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Uttarakhand Waste Management: स्वच्छ एवं कचरा-मुक्त उत्तराखंड की दिशा में मजबूत पहल, कचरा प्रबंधन में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर

On: September 10, 2026 12:35 PM
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Uttarakhand Waste Management: स्वच्छ एवं कचरा-मुक्त उत्तराखंड की दिशा में मजबूत पहल
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Uttarakhand Waste Management News: हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड की पहचान केवल उसकी नैसर्गिक सुंदरता, सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और पवित्र तीर्थस्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र पूरे उत्तर भारत के लिए जल, प्राणवायु और पर्यावरणीय संतुलन का मुख्य स्रोत भी है। जैसे-जैसे राज्य में आर्थिक गतिविधियां, शहरीकरण और पर्यटन का विस्तार हुआ है, वैसे-वैसे पहाड़ों की संवेदनशील पारिस्थितिकी पर मानवीय गतिविधियों का दबाव भी तेजी से बढ़ा है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी और जटिल चुनौती ठोस कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की रही है। ढलानों पर बिखरा प्लास्टिक, नदियों के किनारों पर जमा होता मलबा और शहरों के मुहाने पर खड़े कचरे के पुराने पहाड़ देवभूमि के अस्तित्व के लिए गंभीर प्रश्न बन चुके थे। इसी संकट के स्थायी समाधान की दिशा में राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक ऐतिहासिक और ठोस कदम उठाया है।

सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते, पीआईबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुन्दिरयाल और शहरी विकास निदेशक प्रवीण कुमार की संयुक्त उपस्थिति में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड अब कचरा प्रबंधन को केवल सफाई के एक नियमित काम के तौर पर नहीं, बल्कि कठोर प्रशासनिक जवाबदेही, कानूनी दायित्व और सर्कुलर इकोनॉमी के एक सुनियोजित तंत्र के रूप में देख रहा है। केंद्र सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2026 से देशभर में लागू किए गए नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को उत्तराखंड में जिस तत्परता और जमीनी रणनीति के साथ धरातल पर उतारा जा रहा है, वह न केवल पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बल्कि पूरे देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बनने जा रहा है।

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Photo- Uttarakhand Waste Management Mdano News

नए नियमों का पूरा ढांचा इस बुनियादी सिद्धांत पर आधारित है कि कचरा तब तक ही कचरा रहता है जब तक हम उसे अलग-अलग करके एक संसाधन की तरह देखना शुरू नहीं करते। पुराने नियमों की सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए अब स्रोत पर पृथक्करण को कानूनी रूप से अनिवार्य और अधिक व्यावहारिक बनाया गया है। वर्ष 2016 के पुराने कचरा प्रबंधन नियमों के तहत मुख्य रूप से तीन श्रेणियां निर्धारित थीं, जिनमें गीला कचरा, सूखा कचरा और घरेलू खतरनाक कचरा शामिल था। व्यवहार के स्तर पर यह व्यवस्था कई बार अस्पष्ट रह जाती थी, जिसके कारण घरों से निकलने वाले पैड, डायपर और चिकित्सा अपशिष्ट अक्सर सूखे या गीले कचरे में मिलकर पूरी सामग्री को दूषित कर देते थे। नए नियमों में इस खामी को पूरी तरह से दूर करते हुए चार स्पष्ट श्रेणियां बनाई गई हैं। इनमें पहली श्रेणी गीले यानी जैविक कचरे की है, दूसरी श्रेणी सूखे अथवा रिसाइकिल होने वाले कचरे की है, तीसरी श्रेणी विशेष रूप से सैनिटरी कचरे के लिए आरक्षित की गई है और चौथी श्रेणी विशेष देखभाल वाले खतरनाक घरेलू कचरे की रखी गई है।

इस चार स्तरीय वर्गीकरण का सीधा असर कचरा बीनने वालों, सफाई कर्मचारियों और प्रोसेसिंग प्लांट के संचालन पर पड़ेगा। जब सैनिटरी कचरा अलग थैलों में चिह्नित होकर पहुंचेगा, तो सफाई कर्मियों को मानवीय गरिमा के विरुद्ध जाकर उसे हाथों से छांटने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी। साथ ही रासायनिक और खतरनाक कचरे के अलग होने से खाद बनाने की प्रक्रिया शुद्ध और विषैले तत्वों से मुक्त रहेगी। इस प्रणाली को घरों से लेकर प्रोसेसिंग साइट तक बिना किसी रुकावट के चालू रखने के लिए राज्य के परिवहन बेड़े में भारी बदलाव किया जा रहा है। सरकार लगभग 500 कचरा संग्रहण वाहनों में चार अलग-अलग कम्पार्टमेंट की तकनीकी व्यवस्था करा रही है, ताकि नागरिकों द्वारा घर पर किया गया अलगाव गाड़ी में डालते समय व्यर्थ न हो जाए। यह कदम जनता के उस विश्वास को दोबारा बहाल करेगा, जो अक्सर यह देखकर टूट जाता था कि अलग-अलग रखा कचरा गाड़ी में एक साथ मिला दिया गया है।

इस नई व्यवस्था की दूसरी सबसे बड़ी धुरी वाणिज्यिक और बड़े संस्थानों की जवाबदेही तय करना है। अक्सर यह देखा गया है कि शहरों और पर्यटन स्थलों पर कचरे का बड़ा हिस्सा आम नागरिकों के घरों से नहीं, बल्कि बड़े होटलों, मैरिज हॉलों, विश्वविद्यालयों, औद्योगिक इकाइयों और विशाल आवासीय परिसरों से निकलता है। पहले ऐसे संस्थान मामूली यूजर चार्ज देकर अपने भारी कचरे का बोझ स्थानीय नगर पालिकाओं पर डाल देते थे। नए कानून के अंतर्गत बल्क वेस्ट जनरेटर की स्पष्ट, सख्त और पारदर्शी परिभाषा तय कर दी गई है। राज्य में कोई भी ऐसा संस्थान जिसका क्षेत्रफल 2,000 वर्ग मीटर से अधिक है, या जहां प्रतिदिन 40 हजार लीटर से अधिक पानी की खपत होती है, अथवा जहां रोज 100 किलोग्राम से अधिक ठोस कचरा पैदा होता है, वह अनिवार्य रूप से बल्क वेस्ट जनरेटर की श्रेणी में गिना जाएगा। इनमें से यदि कोई भी एक मानक पूरा होता है, तो वह प्रतिष्ठान कानूनी रूप से इस दायरे में आ जाएगा।

ऐसे सभी बल्क जनरेटरों के लिए स्थानीय निकायों में अनिवार्य पंजीकरण कराना जरूरी कर दिया गया है। केवल पंजीकरण ही काफी नहीं होगा, बल्कि उन्हें अपने परिसर के भीतर निकलने वाले गीले कचरे की कंपोस्टिंग या बायोगैस में बदलने की व्यवस्था स्वयं करनी होगी और सूखे कचरे को पंजीकृत रिसाइक्लर्स को सौंपना होगा। यह प्रावधान राज्य के पर्यटन क्षेत्रों जैसे नैनीताल, मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार और चारधाम यात्रा मार्गों पर स्थित विशाल रिसॉर्ट्स और होटलों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह बदल देगा। जो संस्थान पहले अपने कचरे को रातों-रात खाई में फेंक देते थे या खुले डंपिंग ग्राउंड में डाल आते थे, उन्हें अब हर किलोग्राम कचरे का डिजिटल रिकॉर्ड रखना होगा। नियमों की अनदेखी करने पर भारी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और लाइसेंस निरस्त करने तक की कानूनी कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

प्रशासनिक स्तर पर इस पूरी कवायद को केवल कागजी आदेशों तक सीमित न रखकर कानूनी निगरानी से भी सशक्त किया गया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा 19 फरवरी 2026 को दिए गए महत्वपूर्ण फैसले के आलोक में, प्रदेश के सभी तेरह जनपदों में डिस्ट्रिक्ट स्पेशल सेल का गठन किया गया है। यह सेल जिला स्तर पर एक स्वतंत्र और अधिकार संपन्न निगरानी इकाई के रूप में काम कर रहा है। जिलाधिकारी और जिला स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों की अगुवाई में यह सेल प्रतिदिन यह समीक्षा करता है कि किसी जिले के शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में कचरा प्रबंधन का काम किस स्तर पर चल रहा है। यह सेल न केवल नई कचरा उठान व्यवस्था पर नजर रख रहा है, बल्कि बरसों से जमा पुराने कचरे के पहाड़ों, जिन्हें लीगेसी वेस्ट कहा जाता है, उनके वैज्ञानिक निस्तारण की सीधी निगरानी भी कर रहा है।

उत्तराखंड के प्रमुख शहरों के बाहर लीगेसी वेस्ट के विशाल ढेर वर्षों से पर्यावरण, भूजल और वायु गुणवत्ता के लिए नासूर बने हुए थे। बरसात के दिनों में इन ढेरों से निकलने वाला जहरीला पानी रिसकर जमीन के अंदर चला जाता था और पास की नदियों में मिलकर जल स्रोतों को जहरीला बना देता था। सरकार ने इस समस्या को समाप्त करने के लिए एक समयबद्ध और स्पष्ट लक्ष्य तय किया है। राज्य के सभी चिन्हित डंपिंग साइट्स से लीगेसी वेस्ट का निस्तारण दिसंबर 2026 तक शत-प्रतिशत पूरा करने का संकल्प लिया गया है। बायो-माइनिंग और बायो-रेमेडिएशन तकनीकों के माध्यम से पुराने कचरे को छानकर उसमें से रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल अलग किया जा रहा है, जिसे सीमेंट कारखानों में कोयले के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। इसके साथ ही निकलने वाली इनर्ट मिट्टी का उपयोग सड़क निर्माण और गड्ढों को भरने में किया जा रहा है, जिससे डंपिंग ग्राउंड की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन फिर से हरी-भरी और उपयोगी बन सकेगी।

वर्तमान आंकड़ों की बात करें तो उत्तराखंड ने इस दिशा में अब तक काफी संतोषजनक और मजबूत जमीनी आधार तैयार कर लिया है। राज्य में इस समय प्रतिदिन लगभग 1,930 मीट्रिक टन ठोस कचरा पैदा होता है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें से करीब 1,800 मीट्रिक टन कचरे का रोजाना वैज्ञानिक रूप से प्रसंस्करण किया जा रहा है। प्रसंस्करण की यह दर राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर है, लेकिन बची हुई खाई को पाटने के लिए बुनियादी ढांचे को और अधिक आधुनिक बनाया जा रहा है। राज्य में इस समय लगभग शत-प्रतिशत डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण का तंत्र सक्रिय रूप से काम कर रहा है। कचरे को संसाधनों में बदलने के लिए प्रदेश भर में 22 इंटीग्रेटेड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट, लगभग 50 मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी और 600 से अधिक वेस्ट कम्पोस्टर सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं।

प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन के लिए मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी अत्यंत कारगर सिद्ध हो रही हैं। यहां विभिन्न श्रेणियों के प्लास्टिक को दबाकर बेल बनाई जाती है और फिर उन्हें रिसाइकिलिंग इकाइयों तक भेजा जाता है। इस पूरी श्रृंखला को कार्बन मुक्त और पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए राज्य सरकार 657 नए कचरा संग्रहण वाहन खरीदने जा रही है। इस नए बेड़े की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लगभग 480 वाहन पूरी तरह से बिजली से चलने वाले ई-वाहन होंगे। संकरी पहाड़ी सड़कों और घनी बस्तियों में इन ई-वाहनों के संचालन से न केवल डीजल और पेट्रोल के धुएं से मुक्ति मिलेगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी आएगी। इसके साथ ही वाहनों की कार्यप्रणाली में पूरी पारदर्शिता बनाए रखने के लिए डिजिटल व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम लागू कर दिया गया है। अब जीपीएस और डिजिटल डैशबोर्ड के जरिए यह देखा जा सकेगा कि किस मोहल्ले में कचरा गाड़ी किस समय पहुंची, उसने निर्धारित रूट पूरा किया या नहीं और कचरा सीधे प्रोसेसिंग सेंटर तक पहुंचा अथवा नहीं। इससे ड्राइवरों की मनमानी और कचरे को रास्ते में ही कहीं गिरा देने की शिकायतों पर पूरी तरह लगाम लग जाएगी।

उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना दोहरे चरित्र वाली है। यहां एक तरफ हरिद्वार, उधमसिंह नगर और देहरादून का मैदानी क्षेत्र है, तो दूसरी तरफ चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे सुदूर और अत्यधिक दुर्गम पहाड़ी इलाके हैं। नए नियमों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें केवल शहरी क्षेत्रों को ही नहीं, बल्कि ग्राम पंचायतों को भी समान रूप से जवाबदेह बनाया गया है। पहाड़ों में कई गांव अब कस्बों का रूप ले चुके हैं और पर्यटन के कारण वहां कचरे की मात्रा शहरों के बराबर पहुंच गई है। पंचायती राज विभाग और ग्रामीण विकास एजेंसियों को अब इन नियमों के दायरे में लाकर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि गांवों का कचरा सीधे गदेरों या बरसाती नालों में न बहाया जाए। ग्रामीण स्तर पर छोटे कम्पोस्टिंग पिट और क्लस्टर आधारित कचरा संग्रहण केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि ग्राम पंचायतें अपने स्तर पर ही जैविक कचरे का निपटारा कर सकें।

यह पूरी व्यवस्था केवल सरकारी तंत्र के डंडे या कानूनों की सख्ती से सफल नहीं हो सकती। डॉ. पराग मधुकर धकाते और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रेस वार्ता के दौरान इस बात को बहुत शिद्दत से रेखांकित किया कि जब तक इसमें आम जनमानस की भागीदारी नहीं होगी, तब तक शून्य-कचरा समाज की कल्पना अधूरी रहेगी। कचरा प्रबंधन को एक जन आंदोलन बनाने की जरूरत है, जहां हर नागरिक अपने घर से निकलने वाले कचरे को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझे। जब कोई परिवार अपने घर में ही नीले, हरे, लाल और काले डिब्बे में कचरा अलग करना शुरू करता है, तो वह केवल एक नियम का पालन नहीं करता, बल्कि वह गंगा और यमुना के उद्गम को स्वच्छ रखने में अपना सीधा योगदान देता है। स्कूल स्तर पर बच्चों को कचरा पृथक्करण की आदत डालना, महिला स्वयं सहायता समूहों को अपशिष्ट प्रबंधन और जैविक खाद निर्माण से जोड़कर आजीविका देना और व्यापारियों को सिंगल-यूज प्लास्टिक के विकल्पों के प्रति जागरूक करना इस रणनीति का अभिन्न हिस्सा है।

सर्कुलर इकोनॉमी की जिस नई अवधारणा पर यह नीति टिकी है, उसका अंतिम उद्देश्य यह है कि जमीन में दफनाने या जलाने के लिए कचरा शून्य के बराबर बचे। जैविक कचरे से बनने वाली उच्च गुणवत्ता की कम्पोस्ट खाद को उत्तराखंड के जैविक खेती अभियान से जोड़ा जा रहा है, जिससे हमारे किसानों को रासायनिक खादों से मुक्ति मिले और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़े। सूखे कचरे के पुनर्चक्रण से नए रोजगार और स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। यह व्यवस्था पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ राज्य की आर्थिकी को भी एक नया आधार प्रदान करेगी।

उत्तराखंड का यह मॉडल देश के अन्य हिमालयी राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर के लिए भी एक मार्गदर्शक ढांचा प्रस्तुत कर रहा है। कमजोर पारिस्थितिकी तंत्र वाले राज्यों में अपशिष्ट प्रबंधन की पारंपरिक मैदानी नीतियां कभी सफल नहीं हो सकती थीं। नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 ने स्थानीय भूगोल, पर्यटन की मौसमी चुनौतियों और आधुनिक तकनीक के सटीक तालमेल के साथ एक नया रास्ता दिखाया है। प्रशासनिक प्रतिबद्धता, न्यायिक निगरानी, डिजिटल जवाबदेही और जनसहभागिता का यह संगम देवभूमि को स्वच्छ, हरित और कचरा-मुक्त बनाने के स्वप्न को हकीकत में बदलने की पूरी क्षमता रखता है। आने वाले महीनों में जब इस व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम जमीन पर दिखने लगेंगे, तो यह साबित होगा कि कड़े नियम और स्पष्ट इच्छाशक्ति किसी भी विषम भौगोलिक चुनौती पर विजय पा सकते हैं।

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