DM Dehradun News: स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक सार्थकता केवल इस बात में नहीं आंकी जा सकती कि कागजों पर आंकड़े कितने बेहतर दिखाई देते हैं, बल्कि इसकी असली कसौटी यह है कि समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़ी महिला और उसके नवजात शिशु को संकट के समय कितनी त्वरित और सुरक्षित चिकित्सा सुविधा मिलती है। देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान की अध्यक्षता में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत आयोजित समीक्षा बैठक ने प्रशासनिक संवेदनशीलता और जवाबदेही का यही रूप सामने रखा है। इस बैठक में न केवल मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर पर लाने के लिए आधुनिक तकनीक और भौगोलिक विश्लेषण पर आधारित योजना बनाने पर बल दिया गया, बल्कि व्यवस्था में मौजूद मानवीय लापरवाही पर भी सख्त प्रशासनिक प्रहार किया गया।

प्रशासनिक समीक्षाओं में अक्सर समग्र औसत की आड़ में उन सूक्ष्म चूकों को नजरअंदाज कर दिया जाता है जो किसी की जान जाने का कारण बनती हैं। जिलाधिकारी ने बैठक की शुरुआत में ही स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य संकेतकों में देहरादून की स्थिति चाहे राज्य और राष्ट्रीय औसत से कितनी भी बेहतर क्यों न हो, एक भी गर्भवती महिला या नवजात शिशु की असमय मृत्यु पूरे तंत्र की विफलता मानी जाएगी। इसी सोच के तहत उन्होंने पिछले पांच वर्षों के दौरान जिले में हुई सभी मातृ एवं शिशु मृत्यु के आंकड़ों का वैज्ञानिक और सांख्यिकीय विश्लेषण करने के निर्देश दिए। इसके लिए जीआईएस यानी जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम मैपिंग की मदद ली जाएगी। जीआईएस मैपिंग के जरिए जिले के उन विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों, बस्तियों और दूरस्थ गांवों को लाल घेरे में चिह्नित किया जाएगा, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच कठिन है अथवा जहां बार-बार ऐसे दुखद मामले सामने आते रहे हैं। इन संवेदनशील क्षेत्रों के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित कर वहां स्वास्थ्य कर्मियों की तैनाती, दवाइयों की उपलब्धता और आपातकालीन परिवहन सेवाओं को प्राथमिकता के आधार पर मजबूत किया जाएगा।

स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ मानी जाने वाली प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की जवाबदेही पर इस बैठक में बेहद कड़ा रुख देखने को मिला। वर्ष 2026 के दौरान अब तक प्रसव के दौरान अथवा प्रसव के तत्काल बाद जान गंवाने वाली 12 महिलाओं के मामलों की केस स्टडी प्रस्तुत की गई। जिलाधिकारी ने प्रत्येक मामले की फाइल को स्वयं देखा और उसमें दर्ज तथ्यों की बारीकी से पड़ताल की। इस दौरान चार मामलों में दी गई रिपोर्ट में गंभीर विसंगतियां सामने आईं, जिस पर संबंधित अधिकारियों से तत्काल प्रभाव से स्पष्ट आख्या तलब की गई। प्रेमनगर क्षेत्र की निवासी रुखसाना की मृत्यु के मामले ने प्रशासनिक मशीनरी के भीतर चल रही लीपापोती को पूरी तरह उजागर कर दिया। इस प्रकरण में जब आशा और एएनएम से मिले बयानों का मिलान किया गया तो उनमें भारी विरोधाभास पाया गया। इतना ही नहीं, जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि अपनी लापरवाही छुपाने के लिए सरकारी अभिलेखों और स्वास्थ्य आंकड़ों में हेरफेर किया गया था तथा साक्ष्य के रूप में पुरानी और गलत तारीखों वाले फोटोग्राफ नत्थी किए गए थे।

मानव जीवन के साथ इस तरह के गंभीर खिलवाड़ और फर्जीवाड़े को देखकर जिलाधिकारी ने बिना किसी देरी के मौके पर ही संबंधित एएनएम को निलंबित करने के आदेश जारी किए। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा कि कर्तव्य में कोताही, फर्जी दस्तावेज तैयार करना और आंकड़ों की बाजीगरी कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता समय पर गर्भवती महिला की जांच नहीं करता, जोखिम वाले लक्षणों की उपेक्षा करता है या जटिलताओं के बावजूद महिला को समय पर उच्च चिकित्सा संस्थान में रेफर करने के बजाय मामले को दबाए रखता है, तो इसे केवल विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि आपराधिक उपेक्षा के रूप में देखा जाएगा। विशेष रूप से घर पर होने वाले असुरक्षित प्रसवों को लेकर आशा कार्यकत्रियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव सुनिश्चित किया जा सके।

स्वास्थ्य समीक्षा केवल मातृ-शिशु स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें राष्ट्रीय क्षय रोग यानी टीबी उन्मूलन कार्यक्रम की गति का भी कड़ा मूल्यांकन किया गया। जिलाधिकारी ने जनपद की जनसंख्या के अनुपात में टीबी की जांच और एक्स-रे की संख्या बेहद कम पाए जाने पर गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने स्वास्थ्य अधिकारियों को चेताया कि जब तक जांच का दायरा नहीं बढ़ेगा, तब तक समाज में छुपे हुए टीबी के रोगियों की पहचान संभव नहीं हो सकेगी, जिससे संक्रमण की कड़ी को तोड़ना असंभव हो जाएगा। उन्होंने सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी क्लीनिकों, नर्सिंग होम और पैथोलॉजी लैब को भी सक्रिय रूप से इस अभियान में शामिल करने के निर्देश दिए। कार्यक्रम के दौरान एक सकारात्मक पहलू भी देखने को मिला, जहां टीबी से पूरी तरह जंग जीतकर स्वस्थ हो चुके नागरिकों और समाज में जागरूकता फैलाने वाले पांच टीबी चैंपियनों को सम्मानित किया गया, ताकि समाज में इस बीमारी को लेकर फैली भ्रांतियां दूर हो सकें और लोग समय पर जांच कराने के लिए आगे आएं।
आंकड़ों के नजरिए से देखें तो स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली यानी एचआईएमएस के वर्ष 2025-26 के आंकड़े देहरादून के लिए कई मोर्चों पर राहत देने वाले हैं। जनपद में मातृ मृत्यु अनुपात यानी एमएमआर 31.0 दर्ज किया गया है, जो उत्तराखंड के राज्य औसत 99 और राष्ट्रीय औसत 97 की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बेहतर है। यह आंकड़ा वर्ष 2030 के लिए निर्धारित राष्ट्रीय सतत विकास लक्ष्य 70 से भी काफी नीचे है। इसी तरह, नवजात शिशु मृत्यु दर 10.4 है, जबकि राज्य में यह 13 और देश में 20 है। शिशु मृत्यु दर के मामले में देहरादून 13.8 पर है, जो राज्य के 19 और राष्ट्रीय स्तर के 28 से काफी कम है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर भी जनपद में 16.0 दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय लक्ष्य 25 और राष्ट्रीय औसत 32 की तुलना में बेहतर प्रबंधन को दर्शाती है।

तमाम सकारात्मक आंकड़ों के बीच एक आंकड़ा ऐसा भी है जो जिले के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है। वह है जन्म के समय लिंगानुपात, जो देहरादून में चिंताजनक रूप से गिरकर 924.4 पर आ गया है। यह आंकड़ा उत्तराखंड के 984 और राष्ट्रीय औसत 929 से काफी पीछे है, तथा वर्ष 2025 के लिए तय किए गए 950 के राष्ट्रीय मानक से भी बहुत दूर है। राजधानी क्षेत्र और उच्च साक्षरता दर वाले जिले में लिंगानुपात का यह निम्न स्तर स्पष्ट करता है कि कन्या भ्रूण हत्या और लिंग चयन जैसी कुप्रथाओं पर लगाम लगाने के लिए पीसीपीएनडीटी अधिनियम का कड़ाई से अनुपालन कराया जाना नितांत आवश्यक है। जिलाधिकारी ने इस विषमता को तत्काल सुधारने के लिए अल्ट्रासाउंड केंद्रों की सख्त और नियमित जांच करने के निर्देश दिए हैं।
देहरादून कलेक्ट्रेट में हुई यह समीक्षा बैठक इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि नीतियां केवल फाइलों में बंद रहने के लिए नहीं होतीं। जब तक प्रशासनिक नेतृत्व आंकड़ों की चमक के पीछे छिपी जमीनी सच्चाइयों की पड़ताल नहीं करेगा और लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई नहीं करेगा, तब तक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकता। जीआईएस मैपिंग और टास्क फोर्स जैसी पहलों से आने वाले समय में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा और अधिक पारदर्शी, संवेदनशील और परिणामोन्मुखी होने की उम्मीद बंधी है।
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