Uttarakhand News: उत्तराखंड की शांत वादियों, पथरीली पगडंडियों और सीमित संसाधनों के बीच जब कोई युवा अपने पसीने की बूंदों से मैदान की मिट्टी को सींचता है, तो उसके सीने में सिर्फ पदक जीतने की नहीं, बल्कि अपने परिवार के संघर्षों को सम्मानजनक मुकाम तक पहुंचाने की तड़प होती है। खेलों की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार, उत्साहवर्धक और रोमांचक दिखाई देती है, भीतर से उसका यथार्थ उतना ही कठोर, एकाकी और अनिश्चितताओं से भरा होता है। एक एथलीट अपनी पूरी जवानी मैदान पर खपा देता है, चोटों से जूझता है, परिवार से दूर रहता है और समाज के तानों को सहते हुए तिरंगे की आन-बान-शान के लिए लड़ता है। लेकिन जैसे ही खेल का मैदान पीछे छूटता है, जीवन यापन और सुरक्षित आजीविका का सवाल उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य के 243 पदक विजेता खिलाड़ियों को खेल नीति 2021 के प्रावधानों के तहत आउट ऑफ टर्न सरकारी नियुक्ति प्रदान करने का शासनादेश जारी करना एक ऐतिहासिक और संवेदनशील कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश भर नहीं है, बल्कि यह उन सैकड़ों परिवारों के आंसुओं, त्याग और अथक तपस्या को मिला राज्य का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
उत्तराखंड के खेल एवं युवा कल्याण विभाग के माध्यम से सामने आया यह शासनादेश स्पष्ट करता है कि राज्य में अब खेल प्रतिभाओं को केवल तालियों, गुलदस्तों और क्षणिक प्रशस्ति पत्रों तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि उन्हें स्थायी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से जोड़ा जाएगा। खेल एवं युवा कल्याण मंत्री रेखा आर्या ने जब इस फैसले की घोषणा की, तो उनके शब्दों में इस बात का स्पष्ट अहसास था कि कोई भी राज्य तब तक खेल महाशक्ति नहीं बन सकता जब तक वह अपने खिलाड़ियों के भविष्य की चिंता को दूर न कर दे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार का यह संकल्प कि खेलेगा युवा तो आगे बढ़ेगा युवा, अब फाइलों की सीमा लांघकर जमीन पर उतरता हुआ दिख रहा है।
इस महत्वपूर्ण निर्णय के अंतर्गत जिन 243 खिलाड़ियों को विभिन्न विभागों में राजपत्रित और अराजपत्रित पदों पर समायोजित किया जा रहा है, उनका वर्गीकरण उनकी खेल उपलब्धियों की गहराई को बयां करता है। इनमें 34 स्वर्ण पदक विजेता, 115 रजत पदक विजेता और 94 कांस्य पदक विजेता शामिल हैं। ये वे खिलाड़ी हैं जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी अद्वितीय क्षमता का लोहा मनवाया है। राज्य सरकार ने इन खिलाड़ियों को उनकी योग्यता, शैक्षणिक पृष्ठभूमि और पदकों के स्तर के अनुरूप खेल एवं युवा कल्याण विभाग, गृह विभाग, परिवहन विभाग, वन विभाग तथा शिक्षा विभाग जैसे प्रमुख और सक्रिय विभागों में नियुक्त करने का मार्ग प्रशस्त किया है। इससे न केवल खिलाड़ियों को अपनी आजीविका का ठोस आधार मिलेगा, बल्कि इन प्रशासनिक विभागों को भी ऐसे ऊर्जावान, अनुशासित और प्रतिबद्ध युवा मिलेंगे जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में विजय प्राप्त करने का हुनर सीखा है।
एक खिलाड़ी की यात्रा को यदि गहराई से समझा जाए, तो उसका अधिकांश समय प्रशिक्षण शिविरों, आहार की चिंताओं और उपकरणों के अभाव से जूझने में ही बीत जाता है। मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवेश से आने वाले एथलीटों के माता-पिता अक्सर कर्ज लेकर या अपनी छोटी-मोटी संपत्तियों को गिरवी रखकर अपने बच्चों के सपनों में खाद-पानी डालते हैं। कई बार ऐसा देखा गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करने के बाद भी रोजगार के अभाव में खिलाड़ी दिहाड़ी मजदूरी करने, छोटी दुकानें चलाने या अपनी खेल यात्रा को बीच में ही छोड़ देने को विवश हो जाते हैं। जब एक राष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ी को आजीविका के लिए संघर्ष करते देखा जाता है, तो उसका असर केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे समाज के लिए एक नकारात्मक संदेश बन जाता है। आसपास के अभिभावक अपने बच्चों को खेलों से दूर कर केवल पारंपरिक पढ़ाई और सुरक्षित नौकरियों की ओर धकेलने लगते हैं। उत्तराखंड सरकार का यह आउट ऑफ टर्न नियुक्ति का निर्णय इस पूरी मानसिकता पर एक सकारात्मक प्रहार करता है। अब पहाड़ का कोई भी माता-पिता अपने बच्चे को दौड़ने, मुक्केबाजी करने, तीरंदाजी सीखने या फुटबॉल खेलने से रोकने से पहले यह सोचेगा कि यदि उसका बच्चा लगन से खेलेगा और पदक लाएगा, तो राज्य सरकार स्वयं आगे बढ़कर उसके हाथों में नियुक्ति पत्र थमाएगी।
खेल नीति 2021 की रूपरेखा तैयार करते समय इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया था कि नीतियां केवल कागजी औपचारिकताओं का पुलिंदा न बनकर रह जाएं। पिछली कई व्यवस्थाओं में घोषणाएं तो बहुत होती थीं, लेकिन जब बात नियुक्ति की आती थी, तो नियमों की जटिलताएं, सेवा नियमावलियों के पेच और विभागों की आपसी खींचतान के कारण फाइलें वर्षों तक धूल फांकती रहती थीं। कई बार खिलाड़ी अपनी उम्र की सीमा पार कर जाते थे और उन्हें न्याय नहीं मिल पाता था। रेखा आर्या ने इस गतिरोध को तोड़ने में जिस प्रशासनिक तत्परता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, वह सराहनीय है। खेल विभाग ने विभिन्न विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर रिक्त पदों की पहचान की, सेवा नियमावलियों में आवश्यक संशोधन और शिथिलीकरण के रास्ते तलाशे और अंततः 243 पदों पर एकमुश्त समायोजन का ऐसा ठोस प्रारूप तैयार किया जिस पर शासनादेश की अंतिम मुहर लग सकी।
गृह विभाग और पुलिस बल में खिलाड़ियों का समायोजन एक अत्यंत स्वाभाविक और सकारात्मक कदम माना जाता है। खेलों से आने वाले युवाओं में शारीरिक क्षमता, मानसिक दृढ़ता, त्वरित निर्णय लेने का कौशल और अनुशासन कूट-कूट कर भरा होता है। जब ऐसे खिलाड़ी पुलिस बल का हिस्सा बनते हैं, तो वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में अपनी प्राकृतिक चपलता का उपयोग तो करते ही हैं, साथ ही वे पुलिस महकमे की खेल टीमों को भी राष्ट्रीय फलक पर मजबूत करते हैं। ठीक इसी प्रकार, शिक्षा विभाग और खेल विभाग में इन खिलाड़ियों की तैनाती प्रदेश की आने वाली पीढ़ियों के लिए वरदान साबित होगी। एक ऐसा शिक्षक या प्रशिक्षक जिसने स्वयं अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा का दबाव झेला हो, वह विद्यालय स्तर पर बच्चों की प्रतिभा को जितनी बारीकी से पहचान सकता है, उतनी बारीकी से कोई अन्य नहीं पहचान सकता। वह सिर्फ तकनीकी ज्ञान नहीं देगा, बल्कि बच्चों के भीतर वह जुझारूपन भी भरेगा जो मैदान पर जीत के लिए अनिवार्य होता है।
वन और परिवहन जैसे विभागों में भी इन खिलाड़ियों की ऊर्जा और गतिशीलता व्यवस्था को एक नया जीवन दे सकती है। उत्तराखंड भौगोलिक दृष्टि से एक चुनौतीपूर्ण राज्य है, जहां का अधिकांश भूभाग वनों और पर्वतीय ढलानों से घिरा हुआ है। ऐसे परिवेश में कार्यरत विभागों को ऐसे मानव संसाधन की सख्त आवश्यकता होती है जो कठिन परिस्थितियों में भी सहजता से काम कर सकें। खिलाड़ियों का जीवन संघर्षों और सहनशीलता की प्रयोगशाला में ही गढ़ा जाता है, इसलिए वे इन विभागों की कार्यसंस्कृति में एक नया उत्साह और गति जोड़ने में पूरी तरह सक्षम सिद्ध होंगे।
इस शासनादेश का मनोवैज्ञानिक प्रभाव राज्य के उन हजारों उभरते हुए बाल और युवा खिलाड़ियों पर भी बेहद गहरा पड़ेगा जो इस समय विभिन्न जिला स्टेडियमों, अकादमियों और गांवों के कच्चे मैदानों में पसीना बहा रहे हैं। जब वे अपने ही बीच के सीनियर खिलाड़ियों को, जिन्हें वे कल तक अपने साथ अभ्यास करते देखते थे, एक राजपत्रित या अराजपत्रित अधिकारी के रूप में सम्मानित पद पर बैठते देखेंगे, तो उनके भीतर का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाएगा। यह फैसला उनके भीतर यह अटूट विश्वास पैदा करेगा कि मैदान पर बहाई गई पसीने की हर बूंद का हिसाब राज्य सरकार के पास सुरक्षित है। इससे प्रतिभा पलायन की समस्या पर भी काफी हद तक लगाम लगेगी। उत्तराखंड से अक्सर यह शिकायत सामने आती रही है कि बेहतर सुविधाओं और सुरक्षित रोजगार की तलाश में यहां के कई होनहार एथलीट रेलवे, सेना या अन्य राज्यों की ओर से खेलने का विकल्प चुन लेते थे। जब राज्य स्वयं उन्हें सर्वोच्च सम्मान और स्थायी करियर का भरोसा दे रहा है, तो कोई भी खिलाड़ी अपनी जन्मभूमि का प्रतिनिधित्व छोड़कर किसी अन्य संस्था की ओर क्यों देखना चाहेगा।
यह निर्णय उत्तराखंड को खेलों की राष्ट्रीय मुख्यधारा में एक अग्रणी राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी मील का पत्थर साबित हो सकता है। हरियाणा जैसे राज्यों ने जिस प्रकार अपनी खेल नीति और रोजगार सुरक्षा के दम पर ओलंपिक और एशियाई खेलों में पदकों की झड़ी लगाई है, उत्तराखंड का यह मॉडल भी उसी दिशा में एक गंभीर और ठोस पहल प्रतीत होता है। पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं में प्राकृतिक रूप से फेफड़ों की क्षमता, सहनशक्ति और शारीरिक मजबूती मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक होती है। लंबी दूरी की दौड़, पर्वतारोहण, बॉक्सिंग, जूडो, फुटबॉल और तीरंदाजी जैसे खेलों में उत्तराखंड के युवाओं के पास असीमित संभावनाएं मौजूद हैं। आवश्यकता केवल इस बात की थी कि उन्हें एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र मिले जहां वे बिना किसी पारिवारिक आर्थिक दबाव के, पूरे समर्पण के साथ अपने खेल को निखार सकें।
शासनादेश जारी होने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण चरण इसके त्वरित और पारदर्शी क्रियान्वयन का होगा। खिलाड़ियों को उनके दस्तावेजों के सत्यापन, पदों के आवंटन और प्रशिक्षण की प्रक्रियाओं से गुजारते हुए शीघ्र अति शीघ्र विभागों में कार्यभार ग्रहण कराना होगा, ताकि इस नीतिगत फैसले का वास्तविक लाभ उन तक बिना किसी देरी के पहुंच सके। साथ ही, सेवा में आने के बाद भी इन खिलाड़ियों को अपनी खेल प्रतिभा को निरंतर जारी रखने के लिए विशेष अवकाश, उन्नत प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भाग लेने की आवश्यक छूट प्रदान की जानी चाहिए, जिससे वे सरकारी सेवा में रहते हुए भी तिरंगे की शान को और ऊंचा कर सकें।
उत्तराखंड के विकास का खाका केवल सड़कों, पुलों और कंक्रीट के बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रह सकता। राज्य की वास्तविक पूंजी उसके युवा हैं, और जब युवाओं की ऊर्जा को खेल, अनुशासन और सम्मानजनक रोजगार के साथ जोड़ दिया जाता है, तो एक सशक्त और आत्मनिर्भर समाज की नींव मजबूत होती है। खेल मंत्री रेखा आर्या का यह प्रयास और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का प्रशासनिक समर्थन निश्चित रूप से उत्तराखंड के खेल इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज होगा। 243 परिवारों के चूल्हों में जलने वाली उम्मीद की लौ अब विश्वास के एक ऐसे उजाले में बदल चुकी है, जो आने वाले समय में राज्य के सुदूर सीमांत गांवों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक उत्तराखंड के खेल कौशल की एक नई और प्रेरक गाथा लिखेगी।
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