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Apple Fest News: नाबार्ड द्वारा आयोजित सेब महोत्सव 3.0 शुरू, मुख्य सचिव ने किया शुभारंभ

On: October 9, 2026 3:34 AM
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Apple Fest News: नाबार्ड द्वारा आयोजित सेब महोत्सव 3.0 शुरू, मुख्य सचिव ने किया शुभारंभ
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Apple Fest News: उत्तराखंड की शांत और मनोरम वादियों में कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति, परंपरा और जीवन शैली की रीढ़ है। जब भी पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि की बात उठती है, तो बागवानी और विशेष रूप से सेब की खेती को सबसे अग्रणी स्थान दिया जाता है। हाल ही में राजधानी देहरादून में नाबार्ड के क्षेत्रीय शाखा कार्यालय के प्रांगण में आयोजित ‘सेब महोत्सव 3.0’ केवल एक औपचारिक प्रदर्शनी भर नहीं था, बल्कि यह राज्य के मेहनतकश बागवानों के पसीने, उनकी संगठित शक्ति और एक सुनहरे भविष्य की जीवंत तस्वीर पेश करने वाला मंच बना। प्रदेश के मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन द्वारा किए गए इस महोत्सव के शुभारंभ ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अब पारंपरिक खेती के ढर्रे को तोड़कर वैज्ञानिक सोच, सुदृढ़ संस्थागत ढांचे और व्यावसायिक रणनीति के साथ आगे बढ़ने का समय आ चुका है।

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Photo- X Dehradun Apple Festival 3.0

पहाड़ों के दुर्गम ढलानों पर जब एक किसान सेब का पौधा रोपता है, तो वह केवल एक पेड़ नहीं लगाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सपनों को सींचता है। इस आयोजन में प्रदेश के दूरदराज के क्षेत्रों से आए विभिन्न किसान उत्पादक संगठनों ने जिस उत्साह के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, वह इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड का किसान अब अकेले संघर्ष करने के बजाय सामूहिक शक्ति के महत्व को भली-भांति समझने लगा है। मुख्य सचिव ने प्रदर्शनी के हर स्टॉल पर जाकर जिस आत्मीयता से किसानों द्वारा उपजाई गई सेब की विभिन्न प्रजातियों, रसीले कीवी, ताजी जैविक सब्जियों और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों का मुआयना किया, उससे उत्पादकों के भीतर एक नया विश्वास जागा। किसानों से सीधे संवाद करते हुए उनकी जमीनी कठिनाइयों को सुनना और समाधान की दिशा में सोचना ही किसी भी सुशासन की सच्ची पहचान होती है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में किसान उत्पादक संगठनों की भूमिका महज कागजों पर कुछ किसानों को एक साथ जोड़ने तक सीमित नहीं रह सकती। इस बात को रेखांकित करते हुए मुख्य सचिव ने अत्यंत सटीक विचार साझा किए कि इन संगठनों को आत्मनिर्भर, आर्थिक रूप से सक्षम और लंबे समय तक टिकने वाली मजबूत व्यावसायिक इकाइयों में तब्दील करना आज की सबसे बड़ी अनिवार्यता है। जब तक कोई एफपीओ अपने बलबूते पर बाजार की उथल-पुथल को झेलने और मुनाफा कमाने में सक्षम नहीं होगा, तब तक किसानों की आर्थिक स्थिति में बुनियादी बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके लिए आवश्यक है कि किसानों को केवल संगठन बनाने का ढांचा देकर न छोड़ा जाए, बल्कि उन्हें आधुनिक प्रबंधन, वित्तीय साक्षरता, गुणवत्ता नियंत्रण और विपणन की आधुनिक तकनीकों का निरंतर प्रशिक्षण दिया जाए। निरंतर मार्गदर्शन और क्षमता संवर्धन ही वह खाद-पानी है जिससे ये संगठन वटवृक्ष का रूप धारण कर सकते हैं।

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Photo- X Dehradun Apple Festival 3.0

कृषि और बागवानी के क्षेत्र में सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि फसल अच्छी होने के बावजूद किसान के हाथ में अक्सर निराशा ही लगती है। इसका मुख्य कारण उचित बाजार व्यवस्था, समय पर खरीद और उत्पाद की पहचान का अभाव है। सेब महोत्सव 3.0 के मंच से यह बात प्रमुखता से सामने आई कि स्थानीय उत्पादों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराकर सीधे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना होगा। इसके लिए पेशेवर स्तर पर खरीद व्यवस्था और आक्रामक ब्रांडिंग रणनीति की दरकार है। उत्तराखंड के सेब का स्वाद, उसका कुरकुरापन और उसकी प्राकृतिक मिठास किसी भी मायने में विदेशी या अन्य राज्यों के सेबों से कम नहीं है, लेकिन बाजार की शेल्फ पर पहचान बनाने के लिए एक सशक्त ब्रांड नाम, आकर्षक पैकेजिंग और उपभोक्ताओं तक सीधी पहुंच की जरूरत होती है। जब तक उपभोक्ता को यह अहसास नहीं कराया जाएगा कि वह जो फल खरीद रहा है, वह हिमालय की शुद्ध हवा और बर्फीले पानी से पोषित है, तब तक उत्पादक को उसकी उपज का प्रीमियम मूल्य नहीं मिल पाएगा।

पहाड़ी बागवानी के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है उत्पादों की नाशवान प्रकृति और उनके भंडारण का अभाव। फसल तैयार होते ही यदि उसे सुरक्षित न रखा जाए, तो बागवान औने-पौने दामों पर अपनी मेहनत बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस दर्द को समझते हुए मुख्य सचिव ने राज्य भर में शीत भंडारण यानी कोल्ड स्टोरेज और नियंत्रित वातावरण वाले गोदामों के नेटवर्क को विस्तार देने पर बल दिया। जब किसान के पास अपनी उपज को कई महीनों तक सुरक्षित रखने का साधन होगा, तो वह बाजार की मांग के अनुरूप सही समय पर आपूर्ति कर सकेगा और बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकेगा। इसके साथ ही, आज का जागरूक उपभोक्ता यह भी जानना चाहता है कि जो फल उसकी थाली में आ रहा है, वह किस मिट्टी में उगाया गया है, उसमें कौन से पोषक तत्व हैं और क्या वह रासायनिक खादों से मुक्त है। यहीं पर डिजिटल ट्रेसेबिलिटी व्यवस्था की आवश्यकता महसूस होती है। एक सामान्य क्यूआर कोड के माध्यम से जब खरीदार को बागवान के खेत तक की पूरी यात्रा का विवरण मिलेगा, तो उत्पाद के प्रति विश्वसनीयता कई गुना बढ़ जाएगी।

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Photo- X Dehradun Apple Festival 3.0

उत्तराखंड की आबो-हवा प्राकृतिक रूप से जैविक खेती के सर्वथा अनुकूल है। राज्य के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों में रासायनिक खादों का प्रयोग वैसे भी नगण्य रहा है, परंतु केवल जैविक होने का दावा करना बाजार में नहीं बिकता। उसके लिए एक पारदर्शी, सुगम और प्रामाणिक जैविक प्रमाणीकरण प्रक्रिया का होना अनिवार्य है। सेब महोत्सव में इस विषय पर भी गंभीरता से चर्चा हुई कि किस प्रकार छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्रमाणीकरण की जटिलताओं को सरल बनाया जाए, ताकि उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतर सकें और उन्हें ऑर्गेनिक प्रीमियम का वास्तविक लाभ मिल सके।

विकास कभी भी किसी एक विभाग या संस्था के एकाकी प्रयासों से संभव नहीं हो सकता। नाबार्ड जैसी शीर्ष वित्तीय संस्था और राज्य सरकार के विभिन्न विकास विभागों के बीच तालमेल ही इस कृषि क्रांति की असली कुंजी है। मुख्य सचिव ने जिस एकीकृत इकोसिस्टम की बात कही, वह वास्तव में समय की मांग है। योजनाओं की भरमार होना एक बात है, लेकिन उन योजनाओं का धरातल पर एक-दूसरे के पूरक बनकर काम करना दूसरी बात है। जब नाबार्ड का वित्तीय सहयोग, कृषि व उद्यान विभाग की तकनीकी विशेषज्ञता, ग्रामीण विकास की योजनाएं और एफपीओ का सामूहिक श्रम एक बिंदु पर आकर मिलेंगे, तभी संसाधनों की बर्बादी रुकेगी और योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम छोर पर खड़े बागवान तक पहुंचेगा।

इस पूरे परिदृश्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे पलायन की मार झेल रहे उत्तराखंड के गांवों में एक नई उम्मीद की किरण जगी है। जब युवा देखेंगे कि अपने ही पुरखों की जमीन पर आधुनिक बागवानी करके, संगठन बनाकर और अपने उत्पाद को अपनी शर्तों पर बेचकर सम्मानजनक आय प्राप्त की जा सकती है, तो वे शहरों की अनिश्चित नौकरियों की ओर भागने के बजाय अपनी माटी से जुड़ने में गर्व महसूस करेंगे।

सेब महोत्सव 3.0 केवल फलों की विविधता का उत्सव नहीं था, बल्कि यह संकल्प था पर्वतीय आर्थिकी को एक मजबूत, टिकाऊ और स्वावलंबी दिशा देने का। सरकार, नाबार्ड, किसान उत्पादक संगठनों और स्वयं किसानों की साझा भागीदारी से तैयार हो रहा यह नया रोडमैप निश्चित रूप से उत्तराखंड के सेब और अन्य कृषि उत्पादों को देश-दुनिया के नक्शे पर एक नई पहचान दिलाएगा और पहाड़ के किसान के चेहरे पर सच्ची मुस्कान बिखेरेगा।

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