Uttarakhand Weather News: ऊंचे देवदार के जंगलों से छनकर आने वाली सर्द हवाएं जब एकाएक बर्फीले तूफानों में बदल जाएं और पत्थरों से टकराकर बहने वाली कलकल नदियां रौद्र रूप धारण कर किनारे लीलने लगें, तो समझ लीजिए कि शांत दिखने वाले हिमालय का मिजाज बिगड़ चुका है। देवभूमि उत्तराखंड के आसमान से इस समय आफत बनकर बरसती बारिश और ऊंची चोटियों पर बिछती सफेद बर्फ की मोटी चादर ने समूचे राज्य में एक भीषण मानवीय और भौगोलिक संकट पैदा कर दिया है।
भक्ति, आस्था और प्रकृति के सान्निध्य की चाहत लेकर सुदूर राज्यों से आए लाखों श्रद्धालुओं के कदम जहां के तहां ठिठक कर रह गए हैं। तीर्थाटन की प्रमुख जीवनरेखा कही जाने वाली विश्वप्रसिद्ध चारधाम यात्रा को सुरक्षा कारणों से रोक दिया गया है। सबसे विकट हालात आस्था के परम धाम केदारनाथ में देखने को मिल रहे हैं, जहां कड़ाके की ठंड, लगातार गिरते पारे और मूसलाधार बारिश के बीच करीब चार हजार श्रद्धालु फंसे हुए हैं। दूसरी तरफ, भारत-चीन और भारत-नेपाल सीमा से सटे सीमांत जिले पिथौरागढ़ में आदि कैलाश और ओम पर्वत यात्रा मार्ग का एक बड़ा हिस्सा भयानक भूस्खलन की भेंट चढ़ गया है, जिससे सीमांत घाटियों का शेष संसार से संपर्क पूरी तरह कट चुका है।
पहाड़ों में बारिश जब सामान्य रिमझिम से आगे बढ़कर आसमान से बरसती आफत की शक्ल ले लेती है, तो सबसे पहले उन रास्तों पर ताले लग जाते हैं जो सदियों से आस्था की पगडंडियां रहे हैं। गढ़वाल मंडल से लेकर कुमाऊं मंडल के सुदूरतम अंचलों तक इस समय मौसम विभाग का रेड और ऑरेंज अलर्ट सक्रिय है। रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, बागेश्वर, टिहरी और नैनीताल जिलों में बादल ऐसे घिरकर आए हैं मानो दिन और रात का फर्क ही मिट गया हो। गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं पर तापमान शून्य डिग्री से नीचे फिसल चुका है। जहां एक ओर निचले इलाकों में लगातार 24 से 36 घंटों से हो रही अनवरत बारिश से पहाड़ियां दरक रही हैं, वहीं तीन हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर सीजन की पहली तीव्र बर्फबारी ने तीर्थयात्रियों के सामने जीवन रक्षा की गंभीर चुनौती पेश कर दी है।
प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किस तरह इन हजारों लोगों को महफूज रखते हुए उनके खाने, ठहरने और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था को सुचारू रखा जाए।केदारनाथ धाम में पैदा हुए हालात किसी भी संवेदनशील इंसान के रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। भगवान शिव के इस द्वादश ज्योतिर्लिंग में दर्शन करने पहुंचे करीब चार हजार यात्री वहां के मौसम की अप्रत्याशित मार झेल रहे हैं। सुबह के वक्त जब अचानक बादलों का घना घेरा घाटी में उतरा, तो तेज बौछारों के साथ ओले और फिर बर्फीली फुहारें शुरू हो गईं। केदारनाथ मंदिर परिसर, जो आम दिनों में हर-हर महादेव के जयकारों से गुंजायमान रहता है, इस समय ठंडी हवाओं के थपेड़ों और छातों तथा बरसाती पन्नियों में सिमटे सहमे हुए श्रद्धालुओं के संघर्ष का गवाह बन रहा है।
गौरीकुंड से केदारनाथ के बीच का करीब 16 से 18 किलोमीटर लंबा पैदल मार्ग कई संवेदनशील जगहों पर भूस्खलन और ऊपर से पत्थरों के गिरने के कारण बेहद खतरनाक हो गया है। लिंचोली, जंगलचट्टी और भीमबली जैसे दुर्गम पड़ावों पर रुक-रुक कर पहाड़ से मलबा आ रहा है, जिसके कारण यात्रियों को आगे बढ़ने या पीछे हटने से रोक दिया गया है।पैदल मार्ग पर सुरक्षा के लिहाज से घोड़े, खच्चरों और डंडी-कंडी के संचालन पर भी तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है, क्योंकि गीले पत्थरों पर फिसलने के कारण किसी भी क्षण बड़ा हादसा पेश आ सकता है। कई बुजुर्ग यात्री, महिलाएं और छोटे बच्चे, जो इस यात्रा पर गर्म कपड़ों के सामान्य इंतजाम के साथ निकले थे, अचानक तापमान में आई भारी गिरावट के चलते कंपकंपाने को मजबूर हैं।
हालांकि स्थानीय तीर्थ पुरोहितों, मंदिर समिति के कर्मचारियों, जिला प्रशासन और एसडीआरएफ की टीमों ने आगे आकर इन श्रद्धालुओं को धर्मशालाओं, टेंटों और रेन शेल्टरों में शरण दी है, लेकिन लगातार जारी कड़ाके की ठंड और गीलेपन के कारण लोगों के बीमार पड़ने का खतरा बढ़ गया है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सांस की तकलीफ और हाइपोथर्मिया के लक्षणों वाले मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जहां डॉक्टर सीमित संसाधनों के बीच दिन-रात तीमारदारी में जुटे हुए हैं।दूसरी तरफ, सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की धारचूला तहसील के अंतर्गत आने वाले तवाघाट-लिपुलेख राष्ट्रीय राजमार्ग और आदि कैलाश यात्रा मार्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। व्यास घाटी और दारमा घाटी को जोड़ने वाले इस सामरिक और धार्मिक महत्व के मार्ग पर विशालकाय चट्टानें टूटकर गिर गई हैं। नजंग, लखनपुर और गुंजी के आसपास कई स्थानों पर सड़क का नामोनिशान तक मिट गया है, जिससे मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो गया है। आदि कैलाश और ओम पर्वत के दर्शन कर लौट रहे और वहां की ओर रुख कर रहे दर्जनों वाहनों के काफिले बीच रास्तों में ही खड़े रह गए हैं।
सीमांत क्षेत्र में संचार सेवाएं और मोबाइल नेटवर्क बेहद कमजोर या पूरी तरह ठप हो जाने के कारण कई दल अपने परिजनों से संपर्क नहीं साध पा रहे हैं, जिससे मैदानी इलाकों में बैठे उनके रिश्तेदारों की सांसें अटकी हुई हैं। सीमा सड़क संगठन यानी बीआरओ के जवान लगातार भारी मशीनों और बुलडोजरों के साथ मलबे को हटाने में लगे हैं, लेकिन पहाड़ी से लगातार हो रही पत्थरबाजी उनकी जान के लिए भी जोखिम पैदा कर रही है। धारचूला प्रशासन ने नए परमिट जारी करने पर तुरंत रोक लगा दी है और पहले से निकले यात्रियों को गुंजी, बूंदी और नाबी गांवों के होमस्टे में ही सुरक्षित ठहरने के निर्देश दिए हैं।
चारधाम यात्रा के पूरे परिदृश्य पर नजर डालें तो इस समय केदारनाथ के अलावा बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धामों में भी जीवन लगभग ठहर सा गया है। बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर तोताघाटी, देवप्रयाग, सिरोबगड़ और पागलनाला जैसी जगहों पर पहाड़ से भारी बोल्डर और कीचड़युक्त मलबा आ गिरा है। सिरोबगड़, जिसे पहाड़ों में भूस्खलन का सबसे कुख्यात नासूर माना जाता है, वहां हालात इतने नाजुक हैं कि सड़क का एक बड़ा हिस्सा अलकनंदा नदी की ओर धंसने के कगार पर पहुंच गया है। सड़क के दोनों ओर सैकड़ों यात्री बसें, निजी कारें और टैक्सियां कई किलोमीटर लंबी कतारों में फंसी हुई हैं। इसी प्रकार उत्तरकाशी जिले में यमुनोत्री हाईवे पर डाबरकोट और दुर्बिल के पास लगातार पत्थर बरस रहे हैं, जिससे मार्ग पूरी तरह बंद है। गंगोत्री धाम के आसपास गोमुख और भारत-चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी बर्फबारी के चलते पारा माइनस में जा चुका है।
तीर्थयात्रियों की हिफाजत को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए गढ़वाल मंडल आयुक्त और आपदा प्रबंधन तंत्र ने समूची चारधाम यात्रा को अस्थायी रूप से स्थगित करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है। हरिद्वार और ऋषिकेश के प्रमुख बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर ही तीर्थयात्रियों को आगे न जाने की मुनादी की जा रही है और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर ठहरने की सलाह दी जा रही है। इस प्राकृतिक विपदा के बीच सबसे भयावह दृश्य नदियों के बदलते मिजाज में देखने को मिल रहा है। लगातार बारिश से मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी, गंगा, पिंडर और काली नदियां अपने चेतावनी निशान के बेहद करीब या उससे ऊपर बह रही हैं।
ऋषिकेश में गंगा का जलस्तर इतना बढ़ गया है कि प्रसिद्ध त्रिवेणी घाट की आरती की सीढ़ियां और कई छोटे मंदिर जलमग्न हो चुके हैं। जल पुलिस लगातार लाउडस्पीकरों के माध्यम से तटीय इलाकों में रहने वाले झुग्गीवासियों और साधु-संतों को सुरक्षित ऊंचाई पर जाने की चेतावनी दे रही है। पहाड़ों में जब नदियां उफान पर आती हैं, तो वे केवल पानी नहीं लातीं, बल्कि अपने साथ हजारों टन गाद, पेड़ और विशालकाय बोल्डर बहाकर लाती हैं। इस भयानक गर्जना को सुनकर नदी तटों पर रहने वाले स्थानीय ग्रामीणों की रातों की नींद उड़ चुकी है। वे पुराने आपदा के मंजर याद करके सिहर उठते हैं। हालांकि इस भीषण त्रासदी के बीच राहत और बचाव कार्यों में लगे जवानों और स्थानीय समुदाय का अदम्य साहस इंसानियत पर यकीन को और गहरा करता है।
राज्य आपदा प्रतिवादन बल यानी एसडीआरएफ, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ, उत्तराखंड पुलिस, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस यानी आईटीबीपी और सेना के जवान अपनी जान हथेली पर रखकर लगातार मोर्चे पर डटे हुए हैं। जहां-जहां पैदल मार्ग संकरे हो गए हैं या बह गए हैं, वहां जवान रस्सियों और सीढ़ियों की मदद से बच्चों और बुजुर्गों को अपनी पीठ पर लादकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा रहे हैं। स्थानीय ढाबा संचालकों, खच्चर मालिकों और गांव के लोगों ने भी अपनी पारंपरिक पहाड़ी मेहमाननवाजी और इंसानियत का परिचय दिया है। जहां कई बार आपदा में मुनाफाखोरी की शिकायतें आती हैं, वहीं विपरीत परिस्थितियों में स्थानीय युवाओं ने फंसे हुए तीर्थयात्रियों के लिए अलाव जलाने, गर्म चाय-पानी और खिचड़ी वितरित करने के सामुदायिक लंगर शुरू किए हैं।
देवभूमि का यह मानवीय पहलू उस वक्त सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरता है जब सरकारी मशीनरी के साधन भी मौसम की मार के आगे कम पड़ने लगते हैं। इस पूरी स्थिति का एक अत्यंत गंभीर और अनदेखा पहलू हमारा पर्यावरण और हिमालय की पारिस्थितिकी है। बार-बार यह सवाल उठता है कि आखिर उत्तराखंड में हर साल मौसम की यह मार इतनी संहारक क्यों होती जा रही है। पर्यावरणविदों और भूगर्भ वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय दुनिया की सबसे नई और अत्यंत संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसकी चट्टानें अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुई हैं। पिछले कुछ दशकों में पर्यटन और तीर्थाटन के नाम पर जिस तरह का अनियंत्रित और अंधाधुंध बुनियादी ढांचा खड़ा किया गया है, उसने पहाड़ों की नींव को भीतर से खोखला कर दिया है।
ऑल वेदर रोड परियोजना, रेल लाइन की सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाओं के लिए किए जाने वाले अनगिनत भारी विस्फोट और अनियोजित बहुमंजिला इमारतों के निर्माण ने पहाड़ों के प्राकृतिक जल निकास और ढलानों के संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है। जब भारी बारिश का पानी इन कमजोर हो चुकी पहाड़ियों पर गिरता है, तो मिट्टी की पकड़ छूट जाती है और पूरी की पूरी पहाड़ी मलबे के रूप में नीचे आ गिरती है। इसके अलावा, वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण अब मौसम का चक्र पूरी तरह अप्रत्याशित हो चुका है। जब बारिश का मौसम खत्म होने की कगार पर होता है, तब अचानक पश्चिमी विक्षोभ और मानसूनी हवाओं के टकराने से बादल फटने और मूसलाधार बारिश की घटनाएं सामने आने लगती हैं। बेमौसम की भारी बर्फबारी और अत्यधिक बारिश का यह तालमेल हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक लाल बत्ती की तरह है, जिसे अगर अब भी नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले समय में इसके परिणाम और अधिक भयावह हो सकते हैं।हवाई यातायात की बात करें तो खराब मौसम की मार से आसमान भी अछूता नहीं रहा है। देहरादून के जौलीग्रांट हवाई अड्डे पर घने कोहरे, कम दृश्यता और तेज हवाओं के कारण उड़ानों का संचालन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और अहमदाबाद से देहरादून आने वाली कई नियमित उड़ानों को या तो रद्द करना पड़ा है या फिर उन्हें नजदीकी हवाई अड्डों की ओर डायवर्ट कर दिया गया है।
चारधाम यात्रा के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली केदारनाथ हेलीकॉप्टर सेवा पिछले दो दिनों से पूरी तरह ठप पड़ी हुई है। गुप्तकाशी, फाटा और सिरसी के हेलीपैडों पर सैकड़ों यात्री अपने टिकट हाथ में लिए हेलीकॉप्टरों की गूंज सुनने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन कोहरे और तेज बारिश के कारण एक भी उड़ान भरना संभव नहीं हो पा रहा है। हेलीकॉप्टर कंपनियों का कहना है कि जब तक विजिबिलिटी कम से कम पांच हजार मीटर नहीं हो जाती और हवा की गति नियंत्रित नहीं होती, तब तक जोखिम उठाकर उड़ान भरना असंभव है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो उत्तराखंड सरकार ने सभी जिलों के जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को 24 घंटे अलर्ट मोड पर रहने के सख्त निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री आवास में बने राज्य आपदा नियंत्रण कक्ष से हर घंटे सभी प्रभावित जिलों से उपग्रह फोन और वायरलेस के माध्यम से संपर्क साधा जा रहा है। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि किसी भी स्थिति में राशन, दवाइयों, पीने के पानी और एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत न होने पाए। विशेष रूप से केदारनाथ जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में जहां सर्दियों की आहट शुरू हो चुकी है, वहां अतिरिक्त कंबलों, हीटरों और ऊर्जा देने वाले खाद्य पदार्थों का स्टॉक पहुंचाने की कवायद की जा रही है।
वर्तमान परिस्थितियों में यात्रियों के लिए सबसे बड़ी सलाह यही है कि वे किसी भी तरह की जल्दबाजी न दिखाएं। भक्ति अपनी जगह है, लेकिन जीवन की सुरक्षा उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों से बचते हुए प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक बुलेटिन और मौसम विभाग की चेतावनियों पर ही भरोसा करना समझदारी है। जो यात्री अभी ऋषिकेश, हरिद्वार या देहरादून में हैं, उन्हें मौसम के पूरी तरह सामान्य होने तक वहीं रुकना चाहिए। जो लोग रास्तों में फंसे हैं, उन्हें पुलिस और एसडीआरएफ के निर्देशों का अक्षरशः पालन करते हुए सुरक्षित ढाबों और आश्रमों में समय बिताना चाहिए।
उत्तराखंड की धरती इस समय कुदरत के एक अत्यंत कठिन इम्तिहान से गुजर रही है। बारिश के कोड़े, बर्फ की ठंडक, दरकती चट्टानें और उफनती नदियां मिलकर इंसानी हौसले की परीक्षा ले रही हैं। केदारनाथ में फंसे वे चार हजार यात्री और आदि कैलाश के रास्ते में अटके श्रद्धालु केवल सरकारी आंकड़ों की संख्या नहीं हैं, बल्कि वे उन परिवारों के अपने हैं जो घरों में उनके सुरक्षित लौटने की मन्नतें मांग रहे हैं। यह समय केवल आपदा के बीत जाने का इंतजार करने का नहीं है, बल्कि यह समय हिमालय के प्रति हमारे नजरिए को बदलने का भी है। देवभूमि हमें अपनी गोद में शांति और आध्यात्म का वरदान देती है, लेकिन जब हम उसकी सहनशीलता की सीमाओं को लांघते हैं, तो प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें अपनी सीमाओं का अहसास करा देती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले कुछ घंटों में मौसम का मिजाज नरम पड़ेगा, आसमान साफ होगा, सूर्य की किरणें इन बर्फीली चोटियों को सहलाएंगी और फंसे हुए श्रद्धालु अपने सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचकर इस कठिन यात्रा की दास्तान को अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए संजो सकेंगे।
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