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CM Dhami Birthday: दिव्यांग बच्चों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मनाया अपना जन्म दिवस

On: September 16, 2026 4:38 PM
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CM Dhami Birthday: दिव्यांग बच्चों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मनाया अपना जन्म दिवस
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CM Dhami Birthday: राजनीतिक जीवन की आपाधापी, फाइलों के अंबार और कूटनीतिक व्यस्तताओं के बीच एक जननेता का अपने जीवन के सर्वाधिक व्यक्तिगत दिन को किस तरह जीना है, यह केवल उसकी पसंद नहीं बल्कि उसके अंतरमन की प्राथमिकताओं का आईना होता है। सत्ता के गलियारों में जब किसी बड़े राजनेता का जन्मदिन आता है, तो अक्सर भव्य पंडालों, पुष्पगुच्छों की भरमार, शक्ति प्रदर्शन और बधाई संदेशों के औपचारिक ताने-बाने की तस्वीर उभरती है। किंतु जब कोई शीर्ष नेतृत्व इन तमाम चकाचौंध को दरकिनार कर किसी शांत, संवेदनशील और आत्मिक ऊर्जा से भरे स्थान की ओर रुख करता है, तो वह केवल एक आयोजन नहीं रहता, बल्कि समूचे समाज के लिए एक गहरा नैतिक संदेश बन जाता है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून स्थित राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान के प्रांगण में कदम रखकर ठीक यही संदेश स्थापित किया। बुधवार की वह सुबह देहरादून की वादियों में केवल एक सामान्य दिन की शुरुआत नहीं थी, बल्कि संस्थान के उन नन्हे-मुन्ने बच्चों के लिए एक ऐसा अविस्मरणीय पर्व बन गई, जहां औपचारिकता की दीवारें ढह गईं और केवल शुद्ध मानवीय स्नेह की सरिता बह निकली।

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Photo- X CM Dhami Birthday celebration

संस्थान के परिसर में जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की गाड़ी रुकी, तो वहां किसी भारी-भरकम प्रोटोकॉल का दमघोंटू माहौल नहीं था। इसके विपरीत, वहां एक ऐसा अपनत्व था जो किसी पारिवारिक सदस्य के घर लौटने पर महसूस होता है। मुख्यमंत्री सीधे उन बच्चों के बीच पहुंचे जो दुनिया को अपनी बाहरी आंखों से भले न देख पाते हों, लेकिन अपनी अंतरआत्मा, अपनी स्पर्श-शक्ति और अपनी असीम संवेदनशीलता से इस संसार के हर भाव को बेहद गहराई से महसूस करते हैं। बच्चों के बीच पहुंचकर मुख्यमंत्री का बैठना, उनसे हाथ मिलाना, उनके कंधों पर स्नेह भरा हाथ रखना और उनसे उन्हीं की भाषा में बतियाना एक ऐसा दृश्य था जिसने उपस्थित हर व्यक्ति के हृदय को छू लिया। वहां केक काटा जाना केवल एक पारंपरिक औपचारिकता भर नहीं था, बल्कि वह मिठास वास्तव में उस आत्मीय जुड़ाव की थी जो समाज के अंतिम छोर पर खड़े हर चेहरे को अपने साथ जोड़ने की तड़प से पैदा होती है।

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Photo- X CM Dhami Birthday celebration

बच्चों के चेहरे पर खिली मुस्कान इस बात की गवाही दे रही थी कि उन्हें सत्ता के किसी बड़े पद से मतलब नहीं था, उन्हें तो बस उस अपनेपन की तलाश थी जो उन्हें यह भरोसा दिला सके कि वे इस समाज के केंद्र में हैं, हाशिये पर नहीं। मुख्यमंत्री ने जब बच्चों के हाथों में केक का टुकड़ा थमाया और बच्चों ने अपनी मासूम खिलखिलाहट के साथ उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं, तो उस क्षण में समय जैसे ठहर सा गया था। उस पूरे कमरे का वातावरण स्नेह, श्रद्धा और एक निश्छल आनंद से भर उठा। बच्चों की हंसी में जो पवित्रता थी, उसने यह साबित कर दिया कि खुशियां कभी बड़े संसाधनों की मोहताज नहीं होतीं, वे केवल सच्चे दिल से दिए गए थोड़े से वक्त और सम्मान से खिल उठती हैं। मुख्यमंत्री के चेहरे का सुकून भी यह बयां कर रहा था कि राजकाज के तनाव भरे जीवन में ऐसे पल किसी अमृत से कम नहीं होते।

संवाद के दौरान मुख्यमंत्री धामी ने जो विचार व्यक्त किए, वे किसी राजनेता का बना-बनाया भाषण नहीं थे, बल्कि एक अभिभावक और मार्गदर्शक के दिल से निकली अंतरध्वनि थे। उन्होंने अत्यंत भावुक लहजे में कहा कि बच्चों के बीच बिताया गया समय मनुष्य को एक नई चेतना, ऊर्जा और जीवन की सच्ची प्रेरणा से भर देता है। अक्सर लोग यह मान बैठते हैं कि जिनके पास दृष्टि नहीं है, उनका जीवन सीमित है। किंतु मुख्यमंत्री ने इस संकीर्ण सोच को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि प्रत्येक बच्चे के भीतर प्रतिभा का एक अथाह समंदर और असीम संभावनाएं छिपी होती हैं। किसी भी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति उसकी आत्मा की उड़ान और उसके बौद्धिक सामर्थ्य का पैमाना कभी नहीं हो सकती। आवश्यकता इस बात की है कि समाज उन क्षमताओं को पहचाने, उन्हें उचित अवसर प्रदान करे और उन पर अटूट विश्वास जताए।

यह संवाद केवल उस कक्ष तक सीमित रहने वाला विचार नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे सामाजिक ढांचे के लिए एक गहरा आत्ममंथन है। मुख्यमंत्री ने इस बात को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया कि दिव्यांगजनों का सशक्तिकरण केवल कुछ कागजी योजनाओं, सरकारी बजटों और प्रशासनिक आदेशों तक सीमित नहीं रह सकता। सरकार नीतियां बना सकती है, विशेष विद्यालय खोल सकती है, छात्रवृत्तियां दे सकती है और आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है, लेकिन क्या केवल इतने भर से कोई व्यक्ति समाज में पूर्णतः सशक्त महसूस कर सकता है? कतई नहीं। सशक्तिकरण की असली शुरुआत तब होती है जब समाज की सोच बदलती है। जब सड़क पर चलता हुआ आम नागरिक, दफ्तर में काम करता हुआ सहकर्मी, और मोहल्ले में रहने वाला पड़ोसी इन बच्चों को दया की दृष्टि से नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान की दृष्टि से देखना शुरू करता है। यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है, एक नैतिक अनुबंध है जिसे समाज के हर वर्ग को मिलकर निभाना होगा।

जीवन में कठिनाइयों और संघर्षों का आना स्वाभाविक है, किंतु उन संघर्षों के सामने घुटने टेकने के बजाय उनसे टकराने का जज्बा ही मनुष्य को महान बनाता है। मुख्यमंत्री ने बच्चों को प्रेरित करते हुए कहा कि मजबूत इच्छाशक्ति, अटूट आत्मविश्वास और निरंतर किया गया प्रयास दुनिया की किसी भी बाधा को परास्त करने की ताकत रखता है। यदि मन में यह विश्वास हो कि मंजिल तक पहुंचना है, तो मार्ग की कोई भी चट्टान रास्ता नहीं रोक सकती। उन्होंने बच्चों को यह विश्वास दिलाया कि उनके सपने किसी भी अन्य बच्चे के सपनों जितने ही बड़े और साकार होने योग्य हैं। इतिहास ऐसे अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां दृष्टिबाधित और अन्य दिव्यांग व्यक्तियों ने अपने बौद्धिक और रचनात्मक पराक्रम से दुनिया को एक नई दिशा दिखाई है। सूरदास के पदों से लेकर हेलेन केलर के अदम्य साहस तक, और आधुनिक काल में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं को पास कर शीर्ष पदों पर बैठने वाले दिव्यांग युवाओं तक, हर कहानी यही सिखाती है कि आंखें केवल बाहरी दुनिया को देखती हैं, लेकिन इतिहास वही रचते हैं जो अपनी अंतर्दृष्टि से भविष्य का निर्माण करते हैं।

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Photo- X CM Dhami Birthday celebration

इस अवसर पर मुख्यमंत्री का दृष्टिकोण उत्तराखंड के समग्र विकास की उस अवधारणा को भी पुष्ट करता है जिसे समावेशी विकास कहा जाता है। उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से विषम और पर्वतीय राज्य में विकास का मतलब केवल सड़कों का चौड़ीकरण, पुलों का निर्माण या उद्योगों की स्थापना नहीं हो सकता। विकास की सार्थकता इस बात में है कि वह राज्य के सबसे सुदूरवर्ती और सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में क्या बदलाव ला रहा है। यदि समाज का कोई भी अंग पीछे छूट जाता है, तो समग्र विकास का दावा अधूरा और खोखला रह जाता है। मुख्यमंत्री का यह प्रयास दिखाता है कि राज्य सरकार की नीति केवल आर्थिक समृद्धि तक केंद्रित नहीं है, बल्कि वह सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनाओं को शासन की धुरी बनाने के लिए संकल्पित है।

समाज के प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर, गरिमा और आगे बढ़ने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना एक सभ्य समाज की पहली पहचान है। जब तक हम एक ऐसा परिवेश नहीं बना पाते जहां कोई भी दिव्यांग व्यक्ति बिना किसी झिझक, डर या हीनभावना के अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सके, तब तक हमारा लोकतंत्र पूरी तरह परिपक्व नहीं कहलाएगा। इसके लिए आधुनिक तकनीकों, ब्रेल लिपि के व्यापक प्रसार, डिजिटल सुगम्यता और सार्वजनिक स्थलों को दिव्यांग-अनुकूल बनाने जैसे ठोस कदमों के साथ-साथ सामाजिक चेतना का विस्तार भी जरूरी है। मुख्यमंत्री का बच्चों के बीच जाना इसी चेतना को जगाने का एक सशक्त माध्यम बनता है, क्योंकि जब राज्य का मुखिया खुद किसी वर्ग को इतना महत्व देता है, तो पूरा प्रशासनिक अमला और समाज भी उस दिशा में सोचने और कार्य करने के लिए प्रेरित होता है।

अपने उद्बोधन के अंतिम पलों में मुख्यमंत्री का यह कहना कि बच्चों का निष्कपट स्नेह और उनके चेहरों की खिलखिलाहट ही उनके लिए इस जन्मदिन का सबसे अमूल्य और अविस्मरणीय उपहार है, हर किसी के दिल में उतर गया। राजनीति के कांटे भरे रास्तों पर चलते हुए जब कोई जनसेवक ऐसे पलों से गुजरता है, तो उसकी जनसेवा की भावना और अधिक गहरी हो जाती है। यह उपहार किसी महंगे सामान या राजनीतिक जयकारे से कहीं ऊंचा था, क्योंकि इसमें किसी स्वार्थ की मिलावट नहीं थी। यह विशुद्ध रूप से आत्मा से आत्मा का मिलन था।

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Photo- X CM Dhami Birthday celebration

देहरादून का यह संस्थान उन अनगिनत संघर्षों की तपोभूमि है जहां अंधेरों से लड़कर अपनी राह बनाने की साधना प्रतिदिन की जाती है। मुख्यमंत्री का वहां पहुंचना उन मासूम साधकों के लिए यह भरोसा बन गया कि उनकी इस लंबी यात्रा में वे अकेले नहीं हैं, बल्कि समूचा राज्य उनके साथ एक अभिभावक की तरह खड़ा है। यह जन्मदिन केवल एक वर्ष की आयु वृद्धि का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी गहरी लकीर खींच गया जो यह याद दिलाती रहेगी कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य सेवा है, और पद की असली गरिमा समाज के उन चेहरों पर मुस्कान बिखेरने में है जो जीवन की राह में रोशनी की आस लगाए बैठे हैं। सादगी, आत्मीयता और संवेदनशील शासन का यह अनुपम दृश्य लंबे समय तक समाज के भीतर प्रेरणा का प्रकाश फैलाता रहेगा।

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