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Uttarakhand Anganwadi: आंगनवाड़ी योजनाएं 7 अक्टूबर तक शत-प्रतिशत कवरेज का अल्टीमेटम

On: October 6, 2026 5:37 AM
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Uttarakhand Anganwadi: आंगनवाड़ी योजनाएं 7 अक्टूबर तक शत-प्रतिशत कवरेज का अल्टीमेटम
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Uttarakhand Anganwadi: देवभूमि उत्तराखंड के सामाजिक ताने-बाने में आंगनवाड़ी केंद्रों की भूमिका सदैव एक ऐसी जीवन रेखा जैसी रही है, जो हर विषम परिस्थिति में ग्रामीणों के साथ खड़ी नजर आती है। इन्हीं केंद्रों को नई ऊर्जा, चेतना और सीधे संवाद का जीवंत केंद्र बनाने के उद्देश्य से जब ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत ‘आंगन का मिलन’ जैसा कार्यक्रम शुरू किया गया, तो उसका मकसद सरकारी फाइलों की सीमाओं को लांघकर सीधे मानवीय संवेदनाओं तक पहुंचना था। देहरादून स्थित राज्य सचिवालय के सभागार में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक इसी जमीनी उद्देश्य को अंतिम सीमा तक साकार करने की एक गंभीर प्रशासनिक पहल बनकर सामने आई, जिसकी कमान स्वयं प्रदेश की महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्या ने संभाली।

उस दिन सचिवालय के कक्ष में लगी स्क्रीन पर प्रदेश के सभी तेरह जनपदों के जिला कार्यक्रम अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े हुए थे। यह केवल अधिकारियों की एक औपचारिक उपस्थिति नहीं थी, बल्कि इसमें टिहरी और उत्तरकाशी के ऊंचे शिखरों से लेकर चमोली और पिथौरागढ़ की सुदूर घाटियों, तथा हरिद्वार व उधम सिंह नगर के मैदानी अंचलों तक की प्रशासनिक धड़कनें महसूस की जा रही थीं। बैठक का मुख्य बिंदु यह समीक्षा करना था कि ‘आंगन का मिलन’ अभियान ने अब तक कितने परिवारों के जीवन को छुआ है और जो दूरी शेष रह गई है, उसे तय समय सीमा यानी सात अक्टूबर तक किस समर्पण भाव के साथ पूरा किया जाना है।

अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों ने इस बात की स्पष्ट गवाही दी कि अभियान ने बहुत कम समय में एक व्यापक जन आंदोलन का रूप ले लिया है। राज्यभर में संचालित करीब बीस हजार आंगनवाड़ी केंद्रों में से अब तक तेरह हजार से अधिक केंद्रों पर इस कार्यक्रम का गरिमामय और सफल आयोजन पूरा किया जा चुका है। इन केंद्रों पर न केवल पोषण और स्वास्थ्य की बात हुई, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की दर्जनों जनकल्याणकारी योजनाओं की सीधी जानकारी उन माताओं और बहनों तक पहुंचाई गई, जो अक्सर सूचनाओं के अभाव में अपने अधिकारों से वंचित रह जाती थीं। बैठक में मंत्री ने इस प्रगति की सराहना तो की, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी बहुत स्पष्ट शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि विकास की असली परीक्षा शत-प्रतिशत के आंकड़े को छूने में ही है।

जब हम पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ दर्शन की बात करते हैं, तो उसका मूल तत्व यह होता है कि समाज के सबसे निचले पायदान और सबसे अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान आए। कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या ने समीक्षा बैठक के दौरान इसी अंत्योदय के भाव को अपने वक्तव्य का केंद्र बिंदु बनाया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व का मूल उद्देश्य यही है कि कोई भी पात्र नागरिक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के लिए मजबूर न हो, बल्कि सरकार खुद चलकर उसके दरवाजे तक पहुंचे। ‘आंगन का मिलन’ इसी विचार का एक व्यावहारिक और जीवंत स्वरूप है। यदि किसी दुर्गम गांव की एक भी गर्भवती महिला या किशोरी किसी योजना के लाभ से छूट जाती है, तो अंत्योदय का वह संकल्प अधूरा रह जाता है। इसी कारण उन्होंने स्पष्ट शब्दों में निर्देशित किया कि सात अक्टूबर की अंतिम तिथि से पहले हर शेष बचे आंगनवाड़ी केंद्र पर यह उत्सव आयोजित हो और वहां शत-प्रतिशत लाभार्थियों का पंजीकरण और लाभ वितरण सुनिश्चित किया जाए।

इस पूरे कार्यक्रम की बनावट को यदि मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पारंपरिक सरकारी कार्यशैली से बिल्कुल अलग है। पहले अक्सर यह देखा जाता था कि योजनाएं बनती थीं, सर्कुलर जारी होते थे, लेकिन गांव की किसी साधारण महिला को यह पता ही नहीं चल पाता था कि उसके और उसके नवजात शिशु के लिए सरकार ने कौन सी सुरक्षा योजनाएं बनाई हैं। ‘आंगन का मिलन’ ने इस खाई को पाटने का काम किया है। गांव के आंगनवाड़ी केंद्र में जब गांव की महिलाएं, धात्री माताएं, किशोरी बालिकाएं और नन्हे बच्चे एक साथ बैठते हैं, तो वहां का माहौल किसी पारिवारिक उत्सव जैसा बन जाता है। वहां आंगनवाड़ी कार्यकत्री और सहायिका केवल कर्मचारी के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य के रूप में उनसे संवाद करती हैं। वहां मातृत्व वंदना योजना, महालक्ष्मी किट, मुख्यमंत्री आंचल अमृत योजना और पोषण अभियान जैसे विषयों पर सीधी चर्चा होती है। महिलाएं बिना किसी संकोच के अपने स्वास्थ्य, खान-पान और बच्चों के विकास के बारे में सवाल पूछती हैं और उन्हें मौके पर ही समाधान व सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

तकनीक और पारदर्शिता के इस युग में बैठक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय कार्यक्रमों की गूगल मैपिंग को लेकर रहा। रेखा आर्या ने सभी जिला कार्यक्रम अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए कि जिन तेरह हजार से अधिक केंद्रों पर कार्यक्रम हो चुके हैं और जहां अब होने बाकी हैं, उन सभी की शत-प्रतिशत गूगल मैपिंग तुरंत पूरी की जाए। डिजिटल मैपिंग केवल एक तकनीकी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह जवाबदेही और पारदर्शिता का सबसे पुख्ता प्रमाण है। इसके माध्यम से आयोजन स्थल की भौगोलिक स्थिति, समय और कार्यक्रम की वास्तविक तस्वीरों का एक डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो जाता है। इससे उच्च स्तर पर बैठे नीति निर्धारकों को यह तुरंत पता चल जाता है कि किस सुदूरवर्ती तोक या मजरे के केंद्र पर सचमुच गतिविधि हुई है और कहां सुधार की आवश्यकता है। यह आधुनिक तकनीक और जमीनी सेवा का एक सुंदर समन्वय है, जो व्यवस्था से बिचौलियों और कागजी खानापूरी को पूरी तरह समाप्त कर देता है।

उत्तराखंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां किसी भी अभियान के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी चुनौती होती हैं। राज्य के कई ऐसे गांव हैं जहां सड़क मार्ग से मीलों पैदल चलकर ही पहुंचा जा सकता है। बरसात के बाद के मौसम में कई जगह पगडंडियां टूटी होती हैं और नदियां उफान पर होती हैं। इन तमाम बाधाओं के बावजूद आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं ने जिस निष्ठा से इस अभियान को आगे बढ़ाया है, वह वास्तव में वंदनीय है। मंत्री ने अपने संबोधन में इन मैदानी कार्यकर्ताओं के योगदान को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी बहनें विभाग की असली रीढ़ हैं। जब वे अपने सिर पर पोषण सामग्री लेकर या हाथों में वजन तौलने की मशीन और रजिस्टर लेकर चढ़ाइयों को चढ़ती हैं, तो वे केवल अपनी नौकरी नहीं कर रही होतीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ी की नींव को मजबूत कर रही होती हैं। सरकार की योजनाओं की सफलता इन्हीं बहनों के पसीने और समर्पण पर टिकी हुई है।

समीक्षा बैठक के दौरान किशोरियों के स्वास्थ्य और उनके मानसिक सशक्तिकरण पर भी विशेष चर्चा हुई। समाज में आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों के पोषण को लेकर झिझक बनी रहती है। ‘आंगन का मिलन’ मंच ने इस वर्जना को तोड़ा है। केंद्रों पर आने वाली किशोरियों को सेनेटरी नैपकिन के वितरण के साथ-साथ एनिमिया से बचाव के लिए आयरन की गोलियों के नियमित सेवन और संतुलित आहार का महत्व समझाया जा रहा है। जब एक किशोरी स्वस्थ और जागरूक बनेगी, तभी वह भविष्य में एक सशक्त नारी और स्वस्थ मां बनकर परिवार तथा समाज को नई दिशा दे सकेगी। इसी तरह नवजात शिशुओं के टीकाकरण, नियमित वजन की निगरानी और कुपोषण की पहचान कर उन्हें समय रहते पोषण पुनर्वास केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था को इस अभियान के जरिए एक नई गति मिली है।

डबल इंजन सरकार के समन्वय पर जोर देते हुए रेखा आर्या ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में केंद्र सरकार ने महिला एवं बाल विकास को राष्ट्र निर्माण का केंद्रीय विषय बनाया है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ से लेकर ‘मिशन वात्सल्य’ और ‘सक्षम आंगनवाड़ी’ जैसी योजनाएं इसी सोच का परिणाम हैं। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कुशल नेतृत्व में इन सभी केंद्रीय योजनाओं को राज्य की विशिष्ट भौगोलिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालकर पूरी संवेदनशीलता से लागू किया जा रहा है। राज्य सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्रों को केवल दलिया बांटने की जगह नहीं रहने दिया है, बल्कि उन्हें आधुनिक प्ले स्कूल के रूप में विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं, जहां बच्चों के शारीरिक विकास के साथ-साथ उनकी बौद्धिक और रचनात्मक क्षमता का भी विकास हो सके।

सात अक्टूबर की समय सीमा अधिकारियों के लिए केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह एक मिशन मोड में काम करने की चुनौती है। बैठक के अंतिम सत्र में मंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट कर दिया कि इस कार्य में किसी भी प्रकार की शिथिलता या लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जाएगा। जो सात हजार के करीब केंद्र शेष रह गए हैं, वहां युद्धस्तर पर तैयारियां पूरी की जाएं। उन्होंने सभी जिला कार्यक्रम अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे स्वयं फील्ड में निकलें, केंद्रों का औचक निरीक्षण करें और यह सुनिश्चित करें कि गांव का कोई भी गरीब, वंचित या असहाय परिवार इस मिलन के लाभ से अछूता न रह जाए।

सचिवालय से निकला यह निर्देश जब मैदानी हकीकत बनता है, तो उसका असर केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि साधारण लोगों के चेहरों की चमक में दिखाई देता है। जब एक गरीब मां को अपने कुपोषित बच्चे के लिए पौष्टिक आहार और चिकित्सीय सलाह मिलती है, जब एक किशोरी को अपनी पढ़ाई और स्वास्थ्य के लिए सरकारी मदद का भरोसा मिलता है, और जब एक बुजुर्ग दादी या नानी अपने आंगन में सरकारी तंत्र को अपनी सेवा में तत्पर देखती है, तब लोकतंत्र का असली अर्थ सार्थक होता है। ‘आंगन का मिलन’ अभियान उत्तराखंड के हर उस गांव के लिए एक वरदान सिद्ध हो रहा है, जहां सुविधाएं देर से पहुंचती थीं लेकिन अब सरकार खुद उनके आंगनों में दस्तक दे रही है। रेखा आर्या के इस कड़े लेकिन संजीदा प्रशासनिक रुख ने पूरे विभाग में एक नई ऊर्जा का संचार किया है, जिसका सुखद परिणाम सात अक्टूबर तक शत-प्रतिशत लक्ष्य की प्राप्ति के साथ पूरे प्रदेश के सामने एक सशक्त और आत्मनिर्भर नारी शक्ति के रूप में परिलक्षित होगा।

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