जोखिम भरे अभियान के दौरान टीम ने हिमालय के उन दुर्गम और संकरे रास्तों को पार किया, जहां आम इंसानों के पैर आसानी से कांप जाते हैं। इस दल की सबसे बड़ी और खास बात यह रही कि शिखर छूने के जुनून के बीच भी वे पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बिल्कुल नहीं भूले। पर्वतारोहियों ने इस पूरे अभियान के दौरान पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश करते हुए पूरे पर्वत क्षेत्र से प्लास्टिक, टिन और अन्य गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा भी इकट्ठा किया। अपनी जान जोखिम में डालकर सात हजार मीटर से अधिक की ऊंचाई पर अभियान चलाते हुए भी यह जांबाज टीम शिखर क्षेत्र और उसके आस-पास के रास्तों से लगभग पंद्रह किलोग्राम कचरा अपने पिठ्ठू बैग में भरकर वापस नीचे लेकर आई है। यह कदम दिखाता है कि पहाड़ों की ऊंचाई नापने के साथ-साथ इन युवाओं के हौसले और उनकी सोच का स्तर भी कितना ऊंचा है।
माउंट सतोपंथ बेहद कठिन और खतरनाक चोटियों में एक
माउंट सतोपंथ को पर्वतारोहण की दुनिया में तकनीकी रूप से बेहद कठिन और खतरनाक चोटियों में गिना जाता है। इस पर चढ़ाई करने के लिए न केवल शारीरिक रूप से मजबूत होना पड़ता है, बल्कि मानसिक दृढ़ता की भी कड़ी परीक्षा होती है। उत्तरकाशी के इस दल ने जब बेस कैंप से अपनी अंतिम चढ़ाई शुरू की, तो मौसम ने उनके सब्र का कड़ा इम्तिहान लिया। बर्फीली हवाएं इतनी तेज थीं कि एक-एक कदम आगे बढ़ाना भारी पड़ रहा था। दृश्यता कम होने और ग्लेशियरों में छिपी गहरी दरारों (क्रेवासेस) के कारण खतरा लगातार बढ़ता जा रहा था। इसके बावजूद, दल के सदस्यों ने आपस में एक मजबूत तालमेल बनाए रखा और पारंपरिक पर्वतारोहण के सभी कड़े सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए धीरे-धीरे शिखर की ओर कदम बढ़ाए। जब यह टीम सतोपंथ के सर्वोच्च बिंदु पर पहुंची, तो वहां का नजारा बेहद विहंगम और भावुक कर देने वाला था। भारत माता के जयकारों और गगनभेदी नारों के बीच टीम ने वहां तिरंगा लहराया।

आज के दौर में जब वैश्विक स्तर पर पर्यटन और पर्वतारोहण बढ़ने से हिमालयी क्षेत्रों में प्रदूषण का संकट गहराता जा रहा है, तब उत्तरकाशी के इन बेटों का यह प्रयास एक नई अलख जगाने का काम करता है। ऊंचे पहाड़ों पर पर्वतारोहियों द्वारा छोड़े गए प्लास्टिक रैपर, खाली टिन, ऑक्सीजन सिलेंडर और टेंट के अवशेष वहां के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे इस तरह का कचरा भी एक बड़ा कारण माना जाता है। ऐसे संकट के समय में, इस नौ सदस्यीय दल ने हिमालय को सिर्फ एक खेल का मैदान न मानकर उसे अपनी आध्यात्मिक और प्राकृतिक धरोहर समझा। शिखर क्षेत्र से पंद्रह किलो कचरा नीचे लाना यह साबित करता है कि अगर इंसान के मन में सच्ची इच्छाशक्ति हो, तो वह अपनी खेल भावना और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों के बीच एक आदर्श संतुलन बना सकता है।
तीन सप्ताह लंबे इस पूरे अभियान के सफल समापन के बाद जब यह दल वापस उत्तरकाशी की घाटी में लौटा, तो स्थानीय निवासियों और खेल प्रेमियों ने उनका ढोल-दमाऊ की थाप और पारंपरिक मालाओं के साथ भव्य स्वागत किया। हर कोई इन युवाओं की इस दोहरी सफलता पर गर्व महसूस कर रहा है। पहली सफलता चोटी फतह करने की और दूसरी सबसे बड़ी सफलता हिमालय को स्वच्छ रखने के संकल्प को धरातल पर उतारने की। खेल और युवा मामलों के जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड के युवाओं में पर्वतारोहण के प्रति जन्मजात प्रतिभा होती है, और जब इस प्रतिभा को सही दिशा तथा पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का साथ मिल जाता है, तो ऐसे ही सुखद और ऐतिहासिक परिणाम देखने को मिलते हैं। इस अभियान ने यह भी साफ कर दिया है कि भविष्य में होने वाले सभी पर्वतारोहण अभियानों को अब ‘इको-फ्रेंडली’ या जिम्मेदार पर्वतारोहण की श्रेणी में लाना कितना जरूरी हो चुका है।

इस दल के सदस्यों ने अपनी इस यात्रा के अनुभव साझा करते हुए बताया कि सात हजार मीटर की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच भारी कचरा उठाकर चलना उनके जीवन के सबसे कठिन अनुभवों में से एक था। कई बार ऐसा लगा कि कचरे का वजन उनकी शारीरिक क्षमता को तोड़ देगा, लेकिन जब भी वे हिमालय की विशालता और उसकी पवित्रता के बारे में सोचते, तो उनका हौसला दोगुना हो जाता था। उनका यह अभियान देश के उन तमाम पर्यटकों और ट्रैकर्स के लिए एक कड़ा सबक है, जो पहाड़ों की सैर करने तो आते हैं, लेकिन अपने पीछे कचरे का ढेर छोड़ जाते हैं। उत्तरकाशी के इन जांबाजों ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया है कि पहाड़ों की खूबसूरती तभी तक बची रहेगी, जब तक हम उन्हें साफ रखेंगे। सरकार और खेल मंत्रालय को भी इस तरह के अभियानों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी खेल के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के महत्व को भी आत्मसात कर सके।







