Harela Festival News: उत्तराखंड का लोकपर्व ‘हरेला’ संपन्नता, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का एक जीवंत प्रतीक है। इस पावन अवसर पर संपूर्ण राज्य में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। इसी कड़ी में, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को जनपद पौड़ी गढ़वाल के अंतर्गत आने वाले यमकेश्वर विकासखंड के मालाग्राम पहुंचकर एक वृहद एवं सघन पौधरोपण कार्यक्रम में प्रतिभाग किया। इस विशेष और गरिमामय आयोजन में योग गुरु स्वामी रामदेव और पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण की गरिमामयी उपस्थिति रही। मुख्यमंत्री ने स्वयं पौधरोपण कर समस्त प्रदेशवासियों को पर्यावरण संरक्षण और ‘हरित उत्तराखंड’ का एक बेहद सशक्त और दूरगामी संदेश दिया।
पौधरोपण कार्यक्रम के उपरांत मुख्यमंत्री ने मालाग्राम में नवनिर्मित और प्रतिष्ठित ‘श्री धन्वंतरि धाम हर्बल वर्ल्ड हिमालय’ परिसर का विस्तृत भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने वहां अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से संरक्षित की जा रही दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों, उच्च स्तरीय अनुसंधान गतिविधियों तथा आयुर्वेद पर आधारित विभिन्न नवाचारों (इन्नोवेशंस) की विस्तृत जानकारी प्राप्त की। इसके साथ ही, मुख्यमंत्री ने परिसर के भीतर एकांत और साधना के लिए बनाई गई विशेष ‘ध्यान कुटी’ का भी बारीकी से निरीक्षण किया और वहां के शांत एवं आध्यात्मिक वातावरण की सराहना की।
जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान का वैश्विक संवर्धन
परिसर के भ्रमण के दौरान मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड की समृद्ध और अद्वितीय जैव विविधता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली औषधीय वनस्पतियां और हमारा पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान केवल उत्तराखंड या भारत की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक अमूल्य धरोहर है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में इस प्राचीन ज्ञान का वैज्ञानिक संरक्षण, दस्तावेजीकरण और आधुनिक शोध आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पतंजलि और राज्य सरकार के साझा प्रयासों से इस दिशा में किए जा रहे कार्य न केवल पर्यावरण संरक्षण को एक नई और वैज्ञानिक दिशा देंगे, बल्कि इसके कई बहुआयामी लाभ भी राज्य को मिलेंगे। औषधीय पौधों के बड़े पैमाने पर संवर्धन से जहां एक ओर आयुर्वेद आधारित वैज्ञानिक अनुसंधानों को नई गति मिलेगी, वहीं दूसरी ओर राज्य में ‘हर्बल टूरिज्म’ (जड़ी-बूटी आधारित पर्यटन) के एक नए अध्याय की शुरुआत होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय पहाड़ों में रहने वाले युवाओं के लिए स्वरोजगार और आजीविका के नए एवं टिकाऊ अवसर सृजित होंगे, जिससे भविष्य में पर्वतीय क्षेत्रों से होने वाले पलायन पर भी प्रभावी रोक लग सकेगी।
श्री धन्वंतरि धाम: आधुनिक शोध और प्राचीन चिकित्सा का अनूठा संगम
मालाग्राम में स्थापित ‘श्री धन्वंतरि धाम हर्बल वर्ल्ड हिमालय’ आज पूरे देश में अपनी तरह का एक बेहद अनूठा और विशाल हर्बल पार्क बनकर उभरा है। इस पार्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देश के विभिन्न राज्यों, दुर्गम घाटियों और उच्च हिमालयी क्षेत्रों से बेहद खोजबीन के बाद लाई गई दुर्लभ जड़ी-बूटियों और विलुप्तप्राय औषधीय पौधों को लाकर उनका वैज्ञानिक पद्धतियों से संरक्षण और संवर्धन किया जा रहा है। यह स्थान केवल पौधों का बगीचा नहीं है, बल्कि यह एक सजीव प्रयोगशाला है।
यह परिसर हमारी प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और आधुनिक विज्ञान व शोध के अद्भुत समन्वय का एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र बनने की राह पर अग्रसर है। यहां वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि कैसे इन औषधीय पौधों की गुणवत्ता को बढ़ाया जाए और इनसे असाध्य बीमारियों के इलाज के लिए प्रभावी दवाएं तैयार की जा सकें। पतंजलि योगपीठ के संस्थापक स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की देखरेख में इस केंद्र को वैश्विक स्तर के अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो आने वाले समय में विश्व पटल पर उत्तराखंड का गौरव बढ़ाएगा।
यमकेश्वर के मालाग्राम में आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का साफ संकेत है कि उत्तराखंड सरकार विकास के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को सहेजने के लिए कितनी गंभीर है। हरेला पर्व के पावन मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की यह जुगलबंदी राज्य को हरित और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
‘श्री धन्वंतरि धाम हर्बल वर्ल्ड हिमालय’ जैसी परियोजनाएं भविष्य में उत्तराखंड को आयुर्वेद और वैलनेस टूरिज्म का वैश्विक हब बनाने की क्षमता रखती हैं। जब पर्यावरण का संरक्षण होगा, दुर्लभ वनस्पतियों का संवर्धन होगा और स्थानीय युवाओं को अपने ही घर में रोजगार मिलेगा, तभी सच्चे अर्थों में उत्तराखंड की आर्थिकी सुदृढ़ होगी। यह अनूठी पहल प्रकृति, स्वास्थ्य और स्थानीय समृद्धि के त्रिवेणी संगम के रूप में देवभूमि के सतत विकास का एक नया मार्ग प्रशस्त कर रही है।
हरेला उत्तराखंड का पारंपरिक लोकपर्व
हरेला उत्तराखंड के विशेष रूप से कुमाऊं क्षेत्र का एक बेहद लोकप्रिय और पारंपरिक लोकपर्व है। यह त्योहार हरियाली, शांति, सुख-समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है।
‘हरेला’ शब्द का अर्थ ही ‘हरे रंग का तिनका’ या ‘हरियाली’ होता है। यह पर्व वर्ष में तीन बार (चैत्र, आश्विन और श्रावण मास में) आता है, लेकिन श्रावण मास (जुलाई के मध्य) में पड़ने वाले हरेला का धार्मिक और सामाजिक महत्व सबसे अधिक होता है।
1. बुवाई और परंपरा
त्योहार से नौ दिन पहले (आषाढ़ के अंतिम दिनों में) घरों के मंदिरों में टोकरियों या मिट्टी के बर्तनों में पांच या सात प्रकार के अनाज (जैसे गेहूं, जौ, मक्का, गहत, सरसों, उड़द) बोए जाते हैं। इसे ‘हरेला बोना’ कहा जाता है। इन नौ दिनों तक इसमें रोज सुबह पानी दिया जाता है और सूर्य की रोशनी से बचाकर रखा जाता है, जिससे ये तिनके पीले-हरे रंग के बेहद खूबसूरत उगते हैं।
2. पूजन और आशीष
दसवें दिन यानी कर्क संक्रांति (श्रावण मास की शुरुआत) को इन तिनकों को काटा जाता है। इस दिन घर के बुजुर्ग भगवान शिव और माता पार्वती (कर्क संक्रांति के दिन शिव-पार्वती के विवाह के रूप में भी मनाया जाता है) की पूजा करते हैं। इसके बाद वे परिवार के छोटे सदस्यों के सिर और कानों पर इन हरेला के तिनकों को रखकर उन्हें सुख-समृद्धि, दीर्घायु और उन्नति का आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान एक पारंपरिक कुमाऊंनी आशीर्वाद गीत भी गाया जाता है:
“जी रया, जागी रया, यो दिन बार-बार भेंटने रया…” (यानी जीते रहो, जागरूक रहो और यह दिन बार-बार देखने को मिलता रहे)।
3. पर्यावरण संरक्षण का संदेश
धार्मिक महत्व के साथ-साथ हरेला पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित त्योहार है। इस दिन उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर सघन पौधरोपण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पारंपरिक मान्यता है कि हरेला के दिन यदि कोई भी पौधा या टहनी मिट्टी में रोपी जाए, तो वह निश्चित रूप से पनप जाती है।
यह त्योहार नई फसल के आने की खुशी, ऋतु परिवर्तन और मनुष्य का प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को प्रदर्शित करता है।









