Devprayag News: उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में सर्पीली सड़कें जहां एक ओर खूबसूरत वादियों का दीदार कराती हैं, वहीं दूसरी ओर पलक झपकते ही जिंदगी और मौत के बीच का फासला मिटा देती हैं। पर्वतीय मार्गों पर सफर करने वाले हर मुसाफिर के मन में सफर के रोमांच के साथ-साथ एक अनजाना डर हमेशा बना रहता है। टिहरी और पौड़ी गढ़वाल की सीमावर्ती वादियों में स्थित पवित्र संगम नगरी देवप्रयाग के पास गुरुवार का दिन एक बेहद दर्दनाक और मनहूस खबर लेकर आया। पंद्रह अक्टूबर की सुबह जब वादियों में धूप खिलने ही लगी थी, तभी राष्ट्रीय राजमार्ग पर ग्राम पाली के पास एक हृदयविदारक सड़क दुर्घटना घटित हुई। चंडीगढ़ की भागदौड़ भरी जिंदगी से निकलकर अपने पैतृक घर रुद्रप्रयाग की ओर बढ़ रहा एक परिवार अपनी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही काल के क्रूर पंजों में फंस गया। यात्रियों से भरी एक कार अचानक अनियंत्रित होकर सड़क की सुरक्षा दीवारों को तोड़ते हुए लगभग डेढ़ सौ मीटर गहरी पथरीली खाई में लुढ़कती हुई सीधे नदी किनारे जा गिरी। इस भयानक हादसे ने एक झटके में दो जिंदगियों को सदा के लिए समाप्त कर दिया, जबकि तीन अन्य लोग गंभीर रूप से घायल होकर जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।
इस कार में चालक समेत कुल पांच लोग सवार थे। चंडीगढ़ से रुद्रप्रयाग तक का लंबा सफर तय करते हुए यह वाहन पर्वतीय घुमावों से गुजर रहा था। जब कार देवप्रयाग से लगभग चार किलोमीटर आगे श्रीनगर की दिशा में पाली गांव के समीप पहुंची, तभी अचानक चालक ने वाहन पर से अपना नियंत्रण खो दिया। पहाड़ी मार्गों पर अक्सर तीखे मोड़ और संकरी सड़कें चालक के मामूली से भटकाव को भी भयानक तबाही में बदल देती हैं। कार के अनियंत्रित होते ही उसमें चीख-पुकार मच गई होगी, लेकिन संभलने का एक क्षण भी किसी को नहीं मिला। तेज गति से लुढ़कती हुई कार चट्टानों और कंटीली झाड़ियों से टकराते हुए नीचे गिरती चली गई। डेढ़ सौ मीटर की यह ढलान इतनी खड़ी और दुर्गम थी कि वाहन के परखच्चे उड़ गए। वाहन जब नीचे अलकनंदा नदी के किनारे पत्थरों पर जाकर रुका, तो वह लोहे के एक मुड़े-तुड़े ढांचे में तब्दील हो चुका था।

घटना के तुरंत बाद आसपास के पाली गांव के ग्रामीणों ने जब पत्थरों के टकराने और कार के गिरने की जोरदार आवाज सुनी, तो वे बिना एक पल गंवाए घटना की दिशा में दौड़ पड़े। उत्तराखंड के पर्वतीय समाज की यह सबसे बड़ी मानवीय विशेषता रही है कि जब भी सड़कों पर कोई विपत्ति आती है, तो स्थानीय ग्रामीण प्रशासन या एंबुलेंस के आने की प्रतीक्षा किए बिना देवदूत बनकर मौके पर कूद पड़ते हैं। पाली गांव के स्थानीय युवाओं और बुजुर्गों ने तत्काल स्थानीय जिला पुलिस को सूचना दी और खुद खड़ी ढलान पर उतरना शुरू कर दिया। पथरीले पत्थरों और गहरी खाई की परवाह किए बिना ग्रामीणों ने पुलिस कर्मियों के साथ मिलकर राहत कार्य शुरू किया। कार के भीतर फंसे घायल दर्द से कराह रहे थे। ग्रामीणों और पुलिस के जवानों ने अत्यधिक सूझबूझ और तत्परता दिखाते हुए वाहन के भीतर फंसे तीन घायलों को सुरक्षित बाहर निकाला। यह त्वरित मानवीय हस्तक्षेप ही था जिसने इन तीनों घायलों के जीवन की सांसों को टूटने से बचा लिया।
जैसे ही तीनों घायलों को सड़क तक लाया गया, वहां पहले से मौजूद आपातकालीन सेवा एक सौ आठ की एंबुलेंस के जरिए उन्हें तुरंत निकटतम चिकित्सालय भेजा गया। घायलों की शारीरिक स्थिति काफी नाजुक थी क्योंकि डेढ़ सौ मीटर तक वाहन के लुढ़कने के दौरान उन्हें गंभीर अंदरूनी और बाहरी चोटें आई थीं। घायल होने वालों में रुद्रप्रयाग जिले के लाडोली गांव निवासी तैंतीस वर्षीय उत्तम सिंह पुत्र मोहन सिंह शामिल हैं। उनके साथ रुद्रप्रयाग के बीना गांव निवासी अठारह वर्षीय युवा टीशा रावत पुत्र लक्ष्मण सिंह रावत और पैंतालीस वर्षीय सुनीता देवी पत्नी लक्ष्मण सिंह रावत भी इस भीषण दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इन तीनों को चिकित्सकों की गहन निगरानी में भर्ती कराया गया है, जहां उनके समुचित उपचार के लिए विशेषज्ञ टीमें जुटी हुई हैं। परिजनों को जैसे ही इस दुर्घटना की सूचना मिली, उनके घरों में कोहराम मच गया और वे बदहवास हालत में अस्पताल की ओर रवाना हुए।
हादसे की गंभीरता को देखते हुए राज्य आपदा प्रतिवादन बल यानी एसडीआरएफ को तत्काल अलर्ट किया गया। सूचना मिलते ही एसडीआरएफ पोस्ट ब्यासी से उपनिरीक्षक सावर सिंह के नेतृत्व में एक दल और एसडीआरएफ श्रीनगर पोस्ट से निरीक्षक मंजरी नेगी के नेतृत्व में दूसरा दल विशेष रेस्क्यू उपकरणों के साथ तुरंत पाली गांव के लिए रवाना हुआ। जब तक एसडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंचीं, तब तक घायलों को अस्पताल भेजा जा चुका था, लेकिन नीचे नदी किनारे का मंजर बेहद दर्दनाक और चुनौतीपूर्ण बना हुआ था। कार का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह पिचक चुका था और उसके मलबे के भीतर दो शव बुरी तरह फंसे हुए थे। वाहन के चकनाचूर हो जाने के कारण शवों को बिना विशेष कटर और उपकरणों के बाहर निकालना असंभव था।
एसडीआरएफ के जवानों ने नीचे उतरकर अत्यंत सावधानी और तकनीकी दक्षता के साथ रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। कड़ी मशक्कत के बाद वाहन की मुड़ी हुई चादरों को काटकर दोनों शवों को बाहर निकाला गया। मृतकों में सत्तर पार कर चुकीं बुजुर्ग महिला सत्येश्वरी देवी पत्नी हुकम सिंह चौहान शामिल थीं, जो चमोली जिले के कर्णप्रयाग थाना क्षेत्र अंतर्गत किमखाल गांव की निवासी थीं। उनकी उम्र बहत्तर वर्ष थी और अपने जीवन के इस पड़ाव पर वे अपने स्वजनों के साथ यात्रा कर रही थीं। वहीं, दूसरे मृतक कार के चालक अनिल थे, जो वाहन का संचालन कर रहे थे। एक क्षण की अनहोनी ने इन दोनों के जीवन का सफर हमेशा के लिए थाम दिया।
शवों को कार के मलबे से बाहर निकाल लेने के बाद भी एसडीआरएफ की चुनौती समाप्त नहीं हुई थी। घटनास्थल की भौगोलिक परिस्थितियां इतनी विकट थीं कि डेढ़ सौ मीटर की खड़ी, पथरीली और सीधी चढ़ाई पर स्ट्रेचर के सहारे दो शवों को ऊपर मुख्य सड़क तक ले जाना अत्यधिक जोखिम भरा और थका देने वाला काम था। जरा सी चूक से बचाव दल के जवानों की जान भी खतरे में पड़ सकती थी। इस विकट स्थिति को देखते हुए एसडीआरएफ के कमान अधिकारियों ने अपनी सामरिक और व्यावहारिक सूझबूझ का परिचय दिया। उन्होंने नीचे बह रही नदी के जलमार्ग का उपयोग करने का साहसिक निर्णय लिया।
एसडीआरएफ की टीम ने नदी किनारे त्वरित गति से रेस्क्यू राफ्ट तैयार की। दोनों शवों को पूरे सम्मान और सुरक्षा के साथ राफ्ट में रखा गया। नदी की तेज धाराओं और लहरों के बीच कुशल रिवर राफ्टर्स की मदद से शवों को जलमार्ग के जरिए देवप्रयाग पहुंचाया गया। पानी के रास्ते यह अभियान चलाना अपने आप में पर्वतीय रेस्क्यू का एक अनोखा और कुशल उदाहरण था, जिसने कठिन चढ़ाई के जोखिम को पूरी तरह टाल दिया। देवप्रयाग पहुंचकर दोनों शवों को सुरक्षित किनारे लाया गया और वहां अग्रिम विधिक कार्रवाई, पंचनामा और पोस्टमार्टम की औपचारिकताओं के लिए पूरी संवेदनशीलता के साथ जिला पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। दोनों टीमों के इस अनुकरणीय तालमेल और समर्पण की मौके पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने मुक्तकंठ से सराहना की।
यह दुर्घटना एक बार फिर पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क सुरक्षा, थकान और लंबी दूरी की यात्राओं से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े करती है। चंडीगढ़ से रुद्रप्रयाग की यात्रा मैदानी रास्तों से शुरू होकर बेहद घुमावदार पहाड़ी सड़कों पर समाप्त होती है। मैदानी इलाकों में वाहन चलाने और पहाड़ों की संकरी तथा तीखे मोड़ों वाली सड़कों पर गाड़ी संभालने में जमीन-आसमान का अंतर होता है। अक्सर यह देखा जाता है कि मैदानी क्षेत्रों से आने वाले चालक रातभर बिना रुके गाड़ी चलाते हैं, जिससे सुबह होते-होते उन्हें नींद की झपकी या गंभीर शारीरिक थकान घेर लेती है। पहाड़ी रास्तों पर एक सेकंड की झपकी भी पूरे परिवार को काल के गाल में समाने के लिए काफी होती है। यद्यपि इस हादसे के सटीक तकनीकी कारणों की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो पाएगी, लेकिन प्रथम दृष्टया वाहन का अनियंत्रित होना चालक के नियंत्रण खोने अथवा अचानक सामने आए किसी अवरोध का परिणाम प्रतीत होता है।
उत्तराखंड के राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षा मानकों को लेकर भी लगातार विमर्श की आवश्यकता महसूस की जा रही है। ऑल वेदर रोड परियोजना के तहत सड़कों का चौड़ीकरण तो हुआ है, लेकिन कई स्थानों पर तीव्र ढलानों के किनारे मजबूत क्रैश बैरियर और कंक्रीट की सुरक्षा दीवारों की कमी आज भी हादसों को जानलेवा बना देती है। यदि पाली गांव के पास सड़क किनारे अत्यधिक मजबूत क्रैश बैरियर लगा होता, तो संभव था कि कार खाई में गिरने के बजाय सड़क पर ही टकराकर रुक जाती और इतनी बड़ी जनहानि से बचा जा सकता था। प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसे सभी संवेदनशील दुर्घटना संभावित स्थलों को चिन्हित कर वहां तत्काल मजबूत सुरक्षा बाड़ और संकेतक स्थापित करे।
पहाड़ों की शांत वादियों में बिखरा यह दर्द केवल एक सड़क हादसे का आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि उन परिवारों का कभी न भरने वाला घाव है जिनकी दुनिया पलक झपकते ही उजड़ गई। बहत्तर वर्षीय बुजुर्ग सत्येश्वरी देवी अपने पैतृक गांव या स्वजनों से मिलने की उम्मीद लेकर निकली थीं, और चालक अनिल अपने कर्तव्य पथ पर था। घायलों के शारीरिक घाव तो समय के साथ भर जाएंगे, लेकिन खाई में गिरने के उस खौफनाक मंजर की मानसिक दहशत उनके जेहन में ताउम्र बनी रहेगी। देवप्रयाग का यह हादसा हर उस मुसाफिर के लिए एक दर्दनाक चेतावनी है जो पहाड़ों की सड़कों पर सफर करता है। पर्वतीय मार्गों पर अत्यधिक संयम, गति सीमा का पालन और वाहन की तकनीकी स्थिति की निरंतर जांच ही अनमोल जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है। एसडीआरएफ, स्थानीय पुलिस और पाली गांव के ग्रामीणों ने जिस मानवीय सेवा और तत्परता का परिचय दिया, वह इस दुखद प्रसंग में इंसानियत की एक मिसाल बनकर उभरा है।
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