Haridwar Ardh Kumbh 2027: उत्तराखंड की पावन नगरी हरिद्वार में वर्ष 2027 में आयोजित होने वाले अर्धकुंभ को लेकर प्रशासनिक हलकों में तैयारियां अब धरातल पर उतरने लगी हैं। गंगा तट पर लगने वाले इस विशाल धार्मिक समागम में देश और दुनिया भर से पांच करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं और साधु-संतों के पहुंचने का प्रारंभिक आकलन किया गया है। करीब चार महीने तक अनवरत चलने वाले इस आध्यात्मिक महापर्व में आस्था के सैलाब के साथ-साथ नागरिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की भी वास्तविक परीक्षा होती है। विशेष रूप से इतने बड़े जनसमूह के लिए सुरक्षित और सुलभ स्वास्थ्य ढांचा खड़ा करना मेला प्रशासन और राज्य सरकार के लिए सदैव सबसे बड़ी चुनौती साबित होता रहा है। इसी जमीनी हकीकत को केंद्र में रखते हुए मेला प्रशासन ने व्यापक स्वास्थ्य प्रबंधन योजना की पहली रूपरेखा सार्वजनिक की है, जिसके तहत मेला क्षेत्र तथा उससे जुड़े सीमावर्ती जिलों में कुल पैंतालीस अस्थायी अस्पतालों का मजबूत नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।

इस विशालकाय स्वास्थ्य तंत्र को जमीन पर सक्रिय और संवेदनशील बनाए रखने के उद्देश्य से करीब अठारह सौ योग्य डॉक्टरों, पैरामेडिकल कर्मियों, नर्सों और सहायक स्वास्थ्य कर्मचारियों का एक समर्पित दस्ता तैनात किया जाएगा। यह प्रशासनिक पहल केवल एक कागजी घोषणा नहीं है, बल्कि उस गंभीर आवश्यकता का ठोस समाधान है जो बीते कुंभ और अर्धकुंभ आयोजनों के अनुभवों से सामने आई है। जब लाखों श्रद्धालु एक साथ प्रमुख स्नान घाटों जैसे हर की पैड़ी, रोड़ी बेलवाला, चंडी घाट और बैरागी कैंप की तरफ बढ़ते हैं, तब किसी भी अप्रत्याशित चिकित्सकीय संकट को संभालने के लिए मिनटों में प्रतिक्रिया देने वाला तंत्र अनिवार्य हो जाता है। इसी कारण प्रशासन ने निर्णय लिया है कि चिकित्सा केंद्रों का वितरण इस प्रकार होगा कि श्रद्धालु को आपात स्थिति में लंबी दूरी तय न करनी पड़े और उसे चंद पलों के भीतर बुनियादी प्राथमिक उपचार उपलब्ध हो सके।
मेला प्रशासन के नीति नियंताओं के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं का यह पूरा सुरक्षा चक्र सिर्फ हरिद्वार नगर निगम या मुख्य मेला घाटों की परिधि तक सीमित नहीं रहेगा। हरिद्वार आने वाले श्रद्धालु केवल रेल या बस अड्डों तक ही नहीं आते, बल्कि वे आसपास के पर्वतीय और मैदानी मार्गों से होते हुए यात्रा पूरी करते हैं। यही कारण है कि प्रस्तावित योजना में पड़ोसी जिलों देहरादून, टिहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल के संवेदनशील और मुख्य आवागमन वाले क्षेत्रों को भी सीधे तौर पर जोड़ा गया है। ऋषिकेश, मुनिकीरेती, स्वर्गाश्रम, नरेंद्र नगर और कोटद्वार जैसे प्रवेश मार्गों पर भी स्वास्थ्य चौकियों और अस्थायी अस्पतालों की श्रृंखला बनाई जा रही है। इसका मुख्य लाभ यह होगा कि मेला क्षेत्र के मुख्य अस्पतालों पर एकतरफा अत्यधिक दबाव नहीं पड़ेगा और बाहर से आने वाले यात्रियों की स्वास्थ्य जांच और तात्कालिक देखभाल रास्ते में ही संभव हो सकेगी।
धार्मिक मेलों के दौरान भीड़ का असामान्य दबाव कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देता है जहां छोटी सी लापरवाही भी बड़ी अव्यवस्था का रूप ले सकती है। स्नान पर्वों जैसे मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि और चैत्र पूर्णिमा के दिनों में घाटों पर तिल रखने की जगह नहीं बचती। ऐसे चरम दिनों में बुजुर्ग श्रद्धालुओं को सांस लेने में कठिनाई, निर्जलीकरण, हाइपोथर्मिया, थकावट से बेहोशी या भारी दबाव के कारण हल्की-फुल्की भगदड़ में चोट लगना बेहद आम बात होती है। यदि मौके पर तुरंत प्राथमिक चिकित्सा दल न पहुंचे तो मामूली शारीरिक परेशानी भी गंभीर जीवन संकट में तब्दील हो सकती है। पैंतालीस अस्थायी अस्पतालों की संरचना इसी संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर गढ़ी जा रही है, जिससे हर सेक्टर और हर जोनल मजिस्ट्रेट क्षेत्र में एक पूर्ण कार्यशील प्राथमिक चिकित्सा इकाई मौजूद रहे।
अस्पतालों की संरचना को एक समान रखने के बजाय त्रिस्तरीय और बहुआयामी मॉडल पर ढालने का विचार रखा गया है। इसके अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर गंगा घाटों और स्नान कुंडों के किनारे प्राथमिक उपचार चौकियां होंगी, जहां त्वरित ओआरएस, प्राथमिक पट्टियां, ऑक्सीजन सिलेंडर और जीवनरक्षक प्राथमिक दवाइयां चौबीसों घंटे उपलब्ध रहेंगी। इसके बाद मध्यम स्तर पर सेक्टर अस्पताल होंगे, जहां कुछ घंटों के लिए मरीजों को निगरानी में रखने, आवश्यक ड्रिप चढ़ाने और सामान्य परीक्षण की व्यवस्था रहेगी। तीसरे स्तर पर पूर्ण सुसज्जित बेस और अस्थायी रेफरल अस्पताल होंगे, जिनमें गंभीर मरीजों को स्थिर करने के लिए वेंटीलेटर, आपातकालीन ट्रॉमा वार्ड और पोर्टेबल जांच उपकरण स्थापित किए जाएंगे। इस बहुस्तरीय योजना का वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय स्तर पर ही नब्बे प्रतिशत मामलों का निस्तारण हो जाए और केवल अति गंभीर रोगियों को ही ऋषिकेश एम्स या देहरादून व हरिद्वार के जिला अस्पतालों में भेजा जाए।
अठारह सौ मेडिकल और पैरामेडिकल कर्मियों की तैनाती इस समूचे अभियान की रीढ़ बनेगी। इतनी बड़ी संख्या में दक्ष मानव संसाधन को जुटाने के लिए उत्तराखंड स्वास्थ्य महानिदेशालय राज्य के विभिन्न जिलों से स्वास्थ्य कर्मियों की चरणबद्ध प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करेगा। पर्वतीय जिलों की नियमित स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यह संतुलन बनाना स्वास्थ्य विभाग के लिए एक नाजुक काम होगा। इसके लिए अवकाश पर रोक, संविदा पर अतिरिक्त डॉक्टरों की भर्ती और वरिष्ठ मेडिकल छात्रों व इंटर्न की सेवाओं को वॉलंटियर के रूप में जोड़ने की रणनीति पर भी मंथन चल रहा है। डॉक्टरों के साथ-साथ अनुभवी वार्ड बॉय, प्रशिक्षित नर्स और फार्मासिस्टों की मौजूदगी इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भीड़ भरे माहौल में त्वरित निर्णय लेने और मरीज के परिजनों को ढांढस बंधाते हुए तेजी से उपचार शुरू करने का अनुभव केवल प्रशिक्षित कर्मियों के पास ही होता है।
यद्यपि पैंतालीस अस्पतालों और अठारह सौ कर्मियों की संख्या व्यवस्था की गंभीरता को दर्शाती है, फिर भी कई तकनीकी और ढांचागत विवरण अभी अंतिम रूप लिए जाने बाकी हैं। किस अस्पताल में कितने बिस्तरों की व्यवस्था होगी, हृदय रोग या श्वसन संबंधी रोगों के लिए कितने विशेषज्ञ चिकित्सक तैनात किए जाएंगे, और दुर्घटना की स्थिति में रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कितने ब्लड स्टोरेज सेंटर बनेंगे, यह अभी विस्तृत कार्ययोजना जारी होने पर स्पष्ट होगा। इसके अलावा संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए मेला क्षेत्र में स्वच्छ पेयजल की सतत निगरानी और महामारी नियंत्रण प्रयोगशालाओं की स्थापना भी एक ऐसा पहलू है जिस पर अगले कुछ महीनों में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी होने की प्रबल संभावना है।

सड़क मार्ग पर ग्रीन कॉरिडोर का निर्माण और वाटर एंबुलेंस की उपलब्धता भी इस चिकित्सा योजना का एक अपरिहार्य अंग बनने जा रही है। हरिद्वार की संकरी गलियों और मुख्य मार्गों पर स्नान पर्व के दौरान एंबुलेंस को निकालना लगभग असंभव कार्य बन जाता है। इस गतिरोध को तोड़ने के लिए प्रशासन को बाइक एंबुलेंस और गंगा नहर में छोटी मोटरबोट एंबुलेंस चलाने के विकल्प को भी योजना में जोड़ना होगा, ताकि नदी के उस पार या घाटों के संकरे कोनों से घायल अथवा बीमार व्यक्तियों को तुरंत मुख्य अस्पताल तक पहुंचाया जा सके। टिहरी और पौड़ी के पहाड़ी रास्तों पर यदि भूस्खलन या भारी जाम की स्थिति बनती है, तो वहां एयर एंबुलेंस और हेलीपैड की पूर्व पहचान भी योजना की सफलता की अनिवार्य शर्त रहेगी।
हरिद्वार अर्धकुंभ 2027 की यह प्रारंभिक रूपरेखा यह स्पष्ट संकेत देती है कि शासन और मेला प्रशासन इस बार केवल पारंपरिक व्यवस्थाओं के सहारे नहीं बैठना चाहता। श्रद्धालुओं की सुरक्षा, उनके स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी और किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए समय रहते वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। आने वाले समय में जब इन अस्थायी अस्पतालों के सटीक स्थान, बिस्तरों की कुल क्षमता और आपातकालीन हेल्पलाइन नंबरों का खाका पूरी तरह सामने आएगा, तब इस योजना का धरातलीय प्रभाव और अधिक स्पष्ट होकर जनता के सामने प्रस्तुत होगा।
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