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Dehradun News: स्वच्छता पखवाड़ा- देहरादून रेलवे स्टेशन पर ‘रेल जन संवाद’ कार्यक्रम आयोजित

On: October 10, 2026 7:14 AM
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Dehradun News: स्वच्छता पखवाड़ा- देहरादून रेलवे स्टेशन पर ‘रेल जन संवाद’ कार्यक्रम आयोजित
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Dehradun News: सुबह की हल्की ठंडक, हिमालय की तलहटी से बहकर आती मंद बयार और पटरियों पर गूंजती रेलगाड़ियों की परिचित खड़खड़ाहट के बीच देहरादून रेलवे स्टेशन का प्रांगण आम दिनों की तरह ही जीवंत और गतिशील था। कुली भाइयों की हड़बड़ाहट, अपने गंतव्य की ओर बढ़ते मुसाफिरों की कदमताल, चाय की प्याली से उठता भाप और उद्घोषक की गूंजती आवाज के बीच अचानक एक ऐसा दृश्य उभरा जिसने स्टेशन की सामान्य आपाधापी को एक ठहराव, एक आत्मीयता और एक सामूहिक चेतना में बदल दिया। मुरादाबाद मंडल के तत्वावधान में स्वच्छता पखवाड़ा तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के व्यापक अभियान के अंतर्गत जब रेल अधिकारियों और कर्मचारियों ने सीधे यात्रियों के बीच पहुंचकर ‘रेल जन संवाद’ की शुरुआत की, तो लगा मानो रेल और मुसाफिर के बीच का बरसों पुराना औपचारिकता का पर्दा अचानक हट गया हो। यह महज एक सरकारी कार्यक्रम या औपचारिकता निभाने का उपक्रम नहीं था, बल्कि सफर को संस्कृति और स्टेशन को साझा घर मानने की दिशा में एक भावुक और विचारशील पहल थी।

रेलवे स्टेशन किसी भी शहर का वह प्रवेश द्वार होता है जहां से कोई बाहरी व्यक्ति उस शहर के चरित्र, वहां के सलीके और वहां की सांस्कृतिक गरिमा का पहला अनुभव प्राप्त करता है। देहरादून जैसा शहर, जो शांत वादियों, प्राकृतिक संपदा और सुरुचिपूर्ण जीवनशैली का प्रतीक माना जाता है, उसका स्टेशन केवल कंक्रीट का ढांचा भर नहीं है। यह उत्तराखंड की नैसर्गिक आभा का मुखौटा है। ऐसे में जब मुरादाबाद मंडल ने इसी पावन द्वार से यात्रियों को पर्यावरण की रक्षा और स्टेशन की स्वच्छता का प्रहरी बनाने के लिए आमंत्रित किया, तो संवाद की भाषा आदेशात्मक न होकर अपनत्व से सराबोर थी। जब रेल प्रशासन ने यात्रियों से सीधे उनकी आंखों में आंखें डालकर बात की, तो मुसाफिरों को यह अहसास हुआ कि स्वच्छता की असली चाबी नियमों की किताबों में नहीं, बल्कि सफर करने वाले हर इंसान की अंतरात्मा में सुरक्षित है।

इस आत्मीय संवाद का सबसे प्रमुख और विचारणीय बिंदु था एकल उपयोग प्लास्टिक का बढ़ता जहर, जो हमारी धरती, हमारे जलस्रोतों और हमारी यात्राओं को धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में ले रहा है। संवाद के दौरान उपस्थित रेल प्रतिनिधियों ने यात्रियों को बेहद सरल और मार्मिक उदाहरणों से समझाया कि किस प्रकार एक बार इस्तेमाल करके फेंक दी जाने वाली पानी की बोतल, चिप्स का चमकीला पैकेट या चाय का डिस्पोजेबल कप सैकड़ों सालों तक प्रकृति के सीने पर एक भारी बोझ बनकर पड़ा रहता है। यह प्लास्टिक केवल स्टेशनों की पटरियों को गंदा नहीं करता, बल्कि नालियों को जाम करता है, बेजुबान पशुओं के पेट में पहुंचकर उनकी अकाल मृत्यु का कारण बनता है और अंततः सूक्ष्म कणों के रूप में हमारे ही भोजन और सांसों में घुलकर हमारे अस्तित्व को चुनौती देता है। जब एक बुजुर्ग यात्री ने संवाद के बीच अपने थैले से कपड़े का थैला और तांबे की बोतल निकालकर दिखाई, तो पूरा परिसर एक मौन सहमति और प्रेरणा से भर गया। उस क्षण यह बात स्वतः सिद्ध हो गई कि आधुनिकता का अर्थ सुविधा के नाम पर प्रकृति का गला घोंटना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटकर मिट्टी, कपड़े और धातुओं के उन पारंपरिक बर्तनों को अपनाना है जो कभी भारतीय यात्राओं की शान हुआ करते थे।

संवाद की कड़ियों को आगे बढ़ाते हुए कचरे के उचित प्रबंधन और उसके वैज्ञानिक पृथक्करण पर भी अत्यंत सारगर्भित चर्चा हुई। अक्सर हम देखते हैं कि लोग कचरा फेंकते समय यह ध्यान नहीं देते कि कौन सा पदार्थ दोबारा इस्तेमाल हो सकता है और कौन सा सड़ांध पैदा कर सकता है। देहरादून स्टेशन पर यात्रियों को रंग-बिरंगे चार प्रकार के कूड़ेदानों के वैज्ञानिक महत्व से परिचित कराया गया। नीला, हरा और अन्य निर्धारित रंगों के कूड़ेदान केवल स्टेशन की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं रखे गए हैं, बल्कि उनके पीछे एक पूरी वैज्ञानिक सोच और पर्यावरण संरक्षण का तंत्र कार्य करता है। जब गीला कचरा सूखे कचरे से अलग रहता है, तो उसे खाद में बदलना आसान होता है। जब प्लास्टिक, कागज और धातु के टुकड़े अलग रखे जाते हैं, तो उनका पुनर्चक्रण सुगमता से हो पाता है। अन्यथा, सारा कचरा मिलकर एक ऐसा दुर्गंधयुक्त ढेर बन जाता है जिसका निस्तारण करना किसी भी व्यवस्था के लिए एक विकराल चुनौती बन जाता है। यात्रियों ने इस बात को गहराई से महसूस किया कि अगर हम ट्रेन में अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही केले का छिलका और मूंगफली के छिलके अलग रखें और प्लास्टिक की थैली को अलग रखें, तो हम सफाई कर्मचारियों के कठिन श्रम को आधा कर सकते हैं और उनका मानवीय सम्मान भी बढ़ा सकते हैं।

इस ‘रेल जन संवाद’ की सबसे अनूठी और मानवीय विशेषता यह थी कि इसमें केवल प्रशासन ही अपनी बात नहीं कह रहा था, बल्कि उसने अपने कान और दिल दोनों यात्रियों की बातों को सुनने के लिए खोल रखे थे। संवाद के दौरान यात्रियों से स्टेशन पर उपलब्ध सुविधाओं, प्रतीक्षालयों की स्थिति, पीने के पानी की व्यवस्था, शौचालय की स्वच्छता और खानपान की गुणवत्ता के संबंध में अत्यंत बेबाक और पारदर्शी प्रतिक्रियाएं ली गईं। यात्रा पर निकले एक मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया ने जब प्लेटफॉर्म पर पंखों की स्थिति और बैठने की बेंचों की संख्या पर अपनी राय रखी, तो अधिकारियों ने उसे केवल एक कागजी नोट नहीं बनाया, बल्कि उसकी आंखों में सुधार की प्रतिबद्धता का भरोसा जगाया। एक युवा छात्रा ने महिला सुरक्षा और शौचालयों में स्वच्छता की निरंतरता को लेकर जो विचार साझा किए, उन्हें बेहद गंभीरता से सुना गया। यह लोकतंत्र की वह खूबसूरत तस्वीर थी जहां सेवा देने वाला और सेवा लेने वाला दोनों आमने-सामने बैठकर व्यवस्था को बेहतर बनाने का ताना-बाना बुन रहे थे।

अक्सर आम नागरिकों की यह शिकायत रहती है कि रेलवे प्रशासन शिकायतों को लालफीताशाही की फाइलों में दबा देता है, लेकिन देहरादून की धरती पर आयोजित इस संवाद ने इस धारणा को तोड़ने का काम किया। यात्रियों को यह समझाया गया कि शिकायत दर्ज कराना उनका अधिकार है, लेकिन व्यवस्था की देखरेख में भागीदार बनना उनका नैतिक कर्तव्य भी है। ट्रेन की खिड़की से बाहर खाली पानी की बोतल उछाल देना केवल एक सेकंड की लापरवाही होती है, लेकिन उस एक बोतल को पटरियों से उठाने के लिए किसी इंसान को अपनी जान जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है। जब तक यह संवेदनशीलता हर यात्री के मन में नहीं जागेगी, तब तक हजारों सफाई कर्मचारी मिलकर भी हमारे देश को स्वच्छ नहीं बना सकते। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है, और देहरादून स्टेशन पर यह विचार किसी भाषण की तरह नहीं, बल्कि एक पारिवारिक बातचीत की तरह बह रहा था।

मुरादाबाद मंडल द्वारा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया, वह आने वाले कल की भारतीय रेल की एक आधुनिक और उत्तरदायी छवि प्रस्तुत करता है। भारतीय रेल आज केवल लोगों को एक शहर से दूसरे शहर पहुंचाने वाली परिवहन सेवा नहीं रह गई है, बल्कि वह भारत के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय बदलाव की सबसे बड़ी संवाहक बन चुकी है। लाखों टन कचरा जो रोजाना भारतीय रेल के विशाल नेटवर्क से निकलता है, अगर उसका समुचित प्रबंधन न हो तो वह देश के पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा संकट बन सकता है। ऐसे में मुरादाबाद मंडल का यह प्रयास कि वह स्टेशनों पर ही कचरे के पृथक्करण को जन-आंदोलन का रूप दे, अत्यंत सराहनीय और अनुकरणीय है। यह केवल नियमों को लागू करने की बात नहीं है, बल्कि नागरिक चेतना को जगाने का एक भगीरथ प्रयास है।

संवाद के दौरान कई यात्रियों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए। किसी ने बताया कि कैसे उसने अपनी पिछली यात्रा के दौरान अपने सहयात्री को चलती ट्रेन में कूड़ा फेंकने से रोका, तो किसी ने यह संकल्प लिया कि अब से वह अपनी यात्राओं में डिस्पोजेबल कप में चाय पीने के बजाय अपने साथ थर्मस लेकर चलेगा। यह छोटी-छोटी बातें इस बात का प्रमाण हैं कि जब प्रशासन आम जनता पर भरोसा करता है और उससे सीधे संवाद स्थापित करता है, तो जनता भी अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए सहर्ष आगे आती है। विश्वास का यह आदान-प्रदान ही किसी भी सार्वजनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी होता है।

जब यह संवाद अपने समापन की ओर बढ़ रहा था, तब स्टेशन परिसर का वातावरण पूरी तरह बदल चुका था। वहां न केवल एक नई ऊर्जा का संचार था, बल्कि हर यात्री के चेहरे पर अपने राष्ट्र और अपनी रेल के प्रति एक गहरा दायित्व बोध स्पष्ट दिखाई दे रहा था। मुरादाबाद मंडल के अधिकारियों ने हाथ जोड़कर सभी मुसाफिरों से यही विनम्र प्रार्थना की कि वे रेलवे को केवल एक सरकारी संपत्ति न समझें, बल्कि उसे अपनी साझी धरोहर मानें। जैसे हम अपने घर के ड्राइंग रूम में कचरा नहीं फेंकते, वैसे ही ट्रेन के डिब्बे और स्टेशन के प्लेटफॉर्म को भी अपने घर का विस्तार समझें। यदि कोई अन्य यात्री भी जाने-अनजाने कचरा फैलाता दिखे, तो उसे डांटने के बजाय प्रेम और आदर से समझाएं कि यह देश हम सबका है और इसकी गरिमा बनाए रखना हमारी साझी प्रतिष्ठा से जुड़ा है।

देहरादून रेलवे स्टेशन का यह ‘रेल जन संवाद’ केवल एक दिन की गतिविधि नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक चेतना की एक छोटी सी शुरुआत है जो यदि पूरे देश के हर स्टेशन और हर ट्रेन तक पहुंच जाए, तो भारतीय रेल दुनिया की सबसे स्वच्छ, सुंदर और पर्यावरण हितैषी परिवहन प्रणाली बनकर उभर सकती है। स्टेशन से जब दोपहर की ट्रेन अपनी सीटी बजाते हुए आगे बढ़ी, तो उसकी खिड़कियों से झांकते चेहरों में न केवल अपनी मंजिल तक पहुंचने की उत्सुकता थी, बल्कि उनकी आंखों में एक साफ-सुथरे, प्लास्टिक-मुक्त और गरिमापूर्ण भारत का सपना भी तैर रहा था। यह संवाद उस सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में एक ऐसा अटूट कदम बन गया है जिसकी गूंज आने वाले लंबे समय तक हर मुसाफिर के दिल में सुनाई देती रहेगी।


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