Uttarakhand Milk production increasing News: उत्तराखंड के विकास मॉडल में कृषि और पशुपालन हमेशा से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे हैं। देवभूमि से डेयरी क्षेत्र को लेकर एक बेहद उत्साहजनक और सकारात्मक खबर सामने आ रही है। राज्य में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व क्रांति देखने को मिल रही है, जिसके तहत दूध के कुल उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 12 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया है। दुग्ध विकास विभाग के हालिया आंकड़ों के अनुसार, इस शानदार कामयाबी के साथ नैनीताल जिला पूरे प्रदेश में दुग्ध उत्पादन के मामले में शीर्ष यानी नंबर-1 स्थान पर काबिज हो गया है। इस पूरी विकास यात्रा और उत्पादन में हुई रिकॉर्ड बढ़ोतरी के पीछे राज्य सरकार की एक विशेष महत्वाकांक्षी योजना सबसे बड़ी वजह बनकर उभरी है, जिसने पहाड़ों में स्वरोजगार की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी है।
दुग्ध उत्पादन में 12 फीसदी की रिकॉर्ड वृद्धि और नैनीताल का दबदबा
उत्तराखंड में डेयरी उद्योग का यह स्वर्णिम दौर श्वेत क्रांति की नई इबारत लिख रहा है। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में इस साल दूध के उत्पादन में जो 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, उसने राज्य को दुग्ध क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से अग्रसर किया है। मैदानी इलाकों के साथ-साथ पर्वतीय क्षेत्रों में भी दुग्ध समितियों और दुग्ध उत्पादकों की सक्रियता ने इस आंकड़े को छूने में मदद की है। जिलों की रैंकिंग की बात करें तो नैनीताल जिले ने अन्य सभी जिलों को पछाड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है। नैनीताल में दुग्ध सहकारी समितियों का मजबूत ढांचा, आधुनिक डेयरी प्लांट और पशुपालकों को समय पर मिलने वाले लाभ के कारण यहां प्रतिदिन रिकॉर्ड मात्रा में दूध का कलेक्शन किया जा रहा है। नैनीताल के बाद उधमसिंह नगर और हरिद्वार जैसे मैदानी जिले भी इस दौड़ में मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन पहाड़ी और अर्ध-पहाड़ी भौगोलिक स्थिति के बावजूद नैनीताल का शीर्ष पर रहना काबिले तारीफ है।
गेम चेंजर साबित हुई राज्य सरकार की यह विशेष दुग्ध योजना
पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में आए इस बड़े उछाल का पूरा श्रेय उत्तराखंड सरकार द्वारा चलाई जा रही एक विशेष प्रोत्साहन और सब्सिडी योजना को जाता है। यह सरकारी योजना उत्तराखंड के ग्रामीण और सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों के पशुपालकों के लिए वास्तविक रूप से ‘गेम चेंजर’ साबित हुई है। इस योजना के अंतर्गत सरकार न केवल दुग्ध उत्पादकों को प्रति लीटर दूध पर आकर्षक प्रोत्साहन राशि (इंसेंटिव) सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर कर रही है, बल्कि दुधारू पशुओं की खरीद पर भारी सब्सिडी भी प्रदान कर रही है। इसके साथ ही, पशुओं के लिए उन्नत किस्म के चारे, साइलेज और संतुलित आहार (पशु आहार) पर मिलने वाली छूट ने पशुपालकों की लागत को काफी कम कर दिया है। जब लागत कम हुई और दूध के सही दाम सीधे किसानों को मिलने लगे, तो लोगों का रुझान तेजी से दुग्ध व्यवसाय की तरफ बढ़ा, जिससे उत्पादन में यह ऐतिहासिक तेजी देखने को मिली।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ीकरण और रिवर्स पलायन को बढ़ावा
दूध उत्पादन में हुई इस वृद्धि का सीधा सकारात्मक असर उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। पहाड़ों में आजीविका के संकट के कारण होने वाला पलायन हमेशा से एक बड़ी चिंता रहा है, लेकिन डेयरी सेक्टर में आए इस उछाल ने रिवर्स पलायन यानी लोगों को वापस अपने गांवों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया है। गांव के युवाओं और महिलाओं ने डेयरी को एक मुनाफे वाले व्यवसाय के रूप में अपनाया है। दुग्ध समितियों के माध्यम से गांवों में ही रोजगार के साधन उपलब्ध हो रहे हैं, जिससे ग्रामीण परिवारों की मासिक आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। अब पशुपालकों को अपने दूध को बेचने के लिए दूर मंडियों में नहीं जाना पड़ता, बल्कि गांव-गांव में बनी दुग्ध सहकारी समितियां सीधे उनके घर या केंद्र से दूध उठा लेती हैं, जिससे बिचौलियों का शोषण भी पूरी तरह समाप्त हो गया है।
तकनीकी हस्तक्षेप और बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण
उत्पादन में 12 प्रतिशत के इस उछाल के पीछे केवल पशुओं की संख्या बढ़ना ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि डेयरी सेक्टर में हुआ तकनीकी सुधार भी एक बड़ा कारक है। सरकार और डेयरी फेडरेशन (आंचल) द्वारा राज्य भर में दुग्ध शीतलन केंद्रों (बल्क मिल्क कूलर्स) का जाल बिछाया गया है। इससे दूध की गुणवत्ता खराब नहीं होती और सुदूर गांवों से संकलित किया गया दूध भी सुरक्षित प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुंच जाता है। इसके अलावा, कृत्रिम गर्भाधान और उन्नत नस्ल के पशुओं के संवर्धन पर दिए जा रहे ध्यान से प्रति पशु दुग्ध उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू होने से पशुपालकों को उनके दूध का मूल्य सीधे और पारदर्शिता के साथ मिल रहा है, जिसने इस पूरे इकोसिस्टम के प्रति उनके विश्वास को और अधिक मजबूत किया है।

भविष्य की राह और दुग्ध हब बनने की ओर अग्रसर उत्तराखंड
इस सफलता से उत्साहित होकर दुग्ध विकास विभाग अब भविष्य के लिए और भी बड़े लक्ष्य तय कर रहा है। सरकार का उद्देश्य राज्य को देश के अग्रणी दुग्ध उत्पादक राज्यों की श्रेणी में खड़ा करना है। इसके लिए जैविक (ऑर्गेनिक) दुग्ध उत्पादन और पहाड़ी गायों के ‘ए-2’ दूध की ब्रांडिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि बाजार में इसके ऊंचे दाम मिल सकें और पशुपालकों की आय को दोगुना किया जा सके। नैनीताल जिले की इस सफलता को मॉडल बनाकर राज्य के अन्य पर्वतीय जिलों जैसे अल्मोड़ा, पौड़ी और चमोली में भी इसी तर्ज पर काम शुरू कर दिया गया है। यदि यह गति इसी तरह जारी रही, तो आने वाले समय में उत्तराखंड न केवल अपनी घरेलू दूध की जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि पड़ोसी राज्यों को भी बड़े पैमाने पर दुग्ध और उससे बने उत्पादों की आपूर्ति करने वाला एक प्रमुख हब बनकर उभरेगा।







