Haldwani News: गोरापड़ाव ओवरब्रिज की डामरीकृत सतह पर शुक्रवार की दोपहर बिखरा खून केवल कुछ युवाओं के शरीर से नहीं बहा था, बल्कि उसने एक बार फिर हमारे समूचे प्रशासनिक तंत्र, सड़क नियोजन और बेलगाम रफ्तार के आगे बेबस खड़े समाज के दावों को लहूलुहान कर दिया। तीन होनहार छात्रों की मौके पर ही थम गई सांसें और अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी की जंग लड़ती एक सहपाठी छात्रा की सिसकियां चीख-चीख कर यह सवाल पूछ रही हैं कि आखिर किसी सड़क को सुरक्षित बनाने के लिए इंसानी जानों की कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले हल्द्वानी और तराई के इलाकों में सड़कों का जाल तो बिछाया जा रहा है, मगर उस जाल में सुरक्षा के मानक किस कदर उलझे हुए हैं, इसका जीता-जागता और दहला देने वाला प्रमाण राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक सौ नौ पर हुआ यह ताजा हादसा है।
हल्द्वानी से पंतनगर और रुद्रपुर की ओर जाने वाला यह मुख्य मार्ग केवल दो जिलों को जोड़ने वाली सड़क भर नहीं है, बल्कि यह समूचे पर्वतीय भूभाग को देश की राजधानी और मैदानी राज्यों से जोड़ने वाली आर्थिक और सामाजिक जीवन रेखा है। जब इसी जीवन रेखा पर आए दिन अर्थियां उठने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि विकास की रफ्तार और सुरक्षा के बुनियादी इंतजामात के बीच का संतुलन कहीं बहुत गहरे में टूट चुका है। शुक्रवार की इस दुखद घटना ने क्षेत्र के लोगों के भीतर एक गहरा आक्रोश और डर भर दिया है। माता-पिता जब अपने बच्चों को कॉलेज या कोचिंग के लिए घर से विदा करते हैं, तो उनकी नजरें दरवाजे पर टिकी रहती हैं कि बच्चा कब सकुशल लौटेगा। सड़क पर दौड़ते भारी वाहन, रेत और बजरी से लदे डंपर, अनियंत्रित गति और तकनीकी खामियों से भरे चौराहे हर मोड़ पर मौत का फंदा बनकर खड़े दिखाई देते हैं।
इस भयावह दुर्घटना के तुरंत बाद एक बार फिर प्रशासनिक फाइलें खुली हैं और योजनाओं के खाके मेजों पर फैला दिए गए हैं। यह बात सामने आई है कि हादसों और निरंतर लगने वाले भीषण जाम पर अंकुश लगाने के लिए एनएच-109 पर गोरापड़ाव और तीनपानी में फ्लाईओवर तथा अंडरपास निर्माण को हरी झंडी दी जा चुकी है। पचास करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इन ढांचों को लेकर दावे किए जा रहे हैं कि इनके धरातल पर उतरते ही यातायात का दबाव घट जाएगा और दुर्घटनाओं पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी। पचास करोड़ का यह बजट कागजों पर बेशक बहुत राहत देने वाला दिखाई देता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह भी पूछती है कि जब इस मार्ग पर लंबे समय से लगातार दुर्घटनाएं हो रही थीं, जब स्थानीय निवासी और सामाजिक संगठन लगातार इस ओवरब्रिज और आसपास के मोड़ों पर गति नियंत्रक, चेतावनी बोर्ड और बेहतर डिजाइन की मांग कर रहे थे, तब तक इन फाइलों को तेजी से आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया। क्या हमारे सिस्टम की यह पुरानी आदत बन चुकी है कि जब तक कोई बड़ी त्रासदी न हो जाए, तब तक किसी संवेदनशील मोड़ को ठीक करने का काम प्राथमिकता की सूची में नहीं आता।
तराई के इस पूरे इलाके की यातायात समस्या केवल गोरापड़ाव तक ही सीमित नहीं है। लालकुआं का इलाका दशकों से भारी वाहनों के जाम, संकरी सड़कों और रेलवे फाटकों की वजह से त्रस्त रहा है। लालकुआं नगर को इस निरंतर चलने वाले ट्रैफिक के चक्रव्यूह से मुक्ति दिलाने के लिए जिस बाईपास परियोजना को केंद्र सरकार की मंजूरी मिली है, वह निश्चित रूप से एक बहुत बड़ा और दूरगामी कदम कही जा सकती है। कुल बहत्तर सौ मीटर लंबी यानी सात दशमलव दो किलोमीटर की इस महत्वाकांक्षी परियोजना में पांच दशमलव दो सौ सतहत्तर किलोमीटर नया मार्ग निर्मित किया जाना प्रस्तावित है। यह नया मार्ग पूरी तरह से चार लेन का होगा, जिसकी सबसे बड़ी खूबी यह होगी कि हल्द्वानी और काठगोदाम की ओर जाने वाले भारी व्यावसायिक वाहन, डंपर, टैंकर और दूरदराज के राज्यों से आने वाला ट्रैफिक लालकुआं शहर की संकरी गलियों में घुसे बिना बाहर ही बाहर अपने गंतव्य की ओर निकल सकेगा।
जब भारी वाहन किसी घनी आबादी वाले शहर के भीतर से गुजरते हैं, तो वे केवल जाम ही नहीं लगाते, बल्कि स्थानीय नागरिकों, स्कूली बच्चों और पैदल चलने वालों के जीवन के लिए चौबीसों घंटे एक अदृश्य खतरा बने रहते हैं। लालकुआं के लोगों ने इस खतरे को रोज बहुत करीब से महसूस किया है। अब जब इस चार लेन मार्ग का खाका खींचा गया है, तो उम्मीद बंधी है कि शहर के भीतर का स्थानीय कारोबार और जनजीवन सुचारू हो सकेगा और प्रदूषण के भारी स्तर में भी कमी आ सकेगी।
इंजीनियरिंग के नजरिए से देखें तो इस प्रस्तावित बाईपास में सुरक्षा और तकनीकी सुगमता को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण संरचनाएं शामिल की गई हैं। डीपीआर के अनुसार इस पूरे नए रूट पर तीन छोटे पुलों का निर्माण किया जाएगा, ताकि स्थानीय बरसाती नालों और जल प्रवाह को बाधित किए बिना मार्ग को बारहमासी बनाया जा सके। इसके अलावा रेलवे लाइन को पार करने के लिए दो बड़े चार लेन रेलवे पुल प्रस्तावित किए गए हैं, जो भविष्य में ट्रेनों के आवागमन के समय लगने वाले लंबे जाम का हमेशा के लिए खात्मा करेंगे। स्थानीय ग्रामीणों, किसानों और छोटे वाहनों की आवाजाही को मुख्य हाईवे की तेज रफ्तार से अलग और सुरक्षित रखने के मकसद से चार वाहन अंडरपास बनाने का निर्णय भी लिया गया है। यह अंडरपास व्यवस्था बेहद जरूरी है, क्योंकि अक्सर हाईवे हादसों की मुख्य वजह वह कट होते हैं जहां ग्रामीण लिंक रोड अचानक तेज रफ्तार हाईवे से जुड़ती हैं।
इस परियोजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा टांडा क्षेत्र से होकर गुजरता है। नगला बाईपास के नजदीक टांडा के घने वन क्षेत्र में वर्तमान में जो सड़क गुजरती है, उसमें कई ऐसे तीखे और खतरनाक मोड़ हैं जो वाहन चालकों के लिए दृष्टि भ्रम पैदा करते हैं। मोड़ इतना अंधा होता है कि सामने से आने वाला भारी वाहन अंतिम क्षणों तक दिखाई नहीं देता और जरा सी भी मानवीय भूल सीधे आमने-सामने की भीषण भिड़ंत में तब्दील हो जाती है। नए प्रस्ताव के तहत इस टांडा क्षेत्र में लगभग छह सौ मीटर सड़क का संरेखण यानी एलाइनमेंट पूरी तरह बदला जाएगा। इस संरेखण सुधार से सड़क के उस तीखे मोड़ को सीधा कर दिया जाएगा, जिससे चालकों को सामने का रास्ता साफ दिखाई देगा और अप्रत्याशित हादसों की आशंका न्यूनतम हो जाएगी।
किसी भी बड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण की अपनी चुनौतियां होती हैं और लालकुआं बाईपास के साथ भी सबसे बड़ी चुनौती भूमि की उपलब्धता और पर्यावरणीय संतुलन की है। इस पूरी परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए लगभग इकतीस दशमलव चालीस हेक्टेयर भूमि की सख्त दरकार होगी। इसमें सबसे पेंचीदा पहलू यह है कि इस कुल भूमि में से साढ़े तेईस हेक्टेयर भूमि वन क्षेत्र की है। तराई और भाबर का यह इलाका अपनी समृद्ध जैव विविधता, घने जंगलों और वन्यजीवों की आवाजाही के लिए जाना जाता है। ऐसे में वन भूमि का डायवर्जन, पेड़ों का पातन और पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचाते हुए सड़क तैयार करना एक बेहद नाजुक काम है।
प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ा काम यह है कि वह आवश्यक भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करे और साथ ही वन विभाग, रेलवे बोर्ड और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी केंद्रीय व राज्य स्तरीय एजेंसियों से सभी अनिवार्य अनुमतियां बिना किसी अनावश्यक देरी के हासिल करे। अक्सर देखने में आता है कि परियोजनाओं के शिलान्यास तो बड़े उत्साह से हो जाते हैं, लेकिन फाइलें वन और वन्यजीव अनुमतियों के चक्कर में विभिन्न विभागों की मेजों पर सालों तक धूल फांकती रहती हैं। इस बार ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करना जनप्रतिनिधियों और शासन के शीर्ष अधिकारियों की सीधी जिम्मेदारी बनती है।
इसके साथ ही सुरक्षा और भविष्य की विमानन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पंतनगर एयरपोर्ट के आसपास के मार्ग में बदलाव की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। पंतनगर हवाई अड्डे का जिस तरह से विस्तार किया जा रहा है और उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करने की योजनाएं चल रही हैं, उसे देखते हुए एयरपोर्ट के रनवे, बाउंड्री और भविष्य के टर्मिनल के करीब से गुजरने वाले हाईवे का सुरक्षित और व्यवस्थित होना अपरिहार्य हो जाता है। यदि एयरपोर्ट विस्तार के चलते हाईवे की सुरक्षा में कोई व्यवधान आता है या विमानों की उड़ान सुरक्षा प्रभावित होती है, तो उसके लिए पहले से ही बाईपास के संरेखण में वैकल्पिक मार्ग जोड़ना एक दूरदर्शी सोच कही जाएगी।
तराई से थोड़ा और ऊपर भाबर की तलहटी की तरफ बढ़ें तो हल्द्वानी और काठगोदाम का इलाका भी पिछले एक दशक में भीषण ट्रैफिक दबाव का शिकार हुआ है। पहाड़ चढ़ने वाले पर्यटकों, श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के वाहनों का रेला हर वीकेंड और पर्यटन सीजन में पूरे हल्द्वानी शहर को थाम कर रख देता है। नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ या बागेश्वर जाने वाले हर व्यक्ति को शहर के भीतर रेंगते हुए गुजरना पड़ता है। इस गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के रूप में हल्द्वानी-काठगोदाम बाईपास को जो मंजूरी मिली है, वह पूरे कुमाऊं के लिए एक नई उम्मीद की किरण है। आठ दशमलव चार किलोमीटर लंबे इस प्रस्तावित बाईपास के तहत मौजूदा संकरे मार्ग को आधुनिक चार लेन में तब्दील किया जाएगा।
इस मार्ग की सबसे बड़ी भौगोलिक बाधा ऐतिहासिक गौला नदी रही है। बरसात के दिनों में उफनती गौला नदी जब अपने रौद्र रूप में होती है, तो पुराने पुलों पर दबाव असहनीय हो जाता है। परियोजना के तहत गौला नदी पर एक नया दो लेन का पुल निर्मित किया जाएगा, जो वर्तमान पुल के समानांतर बनकर दोनों तरफ के आवागमन को एक तरफा और निर्बाध प्रवाह देगा। इसके अलावा मार्ग की उपयोगिता और ढलान को संतुलित करने के लिए करीब एक दशमलव चार किलोमीटर लंबे हिस्से के संरेखण में भी तकनीकी सुधार किया जाना तय पाया गया है।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री अजय टम्टा ने इस पूरे मामले पर स्पष्ट किया है कि लालकुआं बाईपास की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर पूरी तरह तैयार कर ली गई है। हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम से लेकर काठगोदाम गौला पुल तक की सड़क को फोरलेन बनाने का काम केवल वाहनों की गति बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि यह इस समूचे पर्वतीय और मैदानी संभाग के आर्थिक विकास को एक नया आयाम देने का माध्यम बनेगा। जब सड़कें चौड़ी, सपाट और सुरक्षित होती हैं, तो व्यापारिक माल ढुलाई की लागत घटती है, पर्यटकों का समय बचता है, और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के लिए एंबुलेंस को जाम में तड़पना नहीं पड़ता। अजय टम्टा का यह विश्वास कि इन सभी ढांचागत सुधारों से क्षेत्र में दुर्घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगेगा, तभी सच साबित हो सकता है जब निर्माण की गुणवत्ता और समयसीमा पर कड़ा पहरा रखा जाए।
लेकिन इन तमाम भव्य घोषणाओं, मंजूरियों और करोड़ों रुपयों के बजट के समानांतर हमें उस मूल सवाल पर फिर लौटना होगा जो शुक्रवार को गोरापड़ाव में दम तोड़ गए उन तीन नौजवानों के परिवारों के दिलों को चीर रहा है। क्या केवल चौड़े फोरलेन और कंक्रीट के ओवरब्रिज बना देने से हमारी सड़कें सुरक्षित हो जाएंगी? आधुनिक हाईवे इंजीनियरिंग यह मानती है कि जब तक सड़क पर चलने वालों के भीतर लेन अनुशासन, नियंत्रित गति का भाव और प्रशासनिक स्तर पर सख्त प्रवर्तन व्यवस्था नहीं होगी, तब तक चौड़ी सड़कें कभी-कभी और भी ज्यादा जानलेवा साबित होने लगती हैं। चौड़ी और सपाट सड़क अक्सर चालकों को अपनी गति सीमा लांघने के लिए उकसाती है।
सड़क परिवहन की योजनाएं केवल गिट्टी, तारकोल और सीमेंट का जोड़ नहीं होतीं, वे इंसानी जिंदगियों के सफर का रास्ता होती हैं। लालकुआं का बाईपास हो, टांडा के जंगल का सीधा होता मोड़ हो, पंतनगर का सुधरा हुआ रास्ता हो या फिर हल्द्वानी से काठगोदाम तक गौला नदी के सीने पर खड़ा होने वाला नया पुल, ये सभी योजनाएं उत्तराखंड के विकास की अनिवार्य जरूरत हैं। मगर इन योजनाओं की सार्थकता इसी बात में है कि निर्माण कार्य में एक भी दिन की अतिरिक्त देरी न हो और जब तक यह ढांचे बनकर तैयार न हों, तब तक वर्तमान सड़क पर सुरक्षा का ऐसा मजबूत घेरा बनाया जाए कि फिर किसी होनहार छात्र की पढ़ाई का सफर गोरापड़ाव के किसी खूनी मोड़ पर हमेशा के लिए खामोश न हो जाए।
कुमाऊं की जनता अब केवल आश्वासनों और डीपीआर के आंकड़ों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उसे जमीन पर बुलडोजर, रोलर और कंक्रीट मिक्सर चलते हुए दिखने चाहिए, और साथ ही सड़क पर तैनात वह खाकी वर्दी भी दिखनी चाहिए जो मनमानी रफ्तार पर कानून का चाबुक चला सके। विकास और सुरक्षा जब कदम से कदम मिलाकर चलेंगे, तभी हम कह सकेंगे कि हमारी सड़कें जिंदगी संवारने के लिए बनी हैं, जिंदगी छीनने के लिए नहीं।
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