Dehradun News: आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था किसी भी राज्य की जीवनरेखा मानी जाती है। सड़क दुर्घटना, अचानक गंभीर बीमारी या किसी अन्य संकट की स्थिति में व्यक्ति का जीवन इस बात पर निर्भर करता है कि मदद कितनी तत्परता और किस स्तर की सुविधाओं के साथ मौके पर पहुंचती है। इसी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सचिवालय में मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन की अध्यक्षता में व्यय वित्त समिति की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु प्रदेश में संचालित 108 आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा की वर्तमान स्थिति की समीक्षा करना और इस पूरी प्रणाली को अधिक सक्षम, पारदर्शी व आधुनिक बनाना था। मुख्य सचिव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सेवा सीधे तौर पर आम जनमानस के जीवन और उनकी सुरक्षा से जुड़ी है, इसलिए इसमें किसी भी स्तर की ढिलाई, तकनीकी खामी या लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
बैठक में इस बात पर गहरा मंथन हुआ कि पुरानी और निरंतर तकनीकी समस्याओं से जूझ रही गाड़ियां आपातकाल के समय मरीजों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। लिहाजा, स्वास्थ्य ढांचे में जमीनी सुधार लाने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने की जरूरत है। खटारा और पुरानी एम्बुलेंसों को तत्काल बदलने के आदेश बैठक के दौरान राज्य में चल रही 108 सेवा की गाड़ियों की तकनीकी स्थिति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया। आंकड़ों की समीक्षा के बाद यह बात सामने आई कि बड़ी संख्या में ऐसी गाड़ियां हैं जो अपनी निर्धारित परिचालन सीमा पार कर चुकी हैं और बार-बार रास्ते में खराब होने की आशंका बनी रहती है।
मुख्य सचिव ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि निर्धारित समयावधि पूरी कर चुके वाहनों को सेवा से तुरंत बाहर किया जाए। विशेष रूप से उन्होंने उन लगभग पचास एम्बुलेंसों को प्राथमिकता के आधार पर बदलने के आदेश दिए जो तीन लाख किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर चुकी हैं। इन वाहनों के स्थान पर आधुनिक सुविधाओं से लैस नए वाहन शामिल करने की प्रक्रिया बिना किसी अनावश्यक विलंब के शुरू करने पर जोर दिया गया। प्रशासन का मानना है कि पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों के कठिन भौगोलिक मार्गों पर पुरानी गाड़ियां बीच रास्ते में दम तोड़ देती हैं, जिससे गोल्डन ऑवर यानी दुर्घटना या दिल के दौरे के बाद के शुरुआती अत्यंत महत्वपूर्ण समय का नुकसान होता है।
हालांकि बदलाव की इस पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध रूप से पूरा किया जाएगा ताकि नई गाड़ियों के आने तक सामान्य आपातकालीन सेवाएं किसी भी तरह प्रभावित न हों। केवल औसत नहीं, अब वास्तविक रिस्पांस टाइम का होगा गहन विश्लेषण आपातकालीन सेवाओं की गुणवत्ता मापने के लिए अब तक अधिकांशतः एवरेज रिस्पांस टाइम यानी औसत पहुंचने के समय को पैमाना माना जाता रहा है। मुख्य सचिव ने इस पारंपरिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि कागजों पर औसत समय अक्सर वास्तविक स्थिति को छुपा देता है, क्योंकि अगर किसी शहरी इलाके में एम्बुलेंस आठ मिनट में पहुंच रही है और किसी ग्रामीण या दूरस्थ क्षेत्र में उसे पहुंचने में दो घंटे लग रहे हैं, तो औसत समय ठीक दिखेगा लेकिन असल मरीज को भारी नुकसान हो चुका होगा। अब प्रशासन प्रत्येक कॉल और उस पर एम्बुलेंस के पहुंचने में लगे वास्तविक समय का व्यक्तिगत स्तर पर विश्लेषण करेगा। जिन मामलों में निर्धारित समय से अधिक देरी दर्ज होगी, उनकी केस-दर-केस समीक्षा की जाएगी। यह पता लगाया जाएगा कि देरी का कारण वाहन की खराबी थी, मार्ग की बाधा थी, चालक की लापरवाही थी या फिर कॉल सेंटर का समन्वय ठीक नहीं था। इस विश्लेषण के आधार पर व्यवस्था की कमजोरियों को चिन्हित कर सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे ताकि किसी भी नागरिक को समय पर सहायता से वंचित न रहना पड़े।
जीवनरक्षक उपकरणों की अनिवार्य मासिक जांच और जवाबदेही तय एक एम्बुलेंस केवल मरीज को अस्पताल ले जाने वाला वाहन नहीं होती, बल्कि वह चलता-फिरता प्राथमिक आईसीयू होती है। इसके भीतर ऑक्सीजन सिलेंडर, डिफाइब्रिलेटर, सक्शन मशीन, ईसीजी मशीन, वेंटिलेटर सपोर्ट और आवश्यक जीवनरक्षक दवाइयों की उपलब्धता हर क्षण शत-प्रतिशत सुनिश्चित रहनी चाहिए। अक्सर यह शिकायतें देखने में आती हैं कि गाड़ी समय पर पहुंच गई लेकिन उसका कोई मुख्य उपकरण चालू हालत में नहीं था। बैठक में इस गंभीर पहलू पर सख्त रुख अपनाते हुए निर्देश दिए गए कि सभी एम्बुलेंसों में लगे जीवनरक्षक उपकरणों का प्रत्येक माह अनिवार्य रूप से तकनीकी परीक्षण किया जाए। इस जांच के लिए संबंधित अधिकारियों और तकनीकी कर्मियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी। यदि किसी आपात स्थिति के दौरान एम्बुलेंस के भीतर उपकरण के काम न करने की बात सामने आती है, तो संबंधित जिम्मेदार कर्मचारी के विरुद्ध त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत डेडिकेटेड मॉनिटरिंग सेल का गठन व्यवस्था की निरंतर निगरानी के अभाव में बड़े से बड़ा ढांचा भी समय के साथ शिथिल पड़ जाता है। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए मुख्य सचिव ने एक त्रिस्तरीय निगरानी तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन यानी एनएचएम के तहत एक पूर्णतः समर्पित विशेष दल का गठन किया जाएगा, जिसका काम केवल 108 सेवा के सभी तकनीकी, परिचालन और मानव संसाधन से जुड़े पहलुओं की दैनिक, साप्ताहिक और मासिक आधार पर निगरानी करना होगा। यह दल कॉल आने से लेकर मरीज के अस्पताल पहुंचने तक के पूरे घटनाक्रम का डेटा संकलित करेगा और उसका विश्लेषण प्रस्तुत करेगा। किसी भी क्षेत्र में सेवा की असामान्य स्थिति, गाड़ियों के बार-बार ऑफ-रोड होने या कॉल्स ड्रॉप होने की स्थिति में यह टीम तुरंत हस्तक्षेप करेगी।
विभागीय स्तर पर नियमित बैठकों के जरिए इस निगरानी तंत्र से प्राप्त आंकड़ों की समीक्षा की जाएगी, जिससे व्यवस्था में आ रही किसी भी कमी को समय रहते दूर किया जा सके। अत्याधुनिक मोबाइल ऐप और सरकारी बेड़े का ऐतिहासिक एकीकरण डिजिटल तकनीक के इस दौर में आपातकालीन सेवाओं को आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ना अनिवार्य हो चुका है। बैठक में निर्देश दिए गए कि 108 सेवा के संचालन और ट्रैकिंग के लिए शीघ्र एक अत्याधुनिक मोबाइल ऐप्लिकेशन विकसित किया जाए। इस ऐप के माध्यम से मरीज के परिजनों को एम्बुलेंस की सटीक जीपीएस लोकेशन, उसके पहुंचने का अनुमानित समय और उपलब्ध सुविधाओं की लाइव जानकारी मिल सकेगी। साथ ही, कॉल सेंटर और अस्पताल प्रबंधन को भी मरीज की स्थिति के बारे में पहले से सूचना मिल सकेगी ताकि अस्पताल पहुंचते ही तत्काल उपचार शुरू किया जा सके।
इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता को दोगुना करने के उद्देश्य से एक और युगांतरकारी निर्णय लिया गया। वर्तमान में राज्य में 108 सेवा के तहत दो सौ बहत्तर वाहन संचालित हो रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग के अपने बेड़े में लगभग ढाई सौ से अधिक सरकारी एम्बुलेंस भी उपलब्ध हैं। अब तक ये दोनों व्यवस्थाएं अलग-अलग ढर्रे पर चल रही थीं। मुख्य सचिव ने इन सभी सरकारी एम्बुलेंसों को भी आवश्यक जीवनरक्षक उपकरणों से सुसज्जित कर 108 के केंद्रीय नेटवर्क के साथ एकीकृत करने पर जोर दिया है। इन दोनों बेड़ों के एक साथ आने से सड़कों पर उपलब्ध आपातकालीन वाहनों की संख्या बढ़कर पांच सौ से अधिक हो जाएगी, जिससे आपदा, दुर्घटना या किसी महामारी जैसी स्थिति में भी सहायता की गति कई गुना बढ़ जाएगी।
यह संपूर्ण कार्ययोजना केवल वाहनों को बदलने या नई घोषणाएं करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की संपूर्ण आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को जवाबदेह, पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाने का एक ठोस रोडमैप है। खटारा वाहनों को हटाने, रियल-टाइम ऑडिट करने, आधुनिक तकनीक को जोड़ने और विभागीय बेड़े के एकीकरण से आम नागरिक को यह भरोसा मिलेगा कि जीवन के सबसे नाजुक मोड़ पर सरकारी तंत्र पूरी मजबूती के साथ उनके साथ खड़ा है।
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