Ganesh Chaturthi 2026: सनातन संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य, नए उद्यम, मांगलिक अनुष्ठान अथवा अध्ययन के आरंभ में जिस दिव्य चेतना का स्मरण सबसे पहले किया जाता है, वह हैं प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश। वे केवल बुद्धि, विवेक और समृद्धि के देवता नहीं हैं, अपितु वे मानव चेतना के मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता हैं, जहां से जीवन की ऊर्जा ऊर्ध्वगामी होकर आध्यात्मिक और भौतिक उत्कर्ष की ओर अग्रसर होती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को समस्त भारतभूमि और विश्व भर में फैले सनातन धर्मावलंबी अत्यंत उल्लास, भक्ति और आत्मीयता के साथ इस पावन पर्व को मनाते हैं। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर विद्यमान ज्ञान और विवेक के पुनर्जागरण का राष्ट्रीय व सांस्कृतिक महापर्व है। इस दिन घर-घर में मिट्टी से निर्मित सौम्य विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, गलियों और चौराहों पर भव्य पंडाल सजते हैं, ढोल-ताशों की गूंज से दिशाएं गुंजायमान हो उठती हैं और वातावरण में ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष एक नई ऊर्जा भर देता है।

उत्सव का कालखंड और पंचांग सम्मत गणना
वैदिक पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। शास्त्रों में विधान है कि जिस दिन दोपहर के समय, जिसे मध्याह्न काल कहा जाता है, चतुर्थी तिथि व्याप्त होती है, उसी दिन गणेश स्थापना और मुख्य पूजन संपन्न किया जाना चाहिए। यह मान्यता इसलिए है क्योंकि पुराणों के अनुसार भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। वर्ष 2026 में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तिथि 14 सितंबर, सोमवार को प्रात:काल से प्रारंभ होकर अगले दिन 15 सितंबर के प्रात:काल तक रहेगी। मध्याह्न काल का शुभ संयोग 14 सितंबर को ही प्राप्त हो रहा है, अतएव इसी दिन गृहस्थ और सार्वजनिक समितियां गणपति बप्पा की प्रतिमा की स्थापना करेंगी। स्थापना के लिए मध्याह्न का समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, जो सामान्यतः प्रात: ग्यारह बजे से दोपहर डेढ़ बजे के मध्य रहता है। यह दस दिवसीय ब्रह्मांडीय उत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन यानी 25 सितंबर 2026 को प्रतिमा विसर्जन के साथ पूर्णता को प्राप्त होगा।
भगवान गणेश के प्राकट्य की पावन गाथा
शिवमहापुराण और विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में भगवान श्री गणेश के प्राकट्य की कथा अत्यंत रोचक, वात्सल्यमयी और गहरा तात्विक अर्थ समेटे हुए है। कथा के अनुसार एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती स्नान करने की तैयारी कर रही थीं। उस समय उनके निजी आवास की रक्षा के लिए कोई ऐसा द्वारपाल नहीं था जो पूर्णतः केवल उनकी आज्ञा का पालन करे। भगवान शिव के गण नंदी और अन्य सेवक सदैव उपस्थित रहते थे, किंतु वे मूलतः शिव जी के प्रति उत्तरदायी थे। माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगे उबटन और चंदन के लेप को एकत्र करके उससे एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी बालक की आकृति निर्मित की और उसमें अपने योगबल तथा ममता से प्राण फूंक दिए।
वह बालक अत्यंत बलवान और आज्ञाकारी था। माता पार्वती ने उसे अपना पुत्र मानकर स्नेह से गले लगाया और निर्देश दिया कि जब तक वह स्नान गृह के भीतर हैं, तब तक किसी भी पुरुष या जीव को भीतर प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए। बालक ने अपनी माता की आज्ञा को सर्वोपरि माना और हाथ में छड़ी लेकर गुफा के मुख्य द्वार पर अडिग होकर पहरा देने लगा। कुछ ही समय पश्चात देवों के देव महादेव भगवान शिव वहां पहुंचे। जब उन्होंने भीतर जाना चाहा, तो द्वार पर खड़े उस बालक ने उन्हें रोक दिया। भगवान शिव ने उसे समझाने का प्रयास किया कि यह उनका अपना ही निवास है, किंतु बालक ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी माता की आज्ञा के बिना कोई भी भीतर नहीं जा सकता।
भगवान शिव के गणों ने बालक को हटाने का यत्न किया, परंतु उस अलौकिक बालक के पराक्रम के सामने शिव के बड़े-बड़े पार्षद और देवगण भी परास्त हो गए। बालक का यह हठ देखकर और परिस्थिति की विचित्रता को न समझ पाने के कारण देवाधिदेव शिव अत्यधिक क्रोधित हो गए। अंततः भीषण संग्राम छिड़ गया और क्रोध के वशीभूत होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उस बालक का शीश धड़ से अलग कर दिया।

जब माता पार्वती स्नान पूर्ण करके बाहर आईं, तो अपने निर्दोष और आज्ञाकारी पुत्र को रक्तरंजित भूमि पर निष्प्राण पड़ा देख उनका हृदय हाहाकार कर उठा। जगन्माता का वात्सल्य प्रचंड क्रोध में परिवर्तित हो गया। उन्होंने महाकाली का उग्र रूप धारण कर लिया और घोषणा की कि यदि उनके पुत्र को तुरंत नवजीवन नहीं मिला, तो वे संपूर्ण ब्रह्मांड का संहार कर देंगी। माता के इस रुद्र रूप को देखकर संपूर्ण देवलोक कंपित हो उठा। ब्रह्मदेव, भगवान विष्णु और समस्त देवता हाथ जोड़कर माता के सम्मुख उपस्थित हुए और उनसे शांत होने की प्रार्थना करने लगे।
सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए भगवान शिव ने अपने गणों को उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि उत्तर दिशा में जो भी पहला जीव अपनी मां की ओर पीठ करके सोता हुआ मिले, उसका मस्तक काटकर तुरंत लाया जाए। गणों ने भ्रमण करते हुए एक नवजात गज शिशु (हाथी का बच्चा) देखा, जो अकेला सो रहा था। वे उस गज का शीश लेकर कैलाश लौटे। भगवान शिव ने उस गज मस्तक को बालक के धड़ से जोड़ दिया और ब्रह्मदेव तथा विष्णु जी के मंत्रोच्चार के बीच उसमें नवप्राणों का संचार किया।
बालक जीवित होकर उठ बैठा। उसका मुख हाथी का था और शरीर सुंदर, सुडौल तथा विशाल था। माता पार्वती अपने पुत्र को पुनः जीवित देखकर अत्यंत भावविह्वल हो गईं और उन्होंने उसे अपने अंक में भर लिया। भगवान शिव ने उस बालक को समस्त गणों का स्वामी घोषित करते हुए ‘गणपति’ और ‘गणेश’ नाम प्रदान किया। इसके साथ ही समस्त देवताओं ने मिलकर गणेश जी को यह वरदान दिया कि त्रिलोक में किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, अनुष्ठान अथवा देवपूजन के आरंभ में सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा होगी। जो मनुष्य गणेश की पूजा किए बिना कोई कार्य आरंभ करेगा, उसके कार्य में विघ्न आएंगे, और जो उनकी विधिवत वंदना करके कार्य आरंभ करेगा, उसके सभी संकट स्वतः दूर हो जाएंगे। इस प्रकार वे विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
चंद्रमा के अहंकार और श्राप की कथा
गणेश चतुर्थी के साथ चंद्रमा के दर्शन न करने की एक अत्यंत लोकप्रिय और नैतिक शिक्षा से युक्त कथा जुड़ी हुई है। गणेश पुराण के अनुसार एक बार भगवान गणेश मोदकों का भोग लगाकर अपने मूषक वाहन पर सवार होकर विचरण कर रहे थे। रात्रि का समय था और पूर्ण कांति से युक्त चंद्रमा आकाश में चमक रहे थे। रास्ते में अचानक एक सर्प के आ जाने से मूषक भयभीत होकर उछल पड़ा, जिसके कारण भारी शरीर वाले भगवान गणेश संतुलन खोकर पृथ्वी पर गिर पड़े और उनके पेट में रखे मोदक बिखर गए।
गणेश जी ने तुरंत उठकर मोदकों को समेटा और अपने उदर को स्थिर करने के लिए उस सर्प को कमरबंद की भांति बांध लिया। आकाश में स्थित चंद्रमा अपनी असीम सुंदरता और रूप-लावण्य के घमंड में चूर थे। गणेश जी के इस रूप और उनके गिरने की मुद्रा को देखकर चंद्रमा अपनी हंसी रोक न सके और जोर-जोर से उनका उपहास उड़ाने लगे। किसी के रूप या परिस्थिति का इस प्रकार क्रूरता से मखौल उड़ाया जाना विघ्नहर्ता को स्वीकार्य नहीं हुआ। वे चंद्रमा के अहंकार को चूर करना चाहते थे।
भगवान गणेश ने कुपित होकर चंद्रमा को श्राप दे दिया कि जिस रूप और सौंदर्य पर तुम्हें इतना अभिमान है, वह आज ही नष्ट हो जाएगा। तुम अपनी समस्त कांति खोकर घनघोर अंधकार में विलीन हो जाओगे और जो भी मनुष्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन तुम्हारे दर्शन करेगा, उस पर समाज में मिथ्या कलंक और लांछन लगेगा।

श्राप के प्रभाव से चंद्रमा तुरंत निस्तेज और काले पड़ गए। उनकी शीतल चांदनी समाप्त होते ही संपूर्ण सृष्टि में वनस्पति और औषधियों का पोषण रुक गया, चराचर जगत में त्राहि-त्राहि मच गई। भयभीत चंद्रमा सागर के भीतर एक कमल में जाकर छिप गए। अपनी भूल का गहरा पश्चाताप करते हुए उन्होंने कठिन तपस्या आरंभ की। समस्त देवताओं और महर्षियों ने भी भगवान गणेश से क्षमा याचना की कि वे संसार के कल्याण हेतु चंद्रमा को क्षमा करें।
गणेश जी स्वभाव से अत्यंत कृपालु और भक्तवत्सल हैं। देवताओं की प्रार्थना सुनकर वे शांत हुए और बोले कि दिया गया श्राप पूरी तरह वापस तो नहीं लिया जा सकता, किंतु इसमें संशोधन अवश्य संभव है। गणेश जी ने कहा कि चंद्रमा अब प्रतिदिन क्रमशः घटते हुए अमावस्या को पूर्णतः अदृश्य हो जाएंगे और फिर क्रमशः बढ़ते हुए पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी सोलह कलाओं के साथ चमकेंगे। इससे उनका अभिमान सदैव संयमित रहेगा। इसके अतिरिक्त, गणेश जी ने व्यवस्था दी कि केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन वर्जित रहेगा, ताकि मनुष्य को यह स्मरण रहे कि किसी की शारीरिक बनावट अथवा संकट की घड़ी का उपहास उड़ाने का परिणाम कितना गंभीर होता है। यदि इस दिन भूलवश चंद्रमा के दर्शन हो भी जाएं, तो स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण करने से कलंक का दोष दूर हो जाता है।
महर्षि वेदव्यास और महाभारत लेखन का समर्पण
भगवान गणेश की बुद्धिमत्ता और एकाग्रता का सर्वोत्तम उदाहरण महाभारत के लेखन से जुड़ा हुआ है। जब महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने संपूर्ण महाभारत महाकाव्य की मन में रचना कर ली, तब उनके सम्मुख यह गंभीर प्रश्न उपस्थित हुआ कि इतने विशाल और गूढ़ ज्ञान को लिपिबद्ध कौन करेगा। कोई ऐसा लेखक चाहिए था जिसकी लेखनी विचारों की गति के साथ चल सके और जो ज्ञान के अथाह सागर को बिना रुके शब्दों में पिरो सके।

ब्रह्मदेव के परामर्श पर महर्षि व्यास ने भगवान गणेश से यह दायित्व स्वीकार करने की प्रार्थना की। बुद्धि के देवता गणेश जी ने एक कठिन शर्त रखी। उन्होंने कहा कि महर्षि को निरंतर श्लोक बोलते रहना होगा, यदि वे एक क्षण के लिए भी रुके, तो गणेश जी की लेखनी वहीं रुक जाएगी और वे लिखना बंद कर देंगे। महर्षि व्यास ने मुस्कुराते हुए इस शर्त को स्वीकार कर लिया, किंतु उन्होंने भी एक प्रति-शर्त जोड़ दी। व्यास जी ने कहा कि गणेश जी किसी भी श्लोक को बिना उसका वास्तविक मर्म और अर्थ समझे नहीं लिखेंगे।
इस प्रकार महाभारत का लेखन आरंभ हुआ। जब महर्षि व्यास को विश्राम की आवश्यकता होती, तो वे ऐसा गूढ़ और दार्शनिक श्लोक बोलते, जिसके कई आध्यात्मिक स्तर होते थे। गणेश जी जब तक उस श्लोक के गहरे अर्थ का चिंतन करते और उसे पूर्णतः आत्मसात करते, तब तक व्यास जी अगले छंदों की रचना कर लेते थे। लिखते-लिखते अचानक गणेश जी की लेखनी टूट गई। शर्त के अनुसार उन्हें रुकना नहीं था, इसलिए उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने एक दांत को स्वयं तोड़ लिया और उसे स्याही में डुबोकर निरंतर लिखना जारी रखा। इसी अलौकिक त्याग और विद्या-निष्ठा के कारण वे ‘एकदंत’ कहलाए। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि महान लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए व्यक्तिगत सुख और देह-अभिमान का त्याग करना ही पड़ता है।
विघ्नहर्ता के स्वरूप का दार्शनिक रहस्य
भगवान गणेश की बाह्य शारीरिक रचना केवल एक पौराणिक स्वरूप नहीं है, बल्कि वह मानव जीवन के लिए गहन दार्शनिक और व्यावहारिक जीवन सूत्रों का सजीव प्रतीक है। उनके स्वरूप का प्रत्येक अंग मनुष्य को सार्थक और सफल जीवन जीने की कला सिखाता है।
उनका विशाल गज मस्तक विशाल सोच, दूरदर्शिता और असीम ज्ञान का द्योतक है। यह संकेत देता है कि मनुष्य को अपनी सोच संकुचित नहीं रखनी चाहिए, बल्कि जीवन की सभी परिस्थितियों को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। उनके बड़े-बड़े सूप जैसे कान यह संदेश देते हैं कि एक बुद्धिमान व्यक्ति को सुनना अधिक चाहिए और बोलना कम। जैसे सूप सार-सार को ग्रहण कर लेता है और थोथे कचरे को उड़ा देता है, वैसे ही व्यक्ति को ज्ञान और काम की बातों को भीतर धारण करना चाहिए तथा निरर्थक आलोचनाओं और व्यर्थ की बातों को बाहर ही छोड़ देना चाहिए।
गणेश जी की छोटी और तीक्ष्ण आंखें सूक्ष्म दृष्टि, एकाग्रता और आंतरिक अनुसंधान की प्रतीक हैं। वे हमें सिखाती हैं कि जीवन में किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले सतह के नीचे छिपे सत्यों को गहराई से परखना आवश्यक है। उनकी वक्र सूंड अनुकूलनशीलता और उच्च संवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करती है। सूंड इतनी शक्तिशाली होती है कि वह भारी भरकम वृक्ष के तने को उखाड़ सकती है और इतनी सूक्ष्म भी होती है कि भूमि पर गिरी छोटी सी सुई को भी उठा सकती है। यह संतुलन बताता है कि जीवन में कब कठोर शक्ति का प्रदर्शन करना है और कब अत्यंत कोमल व संवेदनशील बने रहना है।
उनका विशाल उदर यानी लंबोदर हमें यह सिखाता है कि जीवन में मिलने वाले अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के अनुभवों, सुख और दुख, प्रशंसा और निंदा को शांतिपूर्वक पचा जाना चाहिए। जो व्यक्ति दूसरों की कमजोरियों और समाज के कटु अनुभवों को अपने भीतर समाहित रखने का धैर्य रखता है, वही सच्चा मार्गदर्शक बन सकता है। उनका एकदंत रूप द्वंद्वों से परे एकात्म भाव का परिचायक है। संसार में लाभ-हानि, सुख-दुख और मान-अपमान के जो दो दांत दिखाई देते हैं, गणेश जी ने उनमें से एक को त्याग कर यह सिद्ध किया कि सत्य केवल एक ही है।
उनका वाहन मूषक यानी चूहा है। चूहा स्वभाव से चंचल, तृष्णा से भरा हुआ और अंधकार में रहकर हर वस्तु को कुतरने वाला जीव माना जाता है। चूहा वास्तव में मानव मन और अनियंत्रित वासनाओं का प्रतीक है। गणेश जी का उस पर सवार होना यह दर्शाता है कि बुद्धि और विवेक के द्वारा मन की चंचलता और अनियंत्रित इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया जाना चाहिए। जब बुद्धि मन पर नियंत्रण कर लेती है, तभी जीवन सही दिशा में अग्रसर होता है।
घर में गणपति आगमन और स्थापना की विधि
गणेश चतुर्थी के अवसर पर भगवान गणेश को अपने घर में एक अत्यंत आदरणीय अतिथि और परिवार के संरक्षक के रूप में आमंत्रित किया जाता है। स्थापना की प्रक्रिया केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह प्रेम, शुद्धि और समर्पण की एक अंतरंग साधना है।
पर्व से पूर्व घर की संपूर्ण स्वच्छता की जाती है। जिस स्थान पर बप्पा को विराजमान करना हो, उसे ईशान कोण अथवा उत्तर दिशा में चुनना अत्यंत शुभ माना जाता है। उस स्थान को गंगाजल से पवित्र करके सुंदर फूलों, बंदनवारों और रंगोली से सजाया जाता है। स्थापना के लिए लकड़ी की एक सुंदर चौकी बिछाई जाती है, जिस पर नया लाल या पीला वस्त्र आच्छादित किया जाता है। चौकी पर अक्षत यानी साबुत चावलों से अष्टदल कमल बनाया जाता है।
मूर्ति का चयन करते समय इस बात का ध्यान रखना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है कि प्रतिमा प्राकृतिक मिट्टी से बनी हो और पर्यावरण के अनुकूल हो। शास्त्रों में बाईं ओर सूंड वाले गणपति को गृहस्थों के लिए अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी माना गया है, क्योंकि वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले और वात्सल्यमयी स्वभाव के होते हैं।
स्थापना के समय चौकी के समीप एक तांबे या पीतल के कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का और दूर्वा डालकर स्थापित किया जाता है। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखे जाते हैं और उसके ऊपर पूर्णपात्र यानी चावल से भरी कटोरी में एक जटाधारी नारियल लाल वस्त्र में लपेटकर स्थापित किया जाता है। यह कलश वरुण देव और संपूर्ण ब्रह्मांडीय सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक होता है।

जब प्रतिमा को घर में लाया जाता है, तब परिवार के सभी सदस्य मंगल गान और शंख ध्वनि के साथ उनका स्वागत करते हैं। मुख्य द्वार पर बप्पा की आरती उतारी जाती है और उनके चरणों में थोड़ा जल छिड़क कर उन्हें गृहप्रवेश कराया जाता है। चौकी पर विराजमान करने के उपरांत सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान प्राण-प्रतिष्ठा का होता है। इसमें वैदिक मंत्रों के माध्यम से उस पार्थिव प्रतिमा में साक्षात गणेश चेतना का आह्वान किया जाता है। इसके पश्चात भगवान को पंचामृत से प्रतीकात्मक स्नान कराया जाता है, जिसमें दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का प्रयोग होता है। फिर शुद्ध जल और सुगंधित इत्र से स्नान कराकर नवीन पीत वस्त्र, जनेऊ और चंदन अर्पित किया जाता है।
षोडशोपचार पूजन का आंतरिक भाव
गणेश जी की पूजा सामान्यतः षोडशोपचार पद्धति से की जाती है, जिसका अर्थ है सोलह प्रकार के उपचारों या सेवाओं से प्रभु का सत्कार करना। यह भावना बिल्कुल वैसी ही होती है जैसे हम किसी अत्यंत प्रिय और सम्मानित अतिथि का अपने घर में स्वागत करते हैं।
सर्वप्रथम ध्यान और आवाहन किया जाता है, जिसमें मन को शांत करके विघ्नहर्ता के दिव्य रूप का स्मरण किया जाता है। इसके उपरांत उन्हें बैठने के लिए सुंदर आसन समर्पित किया जाता है। फिर पाद्य यानी पैर धोने के लिए जल, अर्घ्य यानी हाथ धोने के लिए जल और आचमन के लिए पवित्र जल प्रस्तुत किया जाता है। स्नान के बाद भगवान को नए वस्त्र और यज्ञोपवीत पहनाया जाता है। इसके पश्चात मस्तक पर सुगंधित अष्टगंध, कुमकुम और लाल चंदन का लेप लगाया जाता है।
इसके बाद अक्षत, ताजे सुगंधित पुष्प और विशेष रूप से लाल गुड़हल का फूल अर्पित किया जाता है। भगवान गणेश को लाल रंग अत्यंत प्रिय है क्योंकि यह तेज, स्फूर्ति और मूलाधार चक्र का रंग है। इसके अनंतर सुगंधित धूप और घृत का दीपक प्रज्वलित करके प्रभु की आरती का प्रकाश उन्हें समर्पित किया जाता है। फिर विविध प्रकार के फल और मुख्य नैवेद्य यानी मोदक और लड्डू का भोग लगाया जाता है। भोजन के उपरांत आचमन कराकर पान का बीड़ा और दक्षिणा अर्पित की जाती है। अंत में कर्पूर आरती उतारी जाती है, जिसमें शंख, घंटी और ढोलक की लय पर ‘जय गणेश जय गणेश देवा’ अथवा ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ का समवेत स्वर में गायन किया जाता है। पूजन के समापन पर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना की जाती है और साष्टांग प्रणाम करके बप्पा से परिवार के कल्याण और सद्बुद्धि की याचना की जाती है।
मोदक, दूर्वा और सिंदूर का दिव्य रहस्य
गणेश पूजन में तीन सामग्रियां अत्यंत अपरिहार्य मानी जाती हैं, मोदक, दूर्वा और सिंदूर। इन तीनों का केवल पौराणिक ही नहीं, बल्कि गहरा व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक संदेश भी है।

मोदक का शाब्दिक अर्थ होता है जो आनंद प्रदान करे। मोदक बाहर से सादा, सफेद और कठोर प्रतीत होता है, किंतु इसके भीतर मीठा, सुगंधित और स्वादिष्ट गुड़ व नारियल का मिश्रण भरा होता है। यह मनुष्य के आत्मज्ञान का प्रतीक है। अध्यात्म का मार्ग बाहर से देखने पर अत्यंत सरल, संयमित और अनुशासित दिखाई देता है, परंतु जो साधक इस अनुशासन को पार करके भीतर प्रवेश करता है, उसे आत्मिक शांति और परमानंद की मिठास प्राप्त होती है। मोदक हमें यह भी सिखाता है कि सत्य का स्वाद हमेशा मधुर होता है, भले ही उसे पाने के लिए बाह्य इंद्रियों को कसना पड़े।
दूर्वा यानी हरी घास भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है। एक पौराणिक प्रसंग के अनुसार अनलासुर नामक एक दैत्य था, जिसने अपने मुख की अग्नि से संपूर्ण त्रिलोक को भस्म करना आरंभ कर दिया था। संसार की रक्षा के लिए भगवान गणेश ने उस भयंकर दैत्य को निगल लिया। दैत्य के उदर में जाते ही गणेश जी के शरीर में भीषण दाह और जलन उत्पन्न हो गई। सभी देवताओं ने उन्हें औषधियां और शीतल जल दिया, किंतु जलन शांत नहीं हुई। अंत में कश्यप ऋषि ने दूर्वा की इक्कीस गांठें एकत्र करके गणेश जी को खाने के लिए दीं। दूर्वा ग्रहण करते ही उनके उदर की अग्नि तुरंत शांत हो गई।
दूर्वा का वैज्ञानिक गुण यह है कि यह अत्यंत शीतल और औषधीय तत्वों से युक्त होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से दूर्वा यह संदेश देती है कि ईश्वर को रिझाने के लिए सोने, चांदी या बहुमूल्य रत्नों की आवश्यकता नहीं है। जो वस्तु सहज, सरल, अहंकारहीन और हर परिस्थिति में हरी-भरी रहने वाली है, जैसे दूर्वा, वही प्रभु को सबसे अधिक प्रिय है। दूर्वा की भांति मनुष्य को भी अपने स्वभाव में विनम्रता, सरलता और हर परिस्थिति में जीवित रहने का लचीलापन बनाए रखना चाहिए।
सिंदूर अर्पण करने के पीछे भी एक सुंदर कथा है। बाल्यकाल में गणेश जी ने सिंदूरासुर नामक एक दुराचारी राक्षस का वध किया था और उसके रक्त रूपी सिंदूर को अपने पूरे शरीर पर लेप लिया था। सिंदूर को मंगल, आरोग्य और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वैज्ञानिक रूप से भी शुद्ध सिंदूर में पारा और औषधीय तत्व होते हैं जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखते हैं। गणेश जी को सिंदूर चढ़ाने से मन का भय दूर होता है और आत्मबल में वृद्धि होती है।
उत्सव के दौरान आचरण, संयम और सात्विक मर्यादा
गणेशोत्सव के जितने भी दिन बप्पा घर में विराजमान रहते हैं, उतने दिन घर का वातावरण किसी तपोवन और मंदिर की भांति पवित्र रखा जाना चाहिए। यह समय केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को त्यागने और अनुशासन सीखने का अवसर होता है।
इस पावन अवधि में घर में पूर्णतः सात्विक आहार ग्रहण किया जाता है। प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन और मादक द्रव्यों का पूरी तरह निषेध होता है। जो भी भोजन घर में पकाया जाता है, सर्वप्रथम उसका भोग बप्पा को लगाया जाता है, उसके पश्चात ही परिवार के सदस्य उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।
घर के भीतर किसी भी प्रकार का कलह, कटु वचन, क्रोध और नकारात्मक विचारों को आने से रोका जाना चाहिए। सुबह और शाम दोनों समय नियमित रूप से परिवार के सभी सदस्यों को एकत्र होकर सामूहिक आरती करनी चाहिए। इस अवधि में घर को कभी भी पूरी तरह अकेला या ताला बंद करके नहीं छोड़ा जाता, क्योंकि जब साक्षात विघ्नहर्ता अतिथि बनकर गृह में पधारे हों, तो उनकी सेवा में कम से कम एक सदस्य का उपस्थित रहना गृहस्थ धर्म की मर्यादा माना जाता है।
लोकमान्य तिलक और सार्वजनिक गणेशोत्सव की चेतना
गणेशोत्सव का इतिहास केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने भारत के स्वाधीनता संग्राम में एक युगांतरकारी भूमिका निभाई है। प्राचीन काल से ही गणेश चतुर्थी का पर्व घरों में और मराठा साम्राज्य के समय पेशवाओं के महलों में धूमधाम से मनाया जाता था। किंतु पेशवा शासन के अवसान के बाद यह उत्सव मुख्यतः व्यक्तिगत घरों तक ही सिमट कर रह गया था।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में, जब भारत ब्रिटिश दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और अंग्रेजों ने भारतीयों के किसी भी प्रकार के सार्वजनिक एकत्रीकरण पर प्रतिबंध लगा रखा था, तब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस पर्व की अद्भुत सामाजिक शक्ति को पहचाना। सन 1893 में तिलक जी ने पुणे में गणेशोत्सव को घरों की चहारदीवारी से बाहर निकालकर सार्वजनिक मंच प्रदान किया।
तिलक जी का उद्देश्य धार्मिक आस्था के माध्यम से देश के सभी वर्गों, जातियों और संप्रदायों को एक सूत्र में पिरोना था। सार्वजनिक पंडाल स्वतंत्रता सेनानियों के गुप्त विचार-विमर्श, देशभक्ति के गीतों, नाटकों, कवि सम्मेलनों और बौद्धिक व्याख्यानों के केंद्र बन गए। अंग्रेज सरकार धार्मिक उत्सव होने के कारण इस पर सीधा प्रतिबंध नहीं लगा सकी। इस प्रकार विघ्नहर्ता गणेश ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना के सबसे बड़े संवाहक की भूमिका निभाई। आज भी देश के कोने-कोने में लगने वाले सार्वजनिक पंडाल सामाजिक एकता, कला और संस्कृति के जीवंत प्रतीक बने हुए हैं।
विसर्जन का मर्म: नश्वरता से अनंत की ओर यात्रा
गणेशोत्सव का सबसे भावुक और आध्यात्मिक रूप से गहन क्षण होता है विसर्जन का दिन। अधिकांश स्थानों पर यह उत्सव डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन अथवा पूर्ण दस दिनों तक यानी अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है। विसर्जन का समय आते ही वातावरण में एक ओर जहां भक्ति का उल्लास होता है, वहीं दूसरी ओर बप्पा के जाने की विरह वेदना भी होती है।
विसर्जन के दिन प्रातःकाल बप्पा की अंतिम विशेष पूजा की जाती है, उन्हें 56 भोग या मोदक अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद ‘उत्तरपूजा’ का विधान संपन्न होता है, जिसमें मंत्रों के द्वारा प्रभु से अपने लोक लौटने और अगले वर्ष पुनः शीघ्र आने की विनम्र प्रार्थना की जाती है। प्रतिमा को चौकी से थोड़ा सा हिलाया जाता है, जो इस बात का संकेत है कि अब प्राण-प्रतिष्ठा का अनुष्ठान पूर्ण हुआ और विग्रह विसर्जन के लिए तैयार है।
अबीर, गुलाल उड़ाते हुए, ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते भक्त बप्पा को जल स्रोत तक ले जाते हैं। मार्ग भर ‘गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या’ के गगनभेदी नारे गूंजते हैं। अंत में प्रतिमा को अत्यंत आदर के साथ जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
यह विसर्जन हमें जीवन का सबसे बड़ा शाश्वत सत्य सिखाता है। जो रूप मिट्टी से बना था, वह अंततः जल में घुलकर पुनः उसी प्रकृति में विलीन हो जाता है। यह इस बात का बोध कराता है कि यह संसार नश्वर है, नाम और रूप सब क्षणभंगुर हैं, केवल जो चेतना इनके भीतर वास कर रही थी, वही सत्य और अनंत है। हम परमात्मा को एक सीमित आकार में अपने घर लाते हैं, उनसे प्रेम करते हैं, उनकी सेवा करते हैं और फिर उन्हें अनंत जलराशि में विसर्जित करके यह स्वीकार करते हैं कि ईश्वर किसी एक सीमा में बंधे नहीं हैं, वे सर्वव्यापी हैं।
गणेश चतुर्थी का यह दिव्य पर्व मनुष्य को विवेकवान बनने, अपने अहंकार को त्यागने, माता-पिता का सम्मान करने, प्रकृति के साथ एकाकार होकर जीने और विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है। विघ्नहर्ता का सच्चा आशीर्वाद वही है जो हमारे मन के विकारों का नाश करे और हमारी आत्मा को सत्य, ज्ञान और आनंद के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दे।
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