Uttarakhand Assembly Session 2026: उत्तराखंड की राजनीति, भावना और जनआकांक्षाओं का केंद्र बिंदु जब भी गैरसैंण बनता है, तब-तब पहाड़ों की सर्द हवाओं में एक तपिश महसूस होने लगती है। चमोली जनपद के अंतर्गत आने वाले भराड़ीसैंण स्थित विधानसभा भवन में उत्तराखंड विधानसभा का विशेष सत्र औपचारिक रूप से शुरू हो चुका है। पहाड़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच लोकतंत्र के इस भव्य मंदिर का खुलना मात्र कोई प्रशासनिक प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह उस लंबे संघर्ष, शहादत और राज्य आंदोलन की अस्मिता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ पहलू है, जिसकी बुनियाद पर इस पर्वतीय प्रदेश की परिकल्पना की गई थी। आज जब विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण के नेतृत्व में सदन की कार्यवाही शुरू हो रही है, तो सदन के भीतर विधायी कामकाज, भारी-भरकम बजट के आंकड़े, सरकार के नीतिगत दस्तावेज और जनता से जुड़े प्रश्नों की गूंज है। वहीं दूसरी तरफ, सदन से चंद किलोमीटर दूर जंगलचट्टी की संकरी सड़कों पर सुरक्षा बलों के पहरे, कंटीले तारों की बाड़ और आंदोलनकारियों का जबरदस्त प्रतिरोध पहाड़ की उस अधूरी टीस को साफ बयां कर रहा है, जो पिछले ढाई दशकों से उत्तराखंड की आत्मा को मथ रही है।

इस बार का सत्र कई मायनों में अभूतपूर्व और ऐतिहासिक महत्व का है। राज्यपाल की औपचारिक स्वीकृति मिलने के बाद विधानसभा सचिवालय ने बहुत ही कम समय के भीतर इस सुदूर क्षेत्र में तमाम व्यवस्थाओं को अमलीजामा पहनाया। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण ने इस बात को बार-बार रेखांकित किया है कि यह सत्र केवल एक संवैधानिक अनिवार्यता की पूर्ति नहीं है, बल्कि यह उन जनप्रतिनिधियों के लिए अपनी आवाज को शासन-प्रशासन के सर्वोच्च पटल पर रखने का खुला मंच है, जो दूर-दराज के गांवों से चुनकर आते हैं। इस बार के सत्र के लिए प्रदेश भर के इकतीस विधायकों ने अब तक चार सौ छब्बीस प्रश्न सचिवालय को सौंपे हैं। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि राज्य के भीतर शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, आपदा प्रबंधन, रोजगार, जंगली जानवरों के आतंक और बुनियादी सड़कों की स्थिति को लेकर विधायकों के पास सवालों की लंबी फेहरिस्त है। यह सवाल महज स्याही से लिखे गए पन्ने नहीं हैं, बल्कि यह टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़, चंपावत और पौड़ी जैसे पर्वतीय जनपदों के उन सुदूर गांवों की धड़कनें हैं, जहां आज भी जीवन एक निरंतर संघर्ष है।
सदन की कार्यवाही का खाका बेहद अनुशासित और तय प्राथमिकताओं के आधार पर तैयार किया गया है। परंपरा और शिष्टाचार के मुताबिक सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण से शिष्टाचार भेंट की और आगामी विधायी कार्यों की रूपरेखा पर गहन विचार-विमर्श किया। इसके उपरांत पूर्वाह्न ग्यारह बजे पूरे सदन में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की गूंज के साथ कार्यवाही का शुभारंभ हुआ। सदन के आरंभ में उन विभूतियों, पूर्व विधायकों और सम्मानित नागरिकों के प्रति शोक संवेदना व्यक्त की गई, जिन्होंने हाल के समय में दुनिया को अलविदा कहा। संसदीय मर्यादा के अनुसार सदन ने उनके योगदान को याद करते हुए मौन रखकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

शोक संदेश के बाद विधायी और वित्तीय प्रक्रियाओं का मुख्य चरण शुरू हुआ। राज्य सरकार की ओर से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी वित्तीय वर्ष दो हजार छब्बीस-सत्ताईस के लिए अनुपूरक अनुदान मांगें पटल पर रख रहे हैं। यह अनुपूरक बजट राज्य के चालू वित्तीय वर्ष के दौरान विकास कार्यों को गति देने, आपदा से क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे की मरम्मत करने और विभिन्न जनहितैषी योजनाओं को निरंतर वित्तपोषित करने के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार की मंशा स्पष्ट है कि राज्य के विकास की गति किसी भी स्थिति में बाधित न हो, और इसके लिए राजकोषीय प्रावधानों को समय पर सुदृढ़ किया जाए। इसके साथ ही सरकार सदन में दो अहम अध्यादेशों को भी औपचारिक रूप से पेश कर रही है, जिन्हें पूर्व में विशेष परिस्थितियों में लागू किया गया था और अब उन्हें विधिवत कानूनी जामा पहनाया जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त नौ महत्वपूर्ण विधेयक भी इस सत्र के दौरान पेश किए जाएंगे, जिनका सीधा असर राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, जनसुविधाओं और कानून-व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर पड़ेगा। सचिवालय के सूत्रों के अनुसार राज्यपाल के अनुमोदन के बाद करीब तेरह नए अधिनियमों की घोषणा भी इस सत्र के दौरान की जाएगी, जो सरकार के कामकाज को नीतिगत स्थायित्व प्रदान करेंगे।
हालांकि, एक तरफ जहां सदन के भीतर संसदीय नियमों, बजट की धाराओं और विधायी भाषा का औपचारिक प्रवाह जारी है, वहीं सदन के बाहर की फिजा बेहद तनावपूर्ण और आक्रोश से भरी नजर आ रही है। भराड़ीसैंण विधानसभा से पहले पड़ने वाले जंगलचट्टी क्षेत्र में सुबह से ही गहमागहमी का माहौल बना हुआ है। उत्तराखंड क्रांति दल, प्रदेश प्रधान संगठन और स्वराज सेवादल के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत विधानसभा घेराव के लिए कूच किया। आंदोलनकारियों का हुजूम जैसे ही जंगलचट्टी के पास पहुंचा, पुलिस प्रशासन द्वारा लगाए गए मजबूत बैरिकेड्स और सुरक्षा घेरे ने उन्हें रोक लिया। इसके बाद आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में मौजूद कार्यकर्ताओं ने सड़क पर बैठकर धरना देना शुरू कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप चमोली की इस लाइफलाइन सड़क पर करीब दो किलोमीटर लंबा भीषण जाम लग गया।

जाम में सामान्य यात्री, स्थानीय ग्रामीण, आवश्यक सेवाओं से जुड़े वाहन और यहां तक कि कई सरकारी गाड़ियां भी फंसी नजर आईं। आंदोलनकारियों के तेवर इस बार बेहद तल्ख हैं। उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं का स्पष्ट कहना है कि गैरसैंण राज्य की आत्मा है और इसे केवल ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर या वर्ष में एक या दो बार सत्र आयोजित करके रस्म अदायगी करने का दौर अब बंद होना चाहिए। आंदोलनकारियों का तर्क है कि राज्य आंदोलनकारियों ने अपने प्राणों की आहुति इसलिए नहीं दी थी कि देहरादून के आरामदायक वातानुकूलित दफ्तरों से पर्वतीय राज्य की तकदीर तय की जाए। उनकी सीधी मांग है कि गैरसैंण को अविलंब उत्तराखंड की पूर्णकालिक और स्थायी राजधानी घोषित किया जाए। इसके साथ ही शासन-प्रशासन के सचिवालय, प्रमुख विभागों के निदेशालय और मंत्रियों व उच्चाधिकारियों के स्थायी दफ्तर गैरसैंण में स्थापित किए जाएं, ताकि पहाड़ की समस्याओं का समाधान उसी धरातल पर हो सके, जिस धरातल पर जनता पीड़ा सहती है।
प्रदेश प्रधान संगठन का इस आंदोलन में शामिल होना एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संदेश दे रहा है। ग्रामीण स्तर पर लोकतंत्र की पहली इकाई का प्रतिनिधित्व करने वाले ग्राम प्रधानों का कहना है कि गांवों से पलायन रोकने, खेती-किसानी को जंगली जानवरों से बचाने और पंचायतों को वित्तीय अधिकार संपन्न बनाने के लिए आवश्यक है कि सरकार का शीर्ष नेतृत्व पहाड़ की वास्तविक जलवायु और भूगोल के बीच बैठकर निर्णय ले। वहीं स्वराज सेवादल के युवाओं का कहना है कि राज्य बने हुए ढाई दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज भी गैरसैंण केवल एक भावनात्मक मुद्दा बनकर रह गया है, जिसे चुनावी फायदा लेने के लिए समय-समय पर हवा दी जाती है और चुनाव बीतते ही भुला दिया जाता है। प्रदर्शनकारियों का साफ ऐलान है कि जब तक सरकार गैरसैंण को लेकर कोई ठोस, निर्णायक और समयबद्ध घोषणा नहीं करती, तब तक उनका जनआंदोलन शांत नहीं होगा।
संभावित जनाक्रोश और विधानसभा घेराव की पहले से मिली खुफिया सूचनाओं को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ने सुरक्षा के कड़े और अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं। चमोली जिला प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भराड़ीसैंण और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा एक सौ तिरसठ को प्रभावी कर दिया है। इसके तहत किसी भी स्थान पर पांच या उससे अधिक लोगों के अनधिकृत रूप से एकत्र होने, जुलूस निकालने, हथियार या लाठी-डंडे लेकर चलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। विधानसभा भवन की ओर जाने वाले सभी संवेदनशील और प्रमुख रास्तों पर त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है। सड़क के चौराहों और मुख्य मोड़ों पर मजबूत लोहे के बैरिकेड्स लगाए गए हैं और उनके ऊपर कंटीले तार बिछाए गए हैं ताकि कोई भी प्रदर्शनकारी जबरन विधानसभा परिसर की ओर न बढ़ सके।
सुरक्षा व्यवस्था की कमान खुद वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने अपने हाथों में संभाल रखी है। शांति बनाए रखने और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए करीब पंद्रह सौ पुलिसकर्मियों, प्रांतीय रक्षक दल और दंगा नियंत्रण बलों की तैनाती की गई है। महिला पुलिसकर्मियों की भी बड़ी संख्या में तैनाती की गई है ताकि महिला प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित किया जा सके। ड्रोन कैमरों के माध्यम से पूरे इलाके की हवाई निगरानी की जा रही है और संकरे रास्तों व पगडंडियों पर भी पुलिस की गश्ती टीमें नजर बनाए हुए हैं। प्रशासन की पूरी कोशिश है कि सदन की कार्यवाही निर्बाध गति से चलती रहे और कोई भी तत्व विधानसभा भवन की गरिमा और सुरक्षा को भंग न कर सके।
सदन के भीतर की चर्चाओं पर लौटें तो विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण का रुख इस सत्र को लेकर अत्यंत गंभीर और संवेदनशील दिखाई देता है। उन्होंने अपने वक्तव्य में साफ कहा कि सदन का प्रत्येक मिनट राज्य की सवा करोड़ जनता की गाढ़ी कमाई से चलता है, इसलिए समय की बर्बादी किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराई जा सकती। उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से सदन को शांतिपूर्ण ढंग से चलाने और जनसमस्याओं पर सार्थक चर्चा करने की अपील की है। अध्यक्ष महोदया ने विधायकों द्वारा पूछे गए चार सौ छब्बीस प्रश्नों के संदर्भ में कहा कि विधायकों का मुख्य दायित्व अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को सदन के सामने रखना है। जब विधायक सवाल पूछते हैं, तो वे केवल व्यक्तिगत राय व्यक्त नहीं कर रहे होते, बल्कि वे अपने पूरे क्षेत्र की पीड़ा को सरकार के संज्ञान में ला रहे होते हैं।
विधायकों द्वारा लगाए गए प्रश्नों में सबसे बड़ा हिस्सा आधारभूत ढांचे से जुड़ा हुआ है। बारिश के मौसम के बाद पर्वतीय क्षेत्रों में टूटी सड़कें, भूस्खलन से बंद संपर्क मार्ग, पुलों की बदहाली और दूरदराज के क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन की कमी ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर कई विधायकों ने संबंधित विभागों से जवाब मांगा है। इसके अलावा पहाड़ के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी, अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे जैसी प्राथमिक जांच मशीनों का न होना और गंभीर मरीजों को देहरादून या हल्द्वानी रेफर किए जाने की मजबूरी पर भी तीखे सवाल पूछे गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पद, जर्जर भवन और उच्च शिक्षा में रोजगारपरक पाठ्यक्रमों का अभाव सदन में गरमाने वाले प्रमुख विषय हैं।
पेयजल संकट उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में एक गंभीर समस्या के रूप में उभरा है। जल जीवन मिशन के तहत बिछाई जा रही पाइपलाइनों की गुणवत्ता, प्राकृतिक जल स्रोतों के सूखने और कई गांवों में नलों में पानी न आने की शिकायतों पर विधायकों ने सरकार की घेराबंदी की तैयारी कर रखी है। इसके अलावा युवाओं में बेरोजगारी, सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने से उपजा असंतोष और स्थानीय स्तर पर आजीविका के अवसरों का अभाव भी ऐसे ज्वलंत प्रश्न हैं, जिनका सामना सरकार को सदन में करना पड़ेगा। जंगली जानवरों विशेषकर गुलदार, भालू और बंदरों द्वारा फसलों को पहुंचाए जा रहे नुकसान और मानव-वन्यजीव संघर्ष में जा रही इंसानी जानों का मुद्दा भी विधायकों के प्रश्नों में प्रमुखता से शामिल है।
विधानसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि संबंधित सरकारी विभाग इन सभी प्रश्नों का उत्तर औपचारिकता मात्र के रूप में न दें, बल्कि समय पर सटीक, प्रामाणिक और संतोषजनक जवाब पटल पर रखें। उन्होंने कहा कि विधायिका की गरिमा तभी बनी रहती है जब कार्यपालिका उसके प्रति जवाबदेह हो। सदन के माध्यम से सरकार को यह मौका मिलता है कि वह अपनी नीतियों, योजनाओं और उपलब्धियों को जनता के सामने रखे और यदि कहीं कोई कमी रह गई है तो उसे दूर करने का संकल्प ले। विपक्ष भी इस सत्र में सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरने की पूरी रणनीति बना चुका है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार गैरसैंण में सत्र केवल खानापूर्ति के लिए करती है और जनता के असल मुद्दों से उसका कोई सरोकार नहीं है। ऐसे में सदन के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक, आरोप-प्रत्यारोप और हंगामे के पूरे आसार बने हुए हैं।
गैरसैंण केवल एक भौगोलिक भूभाग नहीं है, यह उत्तराखंड की अस्मिता, उसके स्वाभिमान और उसके आत्मसम्मान की स्थायी राजधानी का स्वप्न है। जब उत्तराखंड अलग राज्य बना था, तब यह उम्मीद बंधी थी कि पहाड़ के कष्टों, उसकी विभीषिकाओं और उसके विकास की रूपरेखा पहाड़ की गोद से ही तय होगी। देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाकर जो यात्रा शुरू हुई थी, वह ढाई दशक बाद भी किसी स्थायी मुकाम पर नहीं पहुंच सकी है। भराड़ीसैंण में बना भव्य विधानसभा परिसर निश्चित रूप से एक उत्कृष्ट वास्तुकला का उदाहरण है, लेकिन ईंट और कंक्रीट का यह ढांचा तब तक अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर सकता, जब तक कि इसके गलियारों से पहाड़ के आम आदमी के आंसुओं को पोंछने वाली नीतियां न बनें।
आज जब जंगलचट्टी में आम लोग और नौजवान अपनी मांगों के लिए बैरिकेड्स पर पुलिस से जूझ रहे हैं और विधानसभा के भीतर मुख्यमंत्री व तमाम जनप्रतिनिधि राज्य के भविष्य की योजनाओं को कागजों पर दर्ज कर रहे हैं, तो यह दृश्य उत्तराखंड के वर्तमान द्वंद्व को पूरी स्पष्टता से उजागर करता है। एक तरफ उम्मीदें हैं कि सरकार इस सत्र में कोई ऐसा ऐतिहासिक निर्णय लेगी जिससे गैरसैंण को लेकर व्याप्त असमंजस समाप्त हो सके, वहीं दूसरी तरफ शंकाएं हैं कि कहीं यह सत्र भी पूर्व के सत्रों की भांति केवल औपचारिकता, हंगामे और अनुपूरक बजट पारित कराने तक ही सीमित न रह जाए।
बहरहाल, सत्र की शुरुआत हो चुकी है और आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि भराड़ीसैंण की यह विशाल इमारत जनता के विश्वास पर कितनी खरी उतरती है। क्या विधायकों द्वारा उठाए गए चार सौ छब्बीस प्रश्न केवल फाइलों की शोभा बनकर रह जाएंगे या उनसे जमीन पर कोई ठोस बदलाव देखने को मिलेगा? क्या सरकार अनुपूरक बजट के जरिए उन दूरस्थ क्षेत्रों तक विकास का उजाला पहुंचा पाएगी जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या उत्तराखंड की सरकार और उसकी पूरी व्यवस्था कभी उस जनभावना का सम्मान करते हुए गैरसैंण को वह स्थान दे पाएगी, जिसका वह वास्तव में हकदार है? इन तमाम सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सदन के पटल पर होने वाली बहसों, सरकार के जवाबों और सड़कों पर उठने वाली आवाजों के बीच ही तलाशने होंगे। लोकतंत्र की असली खूबसूरती यही है कि वह बंद कमरों के भीतर की सत्ता को सड़कों पर चल रहे आम इंसान के प्रति जवाबदेह बनाए रखती है, और आज गैरसैंण की धरती पर यही परीक्षा सत्ता और विपक्ष दोनों की एक साथ हो रही है।
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