Congress News: राजनीतिक दलों के दफ्तरों में बैठकों का होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब कोई चुनावी इम्तिहान सामने हो और संगठन लंबे समय से सत्ता की राह देख रहा हो, तो बंद कमरों के भीतर चलने वाली चर्चाओं के मायने पूरी तरह बदल जाते हैं। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में हाल ही में संपन्न हुई बैठक भी महज एक औपचारिक हाजिरी नहीं थी, बल्कि यह उस लंबी और थकाऊ सियासी जंग की तैयारी का संकेत थी, जिसके लिए कांग्रेस अपने बिखरे हुए ढांचों को फिर से मजबूत करने की जद्दोजहद में लगी है। प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की मौजूदगी ने इस पूरी कवायद को एक सीधा और सख्त संदेश दिया कि अब केवल राजधानी में बैठकर बयानों की राजनीति करने का वक्त निकल चुका है। अगर पार्टी को वाकई चुनावी मुकाबले में मजबूती से टिकना है, तो कागजों से बाहर निकलकर सीधे धूल-धक्कड़ भरे रास्तों और गांव-गांव की चौपालों तक पहुंचना होगा।
बैठक के पहले चरण में जिस तरह फ्रंटल संगठनों, विभिन्न विभागों और अलग-अलग प्रकोष्ठों के प्रदेश अध्यक्षों के साथ सीधा संवाद किया गया, उसने साफ कर दिया कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बार जमीनी तंत्र की कमजोरियों को भली-भांति समझ रहा है। अक्सर देखा गया है कि राज्यों में मुख्य संगठन के अलावा जो युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवा दल या सामाजिक प्रकोष्ठ होते हैं, वे ज्यादातर मौकों पर निष्क्रिय रहते हैं या फिर उनकी गतिविधियां सिर्फ बड़े नेताओं के स्वागत समारोहों तक सिमट जाती हैं। शैलजा ने इसी कमजोर नस पर हाथ रखते हुए सभी प्रकोष्ठ प्रमुखों को दो टूक कहा कि संगठन को केवल फाइलों और पदाधिकारियों की लंबी सूचियों में जिंदा नहीं रखा जा सकता। उन्होंने सबसे पहले सभी इकाइयों को अपनी-अपनी कार्यकारिणी तत्काल गठित करने का स्पष्ट निर्देश दिया, ताकि जिम्मेदारियां तय की जा सकें और जवाबदेही से कोई बच न सके।

संगठन के भीतर सबसे बड़ी बीमारी अक्सर यह देखने को मिलती है कि पद बांट दिए जाते हैं, लेकिन उन पदों पर बैठे लोगों को अपनी कार्ययोजना का अंदाजा तक नहीं होता। शैलजा ने इस ढर्रे को बदलने पर जोर दिया। उनका कहना था कि पदाधिकारी बनने के बाद अगर नेता जिलों और तहसीलों के दौरे नहीं करते, तो ऐसे पदों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। सभी प्रमुखों को प्रदेश भर में सघन दौरे करने, स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल बिठाने और जमीनी वास्तविकताओं को समझने के लिए सक्रिय रहने को कहा गया है। यह कवायद इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जब तक सहयोगी संगठन सक्रिय नहीं होंगे, तब तक मुख्य संगठन कभी भी पूरी ताकत के साथ किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन को आगे नहीं बढ़ा सकता।
बैठक के दौरान राजनीतिक एजेंडे और जनमुद्दों को लेकर जो दिशा तय की गई, वह आने वाले दिनों में कांग्रेस के आक्रामक तेवर की ओर इशारा करती है। शैलजा ने साफ कहा कि पार्टी को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लगाने के बजाय जनता से जुड़े सीधे सवालों को पकड़ना होगा। आज के दौर में जब आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक उदासीनता से जूझ रहा है, तब विपक्ष का यह दायित्व बनता है कि वह इन समस्याओं को केवल भाषणों में न समेटे, बल्कि उनके समाधान के लिए सड़क पर उतरकर एक जन-आंदोलन खड़ा करे। उन्होंने विशेष रूप से वंचित वर्गों और दलितों के साथ हो रहे अन्याय, महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों और नौजवानों के सामने खड़े रोजगार के गहरे संकट को केंद्र में रखकर जनता के बीच जाने की हिदायत दी।
युवाओं और महिलाओं का मुद्दा आज के दौर में किसी भी चुनाव की दिशा तय करने की ताकत रखता है। शैलजा का मानना है कि जब तक कांग्रेस इन दोनों वर्गों का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं होगी, तब तक चुनावी वैतरणी पार करना नामुमकिन रहेगा। इसलिए पार्टी कार्यकर्ताओं को यह समझाया गया है कि वे सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियां जारी करके अपनी जिम्मेदारी पूरी न समझें, बल्कि पीड़ित परिवारों के पास जाएं, बेरोजगार युवाओं के साथ संवाद करें और जहां भी अन्याय हो, वहां सबसे पहले खड़े नजर आएं। जनता जब यह महसूस करेगी कि कांग्रेस उसके संकट के समय साथ खड़ी है, तभी जाकर वह मतदान केंद्र पर पार्टी के पक्ष में बटन दबाने का मन बनाएगी।
प्रकोष्ठों के मंथन के बाद उपाध्यक्षों, महामंत्रियों और सचिवों की जो बैठक हुई, उसमें रणनीति का दायरा और विस्तृत हो गया। यहां चर्चा का मुख्य केंद्र चुनावी गणित, आंतरिक एकजुटता और बूथ स्तर का प्रबंधन था। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस दौरान जो बात रखी, वह कांग्रेस की पारंपरिक राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी और ताकत दोनों को उजागर करती है। गोदियाल ने बहुत व्यावहारिक लहजे में कहा कि कोई भी चुनाव किसी एक नेता के चेहरे या सिर्फ मंच से दी गई तकरीरों से नहीं जीता जा सकता। जीत की असली बुनियाद वे कार्यकर्ता होते हैं जो बिना किसी पद की लालसा के दिन-रात पार्टी के लिए पसीना बहाते हैं।
गोदियाल ने पदाधिकारियों को नसीहत दी कि वे गुटबाजी और आपसी खींचतान को पूरी तरह भुलाकर एक सूत्र में बंधें। राजनीति में अक्सर यह देखा जाता है कि बड़े नेताओं के आपसी मतभेद नीचे के कार्यकर्ताओं तक पहुंचकर संगठन को भीतर से खोखला कर देते हैं। इस बैठक में इसी दरार को पाटने की पुरजोर कोशिश की गई। पदाधिकारियों से कहा गया कि वे अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों से बाहर निकलें, गांव-गांव जाएं और हर एक बूथ पर ऐसे समर्पित लोगों की टोली तैयार करें जो मतदान के दिन तक हर मतदाता से व्यक्तिगत संपर्क बनाए रख सके। आधुनिक चुनावी प्रबंधन में बूथ स्तर की तैयारी ही किसी भी दल का असली सुरक्षा कवच होती है, और कांग्रेस अब इसी बुनियादी सिद्धांत पर लौटने की कोशिश कर रही है।
कुल मिलाकर, प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में हुआ यह मंथन केवल एक औपचारिक बैठक न रहकर पार्टी के लिए एक आत्ममंथन का मंच बन गया। कुमारी शैलजा की स्पष्टवादिता और गणेश गोदियाल की व्यावहारिक सोच ने पार्टी कैडर को यह समझाने की कोशिश की है कि सत्ता पक्ष की मजबूत मशीनरी से मुकाबला करने के लिए केवल बयानों की धार काफी नहीं है, बल्कि उसके लिए संगठनात्मक अनुशासन, लगातार जनसंपर्क और जनता के दर्द के प्रति ईमानदार संवेदनशीलता की जरूरत है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि बैठक में लिए गए इन कड़े फैसलों को पदाधिकारी कितनी निष्ठा से जमीन पर उतारते हैं, क्योंकि पार्टी का चुनावी भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि वह बंद कमरों के प्रस्तावों को धरातल की हकीकत में कितना बदल पाती है।








