Uttarakhand Pension: उत्तराखंड में लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी लोक-कल्याणकारी सरकार की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वह समाज के सबसे कमजोर, उपेक्षित और अभावग्रस्त नागरिकों के प्रति कितनी संवेदनशील है। जब शासन की नीतियां केवल कागजों या बैठकों तक सीमित न रहकर सीधे उन लोगों के जीवन को संवारने लगें जिन्हें सहारे की सबसे अधिक जरूरत है, तब विकास का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। देवभूमि उत्तराखंड में इस संवेदनशील शासन का प्रत्यक्ष उदाहरण मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में देखने को मिला, जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक एकल क्लिक के माध्यम से प्रदेश के लाखों जरूरतमंदों के बैंक खातों में पेंशन राशि अंतरित की। यह आयोजन केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता या नियमित बजट वितरण भर नहीं था, बल्कि यह पर्वतीय और दूरदराज के अंचलों में जीवन यापन कर रहे बुजुर्गों, बेसहारा महिलाओं, दिव्यांगजनों और वंचित तबकों के प्रति राज्य सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का जीवंत प्रमाण था।
समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित विभिन्न सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं के अंतर्गत माह अगस्त की पेंशन किस्त सीधे 9 लाख 91 हजार 914 लाभार्थियों के खातों में पहुंचाई गई। कुल 147 करोड़ 05 लाख 51 हजार रुपये की यह भारी-भरकम राशि बिना किसी बिचौलिए या अनावश्यक विलंब के पारदर्शी डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंची। डिजिटल सशक्तिकरण और पारदर्शिता का युग आज का समय प्रशासनिक गति और तकनीक के समायोजन का है। पहले जहां पेंशनरों को अपनी हक की राशि पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे, घंटों कतारों में खड़ा रहना पड़ता था और कभी-कभी महीनों का इंतजार करना पड़ता था, वहीं अब डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर अर्थात प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने पूरी व्यवस्था का कायाकल्प कर दिया है। मुख्यमंत्री के हाथों एक बटन दबते ही प्रदेश के कोने-कोने में बसे लाखों नागरिकों के बैंक खातों में धनराशि का जमा होना इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड में ई-गवर्नेंस केवल एक नारा नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बन चुका है। इस प्रक्रिया ने न केवल बिचौलियों और अनुचित कटौतियों की संभावना को जड़ से समाप्त किया है, बल्कि लाभार्थियों में शासन के प्रति एक गहरा विश्वास भी पैदा किया है। बुजुर्गों को अब अपनी दवाइयों, दैनिक आवश्यकताओं या बुनियादी खर्चों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। निश्चित समय पर मिलने वाली यह सहायता उनके जीवन में आर्थिक संबल के साथ-साथ आत्मसम्मान की भावना भी भरती है।
संवेदनशीलता की नई मिसाल: पहचान पत्र संबंधी बाध्यताओं का मानवीय समाधान अक्सर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में तकनीकी औपचारिकताएं सबसे बड़ी रुकावट बन जाती हैं। सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों, अत्यधिक उम्र के कारण रेखाएं मिट जाने या शारीरिक अक्षमता के कारण कई बार पात्र नागरिकों के आवश्यक बायोमेट्रिक पहचान पत्र समय पर नहीं बन पाते या तकनीकी त्रुटि के कारण निरस्त हो जाते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस जमीनी वास्तविकता और मानवीय पीड़ा को गहराई से समझते हुए अधिकारियों को बेहद स्पष्ट और संवेदनशील निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि किसी पात्र व्यक्ति का अपरिहार्य कारणों से बायोमेट्रिक पहचान पत्र तैयार नहीं हो पा रहा है, तो उसे योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जाएगा। ऐसे सभी पात्र नागरिकों को चिन्हित कर उनके लिए विशेष रूप से खाता आधारित भुगतान प्रणाली सुनिश्चित की जाए। यह निर्देश शासन की उस संवेदनशीलता को दर्शाता है जहां नियम जनता के कल्याण के लिए बनाए जाते हैं, न कि जनता को नियमों की जटिलता में उलझाने के लिए। किसी भी कमजोर वर्ग के व्यक्ति को कागजी पेचीदगियों के चलते भूखा या बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता, और सरकार का यह रुख इस सिद्धांत को पूरी तरह स्थापित करता है।
वित्तीय संरचना और योजनाओं का व्यापक ताना-बाना इस वित्तीय हस्तांतरण के आंतरिक ढांचे पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर किस प्रकार इस सामाजिक सुरक्षा चक्र को सुदृढ़ कर रहे हैं। कुल 147 करोड़ 05 लाख 51 हजार रुपये के वितरण में लगभग 140 करोड़ 11 लाख रुपये का योगदान सीधे राज्य के अपने संसाधनों से हुआ है, जबकि केंद्र सरकार की हिस्सेदारी लगभग 6 करोड़ 94 लाख रुपये रही है। यह आंकड़ा इस तथ्य को उजागर करता है कि उत्तराखंड सरकार अपने सीमित वित्तीय संसाधनों के बावजूद सामाजिक सुरक्षा पर भारी निवेश करने से पीछे नहीं हट रही है। आच्छादित लाभार्थियों की संरचना भी व्यापक और समावेशी है। कुल 9 लाख 91 हजार 914 लाभार्थियों में से 2 लाख 14 हजार 711 लाभार्थी राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत लाभान्वित हुए हैं, जबकि 7 लाख 77 हजार 203 लाभार्थी विशुद्ध रूप से राज्य सरकार की कल्याणकारी नीतियों के तहत आच्छादित हैं। इस सुरक्षा तंत्र का दायरा अत्यंत विस्तृत है। इसमें केवल पारंपरिक वृद्धावस्था पेंशन ही शामिल नहीं है, बल्कि समाज के हर उपेक्षित वर्ग को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई गई हैं। इसके अंतर्गत वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, दिव्यांग पेंशन, किसान पेंशन, परित्यक्ता पेंशन, भरण-पोषण अनुदान, तीलू रौतेली विशेष पेंशन और बौना पेंशन जैसी योजनाएं संचालित की जा रही हैं। पर्वतीय राज्य की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए तीलू रौतेली पेंशन जैसी योजनाएं उन महिलाओं और नागरिकों के लिए जीवनरेखा सिद्ध हो रही हैं जिन्होंने विषम परिस्थितियों में अदम्य साहस दिखाया है अथवा जो कृषि एवं ग्रामीण कार्यों के दौरान दुर्घटनाग्रस्त होकर दिव्यांगता का शिकार हुए हैं।

नए चेहरों को मिला सुरक्षा का कवच सामाजिक सुरक्षा का यह दायरा स्थिर नहीं है, बल्कि यह निरंतर गतिशील और विस्तारशील है। राज्य सरकार लगातार नए पात्र व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें इस व्यवस्था से जोड़ रही है। अगस्त माह के दौरान ही विभिन्न पेंशन योजनाओं के तहत 5,605 नए लाभार्थियों को स्वीकृति प्रदान की गई। यह संख्या केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह 5,605 ऐसे परिवारों का प्रतिनिधित्व करती है जिनके घर में अब एक नियमित आर्थिक सहारा पहुंचेगा। इन नए स्वीकृत मामलों का वर्गीकरण भी समाज के कमजोर वर्गों की तात्कालिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा वृद्धजनों का है, जहां 3,945 नए वरिष्ठ नागरिकों को वृद्धावस्था पेंशन की स्वीकृति दी गई। इसके अतिरिक्त 1,000 बेसहारा महिलाओं को विधवा पेंशन, 416 विशेष रूप से सक्षम नागरिकों को दिव्यांग पेंशन, 106 मेहनतकश अन्नदाताओं को किसान पेंशन, 23 असहाय महिलाओं को परित्यक्ता पेंशन और 115 अत्यंत निर्धन बच्चों व आश्रितों को भरण-पोषण अनुदान की नई स्वीकृति प्रदान की गई है। नए लाभार्थियों को समय पर व्यवस्था से जोड़ना यह दर्शाता है कि राज्य का समाज कल्याण तंत्र सक्रियता से कार्य कर रहा है।
प्रशासनिक संवेदनशीलता और जवाबदेही पर बल कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने केवल आर्थिक आंकड़े ही प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि प्रशासनिक मशीनरी को अपनी कार्यशैली में आमूलचूल बदलाव लाने की हिदायत भी दी। उन्होंने उपस्थित विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया कि पेंशन योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन में आने वाली किसी भी व्यावहारिक समस्या का समाधान सहानुभूति और संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक विषमताएं, दूरस्थ गांव और कमजोर संचार व्यवस्थाएं कई बार ग्रामीण और अशिक्षित नागरिकों के लिए मुश्किलें खड़ी करती हैं। ऐसे में अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे वातानुकूलित दफ्तरों से बाहर निकलकर गांव-गांव तक पहुंचें, शिविर आयोजित करें और यह सुनिश्चित करें कि समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को अपना अधिकार पाने के लिए दर-दर न भटकना पड़े।
व्यवस्था को पारदर्शी, सरल और पूरी तरह लाभार्थी-केंद्रित बनाने की दिशा में निरंतर कदम उठाने पर बल दिया गया। राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत संवाद की तैयारी बैठक के दौरान सामाजिक सुरक्षा की भविष्य की योजनाओं और आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा भी साझा की गई। इसी क्रम में यह जानकारी दी गई कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आगामी 18 एवं 19 सितम्बर को नई दिल्ली के जनपथ स्थित डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में दो दिवसीय राष्ट्रीय विभागीय शिखर सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। यह राष्ट्रीय सम्मेलन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच सामाजिक न्याय, दिव्यांगजन सशक्तिकरण और वंचित वर्गों के कल्याण से जुड़ी प्रमुख प्राथमिकताओं, चुनौतियों और अभिनव प्रयोगों पर गहन संवाद का मंच बनेगा।
उत्तराखंड जैसे विशेष भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए यह सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण होगा, जहां राज्य सरकार अपने अनुभवों, नवाचारों और पर्वतीय अंचल की विशिष्ट आवश्यकताओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर सकेगी। आत्मनिर्भरता और सम्मान की ओर बढ़ते कदम सामाजिक सुरक्षा पेंशन केवल एक मौद्रिक सहायता नहीं है, बल्कि यह राज्य के नागरिकों को यह विश्वास दिलाने का माध्यम है कि संकट या अक्षमता की घड़ी में उनकी सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी है। जब किसी असहाय बुजुर्ग, विधवा या दिव्यांग व्यक्ति को हर महीने निश्चित समय पर सम्मानजनक राशि मिलती है, तो उनका मनोबल बढ़ता है और वे समाज में गरिमा के साथ जीवन व्यतीत कर पाते हैं। उत्तराखंड सरकार द्वारा तकनीक का सदुपयोग करते हुए एक क्लिक में करोड़ों रुपये की सहायता का सीधा हस्तांतरण, नए लाभार्थियों का त्वरित जुड़ाव और तकनीकी अड़चनों को दूर करने के लिए खाता आधारित भुगतान की वैकल्पिक व्यवस्था वास्तव में सुशासन के उस संकल्प को चरितार्थ करती है जिसमें हर नागरिक का हित सर्वोपरि है। यह प्रयास देवभूमि को न केवल आध्यात्मिक रूप से, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी एक आदर्श एवं संवेदनशील राज्य बनाने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हो रहा है।
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