Uttarakhand Pauri Garhwal Monsoon News: उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद में आगामी मानसून सत्र के मद्देनजर प्रभारी एवं जलागम सचिव दिलीप जावलकर ने एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की। कलेक्ट्रेट सभागार में हुई इस बैठक में संवेदनशील गुमखाल-सतपुली मार्ग की ड्रोन सर्विलांस से निगरानी करने, आपदा परिचालन केंद्र को हाई-टेक बनाने और नयार नदी के पुनर्जीवन के लिए तैयार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को एक सप्ताह के भीतर शासन को भेजने के कड़े निर्देश दिए गए हैं। जानिए मानसून तैयारियों और नदी संरक्षण की इस विस्तृत जमीनी रिपोर्ट को।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मानसून का आगमन अपने साथ प्राकृतिक हुस्न के साथ-साथ आपदाओं की गंभीर चुनौतियां भी लेकर आता है। आगामी मानसून सत्र के दौरान संभावित दैवीय आपदाओं, भूस्खलन और अतिवृष्टि जैसी आपातकालीन स्थितियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए पौड़ी गढ़वाल जिला प्रशासन ने अपनी कमर कस ली है। इसी सिलसिले में जनपद की तैयारियों का धरातलीय जायजा लेने पहुंचे प्रदेश के प्रभारी एवं जलागम सचिव दिलीप जावलकर ने आज कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय बैठक में विभागवार मानसून तैयारियों की विस्तृत समीक्षा की। बैठक के दौरान जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी ने वार्षिक आपदा प्रबंधन कार्ययोजना, जिले के अत्यधिक संवेदनशील और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति, उपलब्ध राहत एवं बचाव संसाधनों, स्थानीय स्वयंसेवकों के विशेष प्रशिक्षण, समय-समय पर आयोजित होने वाले मॉक अभ्यास तथा विभिन्न विभागों के बीच आपसी समन्वय को लेकर तैयार किए गए ब्लूप्रिंट की विस्तृत जानकारी प्रभारी सचिव के समक्ष प्रस्तुत की। इस दौरान वन विभाग की समीक्षा करते हुए डीएफओ गढ़वाल ने एक बड़ी राहत भरी जानकारी दी कि बेहतर प्रबंधन के कारण इस वर्ष वनाग्नि (जंगलों की आग) की घटनाओं में जिले के भीतर किसी भी प्रकार की मानव या जनहानि दर्ज नहीं हुई है।
सभागार की मुख्य बैठक से ठीक पहले प्रभारी सचिव दिलीप जावलकर ने स्वयं जिला आपदा परिचालन केंद्र (कंट्रोल रूम) का औचक निरीक्षण किया। इस निरीक्षण के दौरान उन्होंने केंद्र में स्थापित संचार प्रणालियों, सैटेलाइट फोन, वायरलेस सेटों और अन्य तकनीकी खोज एवं बचाव उपकरणों की कार्यप्रणाली को बारीकी से देखा और व्यवस्थाओं की गहन समीक्षा की। अधिकारियों और कर्मचारियों को कड़े शब्दों में निर्देशित करते हुए उन्होंने कहा कि मानसून की पूरी अवधि के दौरान सभी संबंधित सरकारी विभाग शत-प्रतिशत सतर्कता, मुस्तैदी और आपसी बेहतर तालमेल (समन्वय) के साथ चौबीसों घंटे कार्य करें। उन्होंने दो टूक लहजे में स्पष्ट किया कि आपदा प्रबंधन से जुड़े सुरक्षा और राहत संसाधनों की जिले में किसी भी स्तर पर या किसी भी मोड़ पर रत्ती भर भी कमी नहीं होनी चाहिए।
इस महत्वपूर्ण मौके पर मीडिया से बात करते हुए दिलीप जावलकर ने बताया कि उन्होंने आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारियों को स्पष्ट हिदायत दी है कि जितने भी खोज एवं बचाव उपकरण (सर्च एंड रेस्क्यू इक्विपमेंट्स) और सैटेलाइट संचार तंत्र जिले के पास उपलब्ध हैं, उनकी नियमित रूप से देखरेख और तकनीकी टेस्टिंग सुनिश्चित रखी जाए ताकि आपातकाल के समय कोई उपकरण निष्प्रभावी साबित न हो। इसके अतिरिक्त, उन्होंने जिला कंट्रोल रूम के भीतर संचालित शिकायत निवारण कक्ष की कार्यप्रणाली को और अधिक चुस्त बनाने पर जोर दिया। उन्होंने निर्देश दिए कि मानसून अवधि में कंट्रोल रूम को प्राप्त होने वाली प्रत्येक छोटी-बड़ी सूचना, सड़क बंद होने की खबर या जनसामान्य की शिकायत पर न केवल तुरंत एक्शन लिया जाए, बल्कि संबंधित विभाग द्वारा समस्या का समाधान होने तक उसका लगातार कड़ा फॉलोअप भी रखा जाए। प्रभारी सचिव ने विशेष रूप से कोटद्वार-पौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित ‘गुमखाल-सतपुली मार्ग’ को मानसून के दौरान भूस्खलन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और खतरनाक बताते हुए निर्देश दिए कि इस पूरे मार्ग पर संभावित भूस्खलन और अन्य जोखिमों की चौबीसों घंटे निगरानी के लिए ‘ड्रोन सर्विलांस’ (Drone Surveillance) जैसी आधुनिक तकनीक का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाए ताकि किसी भी दुर्घटना से पहले ही मार्ग को बंद कर जान-माल की रक्षा की जा सके।
आपदा समीक्षा के उपरांत, प्रभारी सचिव और जलागम सचिव दिलीप जावलकर की अध्यक्षता में ‘जल स्रोत एवं नदी पुनर्जीवन प्राधिकरण’ (SARA – सारा) की एक और अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु पौड़ी जिले की जीवनदायिनी मानी जाने वाली ‘नयार नदी’ का पुनरुद्धार रहा। सचिव ने नयार नदी के पुनर्जीवन के लिए विभाग द्वारा तैयार की गई ‘विस्तृत परियोजना रिपोर्ट’ (DPR) की तकनीकी और व्यावहारिक समीक्षा की। उन्होंने इस दूरगामी और महत्वाकांक्षी पर्यावरण परियोजना की गंभीरता को देखते हुए संबंधित अभियंताओं और अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए कि इस डीपीआर को तमाम आवश्यक संशोधनों के साथ आगामी एक सप्ताह के भीतर अनिवार्य रूप से राज्य शासन को प्रेषित कर दिया जाए, ताकि शासन स्तर से बजटीय और प्रशासनिक स्वीकृति मिलते ही इस पूरी नदी घाटी परियोजना पर धरातल पर शीघ्रता से निर्माण और संरक्षण कार्य शुरू किया जा सके। बैठक में जलागम विभाग के उप निदेशक ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन (PPT) के माध्यम से नयार नदी घाटी संरक्षण परियोजना का एक-एक बिंदुवार विस्तृत ब्यौरा और भविष्य का खाका प्रस्तुत किया।
इस विशेष मौके पर नयार नदी के महत्व को रेखांकित करते हुए दिलीप जावलकर ने कहा कि जनपद पौड़ी गढ़वाल की पूरी ‘नयार घाटी’ सदियों से स्थानीय निवासियों के लिए पेयजल, कृषि सिंचाई और ग्रामीण आजीविका का सबसे प्रमुख और मजबूत आधार रही है। लेकिन बदलते पर्यावरण और मानवीय हस्तक्षेप के कारण आज यह नदी और इसके सहायक जल स्रोत संकट के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में नयार नदी और उससे जुड़े पारंपरिक प्राकृतिक जल स्रोतों (धारों-नौलों) का संरक्षण करना केवल एक पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कदम है। उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि इस वैज्ञानिक नदी पुनर्जीवन योजना के माध्यम से पहाड़ों में तेजी से सूखते जा रहे प्राचीन जल स्रोतों को दोबारा पुनर्जीवित किया जाएगा, जिससे समूची घाटी की दीर्घकालिक जल सुरक्षा (Water Security) हमेशा के लिए सुनिश्चित हो सकेगी।

उन्होंने इस व्यापक परियोजना के तहत अपनाए जाने वाले तकनीकी और वैज्ञानिक तौर-तरीकों की जानकारी देते हुए बताया कि नयार नदी के कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्र) में आधुनिक जलागम आधारित उपचार किए जाएंगे। इसके तहत पहाड़ों की ढलानों पर वर्षाजल को रोकने के लिए व्यापक कंटूर ट्रेंच (खंतियां) खोदी जाएंगी, ऊंचे क्षेत्रों में चाल-खाल और छोटे-बड़े पारंपरिक तालाबों का निर्माण किया जाएगा, तथा नदी के छोटे बरसाती नालों पर बड़े पैमाने पर चेकडैम (चेक बांध) बनाए जाएंगे। इस पूरे अभियान को पूरी तरह पारदर्शी और आधुनिक बनाने के लिए विलेज लेवल पर ‘माइक्रोप्लानिंग’ की जाएगी और प्रत्येक निर्मित होने वाली संरचना की ‘जियोटैगिंग’ (Geotagging) के साथ-साथ ‘डिजिटल मॉनिटरिंग’ जैसी उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया जाएगा। प्रभारी सचिव ने विश्वास जताया कि इन समन्वित विजनरी प्रयासों से मानसून के दौरान होने वाले भारी वर्षाजल का पहाड़ियों पर ही बेहतर संरक्षण हो सकेगा, जिससे क्षेत्र के भूजल स्तर (Groundwater Level) में भारी सुधार आएगा, बरसात में होने वाले घातक मृदा अपरदन (मिट्टी के कटाव) पर प्रभावी नियंत्रण मिलेगा और अंततः नयार नदी तंत्र का पूरा पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) दोबारा मजबूत और हरा-भरा हो उठेगा।







