Uttarakhand Disaster Management News: हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए सुरक्षा चक्र को और अधिक मजबूत करना शुरू कर दिया है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने सचिवालय में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में राज्य की ग्लेशियर झीलों, भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली और भूस्खलन न्यूनीकरण परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा की। इस समीक्षा का मुख्य उद्देश्य राज्य में आपदा पूर्व तैयारी को आधुनिकतम तकनीकी संसाधनों से लैस करना है ताकि जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।

ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए वसुंधरा मॉडल का विकास
ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम न्यूनीकरण (GLOF) के अंतर्गत उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा एक महत्वाकांक्षी कार्ययोजना पर काम किया जा रहा है। सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने बैठक में अवगत कराया कि वाडिया संस्थान द्वारा चमोली जिले की वसुंधरा झील को एक पायलट साइट के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग मैकेनिज्म स्थापित किया जा रहा है जो भविष्य में अन्य संवेदनशील झीलों के लिए एक मानक मॉडल बनेगा। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए हैं कि इस परियोजना के तहत पानी के नियंत्रित निकास और झील के जल स्तर को कम करने जैसे संरचनात्मक उपायों पर विशेष ध्यान दिया जाए और वर्ष 2026 से 2028 तक की स्पष्ट समयसीमा (टाइमलाइन) के साथ कार्य किया जाए।

भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली का व्यापक विस्तार
भूकंपीय संवेदनशीलता के लिहाज से उत्तराखण्ड एक अत्यंत महत्वपूर्ण जोन में आता है, जिसके लिए आईआईटी रुड़की के साथ मिलकर चेतावनी प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाया जा रहा है। वर्तमान में राज्य में 169 सेंसर और 112 सायरन पहले से ही कार्यरत हैं, लेकिन अब इसे और व्यापक बनाने के लिए 500 अतिरिक्त स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर और 526 नए सायरन लगाने का प्रस्ताव है। आईआईटी रुड़की के साथ हाल ही में हुए एक नए समझौते के तहत इस प्रणाली के सुचारू संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी तय की गई है। साथ ही, रुड़की, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग और केदारनाथ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नई स्थाई भूकंपीय वेधशालाएं स्थापित करने का निर्णय लिया गया है ताकि सटीक डेटा प्राप्त किया जा सके और आमजन तक समय रहते चेतावनी पहुंचाई जा सके।

भूस्खलन और मलबे के बहाव का श्रेणीबद्ध प्रबंधन
तीसरी महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक में मलबे के बहाव (डिब्रिस फ्लो) से उत्पन्न होने वाले खतरों और उनके न्यूनीकरण पर चर्चा की गई। तकनीकी संस्थानों की एक संयुक्त समिति ने चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जनपदों में 48 ऐसे संवेदनशील स्थानों की पहचान की है जो मुख्य रूप से ड्रेनेज चैनलों के पास स्थित हैं। इन स्थलों को उनके जोखिम के आधार पर उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है ताकि सबसे अधिक खतरे वाले क्षेत्रों में पहले काम शुरू किया जा सके। मुख्य सचिव ने निर्देशित किया है कि इन चिह्नित स्थलों पर सर्वेक्षण और निगरानी का कार्य प्राथमिकता पर किया जाए और जिला प्रशासन के साथ बेहतर तालमेल बनाकर निवारक कार्यों को समय से पूरा किया जाए।









