Uttarakhand Chief Secretary: राज्य में विधि व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने, बढ़ते तकनीकी अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण पाने और आम नागरिक को त्वरित एवं पारदर्शी न्याय दिलाने के उद्देश्य से शासन स्तर पर निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में सचिवालय में मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन की अध्यक्षता में सोमवार को पुलिस विभाग की एक महत्वपूर्ण और विस्तृत समीक्षा बैठक संपन्न हुई। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु पुलिसिंग को पारंपरिक कार्यप्रणाली से बाहर निकालकर अत्याधुनिक तकनीक, डेटा एकीकरण और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ना रहा। शासन का स्पष्ट मानना है कि वर्तमान समय में अपराध की प्रकृति जितनी तेजी से बदल रही है, पुलिस तंत्र की तैयारी उससे कहीं अधिक अग्रगामी होनी चाहिए।
समीक्षा के आरंभ में मुख्य सचिव ने पुलिस विभाग द्वारा राज्य भर में कानून व्यवस्था बनाए रखने तथा जनसुरक्षा के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों की सराहना की। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि अब समय आ गया है जब पुलिस बल को केवल प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई तक सीमित न रहकर निवारक और तकनीकी रूप से सुसज्जित बल के रूप में कार्य करना होगा। मानव एवं बाल तस्करी जैसे संवेदनशील अपराधों पर अंकुश लगाना, साइबर अपराधियों के सिंडिकेट को ध्वस्त करना, नशे के अवैध कारोबार पर चौतरफा प्रहार करना, जांच प्रक्रियाओं में फॉरेंसिक और डिजिटल उपकरणों का व्यापक प्रयोग सुनिश्चित करना तथा पुलिस थानों के भौतिक परिवेश को व्यवस्थित बनाना इस नई कार्ययोजना के प्रमुख स्तंभ हैं।
मानव तस्करी और गुमशुदा बच्चों का विषय किसी भी संवेदनशील समाज और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर चिंता का कारण होता है। बैठक में इस मुद्दे पर बहुत गंभीरता से विचार किया गया। मुख्य सचिव ने कड़े निर्देश दिए कि एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मामलों में केवल मैदानी जनपदों तक ही निगरानी सीमित न रहे, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में भी उतनी ही सघनता और संवेदनशीलता के साथ प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अक्सर देखा गया है कि दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों से युवतियों और बच्चों को बहला-फुसलाकर बाहर ले जाने के मामले सामने आते हैं, जहां तत्काल सूचना तंत्र कमजोर होने का लाभ तस्कर उठा लेते हैं। इस अंतर को समाप्त करने के लिए पर्वतीय जिलों की पुलिस इकाइयों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने को कहा गया है।
प्रशासनिक स्तर पर सूचनाओं के आदान-प्रदान में आने वाली तकनीकी बाधाओं को दूर करने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस विभाग के पोर्टलों को तत्काल आपस में जोड़ने का निर्देश दिया गया है। एपीआई इंटीग्रेशन के माध्यम से दोनों विभागों के डेटाबेस को एकीकृत किया जाएगा ताकि सूचनाओं में किसी भी प्रकार का दोहराव या विसंगति न रहे। कई बार विभाग स्तर पर तालमेल की कमी के चलते महत्वपूर्ण आंकड़े समय पर साझा नहीं हो पाते, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन प्रभावित होते हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए दोनों विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने हेतु तत्काल प्रभाव से नोडल अधिकारियों की तैनाती सुनिश्चित करने के आदेश जारी किए गए हैं।
लापता बालिकाओं और नाबालिग बच्चों को जल्द से जल्द खोजने के लिए केवल नियमित जांच प्रक्रिया पर निर्भर रहने के बजाय समर्पित टीमों का गठन किया जाएगा। इसके लिए एक सुदृढ़ मैकेनिज्म तैयार करने और अनट्रेस्ड बच्चों तथा महिलाओं की खोज के लिए राज्यव्यापी विशेष अभियान चलाने पर जोर दिया गया। पूर्व में संचालित ऑपरेशन स्माइल के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, किंतु अब इसके नवीनतम आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए मानव एवं बाल तस्करी के प्रत्येक मामले का केस-वाइज अध्ययन करने के निर्देश दिए गए हैं। संगठित तस्करी नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचने के लिए अपराध के ट्रेंड, रूट और इसमें शामिल गिरोहों की पहचान करना अनिवार्य कर दिया गया है।
तस्करी के शिकार पीड़ितों के केवल रेस्क्यू तक ही पुलिस की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती, बल्कि उनके पुनर्वास और सामान्य जीवन में वापसी की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। मुख्य सचिव ने इस मानवीय पहलू पर विशेष बल देते हुए कहा कि रेस्क्यू के बाद बच्चों और महिलाओं के सुरक्षित आश्रय, काउंसिलिंग और उचित पुनर्वास पर पूरी संवेदनशीलता से ध्यान दिया जाए। दूसरे राज्यों से जुड़े मामलों में उन राज्यों के पुलिस व बाल संरक्षण तंत्र से तत्काल संपर्क स्थापित कर पीड़ितों को उनके वैध अभिभावकों तक सुरक्षित पहुंचाने की पूरी व्यवस्था की निगरानी जिला स्तर पर गठित समर्पित कमेटियों द्वारा की जाएगी।

आज की दुनिया में भौगोलिक सीमाओं के पार बैठकर इंटरनेट के माध्यम से किए जाने वाले वित्तीय और सामाजिक साइबर अपराध समाज के हर वर्ग के लिए सिरदर्द बन चुके हैं। बैठक में साइबर पुलिसिंग के ढांचे को नए सिरे से मजबूत करने पर विशेष चर्चा हुई। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि साइबर अपराधों की जांच के लिए केवल पारंपरिक पुलिसकर्मियों पर निर्भर रहने के बजाय पुलिसिंग की कार्यबल क्षमता में साइबर विशेषज्ञों और तकनीकी जानकारों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। बैंकिंग धोखाधड़ी के जटिल मामलों को सुलझाने के लिए बैंकिंग और फिनटेक क्षेत्र के विशेषज्ञों को इस जांच प्रणाली का अभिन्न अंग बनाने की रूपरेखा तैयार की जा रही है, जिससे ठगी की रकम को तुरंत ब्लॉक करने और अपराधियों के डिजिटल फुटप्रिंट्स को पकड़ने में लगने वाले समय को न्यूनतम किया जा सके।
नशा मुक्ति की दिशा में उत्तराखंड सरकार द्वारा संचालित अभियानों की समीक्षा करते हुए एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स की कार्यप्रणाली को और अधिक आक्रामक बनाने के निर्देश दिए गए। नशीले पदार्थों की तस्करी न केवल युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेलती है बल्कि यह संगठित अपराध की रीढ़ भी बनती है। इस समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य, आबकारी, शिक्षा और समाज कल्याण विभागों के साथ टास्क फोर्स के सामंजस्य को अनिवार्य माना गया है। नार्को समन्वय केंद्र की आगामी बैठक में इस पूरे नेटवर्क को तोड़ने, अवैध तस्करी के रूटों को सील करने और नशा मुक्ति के व्यापक जन-जागरूकता कार्यक्रमों की विस्तृत प्रस्तुति प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
जांच की गुणवत्ता किसी भी आपराधिक न्याय प्रणाली की रीढ़ होती है। मुख्य सचिव ने अनुसंधान में अत्याधुनिक फॉरेंसिक और वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग को अनिवार्य बनाने की बात कही। जांच अधिकारियों को उच्च गुणवत्ता वाली आधुनिक इन्वेस्टिगेशन किट्स उपलब्ध कराई जाएंगी ताकि अपराध स्थल से साक्ष्य संकलन में कोई वैज्ञानिक चूक न रहे। जिन पुलिस थानों में एफआईआर की संख्या अत्यधिक होती है, वहां कानून व्यवस्था बनाए रखने और अपराध की जांच करने वाले कर्मियों पर अत्यधिक बोझ होता है। इस समस्या के व्यावहारिक समाधान के लिए अत्यधिक कार्यभार वाले थानों में स्वतंत्र इन्वेस्टिगेशन विंग स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे विवेचना अधिकारी केवल साक्ष्य संकलन और चार्जशीट तैयार करने पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
डिजिटल पुलिसिंग के पारदर्शी संचालन के अंतर्गत ई-एफआईआर प्रणाली की प्रभावशीलता की भी जांच की गई। मुख्य सचिव ने कहा कि नागरिकों द्वारा ऑनलाइन दर्ज कराई जाने वाली शिकायतों अथवा ई-एफआईआर के रिजेक्शन के कारणों का गहराई से विश्लेषण और क्रॉस-वेरिफिकेशन किया जाना आवश्यक है, जिससे किसी भी पीड़ित के साथ अन्याय न हो। इसके साथ ही न्यायश्रुति वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म, विधि विज्ञान प्रयोगशालाओं के डिजिटल नेटवर्क, थाना मालखाना प्रबंधन और आपातकालीन सेवा डायल 112 को पूर्णतः एकीकृत और लाइव करने की प्रक्रिया को तेज किया जाएगा। सम्मन तामील कराने की पारंपरिक धीमी प्रक्रिया को बदलकर ई-सम्मन के अधिकाधिक उपयोग को बढ़ावा देने का लक्ष्य तय किया गया है।

न्यायिक और पुलिसिंग तंत्र को जोड़ने वाले इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के दूसरे चरण की समीक्षा के दौरान यह पाया गया कि कुछ दुर्गम और पर्वतीय क्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी के कारण डिजिटल सेवाओं का उपयोग बाधित होता है। इस पर मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि इन क्षेत्रों में नेटवर्क बैंडविड्थ बढ़ाने के लिए टेलीकॉम प्रदाताओं के साथ समन्वय कर तत्काल तकनीकी समाधान किया जाए, ताकि डिजिटल पुलिसिंग की सेवाएं राज्य के अंतिम छोर तक निर्बाध रूप से काम कर सकें।
बैठक का एक अत्यंत व्यावहारिक और महत्वपूर्ण पहलू थानों के भौतिक स्पेस प्रबंधन से जुड़ा रहा। अमूमन सभी थानों में वर्षों से लावारिस, मुकदमों से जुड़ी या सीज की गई गाड़ियों का भारी जमावड़ा रहता है, जिससे थाने कबाड़खानों जैसे दिखने लगते हैं और पुलिसकर्मियों तथा आगंतुकों के लिए बैठने तक की जगह नहीं बचती। मुख्य सचिव ने इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकालते हुए थानों में सीज वाहनों के वैज्ञानिक और डिजिटल निस्तारण की व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए। प्रत्येक सीज वाहन का डिजिटल डेटाबेस और ऑनलाइन इन्वेंट्री तैयार कर उन्हें कैंपेन मोड में कानूनी प्रक्रियाओं के तहत त्वरित गति से नीलाम या नष्ट कराया जाएगा। सभी जनपदों के पुलिस कप्तानों को इस अभियान की मासिक प्रगति रिपोर्ट शासन को भेजने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि थानों का परिसर स्वच्छ, व्यवस्थित और अधिक जनोन्मुख बनाया जा सके।
इस व्यापक समीक्षा से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि राज्य सरकार पुलिस विभाग को केवल बल प्रयोग करने वाली संस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक आधुनिक, तकनीक-सक्षम, त्वरित और नागरिक-हितैषी सेवा प्रदाता के रूप में विकसित करने के लिए पूरी तरह संकल्पित है। विभागों के मध्य डेटा शेयरिंग, प्रशासनिक तालमेल, अत्याधुनिक फॉरेंसिक टूल्स और मानवीय दृष्टिकोण का यह सम्मिलित प्रयास राज्य में अपराध नियंत्रण और न्याय वितरण प्रणाली को एक नई दिशा प्रदान करेगा।
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