Dehradun News: भारतीय सेना की पहचान केवल सीमाओं पर बंदूक थामे खड़े सजग प्रहरी के रूप में ही नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप प्रकृति की विकटतम चुनौतियों के सामने सीना ताने खड़े उस अपराजेय मानवीय संकल्प का नाम है जो विपरीत परिस्थितियों में भी विजय का मार्ग तलाश लेता है। साहस, अटूट अनुशासन, निस्वार्थ दल भावना और संकट के समय त्वरित निर्णय लेने की क्षमता सैन्य जीवन की आत्मा मानी जाती है। इन्हीं मूल्यों को धरातल पर जीवंत करते हुए आर्मी सर्विस कोर ने एक बार फिर जलधाराओं के प्रचंड वेग को चुनौती देने का बीड़ा उठाया है। उत्तराखंड की पावन भूमि देहरादून से बुधवार, सात अक्टूबर दो हजार छब्बीस की सुबह जब सूरज की पहली किरणें दून घाटी को चूम रही थीं, तब आर्मी सर्विस कोर के जांबाज सैनिकों के एक विशेष दल ने व्हाइट वॉटर राफ्टिंग एक्सपीडिशन दो हजार छब्बीस के रूप में अपने अदम्य साहस की नई गाथा लिखने के लिए प्रस्थान किया।

इस बहुप्रतीक्षित और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साहसिक अभियान को मध्य कमान के एम.जी.ए.एस.सी. मेजर जनरल पी. के. तिवारी ने विधिवत हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। सैन्य परंपराओं की पूरी गरिमा, अनुशासन और देशभक्ति के नारों के बीच रवाना हुआ यह सोलह सदस्यीय दल सात अक्टूबर से ग्यारह अक्टूबर दो हजार छब्बीस तक चलने वाले इस महाअभियान के दौरान रुद्रप्रयाग से लेकर ऋषिकेश तक लगभग एक सौ पैंतालीस किलोमीटर की दुर्गम जलयात्रा पूरी करेगा। नदी की उफनती लहरों, पत्थरों से टकराकर झाग छोड़ते तीव्र मोड़ों और अप्रत्याशित जल भंवरों के बीच यह अभियान केवल एक खेल या रोमांचक यात्रा नहीं है, बल्कि यह सैनिकों के मानसिक संतुलन, शारीरिक सहनशीलता और विपरीत परिस्थितियों में एक संयुक्त इकाई के रूप में कार्य करने की क्षमता की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा है।
आर्मी सर्विस कोर के इतिहास में साहसिक अभियानों की एक बहुत लंबी और गौरवमयी परंपरा रही है। हालांकि, विभिन्न सामरिक आवश्यकताओं, प्रशासनिक पुनर्गठन और विभिन्न इकाइयों में सैन्य कार्मिकों की व्यापक तैनाती के चलते पिछले लगभग पांच वर्षों से इस प्रकार का कोई बड़ा श्वेत जल नौकायन अभियान आयोजित नहीं हो सका था। इससे पूर्व अंतिम बार वर्ष दो हजार बाईस में उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की तीव्र नदियों में कोर के साहसिक अभियान का सफल आयोजन किया गया था। पांच वर्षों के इस लंबे अंतराल के बाद इस पारंपरिक सैन्य अभियान को फिर से शुरू करने का संकल्प महानिदेशालय आपूर्ति एवं परिवहन द्वारा लिया गया। इस पूरे विचार को वास्तविकता में बदलने का दायित्व सेना की प्रतिष्ठित मध्य कमान को सौंपा गया, जिसने बेहद योजनाबद्ध तरीके से जमीनी स्तर पर इस अभियान के संचालन की कमान पांच सौ चौदह आर्मी सर्विस कोर बटालियन को सौंपी। बटालियन के अधिकारियों और जवानों ने इस भारी जिम्मेदारी को एक अवसर के रूप में स्वीकार किया और अभियान को अभूतपूर्व सफलता तक पहुंचाने के लिए हर स्तर पर कड़ा श्रम किया।
इस साहसिक अभियान के लिए उपयुक्त सैनिकों का चयन करना स्वयं में एक अत्यंत जटिल और कठोर प्रक्रिया थी। मध्य कमान और उत्तराखंड सब एरिया के मार्गदर्शन में जुलाई और अगस्त दो हजार छब्बीस के दौरान सेना की विभिन्न इकाइयों से स्वयंसेवकों के आवेदन आमंत्रित किए गए थे। सैकड़ों जांबाजों ने इस जोखिम भरे अभियान का हिस्सा बनने की इच्छा जताई, लेकिन आपूर्ति एवं परिवहन निदेशालय द्वारा निर्धारित अत्यंत कड़े शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और तैराकी मानकों की कसौटी पर केवल सोलह सर्वश्रेष्ठ सैन्यकर्मियों को ही अंतिम रूप से चुना गया। इस चुने गए दल की बनावट सैन्य नेतृत्व और समरसता का एक बेजोड़ उदाहरण है। दल में दो सैन्य अधिकारी, दो कनिष्ठ कमीशंड अधिकारी और बारह अन्य रैंक के सिपाही शामिल हैं। यह संरचना दर्शाती है कि युद्ध का मैदान हो या नदी की विकराल धाराएं, भारतीय सेना में अधिकारी हमेशा आगे रहकर नेतृत्व करते हैं और जवान अपने कनिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन में कंधे से कंधा मिलाकर हर चुनौती को धूल चटाते हैं।
अभियान के कठिन मार्ग को देखते हुए केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं था, बल्कि श्वेत जल नौकायन की तकनीकी बारीकियों और जल विज्ञान की गहरी समझ होना भी अनिवार्य था। इसी उद्देश्य से चयनित सोलह सदस्यीय दल को इक्कीस सितंबर से तीन अक्टूबर दो हजार छब्बीस तक आर्मी एक्वा नोडल सेंटर रायवाला में गहन और बुनियादी श्वेत जल नौका प्रशिक्षण प्रदान किया गया। रायवाला के इस प्रतिष्ठित केंद्र में प्रशिक्षकों ने दल के सदस्यों को पानी के दबाव को समझने, तेज बहाव में संतुलन बनाए रखने, राफ्ट के पलट जाने की स्थिति में स्वयं को और अपने साथियों को सुरक्षित बाहर निकालने तथा विपरीत दिशा में चप्पू चलाने की उन्नत तकनीकों का कड़ा अभ्यास कराया। दिन-रात चले इस कठोर प्रशिक्षण ने दल के प्रत्येक सैनिक को मानसिक रूप से इतना सुदृढ़ बना दिया कि वे अब हिमालय से निकलने वाली नदियों के भीषणतम वेग का सामना बिना किसी भय के कर सकें।
अभियान का वास्तविक और रोमांचकारी नदी सफर सात अक्टूबर दो हजार छब्बीस को रुद्रप्रयाग से प्रारंभ हो रहा है। हिमालय की ऊंची चोटियों से पिघलकर आने वाली अलकनंदा नदी रुद्रप्रयाग के समीप अपने पूरे यौवन और प्रचंड वेग के साथ बहती है। यहां से शुरू होकर यह यात्रा पांच प्रमुख और सुनियोजित चरणों में पूरी की जाएगी। प्रथम चरण में जांबाज दल रुद्रप्रयाग से प्रस्थान कर उत्तराखंड की आराध्य देवी मां धारी देवी के ऐतिहासिक और पावन मंदिर तक पहुंचेगा। यह क्षेत्र अपने संकरे जलमार्गों और पानी के नीचे छिपी चट्टानों के लिए जाना जाता है, जहां राफ्ट को नियंत्रित रखना किसी तपस्या से कम नहीं होता। दूसरे चरण में दल धारी देवी मंदिर से श्रीनगर गढ़वाल की ओर बढ़ेगा, जहां नदी का पाट चौड़ा तो होता है लेकिन पानी के भीतर उठने वाली तेज भंवरें किसी भी नाविक की एकाग्रता की कड़ी परीक्षा लेती हैं।
अभियान का तीसरा चरण श्रीनगर से देवप्रयाग तक का होगा। देवप्रयाग वह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थल है जहां शांत और गंभीर अलकनंदा का मिलन चंचल और वेगवती भागीरथी नदी से होता है। इसी पावन संगम के बाद इस संयुक्त जलधारा को दुनिया मां गंगा के पावन नाम से जानती है। दो विशाल नदियों के इस संगम पर जल का दबाव और लहरों का टकराव इतना तीव्र होता है कि वहां किसी भी नौका को संभालना सर्वोच्च स्तर के नौकायन कौशल की मांग करता है। चौथे चरण में यह दल देवप्रयाग की सीमा लांघकर गंगा के तीव्र ढलान वाले क्षेत्र कौड़ियाला की ओर बढ़ेगा। कौड़ियाला से ऋषिकेश तक का पांचवां और अंतिम चरण पूरे विश्व में अपनी उच्च श्रेणी की श्वेत जल धाराओं और विशाल भंवरों के लिए विख्यात है। इस खंड में ‘द वॉल’, ‘थ्री ब्लाइंड माइस’ और ‘रोलर कोस्टर’ जैसे खतरनाक रैपिड्स मौजूद हैं, जहां नदी का पानी कई मीटर ऊंचा उछलकर राफ्ट पर सवार सैनिकों के साहस को चुनौती देता है।
ऋषिकेश के ऐतिहासिक तट पर ग्यारह अक्टूबर दो हजार छब्बीस को इस महाअभियान का औपचारिक और भव्य समापन निर्धारित किया गया है। लगभग एक सौ पैंतालीस किलोमीटर की इस नदी यात्रा के दौरान दल न केवल शारीरिक सहनशीलता की सीमाओं को लांघेगा, बल्कि यह यात्रा सैनिकों के भीतर उस अटूट दल भावना को भी और अधिक प्रगाढ़ करेगी जो केवल जीवन और मृत्यु के बीच की पतली रेखा पर एक-दूसरे पर विश्वास करने से पैदा होती है। जब एक राफ्ट पर सवार सभी सैनिक एक ही लय, एक ही ताल और एक ही धड़कन के साथ चप्पू चलाते हैं, तभी वे विशालकाय जलतरंगों को चीरते हुए आगे बढ़ पाते हैं। यही भावना सेना के ऑपरेशनों की रीढ़ होती है, जहां व्यक्तिगत स्वार्थ पूरी तरह समाप्त हो जाता है और केवल दल का साझा लक्ष्य ही सर्वोपरि रहता है।
यह साहसिक नौकायन अभियान केवल एक खेल प्रतियोगिता या रोमांचक गतिविधि नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा और दूरगामी सैन्य उद्देश्य निहित है। आधुनिक युद्धकला केवल बंदूकों और तोपों के संचालन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसके लिए सैनिकों का मानसिक रूप से अत्यंत कठोर, किसी भी अप्रत्याशित संकट में शांत चित्त रहने वाला और शारीरिक रूप से हर भौगोलिक परिस्थिति को मात देने में सक्षम होना जरूरी है। नदियों के इस विकट मार्ग पर अभियान चलाकर आर्मी सर्विस कोर ने यह सिद्ध कर दिया है कि उसकी रसद और आपूर्ति इकाइयां केवल सीमाओं तक सामान पहुंचाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके जवान प्रकृति के सबसे भीषण अवरोधों को पार करके भी अपने मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देने का माद्दा रखते हैं।
देहरादून से शुरू हुआ यह अभियान उत्तराखंड के युवाओं और संपूर्ण राष्ट्र के नागरिकों में भी एक नया उत्साह और देशभक्ति का संचार करेगा। सेना द्वारा इस प्रकार के आयोजनों से युवाओं में जल क्रीड़ाओं, साहसिक अभियानों और राष्ट्रसेवा के प्रति एक नई प्रेरणा का जन्म होता है। जब यह सोलह सदस्यीय दल रुद्रप्रयाग, धारी देवी, श्रीनगर, देवप्रयाग और कौड़ियाला के कठिन मोड़ों से गुजरते हुए ऋषिकेश पहुंचेगा, तो वह अपने पीछे भारतीय सेना के गौरव, अदम्य जिजीविषा और प्रकृति पर मानवीय साहस की विजय का एक स्वर्णिम अध्याय छोड़ जाएगा। यह अभियान आने वाले कई वर्षों तक सैन्य हलकों में वीरता, उत्कृष्ट योजना और त्रुटिहीन निष्पादन के एक मील के पत्थर के रूप में याद किया जाएगा।
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