Kedarnath Dham News: हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच बसे भगवान केदारनाथ धाम युगों से तप, वैराग्य और आत्मिक शांति का केंद्र रहा है। दुर्गम घाटियों, पतली पगडंडियों और प्राणवायु की कमी वाले इस ऊंचे भूभाग पर जाने का उद्देश्य कभी स्वयं को प्रकृति के समक्ष समर्पित करना माना जाता था। समय बदला और तकनीक के साथ सुलभ हुई सड़कों ने इस कठिन तीर्थ को लाखों लोगों की पहुंच में ला खड़ा किया। दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि के साथ इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, उसकी एक तस्वीर हालिया आंकड़ों ने उजागर की है। मौजूदा यात्रा सत्र में लगभग 15.45 लाख श्रद्धालुओं के आगमन के साथ 250 टन से अधिक ठोस कचरा इस मार्ग और धाम क्षेत्र में दर्ज किया गया है।
बीते वर्ष की तुलना में यह आंकड़ा लगभग 10.7 गुना अधिक बताया जा रहा है। इनमें खाली प्लास्टिक की बोतलें, सिंगल यूज रेनकोट, पैकेज्ड फूड के पैकेट और धातुओं के डिब्बे शामिल हैं। इसी कठिन परिस्थिति के बीच कुछ जागरूक यात्रियों और संस्थाओं द्वारा लगभग 12 टन कचरा वापस नीचे लाने की पहल भी सामने आई, जिससे उम्मीद की एक किरण दिखाई देती है, किंतु 250 टन के मुकाबले यह प्रयास बेहद सीमित है। उपभोग की संस्कृति और पर्वतीय तीर्थाटन का बदलता स्वरूप बीते कुछ दशकों में केदारघाटी का पूरा चरित्र बदला है। पहले यात्रा महीनों की तैयारी और न्यूनतम सामान के साथ की जाती थी, जिसमें स्थानीय संसाधनों और साधारण खान-पान पर निर्भरता होती थी।
आज आधुनिक पर्यटन की सभी सुविधाएं पहाड़ के शिखर तक पहुंचाने की होड़ मची है। चिप्स, बिस्कुट, डिब्बाबंद जूस, प्लास्टिक में पैक मिनरल वाटर और डिस्पोजेबल सामान यात्रा का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। गौरीकुंड से लेकर केदारनाथ धाम तक फैला 16 किलोमीटर का पैदल मार्ग अब केवल एक भक्ति पथ नहीं रहा, बल्कि दोनों तरफ सजी अनगिनत अस्थायी दुकानों का बाजार बन चुका है। यात्री चलते-चलते पानी की बोतल खाली करते हैं और उसे बिना सोचे-समझे खाई में उछाल देते हैं। प्लास्टिक का एक हल्का रैपर जिसे यात्री एक क्षण में फेंक देता है, इस अत्यंत ठंडी जलवायु में सैकड़ों वर्षों तक ज्यों का त्यों पड़ा रहता है, क्योंकि कम तापमान और ऑक्सीजन की कमी में जैविक अपघटन की प्रक्रिया लगभग शून्य हो जाती है।
250 टन कचरा और आंकड़ों के पीछे का भयावह यथार्थ जब हम 250 टन कचरे की बात करते हैं, तो यह संख्या कागजों पर जितनी भारी लगती है, धरातल पर उसकी भयावहता उससे कहीं अधिक है। मैदानी इलाकों में 250 टन कचरे को उठाना नगर निगमों के ट्रकों के लिए कुछ दिनों का काम हो सकता है, लेकिन समुद्र तल से 11,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर यह एक लॉजिस्टिकल आपदा के समान है। गौरीकुंड से ऊपर कोई मोटर मार्ग नहीं है। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस 250 टन कचरे का एक-एक किलोग्राम या तो खच्चरों की पीठ पर लादकर नीचे लाया जाएगा, या फिर सफाई मित्रों की पीठ पर बंधी बोरियों में भरा जाएगा। इस कचरे में लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जो पानी की खाली बोतलों और पन्नियों का है।
यह कचरा वजन में भले ही हल्का हो, लेकिन इसका आयतन इतना विशाल होता है कि इसे दबाकर बांधना और ढोना अत्यंत श्रमसाध्य कार्य बन जाता है। सफाई मित्रों का अनथक श्रम और बुनियादी ढांचे की सीमाएं सुलभ इंटरनेशनल और नगर पंचायत के सैकड़ों सफाई मित्र दिन-रात शून्य डिग्री के आसपास के तापमान में इस कचरे को समेटने का कार्य करते हैं। इन कर्मचारियों को तेज हवाओं, खड़ी ढलानों और फिसलन भरे पत्थरों के बीच से यात्रियों द्वारा फेंकी गई बोतलों को चुनना पड़ता है। कई बार यात्री कचरा सीधे गहरी खाइयों में फेंक देते हैं, जहां उतरना किसी भी मानव के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। प्रशासन द्वारा मार्ग में सैकड़ों डस्टबिन लगाए गए हैं, लेकिन भारी भीड़ के दबाव में वे कुछ ही घंटों में ओवरफ्लो हो जाते हैं। हवा के तेज झोंकों और जंगली जानवरों की आवाजाही से वह कचरा पुनः ढलानों पर बिखर जाता है।
मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) केंद्रों पर कचरे की छंटाई और कॉम्पेक्शन तो किया जा रहा है, लेकिन उत्पादन की गति निस्तारण की क्षमता से कहीं अधिक तेज है। मंदाकिनी और चोराबारी ग्लेशियर पर मंडराता खतरा केदारनाथ घाटी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पवित्र मंदाकिनी नदी का उद्गम क्षेत्र है। केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे स्थित चोराबारी ग्लेशियर वही ग्लेशियर है, जहां 2013 में भीषण जलप्रलय की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी। जब टन-भर प्लास्टिक कचरा इन घाटियों में दबता है, तो वह ग्लेशियरों की सतह पर जमा होकर उनके पिघलने की दर को बढ़ा देता है।
काले और रंग-बिरंगे प्लास्टिक के टुकड़े सौर विकिरण को सोखते हैं, जिससे आसपास की बर्फ तेजी से पिघलती है। इसके अलावा, जब प्लास्टिक का यह ढेर बारिश और बर्फबारी के नीचे सड़ता है, तो उससे लीचेट नामक जहरीला रसायन निकलता है, जो रिसकर मंदाकिनी के निर्मल जल में मिलता है। वही जल आगे चलकर गंगा बनता है और भारत की करोड़ों की आबादी तक पहुंचता है। जिस नदी को हम जीवनदायिनी मानकर पूजते हैं, उसके उद्गम स्थल पर ही हम जहर घोल रहे हैं। श्रद्धालुओं का 12 टन कचरा ढोना: जनसहभागिता की एक शुरुआत इस निराशाजनक परिदृश्य के बीच श्रद्धालुओं और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा लगभग 12 टन सूखा कचरा नीचे लाने का कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
‘कैरी मी बैक’ जैसे अभियानों के तहत यात्रियों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे दर्शन करके लौटते समय कम से कम आधा से एक किलोग्राम सूखा कचरा एक थैले में भरकर नीचे लाएं और सोनप्रयाग या गौरीकुंड में बने केंद्रों पर जमा करें। इस पहल का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि 12 टन कचरा पहाड़ों से कम हुआ, बल्कि इसमें है कि इससे श्रद्धालुओं के मन में जिम्मेदारी का बोध जागृत होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी पीठ पर किसी दूसरे द्वारा फेंका गया कचरा उठाकर 16 किलोमीटर की उतराई तय करता है, तो वह जीवन में कभी किसी तीर्थ या प्राकृतिक स्थल पर कचरा फेंकने की गलती नहीं दोहराएगा। इस प्रकार की जनसहभागिता को केवल एक स्वैच्छिक विकल्प न रखकर यात्रा की अनिवार्य आचार संहिता का हिस्सा बनाया जाना समय की मांग है।
व्यवस्थागत खामियां और नीतियों में कड़े बदलाव की जरूरत नागरिकों की लापरवाही के साथ-साथ प्रशासनिक नीतियों में भी स्पष्ट दिशा की आवश्यकता है। मात्र अपील करने और डस्टबिन लगाने से लाखों की अनियंत्रित भीड़ को अनुशासित नहीं किया जा सकता। सोनप्रयाग और गौरीकुंड के प्रवेश द्वारों पर ही सिंगल यूज प्लास्टिक की बोतलों और पन्नियों की सख्त जांच होनी चाहिए। पैकेज्ड पानी की बोतलों पर डिपॉजिट रिफंड सिस्टम (DRS) को पूरी सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। इसके तहत हर बोतल पर अतिरिक्त शुल्क लिया जाए, जो बोतल वापस जमा करने पर ही लौटाया जाए। इसके साथ ही, पूरे यात्रा मार्ग पर स्वच्छ और प्रमाणित पेयजल के कियोस्क लगाए जाने चाहिए, ताकि यात्रियों को प्लास्टिक की बोतलें खरीदने की आवश्यकता ही न पड़े।
आध्यात्मिक चेतना और प्रकृति के प्रति दायित्व भारतीय सनातन परंपरा में तीर्थाटन केवल पुण्य कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति और ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित करने की साधना है। जिस भूमि को हम देवाधिदेव महादेव का निवास मानते हैं, वहां अपनी सुविधाओं का अपशिष्ट छोड़ आना भक्ति नहीं बल्कि अज्ञानता है। प्रकृति ही साक्षात शिव और शक्ति का स्वरूप है; प्रकृति को दूषित करके की गई पूजा कभी सार्थक नहीं हो सकती। केदारनाथ की वर्तमान स्थिति हिमालय के सभी तीर्थों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि हमने आज अपने उपभोग, यात्रा की आदतों और अपशिष्ट प्रबंधन पर गंभीरता से पुनर्विचार नहीं किया, तो आने वाले समय में ये पवित्र घाटियां केवल प्लास्टिक के बंजर टीलों में तब्दील हो जाएंगी। हर तीर्थयात्री को यह संकल्प लेना होगा कि वह हिमालय में केवल अपनी आस्था लेकर जाए और वहां से केवल आशीर्वाद लेकर लौटे, अपने उपभोग का कचरा नहीं।
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