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Uttarakhand Butter Festival: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में शुरू हुआ बटर फेस्टिवल

On: August 16, 2026 3:37 PM
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Uttarakhand Butter Festival: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में शुरू हुआ बटर फेस्टिवल
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Uttarakhand Butter Festival News: उत्तराखंड के जनपद उत्तरकाशी की मनोरम वादियों में स्थित विश्व प्रसिद्ध दयारा बुग्याल एक बार फिर लोक संस्कृति, आस्था और उमंग के अनोखे रंगों से सराबोर हो उठा है। समुद्र तल से लगभग ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर फैले मखमली घास के विशाल मैदानों में पारंपरिक ‘बटर फेस्टिवल’ यानी स्थानीय भाषा में ‘अढूंड़ी उत्सव’ का भव्य शुभारंभ हो चुका है। भाद्रपद संक्रांति के पावन अवसर पर आयोजित होने वाला यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, पशुधन और मानव के बीच के अटूट और पवित्र रिश्ते का जीवंत प्रमाण है। दूर-दूर तक फैली हरियाली, सामने खड़ी हिमाच्छादित चोटियां और चारों ओर गूंजते ढोल-दमाऊं की थाप ने पूरे दयारा क्षेत्र को एक अद्भुत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र में तब्दील कर दिया है।

देश और दुनिया भर से पहुंचे हजारों पर्यटक और स्थानीय ग्रामीण इस अलौकिक उत्सव के साक्षी बन रहे हैं, जहां रासायनिक रंगों के बजाय शुद्ध मक्खन, मट्ठा और दूध से एक-दूसरे को सराबोर कर प्रकृति का आभार प्रकट किया जाता है। अढूंड़ी उत्सव का पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भ स्थानीय गढ़वाली बोली में ‘अढूंड़ी’ के नाम से जाना जाने वाला यह उत्सव सदियों पुरानी परंपरा को समेटे हुए है। मान्यता है कि गर्मियों के मौसम में जब निचले गांवों में चारागाह कम पड़ जाते हैं, तो भटवाड़ी ब्लॉक के रैथल और आसपास के ग्रामीण अपने मवेशियों को लेकर उच्च हिमालयी बुग्यालों में चले जाते हैं।

दयारा बुग्याल की पौष्टिक घास और शुद्ध जल से मवेशियों का स्वास्थ्य बेहतर होता है और दूध उत्पादन में भारी वृद्धि होती है। ग्रामीण महीनों तक बुग्याल में बनी अपनी अस्थाई झोपड़ियों (छानियों) में रहकर पशुपालन करते हैं और मक्खन, घी तैयार करते हैं। भाद्रपद माह की संक्रांति के दिन, जब इन मवेशियों की घर वापसी का समय निकट आता है, तो ग्रामीण अपने आराध्य सोमेश्वर महादेव और वन देवियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए इस उत्सव का आयोजन करते हैं। यह भगवान श्रीकृष्ण की माखन चोरी और बाल लीलाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण मानते हैं कि जंगल और बुग्याल में उनके पशुओं की जंगली जानवरों और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा करने वाले देवता को सबसे पहले उस मौसम का ताजा मक्खन और दूध अर्पित किया जाना चाहिए।

गोबर के लेप से मक्खन की होली तक का सफर अढूंड़ी उत्सव के स्वरूप में समय के साथ एक सुंदर और सकारात्मक बदलाव आया है। बुजुर्गों के अनुसार, प्राचीन काल में जब बुग्यालों में संसाधन सीमित होते थे और मक्खन की बर्बादी से बचा जाता था, तब ग्रामीण उत्सव के दिन एक-दूसरे पर आदर और प्रेम से गाय का पवित्र गोबर लगाकर खुशी मनाते थे। गाय के गोबर को सनातन संस्कृति में अत्यंत शुद्ध और औषधीय माना गया है, इसलिए इसे प्रकृति के आशीर्वाद के रूप में लगाया जाता था। जैसे-जैसे समय बदला और स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ, गोबर की जगह ताजे मक्खन, दूध और मट्ठे ने ले ली। अब ग्रामीण महीनों की मेहनत से तैयार किए गए मक्खन से अपने ईष्ट देव की पूजा-अर्चना करते हैं और उसके बाद उसी पवित्र मक्खन और छाछ से एक-दूसरे के साथ होली खेलते हैं।

इस अनूठी परंपरा ने धीरे-धीरे पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा और आज यह ‘बटर फेस्टिवल’ के नाम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो चुका है। ढोल-दमाऊं और रासों-तांदी नृत्यों की गूंज उत्सव की शुरुआत रैथल गांव से सोमेश्वर महादेव की देव डोली के दयारा बुग्याल पहुंचने के साथ होती है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीण देव डोली को अपने कंधों पर उठाकर कई किलोमीटर की कठिन चढ़ाई चढ़ते हैं। जब देव डोली बुग्याल में प्रवेश करती है, तो पूरा माहौल ‘जय सोमेश्वर’ के जयकारों से गूंज उठता है। इसके बाद पारंपरिक वाद्य यंत्रों—ढोल, दमाऊं और रणसिंघे की ध्वनि पर ग्रामीण गोलाकार घेरा बनाकर रासों और तांदी नृत्य प्रस्तुत करते हैं। उत्तराखंड के इस पारंपरिक लोकनृत्य में बूढ़े, जवान, महिलाएं और बच्चे सभी एक-दूसरे का हाथ थामकर लयबद्ध तरीके से झूमते हैं। इन नृत्यों में गाए जाने वाले लोकगीत प्रकृति, पहाड़ों के सौंदर्य, कठिन जीवन शैली और देवताओं की स्तुति से ओत-प्रोत होते हैं।

उत्सव में आए बाहरी पर्यटक भी खुद को इस लोक संगीत के सम्मोहन से रोक नहीं पाते और ग्रामीणों के साथ कदम से कदम मिलाकर थिरकने लगते हैं। प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का गहरा संदेश बटर फेस्टिवल केवल उल्लास का पर्व नहीं है, बल्कि यह हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) के प्रति गहरी जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। आयोजक ‘दयारा पर्यटन उत्सव समिति’ और स्थानीय ग्रामीण इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि इस विशाल आयोजन से बुग्याल की नाजुक घास और जैव विविधता को कोई नुकसान न पहुंचे। उत्सव में किसी भी तरह के रासायनिक रंग, प्लास्टिक या कृत्रिम सामग्रियों का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित रहता है।

उत्सव के दौरान इस्तेमाल होने वाला मक्खन और छाछ पूरी तरह जैविक और प्राकृतिक होता है, जो जमीन पर गिरकर मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है न कि उसे दूषित करता है। इसके साथ ही, उत्सव समाप्त होने के बाद स्थानीय युवा और स्वयंसेवक मिलकर पूरे बुग्याल की सफाई करते हैं, ताकि हिमालय के इस स्वर्ग समान मैदान की पवित्रता और सुंदरता अक्षुण्ण बनी रहे। यह परंपरा दुनिया को सिखाती है कि प्रकृति का उत्सव मनाते हुए उसकी रक्षा कैसे की जाती है। साहसिक पर्यटन और स्थानीय आजीविका का संबल दयारा बुग्याल का बटर फेस्टिवल उत्तरकाशी जिले के साहसिक और ग्रामीण पर्यटन के लिए एक वरदान साबित हो रहा है। हर साल अगस्त के महीने में आयोजित होने वाले इस उत्सव के चलते क्षेत्र के होमस्टे, स्थानीय गाइड, खच्चर संचालक, ढाबा मालिक और पोर्टर्स को व्यापक स्तर पर रोजगार मिलता है।

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रैथल, भटवाड़ी और उत्तरकाशी के होटल व लॉज पर्यटकों से पूरी तरह भर जाते हैं।… पर्यटकों के लिए यह अनुभव केवल एक उत्सव देखने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे घने बांज, बुरांश और देवदार के जंगलों से होकर गुजरने वाले ट्रैकिंग रूट का आनंद लेते हैं। दयारा बुग्याल पहुंचने के बाद जब सामने बंदरपूंछ, द्रौपदी का डांडा, और गंगोत्री पर्वत श्रृंखलाओं का विहंगम दृश्य दिखाई देता है, तो यात्रा की सारी थकान पल भर में गायब हो जाती है। यह उत्सव उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों में पलायन रोकने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हिमालयी लोकसंस्कृति की धरोहर और भावी पीढ़ी उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल में आयोजित होने वाला बटर फेस्टिवल इस बात का साक्षात प्रमाण है कि आधुनिकता की आंधी के बीच भी पहाड़ के लोगों ने अपनी सदियों पुरानी समृद्ध परंपराओं को कितने जतन से संजोकर रखा है। जिस दौर में लोग अपनी जड़ों से कट रहे हैं, उस दौर में रैथल और आसपास के ग्रामीण हर साल अपनी जड़ों की ओर लौटते हैं और अपने देवताओं व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं।… यह उत्सव आने वाली पीढ़ियों को यह सीख देता है कि प्रकृति से केवल लेना ही मनुष्य का धर्म नहीं है, बल्कि समय-समय पर उसका आभार मानना और उसके संरक्षण के लिए एकजुट होना भी उतना ही आवश्यक है। मक्खन और छाछ की महक से महकता दयारा बुग्याल आज न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेम, समरसता, लोक आस्था और पर्यावरण संतुलन की एक अनुपम मिसाल बनकर चमक रहा है।

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