Uttarakhand News: लोकतांत्रिक प्रशासनिक व्यवस्था की सार्थकता इस बात में नहीं आंकी जाती कि सचिवालय के गलियारों में कितनी नई योजनाएं जन्म लेती हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि दूरस्थ गांवों और कस्बों में उन योजनाओं का प्रभाव कितनी तेजी से पहुंचता है। किसी भी राज्य के विकास की वास्तविक तस्वीर राजधानी की भव्य इमारतों में नहीं, बल्कि जनपदों की धूल भरी सड़कों, आधे-अधूरे पुलों, बजट की बाट जोहते अस्पतालों और विभागीय अनुमतियों के फेर में फंसी जनहित की फाइलों में नजर आती है। जब जनपदों से भेजे गए प्रस्ताव और जनहित की समस्याएं शासन स्तर पर लालफीताशाही का शिकार होकर महीनों और वर्षों तक धूल फांकती रहती हैं, तब जनता का विश्वास प्रशासनिक तंत्र से उठने लगता है। इसी व्यवस्थागत जड़ता को तोड़ने और नीतिगत निर्णयों को त्वरित गति देने के उद्देश्य से सचिवालय में मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दिशा-निर्धारक समीक्षा बैठक संपन्न हुई।
इस बैठक का मूल स्वर केवल औपचारिक प्रगति जानना नहीं था, बल्कि शासन और जनपद स्तर के बीच उस अदृश्य दीवार को गिराना था जिसके चलते विकास कार्य अक्सर अधर में लटक जाते हैं। मुख्य सचिव ने सभी विभागों के आला अफसरों और जिलाधिकारियों के साथ सीधे संवाद के दौरान स्पष्ट किया कि जनपदों के किसी भी प्रकरण में अकारण होने वाली देरी सीधे तौर पर शासन की कार्यकुशलता पर सवालिया निशान लगाती है। उन्होंने दो टूक शब्दों में निर्देश दिए कि जनहित से जुड़े हर उस मामले को प्राथमिकता पर रखा जाए जो शासन स्तर पर किसी न किसी तकनीकी पेंच, अंतर-विभागीय अनापत्ति अथवा बजटीय स्वीकृति के अभाव में लंबित पड़ा है। शासन की इस सख्त और सजग पहल ने समूचे प्रशासनिक अमले को यह संदेश दे दिया है कि अब फाइलों को दबाकर रखने की पुरानी कार्यसंस्कृति बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

ऐतिहासिक रूप से भारतीय प्रशासनिक ढांचे में एक बड़ी कमी यह देखी जाती रही है कि निर्णय लेने की शक्ति राजधानी में केंद्रित होती है, जबकि समस्याओं का वास्तविक सामना जिला स्तर के अधिकारियों को करना पड़ता है। जब किसी जनपद का जिलाधिकारी किसी आपदा प्रभावित सड़क के पुनर्निर्माण, विद्यालय भवन के विस्तार या सिंचाई नहर के पुनरुद्धार का प्रस्ताव शासन को भेजता है, तो वह प्रस्ताव कई विभागों के अनुभागों, पटल सहायकों और उप-सचिवों के बीच चक्कर काटता रहता है। एक विभाग दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी डालता है और दूसरा तीसरे पर। इस प्रशासनिक सुस्ती का सीधा खामियाजा आम नागरिक को भुगतना पड़ता है। मुख्य सचिव ने इस बैठक के माध्यम से इसी अंतर-विभागीय खींचतान को समाप्त करने की सीधी व्यवस्था बनाई है। उन्होंने विभागाध्यक्षों को निर्देश दिया कि वे औपचारिक पत्राचार का इंतजार किए बिना आपसी समन्वय से समस्याओं की गांठें खोलें।
जिलाधिकारियों को यह स्पष्ट अधिकार और निर्देश दिया गया है कि वे किसी भी प्रकरण के अटकने पर औपचारिक चिट्ठियों के आदान-प्रदान में समय नष्ट न करें, बल्कि सीधे संबंधित विभाग के प्रमुख से फोन पर अथवा व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर गतिरोध को समाप्त करें। यह कदम प्रशासनिक औपचारिकता से आगे बढ़कर व्यावहारिक संवाद की ओर एक बड़ा बदलाव है। जब दो वरिष्ठ अधिकारी सीधे आमने-सामने बैठकर किसी अड़चन पर विमर्श करते हैं, तो महीनों का काम चंद मिनटों में सुलझ जाता है। बैठक के दौरान यह रेखांकित किया गया कि यदि विभागाध्यक्ष स्तर पर भी समस्या का हल न निकले, तो तत्काल शासन के उच्चाधिकारियों अथवा स्वयं मुख्य सचिव के संज्ञान में बात लाई जाए, ताकि नीतिगत स्तर पर फैसला लेकर काम को आगे बढ़ाया जा सके।
राज्य के समग्र विकास में आधारभूत ढांचे की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान होती है। खासकर पर्वतीय और मैदानी दोनों प्रकार के भौगोलिक स्वरूप वाले राज्यों में सड़कों, पुलों, पेयजल योजनाओं और सार्वजनिक भवनों का निर्माण केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका की अनिवार्यता है। यदि कोई संपर्क मार्ग भूस्खलन अथवा बजट के अभाव में अधूरा रह जाता है, तो दर्जनों गांवों का संपर्क मुख्यधारा से कट जाता है। मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, बच्चे स्कूल जाने से वंचित रह जाते हैं और किसानों की उपज मंडियों तक नहीं पहुंच पाती। मुख्य सचिव ने इस यथार्थ को भलीभांति समझते हुए निर्माण कार्यों से जुड़े सभी लंबित मामलों को त्वरित गति से निस्तारित करने का सख्त आदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोक निर्माण विभाग, ग्रामीण निर्माण, सिंचाई और शहरी विकास जैसे बुनियादी ढांचे से जुड़े विभागों की कार्यप्रणाली में किसी भी प्रकार की शिथिलता अक्षम्य होगी।
समीक्षा बैठक की सबसे प्रभावी और दूरगामी विशेषता इसका संस्थागत स्वरूप है। यह कोई अचानक बुलाई गई बैठक नहीं थी, बल्कि प्रत्येक माह के प्रथम मंगलवार को आयोजित होने वाली एक नियमित प्रशासनिक समीक्षा प्रणाली का हिस्सा थी। अक्सर देखा जाता है कि सरकारें किसी मुद्दे पर एक बार बड़ी बैठक करती हैं, कड़े निर्देश जारी होते हैं, लेकिन समय बीतने के साथ सब कुछ फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आता है। इसके विपरीत, हर महीने के पहले मंगलवार को इस प्रकार की उच्चस्तरीय समीक्षा का नियम बनाकर शासन ने एक ऐसी निगरानी व्यवस्था स्थापित कर दी है जहां से कोई भी विभाग बचकर नहीं निकल सकता। हर महीने अधिकारियों को यह बताना ही होगा कि पिछले तीस दिनों में उन्होंने जनपदों से आई कितनी फाइलों का निपटारा किया और जो मामले अभी भी लंबित हैं, उनके पीछे का ठोस कारण क्या है।
बैठक में उपस्थित विभिन्न जिलाधिकारियों ने इस मासिक व्यवस्था के जमीनी प्रभावों को साझा करते हुए बताया कि इस व्यवस्था के शुरू होने के बाद से जिलों में वर्षों से अटके मामलों का समाधान संभव हो पाया है। पहले स्थिति यह थी कि जिले से भेजा गया प्रस्ताव शासन के किस कोने में दबा है, इसका पता लगाने में ही महीनों बीत जाते थे। अब स्थिति बदल चुकी है। जब विभागाध्यक्षों को यह पता होता है कि महीने के पहले मंगलवार को मुख्य सचिव के सामने एक-एक फाइल का हिसाब देना है, तो फाइलों की गति अपने आप बढ़ जाती है। जिलाधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस पारदर्शी मंच के मिलने से स्थानीय प्रशासन का मनोबल बढ़ा है, क्योंकि अब उन्हें अपनी योजनाएं लागू कराने के लिए सचिवालय की चौखटों पर लंबे समय तक भटकना नहीं पड़ता।
प्रशासनिक दक्षता का यह नया मॉडल वास्तव में जन-केंद्रित शासन का सजीव प्रमाण है। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारों और उनके प्रशासनिक तंत्र की सफलता की अंतिम कसौटी यही है कि आम आदमी की समस्याओं का निवारण कितनी सुगमता और शीघ्रता से होता है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की यह सक्रियता केवल अधिकारियों की बैठक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव राज्य की आम जनता के जीवन स्तर पर पड़ना तय है। जब फाइलों के निस्तारण में तेजी आएगी, तो विकास की योजनाएं तय समयसीमा के भीतर पूरी होंगी, जिससे न केवल जनता को समय पर सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि योजनाओं की लागत में होने वाली अनावश्यक वृद्धि से सरकारी धन की भी भारी बचत होगी।
सुशासन किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी, अटूट जवाबदेही और विभागों के बीच सहज तालमेल से स्थापित होता है। सचिवालय में आयोजित यह बैठक इसी दिशा में उठाया गया एक ठोस और व्यावहारिक कदम है। यदि प्रत्येक विभाग का मुखिया और हर जनपद का जिलाधिकारी इस मंशा को पूरी ईमानदारी के साथ धरातल पर उतारने में जुट जाए, तो प्रशासनिक लालफीताशाही का अंत होना निश्चित है। जनपदों की समस्याओं का त्वरित समाधान ही वह मार्ग है जिससे विकास की रोशनी समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाई जा सकती है। शासन की यह पहल राज्य के प्रशासनिक इतिहास में एक सकारात्मक और परिणामोन्मुख अध्याय के रूप में दर्ज होगी, जहां जनता के काम को सबसे ऊपर रखकर प्रशासनिक तंत्र को अधिक संवेदनशील, उत्तरदायी और गतिशील बनाया जा रहा है।
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