Uttarakhand News: भोर की पहली किरण जब शिवालिक की वादियों को धीरे-धीरे छू रही थी और दून घाटी की अधिकांश आबादी अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या शुरू करने की तैयारी कर रही थी, ठीक उसी समय शहर की मुख्य सड़कों पर सरकारी गाड़ियों के सायरन या औपचारिक लश्कर के बिना एक बेहद अहम प्रशासनिक हलचल चल रही थी। शासन के वातानुकूलित कमरों, बैठकों के औपचारिक मिनट्स और फाइलों की सरसराहट से निकलकर जब कोई शीर्ष नौकरशाह खुद सड़क पर फावड़े, डामर और रोलर के बीच खड़ा दिखाई दे, तो यह समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था अब केवल कागजी प्रगति रिपोर्ट से संतुष्ट होने के मूड में नहीं है। उत्तराखंड शासन में लोक निर्माण विभाग के सचिव डॉ. पंकज कुमार पांडेय का तड़के छह बजे राजधानी की सड़कों पर औचक उतरना महज एक सामान्य निरीक्षण दौरा नहीं था, बल्कि यह उस प्रशासनिक हनक और जवाबदेही का सीधा प्रदर्शन था, जिसकी उम्मीद अक्सर जनता अपने नीति-नियंताओं से करती है।
राज्य में मानसून के विदा होते ही सड़कों के जीर्णोद्धार और गड्ढों को भरने का काम हमेशा से एक बड़ी जन-अपेक्षा रहा है। पहाड़ से लेकर तराई तक सड़कों की बदहाली न केवल रोजमर्रा के आवागमन को दूषित करती है, बल्कि दुर्घटनाओं का अंदेशा बढ़ाकर जनजीवन को संकट में डालती है। ऐसे में सचिव स्तर के शीर्ष अधिकारी का खुद सुबह छह बजे मैदान में डट जाना और एक-एक मार्ग की जमीनी हकीकत को अपनी आंखों से देखना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों को अमलीजामा पहनाने के लिए अब शून्य-सहनशीलता की नीति अपनाई जा चुकी है। 18 अक्टूबर की अत्यंत निकट समयसीमा तय करते हुए जिस कड़ाई से उन्होंने मातहतों को लक्ष्य पूरा करने के निर्देश दिए हैं, उसने विभागीय अमले की सुस्ती को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है।
इस सघन स्थलीय निरीक्षण की शुरुआत शहर के अत्यंत व्यस्त और रिहायशी लिहाज से संवेदनशील कालीदास रोड टर्न से हुई। सुबह की हल्की ठंड और शांत माहौल के बीच सचिव का काफिला जब कैनाल रोड की ओर बढ़ा, तो वहां काम कर रहे मजदूरों और कनिष्ठ अभियंताओं के लिए यह स्थिति किसी बड़े अचरज से कम नहीं थी। कैनाल रोड जो हाल के वर्षों में दून के सबसे तेजी से विकसित होते आवासीय और व्यावसायिक गलियारों में तब्दील हो चुका है, लगातार भारी ट्रैफिक के दबाव से जूझता रहा है। वहां से आगे बढ़ते हुए नागल और फिर मसूरी डायवर्जन तक की सड़क का एक-एक हिस्सा जांचा गया। मसूरी डायवर्जन केवल स्थानीय नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि वीकेंड पर उमड़ने वाले हजारों बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक मुख्य प्रवेश द्वार की तरह काम करता है। यहां सड़कों पर पड़ने वाले छोटे-बड़े गड्ढे न केवल गाड़ियों की रफ्तार थामते हैं, बल्कि वीकेंड के दौरान लगने वाले भीषण जाम का एक बड़ा सबब भी बनते हैं। सचिव ने मौके पर ही इस बात को रेखांकित किया कि डायवर्जन जैसे रणनीतिक बिंदुओं पर पेचवर्क केवल खानापूरी के लिए नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी डेंसिटी और लेवलिंग ऐसी हो कि गाड़ियां बिना किसी झटके के सुगमता से गुजर सकें।
मसूरी डायवर्जन की पड़ताल के उपरांत अधिकारियों का यह दल सहस्रधारा तिराहे और लाडपुर की तरफ मुड़ा। सहस्रधारा मार्ग पर रोजाना भारी संख्या में लोग दफ्तरों, शिक्षण संस्थानों और पर्यटन स्थलों के लिए निकलते हैं। लाडपुर और जोगीवाला का इलाका ऐसा है, जहां से हरिद्वार और ऋषिकेश की ओर जाने और वहां से लौटने वाला ट्रैफिक राजधानी में प्रवेश करता है। जोगीवाला चौक और उसके आसपास की सड़कें अक्सर भारी वाहनों के दबाव और रुक-रुक कर चलने वाले ट्रैफिक के कारण समय से पहले उखड़ जाती हैं। निरीक्षण के दौरान सचिव ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि किन कारणों से सड़कों का ऊपरी हिस्सा बार-बार उधड़ता है। क्या वहां पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं है, या फिर इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री में कोई तकनीकी कमी रह जाती है। रिस्पना पुल के समीप पहुंचकर उन्होंने जलभराव और भारी यातायात के सम्मिलित प्रभाव से जर्जर हुए पैचों का बारीकी से मुआयना किया। रिस्पना पुल राजधानी की यातायात जीवनरेखा का वह नाका है, जहां यदि सड़क पर हल्का सा भी गड्ढा हो जाए, तो गाड़ियों की कतारें कई किलोमीटर पीछे तक खिंच जाती हैं।
शहर के बाहरी और उपनगरीय हिस्सों का जायजा लेने के बाद निरीक्षण का रुख दून के ऐतिहासिक दिल यानी घंटाघर की ओर हुआ। घंटाघर और उससे जुड़ा चकराता रोड शहर का वह केंद्रीय तंत्र है, जहां दिन-रात पहिए घूमते रहते हैं। चकराता रोड पर स्थित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, कोचिंग संस्थानों और अदालतों के कारण यहां पैदल चलने वालों से लेकर भारी वाहनों तक का निरंतर जमावड़ा रहता है। चकराता रोड की पड़ताल करते हुए सचिव ने पाया कि कई स्थानों पर पेचवर्क किए तो गए हैं, लेकिन वे सड़क की मूल सतह के समतल नहीं हैं। जब किसी गड्ढे को भरने के बाद सड़क पर एक नया उभार या कूबड़ बन जाता है, तो वह भी गड्ढे जितना ही खतरनाक साबित होता है। उन्होंने मौके पर मौजूद अधिशासी अभियंताओं को साफ शब्दों में समझाया कि गड्ढा भरने का तकनीकी अर्थ केवल उसमें गिट्टी और तारकोल उड़ेल देना नहीं है, बल्कि उसके किनारों को सही कोण पर काटकर, रोलर से दबाकर सड़क को एकदम समतल बनाना है। अंत में यह निरीक्षण गढ़ी कैंट क्षेत्र तक पहुंचा, जहां सैन्य प्रतिष्ठानों और आम नागरिक बस्तियों के साझा मार्गों की गुणवत्ता को जांचा गया।
सड़क सुधार के इस व्यापक अभियान में 18 अक्टूबर की मियाद तय करना अपने आप में एक साहसिक और चुनौती भरा कदम माना जा रहा है। प्रशासनिक व्यवस्थाओं में अक्सर तारीखें आती और जाती रहती हैं, लेकिन जब कोई वरिष्ठ सचिव खुले तौर पर सार्वजनिक रूप से तारीख तय कर दे, तो विभाग के भीतर हर स्तर पर जवाबदेही तय होना लाजिमी हो जाता है। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि अब फाइलों में प्रतिशत के आंकड़े दिखाकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकेगा। अब परिणाम सड़कों पर चलते हुए आम नागरिक के अनुभव से मापे जाएंगे। यदि किसी सड़क से गुजरते हुए वाहन चालक को झटका लगता है, तो संबंधित क्षेत्र के सहायक और कनिष्ठ अभियंता से लेकर अधिशासी अभियंता तक की सीधी जवाबदेही तय की जाएगी।
अक्सर यह देखा जाता है कि मानसून के दौरान पर्वतीय और मैदानी दोनों ही क्षेत्रों में लगातार बारिश के चलते सड़कों की परतें कमजोर पड़ जाती हैं। डामर की सबसे बड़ी दुश्मन पानी की नमी होती है। जब तक डामरीकरण के काम में उचित तापमान और सही बिटुमिन ग्रेड का इस्तेमाल न हो, तब तक किया गया काम पहली बारिश में ही बह जाता है। सचिव पंकज पांडेय ने निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को इसी तकनीकी पहलू की याद दिलाई। उन्होंने निर्देश दिए कि गड्ढा भरान के कार्य में आधुनिक तकनीकों, जैसे कोल्ड मिक्स या त्वरित सेट होने वाले इमल्शन का जहां जरूरत हो वहां इस्तेमाल किया जाए, ताकि काम भी जल्दी हो और सड़क की मजबूती भी लंबे समय तक बनी रहे। जहां भारी रोलर नहीं पहुंच सकते, वहां कॉम्पेक्टर मशीनों का अनिवार्य उपयोग सुनिश्चित करने को कहा गया, ताकि भरी गई गिट्टी ट्रैफिक के दबाव से छिटककर दोपहिया वाहन चालकों के लिए फिसलने का खतरा न बने।
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और जनता के बीच सबसे पहला और प्रत्यक्ष संपर्क भौतिक बुनियादी ढांचे के जरिए ही बनता है। एक आम नागरिक अपने दैनिक जीवन में शासन की उपस्थिति को मंत्रालयों की बड़ी नीतियों से कम, और अपने घर के सामने से गुजरने वाली चिकनी सड़क, जलती हुई स्ट्रीट लाइट और साफ पानी से अधिक महसूस करता है। यदि सुबह दफ्तर जाते समय किसी नागरिक की गाड़ी किसी गहरे गड्ढे में गिरकर खराब हो जाए, या किसी मरीज को अस्पताल ले जाती एम्बुलेंस गड्ढों के हिचकोलों से जूझती रहे, तो व्यवस्था के प्रति आम जनमानस में निराशा और आक्रोश का जन्म होना स्वाभाविक है। इस जमीनी यथार्थ को समझते हुए सचिव ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों का रवैया औपचारिकता निभाने वाला नहीं, बल्कि नागरिकों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने वाला होना चाहिए।
राजधानी देहरादून की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय संरचना पिछले दो दशकों में अभूतपूर्व रूप से बदली है। राज्य बनने के बाद से शहर का फैलाव चारों दिशाओं में हुआ है, लेकिन आंतरिक सड़कों की चौड़ाई उस अनुपात में नहीं बढ़ सकी। ऐसे में यदि सड़कों की सतह खराब रहे, तो शहर की पूरी गति ही अवरुद्ध हो जाती है। विशेष रूप से स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और दोपहिया वाहन चालकों के लिए ये गड्ढे जानलेवा साबित होते हैं। आए दिन समाचार पत्रों में सड़कों पर संतुलन बिगड़ने से होने वाली दुर्घटनाओं की खबरें छपती हैं। ऐसे में लोक निर्माण विभाग का यह दायित्व केवल निर्माण तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे-सीधे जनसुरक्षा और जीवन रक्षा से जुड़ जाता है। सचिव ने अधिकारियों को कड़ी हिदायत दी कि किसी भी मार्ग पर कोई भी गड्ढा ऐसा न छूटे जो किसी की जान के लिए जोखिम बन सके।
इस निरीक्षण की एक और खास बात यह रही कि इसमें अंतर-विभागीय समन्वय की जरूरत को भी प्रमुखता से महसूस किया गया। अक्सर यह देखा जाता है कि लोक निर्माण विभाग सड़क बनाता है, और कुछ ही दिनों बाद जल संस्थान, ऊर्जा निगम या गैस पाइपलाइन बिछाने वाली एजेंसियां उसे खोदकर छोड़ देती हैं। इस समन्वय हीनता का खामियाजा अंततः जनता और सरकारी खजाने को भुगतना पड़ता है। सचिव ने मातहतों को निर्देशित किया कि अन्य कार्यदायी संस्थाओं के साथ तत्काल तालमेल बैठाया जाए। यदि किसी अन्य एजेंसी ने किसी कार्य के लिए सड़क काटी है, तो उनसे तत्काल रेस्टोरेशन का काम पूरा करवाया जाए या फिर विभाग स्वयं उसे दुरुस्त कर संबंधित एजेंसी से रिकवरी सुनिश्चित करे, लेकिन सड़क को खुदी हुई हालत में छोड़ने की परिपाटी अब कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सड़कों के सुधार का यह अभियान केवल देहरादून तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे पूरे प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जिसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर्यटन और तीर्थाटन पर टिकी है। चारधाम यात्रा, हेमकुंड साहिब, मसूरी, नैनीताल जैसे पर्यटन केंद्र तभी फलते-फूलते हैं जब राज्य का बुनियादी ढांचा सुदृढ़ और सुरक्षित हो। बाहर से आने वाला पर्यटक राज्य की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता का पहला आकलन यहां की सड़कों को देखकर ही करता है। यदि प्रवेश करते ही उसे टूटी और गड्ढों से भरी सड़कों का सामना करना पड़े, तो राज्य की छवि पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मुख्यमंत्री के विजन के अनुरूप पूरे उत्तराखंड को सुगम और सुरक्षित यात्रा का अनुभव देने की दिशा में लोक निर्माण विभाग के इस सघन अभियान को एक मजबूत आधारशिला माना जा रहा है।
कार्य की गति को तेज करने के लिए सचिव ने अधिकारियों को चौबीसों घंटे की कार्ययोजना बनाकर काम करने के निर्देश दिए हैं। जहां दिन के समय भारी यातायात के कारण डामरीकरण या गड्ढा भरान का काम संभव नहीं हो पाता, वहां रात के समय विशेष दल लगाकर काम किया जाए। इसके लिए रात के समय पर्याप्त रोशनी, सुरक्षा चेतावनी बोर्ड और ट्रैफिक डायवर्जन की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए ताकि काम करने वाले मजदूरों और रात में चलने वाले राहगीरों दोनों की सुरक्षा बनी रहे। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में केवल मातहतों की रिपोर्ट पर भरोसा न करें, बल्कि खुद सुबह और शाम सड़कों पर निकलें। जब तक डिवीजनल स्तर के अधिकारी फील्ड में पसीना नहीं बहाएंगे, तब तक काम में अपेक्षित तेजी और फिनिशिंग नहीं आ सकती।
इस दौरे के बाद विभाग के भीतर एक स्पष्ट संदेश गया है कि काम की गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं होगा। यदि 18 अक्टूबर के बाद किसी भी प्रमुख मार्ग पर गड्ढे पाए गए या पैचवर्क कुछ ही दिनों में उखड़ गया, तो संबंधित ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने के साथ-साथ निगरानी करने वाले अभियंताओं के खिलाफ भी अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी। सरकारी धन का एक-एक पैसा जनता की गाढ़ी कमाई का टैक्स है, और उसका उपयोग धरातल पर दिखना चाहिए, फाइलों की लीपापोती में नहीं। लोक निर्माण विभाग के इस अभियान ने जहां आम नागरिकों के मन में एक नई उम्मीद जगाई है, वहीं प्रशासनिक अमले को यह अहसास कराया है कि अब जवाबदेही से बचने का कोई चोर दरवाजा शेष नहीं है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि इस भोर के निरीक्षण की ऊर्जा सड़कों पर कितनी टिकाऊ साबित होती है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर ली गई इस दृढ़ पहल ने सुधार की एक बेहद सकारात्मक लकीर खींच दी है।
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