Uttarakhand government offices to remain closed tomorrow News: उत्तराखंड के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में शुचिता, अनुशासन और सुशासन के प्रतीक रहे पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन से पूरे देश और विशेषकर उत्तराखंड राज्य में शोक की लहर दौड़ गई है। सैन्य पृष्ठभूमि से निकलकर राजनीति के शीर्ष तक पहुंचने वाले इस महान व्यक्तित्व के अवसान पर देश के शीर्ष नेतृत्व ने गहरा दुख प्रकट किया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनके निधन को राष्ट्र और राज्य के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है। उनके सम्मान में राज्य सरकार ने उत्तराखंड में तीन दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की है, जिसके तहत प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक गतिविधियां स्थगित कर दी गई हैं।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
पूर्व मुख्यमंत्री के निधन पर देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए उनके योगदान को याद किया। राष्ट्रपति ने अपने संदेश में कहा कि भारतीय सेना में एक लंबे समय तक उत्कृष्ट और अनुकरणीय सेवा देने के बाद भुवन चंद्र खंडूड़ी ने जनसेवा के क्षेत्र में कदम रखा। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में रहते हुए उन्होंने ईमानदारी, सादगी और पारदर्शिता की जो मिसाल पेश की, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि सशस्त्र बलों से लेकर देश की सक्रिय राजनीति तक खंडूड़ी जी का योगदान हमेशा अविस्मरणीय रहेगा। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से उत्तराखंड के विकास और वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर व कनेक्टिविटी में सुधार के लिए उनके द्वारा किए गए दूरदर्शी प्रयासों को याद किया और कहा कि वे राज्य के कल्याण के लिए हमेशा समर्पित रहे।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने सुशासन के प्रणेता को किया याद
उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री के निधन पर गहरा शोक प्रकट करते हुए कहा कि मेजर जनरल खंडूड़ी का पूरा जीवन देश और समाज के लिए समर्पित रहा। सुशासन, चौमुखी विकास और उच्च सैनिक मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्होंने एक सैनिक और एक राजनेता दोनों ही रूपों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। दूसरी ओर, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उनके निधन को व्यक्तिगत और पूरे राज्य के लिए एक बड़ी क्षति बताते हुए कहा कि भुवन चंद्र खंडूड़ी ने सूबे की राजनीति में अनुशासन, ईमानदारी और सुशासन की एक ऐसी मजबूत पहचान बनाई थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनका जाना राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ देवभूमि उत्तराखंड के लिए एक ऐसा शून्य पैदा कर गया है, जिसे भर पाना बेहद कठिन है।
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राज्य में तीन दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी के प्रति सम्मान प्रकट करने और उनकी राजकीय सेवाओं को नमन करने के लिए उत्तराखंड सरकार ने शासन स्तर पर एक बड़ा निर्णय लिया है। सरकार की ओर से जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, प्रदेश में तीन दिवसीय राजकीय शोक घोषित किया गया है। यह राजकीय शोक 19 मई से शुरू होकर 21 मई तक पूरे राज्य में प्रभावी रहेगा। शासन द्वारा जारी निर्देशों के तहत, इस तीन दिवसीय शोक की अवधि के दौरान उत्तराखंड के सभी सरकारी भवनों और कार्यालयों में राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा। इसके साथ ही, राज्य में किसी भी प्रकार के सरकारी मनोरंजन, उत्सव या सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है, जिससे पूरा प्रदेश इस दुख की घड़ी में एक साथ खड़ा नजर आ रहा है।
राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार और सरकारी अवकाश
शासन की ओर से जारी आधिकारिक विज्ञप्ति और दिशा-निर्देशों में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ 20 मई को किया जाएगा। एक पूर्व सैनिक और राज्य के शीर्ष जननेता होने के नाते उन्हें अंतिम विदाई सैन्य और राजकीय प्रोटोकॉल के तहत दी जाएगी। अंतिम संस्कार के दिन, यानी 20 मई को पूरे उत्तराखंड में सभी सरकारी कार्यालयों, शिक्षण संस्थानों और शासकीय इकाइयों में पूर्ण रूप से अवकाश घोषित किया गया है ताकि राज्य के नागरिक और अधिकारी उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें।
सुशासन और ईमानदारी की मिसाल छोड़ गए खंडूड़ी
भुवन चंद्र खंडूड़ी को उत्तराखंड की राजनीति में एक ऐसे राजनेता के रूप में जाना जाता है जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा कड़ा रुख अपनाया। मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने उत्तराखंड में कड़े कानून और प्रशासनिक सुधार लागू किए, जिससे प्रदेश में पारदर्शिता को बढ़ावा मिला। सेना से मिले कड़े अनुशासन को उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था में ढाला, जिसके कारण अधिकारी और कर्मचारी वर्ग में उनके प्रति एक विशेष सम्मान और भय रहता था। उनके निधन के बाद उत्तराखंड ने न केवल अपना एक पूर्व मुख्यमंत्री खोया है, बल्कि एक ऐसा अभिभावक खो दिया है जो हमेशा राज्य के हितों और पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की चिंता करता था। उनके आदर्श और मूल्य उत्तराखंड के राजनेताओं के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाते रहेंगे।







