ताजा खबरें क्राइम लाइफस्टाइल मौसम खेल बॉलीवुड हॉलीवुड जॉब - एजुकेशन स्वास्थ्य राज्य देश विदेश राशिफल लाइफ - साइंस धर्म अन्य

---Advertisement---

Uttarakhand News: वर्ल्डस्किल्स 2026 उत्तराखंड के सानिया और पार्थ ने जीते रजत पदक

On: September 29, 2026 1:11 PM
Follow Us:
Uttarakhand News: वर्ल्डस्किल्स 2026 उत्तराखंड के सानिया और पार्थ ने जीते रजत पदक
---Advertisement---

Uttarakhand News: अंतरराष्ट्रीय फलक पर जब किसी राष्ट्र की युवा शक्ति अपनी मेधा, समर्पण और तकनीकी दक्षता का परचम लहराती है, तो वह केवल पदकों की एक साधारण संख्या नहीं होती, बल्कि उस राष्ट्र के भविष्य की मजबूत नींव और दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण बन जाती है। चीन के महानगर शंघाई में 22 से 27 सितंबर 2026 के मध्य आयोजित 48वीं वर्ल्डस्किल्स प्रतियोगिता में भारत ने जो अप्रतिम इतिहास रचा है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक विशाल स्रोत सिद्ध होगा। इस वैश्विक महाकुंभ में दुनिया के विकसित और तकनीकी रूप से अग्रणी देशों के बीच प्रतिस्पर्धा करते हुए भारत ने कुल छह रजत पदक और बीस मेडलियन फॉर एक्सीलेंस अर्जित कर शीर्ष दस देशों की प्रतिष्ठित सूची में अपना स्थान सुरक्षित किया। यह विश्व कौशल प्रतियोगिता के इतिहास में भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है, जिसने वैश्विक स्तर पर भारतीय कौशल पारिस्थितिकी तंत्र की साख को स्थापित किया है।

इस राष्ट्रीय गौरव और ऐतिहासिक विजय की गाथा में देवभूमि उत्तराखंड का योगदान विशेष रूप से स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया है। हिमालय की शांत वादियों और पावन नदियों की गोद से निकलकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा के केंद्र तक पहुंचे दो होनहार युवाओं, सानिया जोशी और पार्थ वोहरा ने अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर दुनिया को चकित कर दिया। सानिया जोशी ने रिटेल सेल्स के अत्यंत प्रतिस्पर्धी और व्यावहारिक क्षेत्र में अपनी वाकपटुता, ग्राहक मनोविज्ञान की गहरी समझ और व्यावसायिक निपुणता का प्रदर्शन करते हुए देश के लिए रजत पदक जीता। वहीं दूसरी ओर, पार्थ वोहरा ने इंडस्ट्रियल डिजाइन टेक्नोलॉजी जैसी जटिल, आधुनिक और नवाचार से परिपूर्ण विधा में अपनी तकनीकी सूझबूझ और सटीक डिजाइनिंग क्षमता के बल पर रजत पदक अपने नाम किया। इन दोनों युवाओं की यह विजय केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट उद्घोष है कि उत्तराखंड के युवाओं में पारंपरिक सीमाओं को लांघकर अत्याधुनिक वैश्विक मानकों पर खरा उतरने का असीम सामर्थ्य विद्यमान है।

वर्ल्डस्किल्स प्रतियोगिता को वैश्विक स्तर पर कौशल का ओलंपिक माना जाता है। यह एक ऐसा मंच है जहां केवल सैद्धांतिक ज्ञान की परीक्षा नहीं होती, बल्कि हाथों की कारीगरी, मन की एकाग्रता, समय प्रबंधन और संकट के क्षणों में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता की अग्निपरीक्षा ली जाती है। वर्ष 2026 के इस 48वें संस्करण में विश्व के कोने-कोने से आए लगभग चौदह सौ प्रतिभागियों ने चौंसठ विभिन्न कौशल विधाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने का प्रयास किया। यह वह मंच था जहां रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी, ग्राफिक डिजाइनिंग और सेवा क्षेत्र के उच्चतम मानकों की सीधी तुलना हो रही थी। ऐसे कड़े माहौल में, जहां एक सेकंड की देरी या एक मिलीमीटर की चूक पदक की दौड़ से बाहर कर सकती है, उत्तराखंड के इन दोनों युवाओं ने जिस मानसिक दृढ़ता, धैर्य और सटीकता का परिचय दिया, वह उनकी गहन तैयारी और अडिग संकल्प को दर्शाता है।

इस सफलता की पृष्ठभूमि किसी एक दिन की मेहनत से तैयार नहीं हुई थी। इसके पीछे वर्षों का अथक परिश्रम, नियमित अभ्यास और राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की एक सुव्यवस्थित चयन प्रक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उत्तराखंड के इन दोनों पदकों की आधारशिला दरअसल ‘इंडिया स्किल्स 2025-26’ की राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं के दौरान रखी गई थी। राज्य के कौशल विकास एवं सेवायोजन विभाग तथा उत्तराखंड कौशल विकास समिति द्वारा राज्य के दूरदराज के क्षेत्रों, छोटे कस्बों और नगरों से प्रतिभाओं को खोज निकालने के लिए जो व्यापक अभियान चलाया गया था, उसी की परिणति आज शंघाई के पोडियम पर दिखाई दी है। इस संस्थागत व्यवस्था ने साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि उनके हुनर को सही दिशा, आधुनिक संसाधन और अंतरराष्ट्रीय स्तर का मार्गदर्शन मिल सकता है।

image 199
Photo- 48th WorldSkills Competition held in Shanghai, China

इंडिया स्किल्स की चयन प्रक्रिया अपने आप में अत्यंत कठोर और पारदर्शी होती है। जिला और राज्य स्तर से चयनित होकर प्रतिभागियों को क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेना होता है, जहां उनका मुकाबला अपने ही देश के विभिन्न राज्यों के सर्वश्रेष्ठ युवाओं से होता है। क्षेत्रीय स्तर पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के बाद राष्ट्रीय मंच यानी नेशनल स्किल्स कॉम्पिटिशन में प्रवेश मिलता है। इस पूरी यात्रा में प्रतिभागियों को न केवल तकनीकी कसौटियों पर परखा जाता है, बल्कि कार्यस्थल के दबाव, लगातार कई घंटों तक बिना थके काम करने की शारीरिक क्षमता और नवाचार के साथ काम पूरा करने की कला का भी सतत मूल्यांकन किया जाता है। सानिया और पार्थ ने इस लंबी और चुनौतीपूर्ण श्रृंखला के प्रत्येक पड़ाव को सफलतापूर्वक पार किया और राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक अर्जित कर विश्व मंच के लिए भारत के आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में अपनी जगह बनाई।

सानिया जोशी की बात करें तो रिटेल सेल्स का क्षेत्र देखने में भले ही एक सामान्य व्यावसायिक गतिविधि प्रतीत हो, परंतु अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप यह विज्ञान और कला का एक अत्यंत दुर्लभ सम्मिश्रण है। आज के आधुनिक बाजार में रिटेल सेल्स केवल उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ता के व्यवहार का विश्लेषण करने, उसकी अनकही जरूरतों को समझने, डिजिटल इन्वेंट्री का प्रबंधन करने, दृश्य मर्चेंडाइजिंग और उत्कृष्ट संचार कौशल के माध्यम से एक दीर्घकालिक संबंध स्थापित करने से जुड़ा है। शंघाई की प्रतियोगिता में सानिया के सामने विभिन्न देशों के काल्पनिक ग्राहकों की ऐसी जटिल परिस्थितियां प्रस्तुत की गईं, जहां सांस्कृतिक भिन्नताओं, भाषा की बाधाओं और विषम व्यावसायिक परिदृश्यों के बीच त्वरित समाधान देना अनिवार्य था। सानिया ने अपनी सौम्यता, आत्मविश्वास, तीव्र विश्लेषण क्षमता और सम्मोहक संवाद शैली से अंतरराष्ट्रीय निर्णायक मंडल को गहराई से प्रभावित किया। उनका प्रदर्शन यह सिद्ध करता है कि भारतीय युवाओं में वैश्विक सेवा क्षेत्र की जटिलताओं को समझकर उत्कृष्ट परिणाम देने की पूरी क्षमता है।

दूसरी तरफ, पार्थ वोहरा ने जिस इंडस्ट्रियल डिजाइन टेक्नोलॉजी में रजत पदक जीता है, वह भविष्य के उद्योगों की धड़कन है। यह क्षेत्र इंजीनियरिंग, कलात्मक सौंदर्यबोध और आधुनिक सॉफ्टवेयर के त्रिवेणी संगम पर काम करता है। किसी भी औद्योगिक उत्पाद का खाका तैयार करते समय उसकी उपयोगिता, लागत, उत्पादन की सुगमता, पर्यावरण अनुकूलता और एर्गोनॉमिक्स का ध्यान रखना होता है। प्रतियोगिता के दौरान पार्थ को बेहद कम समय में एक जटिल औद्योगिक उपकरण की थ्री-डी मॉडलिंग, उसके आंतरिक घटकों की डिजाइनिंग और प्रोटोटाइप तैयार करने का कठिन कार्य सौंपा गया था। इसमें सॉफ्टवेयर पर काम करते हुए माइक्रोमीटर के स्तर की सटीकता की आवश्यकता थी। पार्थ ने अपनी अद्भुत एकाग्रता और तकनीकी समझ का परिचय देते हुए समय सीमा के भीतर एक ऐसा प्रोटोटाइप डिजाइन तैयार किया, जिसने दुनिया के दिग्गज औद्योगिक देशों के विशेषज्ञों को भी उनकी प्रतिभा की सराहना करने पर विवश कर दिया।

उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में इस दोहरी सफलता का सामाजिक और आर्थिक महत्व अत्यंत गहरा है। एक पर्वतीय राज्य के रूप में उत्तराखंड लंबे समय से युवाओं के रोजगार और आजीविका की चुनौतियों से जूझता रहा है। राज्य से होने वाले पलायन की समस्या को रोकने के लिए पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक और रोजगारपरक कौशल का विकास करना समय की सबसे बड़ी मांग रही है। सानिया जोशी और पार्थ वोहरा की इस विजय ने राज्य के हजारों युवाओं की सोच को एक नया आयाम दिया है। इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि कौशल आधारित शिक्षा किसी भी पारंपरिक डिग्री की तुलना में कहीं अधिक सम्मान, वैश्विक पहचान और आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर सकती है। यह उपलब्धि इस धारणा को पूरी तरह तोड़ती है कि वैश्विक स्तर की तकनीकी और व्यावसायिक उपलब्धियां केवल महानगरों के महंगे संस्थानों में पढ़ने वाले युवाओं के हिस्से ही आ सकती हैं।

इस गौरवपूर्ण क्षण को साकार करने में उत्तराखंड कौशल विकास समिति और कौशल विकास एवं सेवायोजन विभाग की कार्यप्रणाली की भी सराहना की जानी चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने वोकेशनल ट्रेनिंग के बुनियादी ढांचे को सुधारने, उद्योग जगत की जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रमों को अपडेट करने और अनुभवी प्रशिक्षकों की सेवाएं उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। सानिया और पार्थ के चयन के बाद उन्हें राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों के सानिध्य में गहन प्रशिक्षण दिलवाया गया। उन्हें अत्याधुनिक उपकरणों, सॉफ्टवेयर और वैश्विक प्रतियोगिता के वास्तविक माहौल के अनुरूप तैयार किया गया, जिससे शंघाई के दबाव भरे वातावरण में वे विचलित नहीं हुए और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दे सके।

भारत का इस प्रतियोगिता में दसवें स्थान पर आना राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे ‘स्किल इंडिया मिशन’ की सार्थकता का एक ठोस प्रमाण है। विकसित भारत के निर्माण का जो संकल्प देश ने लिया है, उसकी सबसे मजबूत रीढ़ वही युवा हैं जो अपने हुनर से देश की उत्पादन क्षमता, नवाचार और सेवा क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। शंघाई में सानिया और पार्थ द्वारा जीते गए रजत पदक न केवल उत्तराखंड की गौरवगाथा में नए अध्याय जोड़ते हैं, बल्कि देश के हर उस युवा के भीतर उम्मीद की एक नई किरण जगाते हैं जो किसी हुनर को सीखने के लिए पसीना बहा रहा है। यह विजय बताती है कि जब प्रतिभा को सही मंच, उचित मार्गदर्शन और व्यवस्था का अटूट विश्वास मिल जाए, तो सुदूर पहाड़ों से उठी गूंज संपूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित करने का दम रखती है।

Kedarnath Dham: केदारनाथ में कचरा संकट,15 लाख यात्रियों ने फैलाया 250 टन कूड़ा

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment