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Uttarakhand News: मुख्यमंत्री ने ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की बैठक में दिए निर्देश

On: August 22, 2026 3:42 AM
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Uttarakhand News: मुख्यमंत्री ने ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की बैठक में दिए निर्देश
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Uttarakhand News: उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों की भौगोलिक बनावट जितनी मनोहारी और समृद्ध है, वहां का सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना उतना ही चुनौतीपूर्ण रहा है। राज्य गठन के समय से ही पहाड़ों से मैदानों की ओर आबादी का निरंतर विस्थापन एक गंभीर चिंता का विषय रहा। जब किसी गांव से युवा शक्ति रोजगार, स्वास्थ्य या शिक्षा के अभाव में शहर की ओर निकलती है, तो पीछे केवल खाली घर और बंजर खेत छूट जाते हैं। इस ऐतिहासिक चुनौती को बदलने और पहाड़ों में जीवन की नई ऊर्जा फूंकने के उद्देश्य से ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक अत्यंत स्पष्ट और व्यावहारिक दृष्टिकोण सामने रखा है। यह बैठक केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता भर नहीं थी, बल्कि इसमें इस बात पर गहन मंथन किया गया कि किस प्रकार शासन की नीतियों और योजनाओं को कागजों से निकालकर सीधे गांवों की चौखट तक पहुंचाया जाए ताकि लोग अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित हों।

रिवर्स पलायन का विचार मात्र यह नहीं है कि बाहर गए लोगों को भावनात्मक आधार पर वापस बुलाया जाए, बल्कि इसका वास्तविक आधार यह होना चाहिए कि जब कोई व्यक्ति अपने गांव लौटे, तो उसे वहां सम्मानजनक आजीविका, सुरक्षित भविष्य और आधारभूत नागरिक सुविधाएं सुलभ हों। मुख्यमंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि सरकारी विभागों को अपनी कार्यशैली में व्यापक बदलाव लाने की आवश्यकता है। अक्सर देखा गया है कि विभिन्न विभाग अलग-अलग दायरे में काम करते हैं, जिससे एक ही गांव या लाभार्थी तक योजनाओं का समग्र लाभ नहीं पहुंच पाता। कृषि, बागवानी, पशुपालन, ग्राम्य विकास, पर्यटन और उद्योग विभागों को अब एक साझा मंच पर आकर समन्वित रूप से काम करना होगा। जब तक विभागीय योजनाएं आपस में जुड़कर एक पूर्ण आजीविका पैकेज का रूप नहीं लेंगी, तब तक पर्वतीय क्षेत्रों में सतत विकास का सपना अधूरा रहेगा।

प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण इस पूरी योजना की रीढ़ है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले साधारण नागरिकों, विशेषकर युवाओं और महिलाओं के लिए अक्सर सरकारी योजनाओं की पेचीदगियां और बैंकों की कागजी औपचारिकताएं एक बड़ी बाधा बन जाती हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्रामीणों को योजनाओं का लाभ लेने के लिए कार्यालयों या बैंकों के चक्कर काटने पर विवश न होना पड़े। इसके लिए आवश्यक है कि सूचना का प्रवाह सीधे ग्राम स्तर तक हो। जब किसी युवा को अपने गांव में ही यह पता होगा कि होमस्टे, मौन पालन, जड़ी-बूटी उत्पादन या लघु प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने के लिए कौन-सी योजना उपलब्ध है और उसका लाभ कैसे लिया जा सकता है, तभी वह स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाएगा। डिजिटल माध्यमों, प्रवासी पंचायतों और स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाले जागरूकता शिविरों के माध्यम से इस सूचना अंतराल को पाटना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

उत्तराखंड के पहाड़ों में प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का एक विशाल भंडार मौजूद है। यहां की जलवायु, उपजाऊ ढलानें और जैव विविधता ऐसे क्षेत्र हैं जहां स्थानीय आजीविका के अनेक रास्ते खुलते हैं। मोटे अनाज जैसे मंडुवा, झंगोरा, दालों में गहत, भट्ट और प्रसिद्ध पहाड़ी राजमा, साथ ही तेजपात, कंडाली, माल्टा और सेब जैसे उत्पाद अपनी शुद्धता और पौष्टिकता के लिए विशिष्ट पहचान रखते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन उत्पादों को केवल स्थानीय स्तर पर न बेचा जाए, बल्कि आधुनिक पैकेजिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और प्रभावी ब्रांडिंग के साथ राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जाए। जब स्थानीय किसान और उत्पादक समूह अपने उत्पाद का सही मूल्य पाएंगे, तो खेती और बागवानी फिर से एक लाभप्रद व्यवसाय के रूप में स्थापित होगी, जिससे युवाओं का रुझान जमीन से जुड़े कार्यों की ओर बढ़ेगा।

पर्यटन क्षेत्र उत्तराखंड की आर्थिकी का मुख्य आधार रहा है, लेकिन अब समय आ गया है कि पर्यटन को केवल बड़े शहरों या प्रमुख तीर्थस्थलों तक सीमित न रखकर दूरस्थ गांवों तक ले जाया जाए। होमस्टे योजना ने इस दिशा में एक नई क्रांति की शुरुआत की है। जब कोई पर्यटक किसी सुदूर पहाड़ी गांव में ठहरता है, वहां का पारंपरिक भोजन करता है और स्थानीय संस्कृति से रूबरू होता है, तो इससे सीधे तौर पर गांव के परिवारों को आय प्राप्त होती है। यह मॉडल न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को शक्ति देता है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल सतत पर्यटन को भी बढ़ावा देता है। इसके साथ ही एडवेंचर टूरिज्म, वेलनेस सेंटर और एग्रो-टूरिज्म जैसे नए आयामों को स्थानीय स्तर पर विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि युवा अपने ही क्षेत्र में रहकर टूर ऑपरेटर, गाइड और हॉस्पिटैलिटी उद्यमी बन सकें।

रिवर्स पलायन को टिकाऊ बनाने के लिए आजीविका के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी कनेक्टिविटी का सुदृढ़ होना अनिवार्य शर्त है। गांव में सड़क और इंटरनेट की उपलब्धता आज के समय में विकास का सबसे बड़ा पैमाना बन चुकी है। मुख्यमंत्री के विजन के अनुरूप पर्वतीय अंचलों में मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है, जिससे गांव में बैठा युवा वर्क फ्रॉम होम या ई-कॉमर्स के माध्यम से दुनिया भर के ग्राहकों से जुड़ सकता है। टेलीमेडिसिन सेवाओं का विस्तार और ग्रामीण विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था उन परिवारों को वापस अपने गांव में बसने का हौसला देती है जो केवल बच्चों की पढ़ाई या बुजुर्गों के इलाज के लिए शहरों की ओर गए थे।

ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग द्वारा विभिन्न जिलों में आयोजित की जाने वाली प्रवासी पंचायतें इस अभियान में सेतु का काम कर रही हैं। इन पंचायतों के माध्यम से उन प्रवासियों से सीधा संवाद स्थापित हो रहा है जो शहरों में अपनी पहचान बना चुके हैं लेकिन अपने पैतृक गांव के लिए कुछ करना चाहते हैं। कई ऐसे युवा हैं जो महानगरों के कॉर्पोरेट जीवन को छोड़कर अपने गांव लौटे हैं और वहां आधुनिक कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और पर्यटन के क्षेत्र में सफल प्रयोग कर रहे हैं। आयोग का कार्य ऐसे सफल मॉडलों को पहचानना, उन्हें प्रोत्साहित करना और अन्य ग्रामीणों के सामने प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करना है।

उत्तराखंड के विकास का यह नया मॉडल आत्मनिर्भरता, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक संरक्षण का संगम है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा दिए गए निर्देशों का मूल भाव यही है कि नीतियां केवल फाइलों में न सिमटें, बल्कि उनका वास्तविक प्रभाव धरातल पर नजर आए। जब सरकारी मशीनरी जनोन्मुख होकर काम करेगी, प्रक्रियाओं में पारदर्शिता आएगी और स्थानीय संसाधनों को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ा जाएगा, तब पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी सचमुच पहाड़ के ही काम आएगी। यह समन्वित प्रयास निश्चित रूप से पर्वतीय गांवों में खाली पड़े आंगनों को फिर से आबाद करेगा और उत्तराखंड को एक सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

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