Somen Debnath News: जब इंसान का हौसला उसकी सांसों से बड़ा हो जाता है, तो भूगोल की तमाम सरहदें सिर्फ नक्शे की लकीरें बनकर रह जाती हैं। साइकिल के दो पहिए, पीठ पर बंधा एक छोटा सा झोला, दिल में असीम संवेदना और आंखों में पूरी दुनिया को एक परिवार मान लेने का ख्वाब—इसी पूंजी के साथ पश्चिम बंगाल के सुंदरबन से एक नौजवान निकला था। नाम है सोमेन देबनाथ। आज जब वह उत्तराखंड की सर्द वादियों, देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश की सड़कों से अपनी साइकिल पर गुजरते हैं, तो उनके चेहरे की शांत मुस्कान देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि इस शख्स ने अपनी हड्डियों में दुनिया के 191 मुल्कों की धूप, छांव, बर्फ और लहू को समेट रखा है। यह कोई आम मुसाफिर की दास्तान नहीं है, न ही यह किसी रिकॉर्ड बुक में नाम दर्ज कराने की अंधी दौड़ है। यह कहानी उस संवेदना की है, जो चौदह बरस के एक अबोध बालक के दिल में टीस बनकर उठी थी और जिसने उसे बीस साल तक घर लौटने नहीं दिया।

इस महायात्रा की जड़ें किसी भौगोलिक रोमांच में नहीं, बल्कि मानवीय पीड़ा के गहरे समंदर में हैं। सुंदरबन के एक शांत गांव में रहने वाले चौदह साल के सोमेन ने अपने पड़ोस में एक खौफनाक मंजर देखा था। एक व्यक्ति की मौत एचआईवी/एड्स की वजह से हो गई थी। उस दौर में इस बीमारी को लेकर समाज में ऐसा वहम और छुआछूत का खौफ था कि लोग मरने वाले के शव के पास जाने से भी कतरा रहे थे। रिश्तेदार पीछे हट गए थे, पड़ोसी दरवाजे बंद कर चुके थे और अंतिम संस्कार के लिए चार कांधे तक मयस्सर नहीं हो रहे थे। उस बेबस लाश की बेकद्री ने किशोर सोमेन के दिल पर ऐसा घाव किया जो कभी भरा नहीं। उनके बाल मन में बार-बार यही सवाल गूंजता रहा कि क्या कोई बीमारी किसी इंसान से उसकी बुनियादी गरिमा भी छीन सकती है? जब समाज डर के साए में अपनों को ही अछूत बना दे, तो फिर इंसानियत कहां बचती है?
उसी बेचैनी ने सोमेन को किताबों और जानकारों की चौखट तक पहुंचाया। उन्होंने पश्चिम बंगाल एड्स प्रिवेंशन एंड कंट्रोल सोसाइटी का रुख किया, बीमारी की हकीकत को वैज्ञानिक नजरिए से समझा और यह जाना कि एड्स छूने से नहीं फैलता, बल्कि इसके पीछे अज्ञानता की गहरी खाई है। बस वहीं से उनके जीवन का मकसद तय हो गया। उन्होंने खुद से वादा किया कि वह इस अज्ञानता के अंधेरे को मिटाने के लिए अपनी जिंदगी समर्पित करेंगे।
घर-परिवार की अपनी स्वाभाविक चिंताएं थीं। पिता का सीधा और व्यावहारिक सोचना था कि बेटा अपनी पढ़ाई पूरी करे, कोई सुरक्षित नौकरी तलाशे और गृहस्थी बसाए। भला कौन सा बाप चाहेगा कि उसका बेटा एक साधारण सी साइकिल उठाकर अनजान रास्तों पर बिना किसी सहारे के निकल पड़े। लेकिन सोमेन के भीतर का संकल्प किसी मामूली समझौते के लिए तैयार नहीं था। 27 मई 2004 को उन्होंने सुंदरबन की नम मिट्टी को माथे से लगाया और पैडल पर पैर रख दिया। शुरुआत में परिवार को यह तसल्ली दी कि वह पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में तीन महीने का छोटा सा दौरा करने जा रहे हैं और जल्द लौट आएंगे। लेकिन जब सफर शुरू हुआ, तो रास्ते खुद-ब-खुद खुलते चले गए। भारत के अट्ठाईस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की खाक छानते हुए उन्हें समझ आ गया कि सरहदों के पार भी दर्द एक जैसा है, और उस दर्द को मिटाने के लिए पूरी दुनिया को ही अपना घर बनाना होगा।

सोमेन की प्रेरणा के आकाश में दो ध्रुवतारे हमेशा चमकते रहे। पहले थे स्वामी विवेकानंद, जिनके आह्वान ने उन्हें सिखाया कि ज्ञान और सेवा को कर्म का माध्यम बनाओ और भारत के अध्यात्म तथा सह-अस्तित्व के संदेश को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाओ। दूसरी प्रेरणा बने विमल मुखर्जी, जिन्होंने बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में साइकिल से दुनिया का चक्कर लगाकर भारतीयों के भीतर एक नई चेतना फूंकी थी। विमल मुखर्जी के सफरनामे ने सोमेन को यकीन दिलाया कि अगर इरादा फौलादी हो, तो साइकिल जैसा मामूली साधन भी सात समंदर पार कराने की ताकत रखता है।
शुरुआती सालों में भारत का कोना-कोना नापने के बाद सोमेन की साइकिल पड़ोसी मुल्कों की तरफ मुड़ गई। नेपाल, भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश होते हुए यह कारवां मध्य एशिया, यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और सुदूर बर्फीले ध्रुवों की ओर बढ़ता चला गया। करीब उन्नीस वर्षों का यह अनवरत सफर लगभग दो लाख किलोमीटर की उस दास्तान में बदल गया, जिसमें 191 मुल्क किसी माला के मोतियों की तरह पिरोए हुए थे। सोमेन जिस भी मुल्क में कदम रखते, अपनी साइकिल के हैंडल पर तिरंगे के साथ उस देश का राष्ट्रीय ध्वज भी शान से लगाते। यह उनका उस मुल्क की धरती, वहां के लोगों और उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान प्रकट करने का अनूठा तरीका था। उनका संदेश स्पष्ट था—हम सब वसुधैव कुटुम्बकम् की डोर से बंधे एक ही परिवार के सदस्य हैं।
लेकिन दुनिया को जितनी आसानी से किताबों में खूबसूरत कहा जाता है, हकीकत में वह उतनी ही बेरहम और पथरीली भी है। सोमेन का सफर कोई सुहाना पिकनिक नहीं था। यह मौत के साए में हर रोज जिंदगी को तलाशने की तपस्या थी। अपने पूरे सफर के दौरान उन्हें अट्ठाईस बार बेरहमी से लूटा गया। अफ्रीका के घने बीहड़ों से लेकर दक्षिण अमेरिका के खतरनाक इलाकों तक, कई बार पिस्तौल की ठंडी नली उनके माथे पर टिकी और कई बार छुरे की नोक पर उनसे उनका सबकुछ छीन लिया गया। जेबें खाली हो जातीं, दवाइयां छिन जातीं, पर जो चीज कोई लुटेरा नहीं छीन सका, वह था उनके सीने में धड़कता हुआ निडर हौसला।
इस पूरे विश्व भ्रमण का सबसे रूह कंपा देने वाला अध्याय अफगानिस्तान की सरजमीं पर लिखा गया। सोमेन काबुल से हेरात की ओर अपनी साइकिल पर आगे बढ़ रहे थे। बंजर पहाड़ियों और धूल भरे सन्नाटे के बीच अचानक कुछ हथियारबंद लोगों ने उन्हें घेर लिया। बिना किसी बातचीत के उन पर लाठियां और बंदूकों के कुंदे बरसने लगे। सोमेन को कुछ समझ आता, उससे पहले ही उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई और उन्हें घसीटते हुए एक अनजान, अंधेरे भूमिगत तहखाने में फेंक दिया गया।
वह तालिबान का गढ़ था। शुरुआती चार दिनों तक उस सीलन भरे तहखाने में न तो रोशनी की एक किरण पहुंची और न ही अन्न का एक दाना। चारों तरफ सिर्फ गालियां, मारपीट और मौत की आहट थी। उन लड़ाकों को लगता था कि साइकिल पर सवार यह अनजान शख्स किसी मुल्क का जासूस है या किसी फौजी मिशन की टोह लेने आया है। भाषा की दीवार इतनी ऊंची थी कि सोमेन की बेगुनाही की चीखें उसी कालकोठरी में घुटकर रह जाती थीं।
चार दिन की नारकीय यातना के बाद जब एक स्थानीय अनुवादक वहां पहुंचा, तब जाकर संवाद का टूटा-फूटा रास्ता खुला। सोमेन ने अपनी टूटी जुबान और अनुवादक की मदद से साफ कहा कि वह किसी हुकूमत के नुमाइंदे नहीं हैं, न ही उनका राजनीति या जंग से कोई सरोकार है; वह तो हिंदुस्तान की मिट्टी से निकले एक फकीर मुसाफिर हैं, जो दुनिया को मोहब्बत और सेहत का पैगाम देने निकला है। जब उन्हें लगा कि हथियारबंद लोग उन्हें इतनी आसानी से रिहा नहीं करेंगे, तो सोमेन ने गजब का मानसिक संतुलन दिखाया। उन्होंने उन लड़ाकों से कहा कि अगर वे उन्हें आगे जाने की इजाजत नहीं दे सकते, तो कम से कम कोई काम दे दें, ताकि वह मुफ्त की रोटियां न तोड़ें।

अगले नौ दिनों तक सोमेन ने उस ठिकाने पर झाड़ू लगाई, मैला साफ किया और फर्श धोया। उसके बाद के ग्यारह दिन उन्होंने उन लड़ाकों के लिए खाना पकाया। भारतीय मसालों और दाल-रोटी के स्वाद ने शायद उन पत्थर दिलों में भी थोड़ी सी जगह बना ली थी। पूरे चौबीस दिन तक मौत के मुंह में रहने के बाद, एक सुबह अचानक उन्हें हेरात से करीब सोलह किलोमीटर पहले ले जाकर छोड़ दिया गया। साइकिल वापस मिल चुकी थी, शरीर पर अनगिनत नीले निशान थे, लेकिन आत्मा पूरी तरह अक्षुण्ण थी। मौत को इतने करीब से छूकर लौटने के बाद कोई भी इंसान घर की सुरक्षित पनाह मांग लेता, लेकिन सोमेन ने हेरात के चौराहे पर खड़े होकर एक बार फिर अपनी साइकिल के पैडल कस लिए।
कठिनाइयों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। मध्य एशिया के उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और कजाकिस्तान के वीराने में जब मौसम ने करवट ली, तो तापमान गिरते-गिरते माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। खून को जमा देने वाली उस ठंड में सांस लेना भी फेफड़ों में कांच की किरचें भरने जैसा महसूस होता था। बर्फबारी इतनी भीषण होती थी कि बुलडोजर रास्तों को काटते थे और सड़क के दोनों तरफ बर्फ की दस-दस फीट ऊंची सफेद दीवारें खड़ी हो जाती थीं। सोमेन को हमेशा यह खौफ सताता था कि अगर बर्फ की यह दीवार भरभरा कर गिर पड़ी, तो उनकी साइकिल समेत उनकी कब्र वहीं बन जाएगी।
पैरों की उंगलियां सुन्न पड़ जाती थीं, होंठ फटकर रिसने लगते थे और रास्ते में भूखे भेड़ियों तथा बर्फीले भालुओं के पंजों के ताजा निशान डराते थे। सोमेन खुद याद करते हैं कि पूरी यात्रा में कम से कम पैंतीस बार ऐसा वक्त आया जब उन्हें लगा कि आज का सूरज उनका आखिरी सूरज है। लेकिन ऐसे हर लम्हे में उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उस विचार को याद किया कि जब तक लक्ष्य हासिल न हो जाए, तब तक रुकना कायरता है। भीतर की इसी आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें हर बार मौत के जबड़े से खींचकर वापस सड़क पर खड़ा कर दिया।
करीब दो दशक तक दुनिया के कोने-कोने में भटकने, राजाओं और फकीरों से मिलने, संयुक्त राष्ट्र के मंचों से लेकर आदिवासियों की झोपड़ियों तक अपनी बात पहुंचाने के बाद सोमेन जब अपने वतन लौटे, तो उनकी दाढ़ी पक चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियां गहरा गई थीं, लेकिन आंखों की चमक चौदह साल वाले उसी बालक जैसी थी। दुनिया घूम लेने के बाद उन्होंने आराम करने का रास्ता नहीं चुना। उन्हें लगा कि जिस देश की मिट्टी ने उन्हें इतना बड़ा हौसला दिया, उसी देश के युवाओं को आज दिशा की सबसे ज्यादा जरूरत है।
यही वजह है कि अब वह भारत के भीतर एक नए संकल्प के साथ साइकिल चला रहे हैं। उनकी मौजूदा यात्रा तीन बुनियादी स्तंभों पर टिकी है—पुनर्मिलन भारत, एक पेड़-एक जीवन, और नशामुक्त भारत के लिए खेल। उत्तराखंड के पहाड़ी रास्तों पर जब वह चढ़ाई चढ़ते हैं, तो उनकी साइकिल सिर्फ एक पहिया वाहन नहीं होती, वह सामाजिक क्रांति का चलता-फिरता मंच बन जाती है।
‘एक पेड़-एक जीवन’ के जरिए सोमेन हर गांव और कस्बे में लोगों को समझा रहे हैं कि कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होती इस दुनिया को अगर बचाना है, तो हर इंसान को कम से कम एक दरख्त की जिम्मेदारी अपने बच्चे की तरह उठानी होगी। ग्लोबल वॉर्मिंग और पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन को उन्होंने दुनिया भर के ग्लेशियरों को पिघलते देखकर अपनी आंखों से महसूस किया है, इसलिए उनकी इस चेतावनी में बनावटीपन नहीं, बल्कि एक प्रत्यक्षदर्शी का दर्द झलकता है।
‘पुनर्मिलन भारत’ के जरिए वह समाज के भीतर जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर खिंचती जा रही दीवारों को गिराने की अपील कर रहे हैं। उनका मानना है कि दुनिया भर में भारतीय संस्कृति का जो मान है, उसकी सबसे बड़ी ताकत हमारा आपसी भाईचारा और विविधता को स्वीकार करने का स्वभाव है। अगर हम अपने ही घर में एक-दूसरे से नफरत करने लगेंगे, तो हम विश्व गुरु बनने का नैतिक हक खो देंगे।
वहीं, यात्रा का तीसरा और सबसे अहम आयाम है युवाओं को नशे के दलदल से बाहर निकालना। सोमेन उत्तराखंड और देश के अन्य हिस्सों में कॉलेजों, स्कूलों और चौपालों पर नौजवानों से सीधे मुखातिब हो रहे हैं। वह उन्हें समझाते हैं कि सिंथेटिक ड्रग्स और शराब का नशा इंसान की रीढ़ को अंदर से खोखला कर देता है। वह युवाओं को खेलों की ओर लौटने का न्योता देते हैं। उनका कहना है कि खेल सिर्फ शरीर को गठीला नहीं बनाते, बल्कि वे दिमाग को अनुशासन, हार को स्वीकारने का हौसला और जीत के लिए निरंतर पसीना बहाने का हुनर सिखाते हैं। जब एक नौजवान मैदान में पसीना बहाता है, तो उसके भीतर अवसाद या नशे के लिए कोई जगह बाकी नहीं बचती।
देहरादून में जब पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी उनके साथ खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाते हैं, या जब राज्यों के मुख्यमंत्री उनकी सादगी के सामने नतमस्तक होते हैं, तो सोमेन के चेहरे पर रत्ती भर भी घमंड नजर नहीं आता। वह इन औपचारिक मुलाकातों का इस्तेमाल भी सिर्फ अपने मिशन को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं। उनके लिए किसी सूबे के मुख्यमंत्री और सड़क किनारे चाय बेचने वाले बुजुर्ग में कोई फर्क नहीं है; दोनों ही उनके उस बड़े परिवार का हिस्सा हैं, जिसे वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कहते हैं।
सोमेन देबनाथ का पूरा जीवन इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि एक इंसान बिना किसी कॉर्पोरेट फंडिंग, बिना किसी भारी-भरकम लश्कर और बिना किसी निजी स्वार्थ के भी दुनिया को बदलने का माद्दा रख सकता है। उनकी दास्तान हमें सिखाती है कि साधन कभी साध्य से बड़े नहीं होते। अगर नीयत में सच्चाई हो और मकसद में इंसानियत की भलाई जुड़ी हो, तो एक साधारण सी साइकिल पर सवार होकर भी पूरी दुनिया के दिलों पर राज किया जा सकता है।

आज जब दुनिया युद्धों, सरहदों के तनाव और वैचारिक कट्टरता के दौर से गुजर रही है, तब सोमेन की साइकिल से निकलती हुई घंटी की आवाज हमें याद दिलाती है कि नफरत का जवाब गोलियों से नहीं, बल्कि लगातार चलते रहने वाले उन पैरों से दिया जा सकता है जो हर दहलीज पर सिर्फ प्यार और परवाह का पैगाम लेकर पहुंचते हैं। सोमेन का सफर थमा नहीं है; जब तक उनकी सांसें चलेंगी, उनकी साइकिल का पहिया घूमता रहेगा, और हर चक्कर के साथ यह धरती थोड़ी सी और बेहतर, थोड़ी सी और मानवीय बनती रहेगी।
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