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Uttarakhand News: बाल संरक्षण एवं पुनर्वास कार्यों में तेजी लाएं अधिकारीः जिलाधिकारी

On: September 18, 2026 5:27 AM
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Uttarakhand News: बाल संरक्षण एवं पुनर्वास कार्यों में तेजी लाएं अधिकारीः जिलाधिकारी
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Uttarakhand News: किसी भी संवेदनशील और प्रगतिशील समाज की वास्तविक पहचान इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे असहाय, निराश्रित और निर्बल वर्ग के प्रति कितना जागरूक और उत्तरदायी है। बच्चे किसी भी राष्ट्र का वर्तमान और भविष्य दोनों होते हैं, किंतु जब परिस्थितियां उनके आंचल से सुरक्षा, शिक्षा और सामान्य पारिवारिक स्नेह छीन लेती हैं, तब राज्य और उसके प्रशासनिक तंत्र की भूमिका एक अभिभावक के रूप में अनिवार्य हो जाती है।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में हाल ही में संपन्न हुई बाल संरक्षण एवं कल्याण से जुड़ी विभिन्न समितियों की त्रैमासिक समीक्षा बैठक इसी उत्तरदायित्व की दिशा में एक गंभीर और विचारणीय कदम के रूप में सामने आई है। कलेक्ट्रेट सभागार में देर शाम तक चली इस बैठक की अध्यक्षता जिलाधिकारी एवं जिला बाल संरक्षण इकाई के अध्यक्ष डॉ. आशीष चौहान ने की। इस गहन विचार-विमर्श के केंद्र में केवल फाइलों का निस्तारण नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों मासूम जिंदगियों की बुनियादी सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरिमा और सर्वांगीण पुनर्वास का सवाल था, जो सड़कों, मलिन बस्तियों, अनौपचारिक कार्यस्थलों या बालगृहों की चारदीवारी के भीतर अपने कल को बेहतर बनाने की बाट जोह रहे हैं।

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Photo- X District Magistrate Dr. Ashish Chauhan

जिलाधिकारी ने बैठक की शुरुआत से ही एक अत्यंत स्पष्ट और मानवीय दृष्टिकोण रेखांकित किया कि प्रत्येक मामले में बच्चे का सर्वोत्तम हित, उसकी शारीरिक व मानसिक सुरक्षा और उसका मानवीय गरिमापूर्ण पुनर्वास ही प्रशासनिक तंत्र की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रशासनिक प्रक्रियाओं में आने वाली किसी भी प्रकार की शिथिलता सीधे तौर पर किसी मासूम के जीवन को अंधकार की ओर धकेल सकती है, इसलिए उन्होंने स्पष्ट रूप से निर्देश दिए कि बाल संरक्षण से जुड़े सभी विभाग, विधिक निकाय और स्वयंसेवी संस्थाएं आपसी तालमेल और समन्वय के साथ मामलों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करें। लापरवाही पाए जाने पर जवाबदेही केवल कागजों में दर्ज नहीं होगी, बल्कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से तय की जाएगी। यह चेतावनी तंत्र को सक्रिय करने के लिए आवश्यक थी क्योंकि बाल अधिकारों का हनन कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवीय अपराध की श्रेणी में आता है।

समीक्षा बैठक के दौरान जिला बाल कल्याण एवं संरक्षण समिति, बाल कल्याण समिति, चाइल्ड हेल्पलाइन और साधु राम इंटर कॉलेज परिसर में संचालित बाल भिक्षावृत्ति निवारण प्रयास व इंटेंसिव केयर सेंटर के कार्यों की परत-दर-परत समीक्षा की गई। विधिक और सामाजिक दृष्टिकोण से सबसे अहम भूमिका बाल कल्याण समिति की होती है, जो बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक पीठ की तरह कार्य करती है। बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार विगत तीन महीनों के भीतर समिति के समक्ष कुल दो सौ छत्तीस नए और पुराने प्रकरण विचारार्थ प्रस्तुत हुए। विधिक प्रक्रियाओं, सामाजिक अन्वेषण रिपोर्टों और बच्चों के पारिवारिक पृष्ठभूमि के आकलन के उपरांत इनमें से एक सौ बीस प्रकरणों का सफलतापूर्वक और विधिसम्मत रूप से निस्तारण कर दिया गया। शेष मामलों पर निरंतर प्रक्रिया जारी है। यह गति दिखाती है कि तंत्र मामलों को लंबित रखने के बजाय उनके स्थाई समाधान की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

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Photo- X District Magistrate Dr. Ashish Chauhan

इसी विधिक प्रक्रिया का एक अत्यंत संवेदनशील और सुखद पहलू अनाथ या बेसहारा बच्चों के दत्तक ग्रहण से जुड़ा हुआ है। बालगृहों में रहने वाले बच्चों को एक सुरक्षित, कानूनी और स्नेहमयी पारिवारिक वातावरण उपलब्ध कराना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। बैठक में यह संतोषजनक तथ्य साझा किया गया कि संस्थागत बालगृहों में निवासरत छह बच्चों को आवश्यक विधिक जांच और प्रक्रियाओं के उपरांत दत्तक ग्रहण के लिए विधिक रूप से मुक्त घोषित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि अब ये बच्चे किसी ऐसे परिवार का हिस्सा बन सकेंगे जो उन्हें अपना नाम, प्यार और सुरक्षित भविष्य देने के लिए प्रतीक्षारत हैं। आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक पांच बच्चों को पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत दत्तक ग्रहण में दिया जा चुका है, जबकि वर्ष दो हजार सोलह से लेकर अब तक जनपद देहरादून से कुल एक सौ नौ बच्चों को देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों में रह रहे परिवारों को कानूनी रूप से गोद दिया गया है। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि यदि प्रशासनिक और विधिक संस्थाएं सक्रियता से कार्य करें, तो परित्यक्त बच्चों को एक नया जीवन और पहचान मिलना पूरी तरह संभव है।

सड़क पर संकट में फंसे बच्चों के लिए आपातकालीन जीवनरेखा का काम करने वाली चाइल्ड हेल्पलाइन सेवा की समीक्षा के दौरान सामने आए आंकड़े चिंता और सतर्कता दोनों की मांग करते हैं। अप्रैल से जून की अवधि में हेल्पलाइन पर संकटग्रस्त बच्चों से जुड़े दो सौ मामले दर्ज किए गए, जबकि जुलाई माह से लेकर बैठक की तिथि तक एक सौ चौहत्तर नए मामले सामने आए। इन कॉल्स में पारिवारिक विवाद, उपेक्षा, घरेलू हिंसा, भिक्षावृत्ति और संकट में फंसे बच्चों की सूचनाएं शामिल थीं। इनमें से विशेष रूप से बाल विवाह के दो मामले और बाल श्रम से संबंधित छियालीस मामले प्रकाश में आए। बाल श्रम के मामलों की यह संख्या स्पष्ट संकेत देती है कि शहर के ढाबों, दुकानों, मोटर गैराजों और छोटे कारखानों में अब भी बाल अधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है। जिलाधिकारी ने इन संवेदनशील मामलों पर अत्यंत कड़ा रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि केवल बच्चों को वहां से छुड़ा लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पारिवारिक समस्याओं, आर्थिक संकटों और संवेदनशील मामलों में परिवार की गहन काउंसलिंग और बच्चों का नियमित फॉलोअप अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए ताकि वे पुनः उसी दलदल में न धकेल दिए जाएं।

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Photo- X District Magistrate Dr. Ashish Chauhan

बच्चों के संस्थागत संरक्षण की रीढ़ जनपद में संचालित उन्नीस राजकीय एवं स्वैच्छिक बालगृह हैं। इन बालगृहों में रह रहे बच्चों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पूरी तरह वहां के वातावरण, सुरक्षा और सुविधाओं पर निर्भर करता है। जिलाधिकारी ने इन सभी गृहों के संचालन और व्यवस्थाओं की गहन समीक्षा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बच्चों के आवास, पौष्टिक भोजन, स्वच्छता, स्वास्थ्य जांच, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुरक्षा के मानकों में किसी भी स्तर पर कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। यदि किसी गृह में मानकों की अनदेखी या कमियां पाई जाती हैं, तो उनका समयबद्ध समाधान अविलंब किया जाना चाहिए। तंत्र की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए समीक्षा अवधि के दौरान बालगृहों के सोलह औचक व नियमित निरीक्षण किए गए, जिससे वहां की वास्तविक स्थिति का आकलन हो सका।

बालगृहों की सुरक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वहां तैनात कर्मचारियों का चरित्र और व्यवहार होता है। बच्चों के साथ किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार, शोषण या लापरवाही को रोकने के लिए प्रत्येक कर्मचारी की पृष्ठभूमि का पारदर्शी होना अनिवार्य है। समीक्षा में बताया गया कि जनपद के इन बालगृहों में कुल एक सौ छप्पन कार्मिक कार्यरत हैं, जिनमें से एक सौ अड़तीस कार्मिकों का पुलिस सत्यापन पूरा कराया जा चुका है। जिलाधिकारी ने निर्देश दिए कि शेष बचे कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन भी बिना किसी देरी के प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराया जाए, जिससे बालगृहों में बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण सुनिश्चित हो सके।

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Photo- X District Magistrate Dr. Ashish Chauhan

संस्थाओं में रहने वाले बच्चों के विधिक अस्तित्व और नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए उनके पहचान दस्तावेजों का होना अत्यंत आवश्यक है। पहचान पत्र के अभाव में बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की मुख्यधारा से बाहर छूट जाते हैं। बालगृहों में वर्तमान में निवासरत तीन सौ दो बच्चों की दस्तावेजी स्थिति की जब समीक्षा की गई, तो यह तथ्य सामने आया कि इनमें से दो सौ छत्तीस बच्चों के पहचान पत्र, पचानवे बच्चों के स्वास्थ्य सुरक्षा कार्ड और एक सौ सोलह बच्चों के राशन कार्ड बनवाए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त दो सौ उन्नीस बच्चे नियमित रूप से विभिन्न विद्यालयों में औपचारिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। जिलाधिकारी ने इस दिशा में संतोष व्यक्त करने के साथ ही कड़े निर्देश दिए कि जिन बच्चों के दस्तावेज अभी तक लंबित हैं, उनके दस्तावेज बनाने की प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा जाए। जब तक प्रत्येक बच्चे के पास उसका वैध पहचान पत्र और स्वास्थ्य सुरक्षा की सुविधा नहीं होगी, तब तक उसके अधिकारों की पूर्ण बहाली नहीं मानी जा सकती।

देहरादून जैसे तेजी से बढ़ते शहरी परिवेश में बाल भिक्षावृत्ति और बाल श्रम की समस्या एक जटिल सामाजिक बुराई बनी हुई है। चौराहों, धार्मिक स्थलों और बाजारों में भिक्षा मांगते या कूड़ा बीनते बच्चे केवल प्रशासनिक विफलता का संकेत नहीं हैं, बल्कि यह समाज की सामूहिक चेतना पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह हैं। इस बुराई से निपटने के लिए चलाए गए विशेष उन्मूलन अभियान के परिणाम बैठक में साझा किए गए। दिसंबर दो हजार चौबीस से लेकर अब तक जनपद में व्यापक अभियान चलाकर कुल सात सौ चौवालीस संकटग्रस्त बच्चों को चिन्हित कर रेस्क्यू किया गया। इन बच्चों का वर्गीकरण यह स्पष्ट करता है कि सड़क पर रहने वाले बच्चों की समस्याएं कितनी विविध हैं। इनमें से एक सौ ग्यारह बच्चे प्रत्यक्ष रूप से बाल भिक्षावृत्ति में लिप्त पाए गए, एक सौ तिहत्तर बच्चे अत्यधिक असुरक्षित परिस्थितियों में कूड़ा बीनने के काम में लगे थे, एक सौ एक बच्चे बाल श्रम की श्रेणी में कार्य करते हुए पाए गए, तीन सौ सात ऐसे बच्चे मिले जिन्होंने बीच में ही स्कूल छोड़ दिया था और बावन बच्चे अन्य संवेदनशील परिस्थितियों में पाए गए।

रेस्क्यू किए गए इन सात सौ चौवालीस बच्चों में से अब तक दो सौ सोलह बच्चों का विद्यालयों में औपचारिक दाखिला कराया जा चुका है, जो उन्हें अंधेरे से निकालकर रोशनी की ओर ले जाने का एक ठोस प्रयास है। हालांकि, जिलाधिकारी ने जोर देकर कहा कि बच्चों को रेस्क्यू करना कार्य का केवल पहला और अपेक्षाकृत आसान चरण है। वास्तविक चुनौती रेस्क्यू के बाद शुरू होती है। जब तक इन बच्चों को निरंतर शिक्षा, नियमित स्वास्थ्य सुविधाएं, मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग और एक सुरक्षित पारिवारिक या संस्थागत वातावरण नहीं दिया जाएगा, तब तक उनके वापस सड़कों पर लौटने का जोखिम हमेशा बना रहेगा। इसलिए उन्होंने सभी संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिए कि प्रत्येक रेस्क्यू किए गए बच्चे का एक विस्तृत केस रिकॉर्ड तैयार किया जाए और उसका नियमित फॉलोअप सुनिश्चित किया जाए ताकि उसका वास्तविक और दीर्घकालिक पुनर्वास संभव हो सके। साधु राम इंटर कॉलेज में संचालित विशेष केंद्र की उपयोगिता को भी इस दिशा में और अधिक प्रभावी बनाने पर बल दिया गया।

बाल संरक्षण को केवल जिला मुख्यालय तक सीमित रखने के बजाय इसे जमीनी स्तर पर उतारने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मिशन वात्सल्य के क्रियान्वयन पर विशेष चर्चा की गई। जिलाधिकारी ने निर्देशित किया कि इस योजना के अंतर्गत ब्लॉक, ग्राम पंचायत, नगर निकाय और वार्ड स्तर पर गठित बाल संरक्षण समितियों को पूरी तरह सक्रिय किया जाए। अक्सर यह देखा जाता है कि कागजों पर समितियां बन जाती हैं लेकिन वे स्थानीय स्तर पर बच्चों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दे पातीं। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि इन समितियों की नियमित बैठकें हों और ग्राम व वार्ड स्तर पर ही स्कूल छोड़ चुके, बाल विवाह के खतरे का सामना कर रहे या कठिन परिस्थितियों में जी रहे बच्चों की पहचान की जाए। इसके साथ ही उन्होंने पंचायतों और निकायों को उपलब्ध होने वाले अनटाइड अनुदान की पांच प्रतिशत धनराशि को नियमानुसार अनिवार्य रूप से बच्चों के कल्याण, पोषण और सुरक्षात्मक कार्यों पर व्यय करने के निर्देश दिए। स्थानीय स्तर पर वित्तीय संसाधनों की इस उपलब्धता से बच्चों की तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करने में भारी मदद मिलेगी।

बैठक के समापन सत्र में जिलाधिकारी ने अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए आवश्यक सभी कागजी और विधिक प्रक्रियाओं को गति देने पर बल दिया। उन्होंने निर्देश दिए कि जिन बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र या अन्य आवश्यक विधिक प्रमाण पत्र अब तक नहीं बन पाए हैं, उन्हें संबंधित विभागों के समन्वय से तुरंत तैयार कराया जाए। जिन बच्चों के परिवार अन्य राज्यों में हैं या जो भटक कर यहां पहुंच गए हैं, उनके गृह राज्यों के बाल कल्याण अधिकारियों से समन्वय स्थापित कर उन्हें सुरक्षित रूप से उनके परिवारों अथवा उनके राज्यों के बालगृहों में भेजने की प्रक्रिया को मानवीय संवेदनशीलता के साथ पूरा किया जाए। इसके अतिरिक्त सभी संस्थाओं में बच्चों के अभिलेखों को डिजिटल और भौतिक रूप से पूरी तरह अद्यतन रखने को कहा गया ताकि किसी भी विधिक या प्रशासनिक स्तर पर जानकारी में कोई अस्पष्टता न रहे।

देहरादून कलेक्ट्रेट में हुई यह समीक्षा बैठक केवल प्रशासनिक औपचारिकताओं की पूर्ति नहीं थी, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संदेश थी कि प्रशासन बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर बेहद गंभीर है। एक सुरक्षित, शिक्षित और स्वस्थ बचपन ही एक मजबूत और मानवीय समाज की नींव रख सकता है। जब तक समाज का अंतिम बच्चा सड़कों की धूल, भिक्षावृत्ति और श्रम की मजबूरी से मुक्त होकर सुरक्षित स्कूल और घर तक नहीं पहुंच जाता, तब तक विकास के तमाम दावे अधूरे ही रहेंगे। जिलाधिकारी के इन स्पष्ट निर्देशों, जवाबदेही की तय व्यवस्था और जमीनी निगरानी की रणनीति से यह उम्मीद बलवती होती है कि देहरादून में बाल अधिकारों के संरक्षण और पुनर्वास की दिशा में आने वाले समय में और अधिक ठोस, सकारात्मक और मानवीय परिणाम देखने को मिलेंगे।

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