Dehradun News: लोकतंत्र केवल शासन की एक व्यवस्था मात्र नहीं है, बल्कि यह नागरिक के आत्मसम्मान, उसकी अस्मिता और समाज के प्रति उसके नैतिक दायित्व का जीवंत प्रकटीकरण है। एक स्वस्थ और संवेदनशील लोकतांत्रिक व्यवस्था की सार्थकता इसी बात में निहित होती है कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी यह महसूस करे कि उसके एक मत में पूरे देश और राज्य की दिशा बदलने की ताकत है। जब चुनाव आते हैं, तो इसे अक्सर एक उत्सव कहा जाता है, जिसे हम महापर्व के नाम से पुकारते हैं। परंतु यह महापर्व तभी पूर्ण और सार्थक माना जा सकता है जब मतदेय स्थल सूने न रहें, जब मतदान पेटियों या मशीनों तक पहुंचने वाले कदमों में किसी प्रकार का संकोच या उदासीनता न हो। उत्तराखंड के देहरादून जनपद में इन दिनों इसी उदासीनता को तोड़ने और जन-जन के मन में अपने नागरिक अधिकारों के प्रति गौरव जगाने की एक गंभीर, विचारशील और जमीनी कोशिश चल रही है।
अतीत के चुनावी आंकड़े कई बार एक कड़वा सच सामने लाते हैं। कई ऐसे मतदेय स्थल या बूथ होते हैं जहां मतदाता सूची में दर्ज नामों की तुलना में आधे लोग भी वोट डालने नहीं पहुंचते। पचास प्रतिशत से कम मतदान होना किसी भी जीवंत समाज के लिए एक गहरा आत्ममंथन का विषय है। इसी जमीनी हकीकत को पहचानते हुए जिला प्रशासन और निर्वाचन तंत्र ने यह ठान लिया है कि अब केवल सामान्य अपील करने भर से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन क्षेत्रों की जड़ों तक जाना होगा जहां लोग मताधिकार से विमुख रहे हैं। देहरादून के जिलाधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी डॉ. आशीष चौहान के नेतृत्व में सुव्यवस्थित मतदाता शिक्षा एवं निर्वाचक सहभागिता यानी स्वीप कार्यक्रम को जिस गहराई और तत्परता के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है, वह बताता है कि प्रशासन इस बार केवल औपचारिकता पूरी नहीं कर रहा, बल्कि हर नागरिक को उसके अधिकार का वास्तविक अर्थ समझाने के लिए कटिबद्ध है। लक्ष्य बहुत स्पष्ट और साहसिक तय किया गया है कि जिन मतदेय स्थलों पर मतदान पचास प्रतिशत से कम रहा था, वहां इस बार पचहत्तर प्रतिशत से अधिक मतदान सुनिश्चित करना है।

इस पचहत्तर प्रतिशत के लक्ष्य को प्राप्त करना केवल कागजी आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे लोगों के मन, उनकी जीवनशैली, उनकी स्थानीय समस्याओं और उनकी सोच को बदलने की एक सतत प्रक्रिया जुड़ी हुई है। पहाड़ी और तराई के मिले-जुले भूगोल वाले देहरादून जिले में हर क्षेत्र की अपनी सामाजिक और भौगोलिक चुनौतियां हैं। कहीं पलायन के कारण गांव खाली दिखते हैं, तो कहीं शहरी आपाधापी और व्यस्तता के चलते लोग मतदान के दिन को केवल एक छुट्टी समझकर घर पर बिता देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खेत-खलिहान और दैनिक मजदूरी की चिंताएं मतदाताओं को बूथ तक जाने से रोक लेती हैं, तो उच्च मध्यवर्ग के इलाकों में राजनीतिक उदासीनता हावी रहती है। इन सभी अलग-अलग मानसिकताओं को समझना और उनके अनुसार जागरूकता का ताना-बाना बुनना ही स्वीप अभियान का मुख्य दर्शन है।
प्रशासनिक स्तर पर इस बार जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है, वह है विभिन्न विभागों का आपसी समन्वय। अक्सर यह देखा जाता था कि निर्वाचन से जुड़े काम केवल राजस्व विभाग या कुछ गिने-चुने अधिकारियों के कंधों पर छोड़ दिए जाते थे। परंतु इस बार शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, उद्योग, खेल, श्रम, पंचायती राज, परिवहन, विद्युत, दूरसंचार, वाणिज्य कर, मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण और नगर निगम जैसे तमाम विभागों को इस महाअभियान का सक्रिय हिस्सा बनाया गया है। जब आंगनबाड़ी कार्यकत्री घर-घर जाकर राशन या पोषण की बात करते हुए मतदान की महत्ता समझाती है, जब बिजली या पानी का बिल जमा करते समय उपभोक्ता को उसके मताधिकार की याद दिलाई जाती है, जब परिवहन निगम की बसों में सफर करते हुए नागरिक को लोकतंत्र का संदेश मिलता है, तो यह अभियान केवल एक सरकारी आदेश न रहकर जन-आंदोलन का रूप लेने लगता है।
शिक्षा जगत की भूमिका इस पूरे अभियान में सबसे संवेदनशील और प्रभावी बनकर उभरी है। लोकतंत्र के संस्कारों की नींव कच्ची उम्र में ही डाली जा सकती है। जब कोई युवा पहली बार अठारह वर्ष का होकर मतदाता सूची में अपना नाम देखता है, तो उसके भीतर एक अलग तरह का गर्व होना चाहिए। इसी सोच के तहत सनातन धर्म इंटर कॉलेज मसूरी जैसे शिक्षण संस्थानों में जो प्रयोग किए जा रहे हैं, वे अत्यंत सराहनीय हैं। वहां केवल भाषण देकर विद्यार्थियों को मतदान का महत्व नहीं बताया गया, बल्कि उनके बीच छात्र परिषद के चुनाव पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत कराए गए। नामांकन से लेकर प्रचार, मतदान और परिणाम की पूरी प्रक्रिया से गुजरते हुए विद्यार्थियों ने यह प्रत्यक्ष अनुभव किया कि एक-एक मत का क्या मूल्य होता है। जब युवा पीढ़ी इस प्रक्रिया की पवित्रता और शक्ति को समझती है, तो वह केवल स्वयं ही जागरूक नहीं होती, बल्कि अपने परिवार और पड़ोस के बड़ों को भी मतदान के दिन घर से निकालकर बूथ तक ले जाने का माध्यम बनती है।

इसी तरह ग्रामीण अंचलों में जो संवाद स्थापित किया जा रहा है, उसकी अपनी अलग महत्ता है। जोड़ी गांव जैसे क्षेत्रों में चौपालों और बैठकों के माध्यम से जब ग्रामीणों से सीधे संवाद किया जाता है, तो वहां की भाषा और तौर-तरीके भी उनके अपने होते हैं। गांव के लोगों को यह समझाना जरूरी होता है कि गांव की सड़क, पानी की पाइपलाइन, बच्चों का स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र का डॉक्टर केवल सरकार की कृपा पर निर्भर नहीं हैं,
बल्कि यह सब उस मत की ताकत से तय होता है जो वे मतदान के दिन बिना किसी प्रलोभन, बिना किसी डर और बिना किसी संकोच के डालते हैं। जब ग्रामीण समाज को यह भरोसा होता है कि उनका एक वोट उनके आने वाले कल की तस्वीर बदल सकता है, तो मतदान केंद्र की दूरी या मौसम की दुश्वारियां उनके कदमों को रोक नहीं पातीं।
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कम मतदान वाले बूथों की पहचान करना और उन पर केंद्रित होकर काम करना वास्तव में एक वैज्ञानिक और सूक्ष्म प्रशासनिक रणनीति का हिस्सा है। विगत चुनावों के आंकड़ों का विश्लेषण करके यह देखा गया है कि किन खास मोहल्लों, बस्तियों या गांवों में लोग कम संख्या में बाहर निकले। क्या वहां बूथ की दूरी अधिक थी?
क्या वहां बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए रैंप या बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी? क्या वहां पेयजल और छांव का अभाव था? या फिर वहां के मतदाताओं के मन में यह भावना बैठ गई थी कि वोट डालने से कुछ नहीं बदलता? जिला निर्वाचन अधिकारी के निर्देशों का सार यही है कि इन तमाम सवालों के ठोस जवाब तलाशे जाएं। अगर व्यवस्था की कमी है तो उसे दुरुस्त किया जाए और अगर सोच की जड़ता है तो उसे लगातार संवाद और प्रेरणा के जरिए पिघलाया जाए।
मतदान प्रतिशत को पचास से सीधे पचहत्तर प्रतिशत के पार ले जाना एक बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन जब सामूहिक संकल्प मजबूत हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता। देहरादून का यह स्वीप अभियान केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के उस मंदिर की परिक्रमा है जिसमें हर नागरिक का सिर सम्मान और कर्तव्यबोध से झुकना चाहिए। जब समाज का हर वर्ग, चाहे वह व्यापारी हो, किसान हो, मजदूर हो, शिक्षक हो या गृहिणी, यह समझ लेगा कि मतदान केंद्र तक न जाना अपने ही भविष्य की उपेक्षा करना है, तब किसी भी बूथ पर सन्नाटा नहीं पसरेगा। आने वाले विधानसभा चुनाव में देहरादून की धरती से उठने वाली यह जन-जागरूकता की लहर न केवल जिले के मतदान प्रतिशत को ऐतिहासिक ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी, बल्कि समूचे राज्य और देश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत करेगी।







