Uttarakhand News: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की धरती जब पारंपरिक लोक धुनों, रंग-बिरंगे परिधानों और सामाजिक उल्लास से सराबोर होती है, तो देवभूमि की सांस्कृतिक विविधता का एक बेहद जीवंत और आत्मीय रूप निखर कर सामने आता है। भाद्रपद मास के पावन अवसर पर आयोजित गोर्खाली महिला हरितालिका तीज उत्सव ने इस बार केवल धार्मिक आस्था का ही प्रकटीकरण नहीं किया, बल्कि इसने हिमालयी समाज की उस अटूट एकता, ऐतिहासिक शौर्य और सांस्कृतिक चेतना को भी एक साझा मंच पर लाकर खड़ा कर दिया जो सदियों से इस राज्य की पहचान रही है। देहरादून में आयोजित इस भव्य और गरिमामय कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्य अतिथि के रूप में प्रतिभाग किया। पारंपरिक वेशभूषा में सजी माताओं और बहनों के बीच पहुंचकर मुख्यमंत्री ने न केवल इस उत्सव की खुशियों को साझा किया, बल्कि गोर्खाली समाज की ऐतिहासिक धरोहर और वर्तमान विकास में उनकी भागीदारी को रेखांकित करते हुए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी कीं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस अवसर पर पूरे गोर्खाली समुदाय को हरितालिका तीज की हार्दिक बधाई देते हुए सभी के सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य की मंगलकामना की। उन्होंने समाज के जनमानस से सीधा संवाद करते हुए एक बड़ी और ऐतिहासिक घोषणा की कि भविष्य में गोर्खाली हरितालिका तीज उत्सव को राज्य सरकार के स्तर पर और अधिक भव्य, व्यापक और सुव्यवस्थित रूप से आयोजित किया जाएगा। सरकार का यह कदम स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं में बंधी नहीं है, बल्कि यहां रच-बस चुके हर समुदाय की लोक-परंपरा को राज्य की साझी धरोहर मानकर उसे सहेजना और आगे बढ़ाना शासन की प्राथमिकताओं में शामिल है। जब पारंपरिक पर्वों को राजकीय स्तर पर प्रोत्साहन मिलता है, तो न केवल समाज का आत्मविश्वास बढ़ता है बल्कि आने वाली युवा पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ने में गर्व का अनुभव करती है।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने हरितालिका तीज के आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व पर गहराई से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह पावन पर्व आदि शक्ति मां पार्वती की उस कठोर तपस्या, अडिग विश्वास, समर्पण और आत्मबल का साक्षात प्रतीक है, जिसके बल पर उन्होंने देवाधिदेव महादेव को प्राप्त किया था। यह केवल उपवास और पूजा-अर्चना का दिन नहीं है, बल्कि यह पर्व हर मनुष्य को अपने संकल्प पर अडिग रहने, जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अटूट आस्था बनाए रखने और अपने उदात्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निरंतर समर्पित भाव से आगे बढ़ने की आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। हरितालिका तीज का यह संदेश आज के आधुनिक दौर में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जहां भौतिक चकाचौंध के बीच जीवन मूल्यों और मानसिक दृढ़ता की सबसे अधिक आवश्यकता महसूस की जाती है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में लोक-संस्कृति के संरक्षण की बात करते हुए मुख्यमंत्री ने महिलाओं की अद्वितीय भूमिका को नमन किया। उन्होंने बहुत ही संजीदगी से कहा कि हमारी माताएं और बहनें समाज की वास्तविक संवाहक हैं। वे केवल परिवार का पालन-पोषण ही नहीं करतीं, बल्कि वे संस्कारों, भाषा, पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीतों और नैतिक मूल्यों की सबसे बड़ी और स्वाभाविक संरक्षक हैं। यदि आज के इस तीव्र गति से बदलते दौर में भी गोर्खाली समुदाय की समृद्ध भाषा, खान-पान और सांस्कृतिक विशिष्टताएं अपनी मूल सुगंध के साथ जीवित हैं, तो इसका सारा श्रेय उन माताओं को जाता है जिन्होंने आधुनिकता के प्रवाह के बीच भी अपनी संतानों को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़कर रखा है। तीज जैसे पारंपरिक मेले और सांस्कृतिक उत्सव दरअसल वे जीवन रेखाएं हैं जो एक पीढ़ी के अनुभवों और संस्कारों को दूसरी पीढ़ी के हाथों में सहजता से सौंप देती हैं।
मुख्यमंत्री धामी ने गोर्खाली समाज के उस गौरवशाली इतिहास का विशेष रूप से उल्लेख किया जिस पर पूरे राष्ट्र को गर्व है। उन्होंने कहा कि गोर्खा नाम सुनते ही जेहन में वीरता, अदम्य साहस, कर्तव्यनिष्ठा, असाधारण परिश्रम और राष्ट्र के प्रति निःस्वार्थ समर्पण की तस्वीर उभर आती है। भारतीय सेना के इतिहास का कोई भी पन्ना गोर्खा वीरों के बलिदान और पराक्रम के उल्लेख के बिना पूरा नहीं हो सकता। बर्फ से ढकी दुर्गम चोटियों से लेकर तपते रेगिस्तानों तक, देश की सीमाओं की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए गोर्खा सैनिकों ने सदैव अपने प्राणों की बाजी लगाई है। उनकी ‘कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो’ यानी कायर बनकर जीने से मरना बेहतर है की भावना केवल एक नारा नहीं, बल्कि उनके खून में रचा-बसा जीवन दर्शन है, जिसका सम्मान हर भारतीय करता है।
सैन्य पराक्रम के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड के नवनिर्माण और विकास यात्रा में गोर्खाली समुदाय के समग्र योगदान की भी मुक्तकंठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि यह समाज केवल सीमा पर बंदूक थामकर ही देश सेवा नहीं करता, बल्कि राज्य के सामाजिक, बौद्धिक और आर्थिक जीवन में भी इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। शिक्षा का क्षेत्र हो, खेलकूद के मैदान हों, कला, साहित्य या फिर निस्वार्थ समाज सेवा, गोर्खाली समुदाय के प्रबुद्धजनों, युवाओं और महिलाओं ने अपनी कड़ी मेहनत, अनुशासन और निष्ठा के बल पर हर जगह अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। राज्य के विभिन्न जनपदों में इस समाज के लोगों ने शांतिप्रिय, कानून का पालन करने वाले और प्रगतिशील नागरिक के रूप में उत्तराखंड के ताने-बाने को मजबूत करने में अतुलनीय योगदान दिया है।
इस अवसर पर एक और अत्यंत भावुक और ऐतिहासिक क्षण तब सामने आया जब मुख्यमंत्री ने मसूरी विधानसभा क्षेत्र में अमर शहीद कप्तान दल बहादुर थापा की पावन स्मृति में बनाए जाने वाले ‘आजाद हिन्द फौज शहीद द्वार’ के शिलान्यास की जानकारी साझा की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिन्द फौज में कप्तान दल बहादुर थापा जैसे वीर सेनानियों ने स्वाधीनता संग्राम की वेदी पर जो सर्वोच्च बलिदान दिया था, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। मुख्यमंत्री ने भावुक होते हुए कहा कि यह भव्य शहीद द्वार केवल ईंट और गारे से बना कोई भौतिक ढांचा नहीं होगा, बल्कि यह गोर्खा समाज के त्याग, अप्रतिम शौर्य और राष्ट्रभक्ति का एक अमर प्रतीक बनकर आने वाली सदियों तक खड़ा रहेगा। यह द्वार हर उस राहगीर, नौजवान और छात्र को यह याद दिलाएगा कि जिस स्वतंत्र भारत की हवा में हम आज सांस ले रहे हैं, उसकी नींव में हमारे वीर पूर्वजों का अनमोल रक्त समाया हुआ है।
देहरादून का यह हरितालिका तीज उत्सव अंततः केवल एक दिन का समारोह बनकर नहीं रहा, बल्कि यह लोक-संस्कृति के सम्मान, सैन्य परंपराओं के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक समरसता के एक नए युग का सूत्रधार बन गया। मुख्यमंत्री के इस कार्यक्रम में पहुंचने और समुदाय की ऐतिहासिक धरोहर को राजकीय संरक्षण और सम्मान देने की पहल ने उपस्थित जनसमूह के भीतर एक नया उत्साह भर दिया। इस पूरे आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि विकास की असली सार्थकता केवल सड़कों और भवनों के निर्माण में नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग के स्वाभिमान, उसकी अनूठी परंपराओं और उसके ऐतिहासिक बलिदानों को संजोकर उन्हें साथ लेकर चलने में ही देवभूमि उत्तराखंड का स्वर्णिम भविष्य सुरक्षित है।

मुख्यमंत्री ने भारत और नेपाल के आत्मीय संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच केवल पड़ोसी देशों का संबंध नहीं, बल्कि सदियों पुराने सांस्कृतिक और पारिवारिक रिश्ते हैं। सीमांत क्षेत्र से होने के कारण उन्होंने भारत और नेपाल की साझा संस्कृति, आत्मीयता और परस्पर जुड़ाव को निकटता से अनुभव किया है। नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस कठिन समय में भारत नेपाल के साथ खड़ा है। उन्होंने आपदा प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना जताते हुए नेपाल के शीघ्र इस संकट से उबरने की कामना की।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मातृशक्ति का सशक्तीकरण राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। इसी दिशा में राज्य सरकार ने महिलाओं को सरकारी सेवाओं में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण प्रदान किया है। उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता लागू कर महिलाओं के अधिकारों को सशक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी व्यापक स्तर पर कार्य किया जा रहा है। प्रदेश में 3 लाख से अधिक महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बनकर न केवल आत्मनिर्भर हुई हैं, बल्कि अपने परिवार और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार मातृशक्ति के सशक्तीकरण और उनके कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।

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