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Uttarakhand Tiger Reserve: मोहान-बिनसर के लिए आउटसाइड टाइगर रिजर्व का प्रस्ताव

On: August 11, 2026 2:39 PM
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Uttarakhand Tiger Reserve: मोहान-बिनसर के लिए आउटसाइड टाइगर रिजर्व का प्रस्ताव
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Binsar Mohan Tiger Reserve News: उत्तराखंड के खूबसूरत पर्वतीय जनपदों में शुमार अल्मोड़ा का प्राकृतिक वातावरण हमेशा से अपनी जैव विविधता और समृद्ध वनस्पतियों के लिए विख्यात रहा है। हालांकि, हाल के दिनों में यहां के पारिस्थितिकी तंत्र में एक बड़ा और सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। अल्मोड़ा जिले के प्रसिद्ध बिनसर वन्यजीव अभयारण्य और कॉर्बेट नेशनल पार्क से सटे मोहान वन क्षेत्र में बाघों (टाइगर) की सक्रियता में अचानक वृद्धि दर्ज की गई है। एक समय था जब मध्य हिमालयी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बाघों की मौजूदगी अपवाद मानी जाती थी, लेकिन अब इन शांत वादियों में बाघों की धमक ने वन्यजीव विशेषज्ञों, स्थानीय निवासियों और पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जंगल की पगडंडियों पर घूमते बाघों के दृश्यों ने जहां एक तरफ क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र की समृद्धि को उजागर किया है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय आबादी के बीच सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी पैदा कर दी हैं।

बिनसर वन्यजीव अभयारण्य में बीते दिनों सफारी पर निकले पर्यटकों ने जंगल के बीच से शांतिपूर्वक गुजरते एक विशालकाय बाघ को अपने कैमरों में कैद कर लिया। यह कोई छिटपुट घटना नहीं थी, क्योंकि इसके तुरंत बाद वन विभाग द्वारा अभयारण्य के भीतर लगाए गए स्वचालित ट्रैप कैमरों में भी बाघ की सुस्पष्ट तस्वीरें और गतिविधियां रिकॉर्ड हुईं। बिनसर की घनी देवदार और बांज की झाड़ियों के बीच बाघ की मौजूदगी की पुष्टि ने यह साबित कर दिया है कि वह इस क्षेत्र को केवल गुजरने का रास्ता नहीं मान रहा, बल्कि इसे अपने नए ठिकाने के रूप में अपना रहा है।

वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर स्थित इस अभयारण्य में बाघ का बसना इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन और वासस्थल के प्राकृतिक विकास के कारण बाघ अब नए भौगोलिक क्षेत्रों में अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे हैं। मोहान के तड़म क्षेत्र में दहशत और ग्रामीणों का बढ़ता सतर्कता स्तरबिनसर अभयारण्य के साथ-साथ कॉर्बेट नेशनल पार्क की सीमा से लगे अल्मोड़ा वन प्रभाग के मोहान क्षेत्र में भी स्थिति तेजी से बदल रही है। विशेषकर मोहान रेंज के अंतर्गत आने वाले तड़म इलाके में ग्रामीणों ने एक बार फिर बाघ की आवाजाही को बहुत करीब से देखा और उसे अपने मोबाइल कैमरों में कैद किया। कॉर्बेट का समीपवर्ती इलाका होने के कारण मोहान हमेशा से वन्यजीवों का गलियारा रहा है, लेकिन हाल के हफ्तों में तड़म गांव के आसपास बाघ की लगातार चहलकदमी ने ग्रामीणों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर दिया है। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में कैद होने को मजबूर हैं और मवेशियों को चराने के लिए जंगल जाने वाले ग्रामीण अब भारी आशंकाओं के बीच दिन बिता रहे हैं।

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क्षेत्र में बाघ की निरंतर आवाजाही ने स्थानीय निवासियों में भारी डर और असमंजस का माहौल बना दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और पशुपालन जीवनयापन का मुख्य आधार हैं, और ऐसे में आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास बाघ की मौजूदगी से मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) का खतरा कई गुना बढ़ गया है। ग्रामीणों की सुरक्षा और उनकी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए वन विभाग ने भी अपने गश्ती दल को हाई अलर्ट पर रख दिया है। संवेदनशील इलाकों में निगरानी टीमें दिन-रात गश्त कर रही हैं ताकि बाघ को आबादी वाले क्षेत्रों से दूर सुरक्षित वन क्षेत्र की ओर मोड़ा जा सके। वन कर्मियों द्वारा ग्रामीणों को भी समूह में बाहर निकलने, देर शाम अकेले जंगल के रास्ते न जाने और बच्चों व मवेशियों की सुरक्षा के विशेष उपाय करने की सलाह दी जा रही है।

वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया और ‘आउटसाइड टाइगर रिजर्व’ की ऐतिहासिक पहलबिनसर और मोहान क्षेत्रों में बाघों के इस बदलते व्यवहार और अनुकूल वातावरण को देखते हुए उत्तराखंड वन विभाग ने एक रणनीतिक कदम उठाया है। अल्मोड़ा के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) दीपक सिंह ने स्थिति की गंभीरता और संभावनाओं की जानकारी देते हुए बताया कि इन दोनों ही क्षेत्रों में बाघों के रहने के लिए आदर्श परिस्थितियां, प्रचुर शिकार और स्वच्छ जल स्रोत उपलब्ध हैं। इसी अनुकूल माहौल के कारण बाघ इन इलाकों की ओर आकर्षित हो रहे हैं और अपना स्थायी वास बना रहे हैं। इस प्राकृतिक बदलाव को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रबंधित करने के लिए वन विभाग ने एक दूरगामी योजना तैयार की है।

Video- Mdano news

प्रभागीय वनाधिकारी ने बताया कि मोहान और बिनसर क्षेत्र के वैज्ञानिक संरक्षण और बेहतर ट्रैकिंग प्रणाली स्थापित करने के उद्देश्य से भारत सरकार को ‘आउटसाइड टाइगर रिजर्व’ (Outside Tiger Reserve) का विस्तृत प्रस्ताव भेजा गया है। इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके जरिए पारंपरिक टाइगर रिजर्व की सीमाओं से बाहर मौजूद बाघों के संरक्षण के लिए विशेष बजट, तकनीकी संसाधन और समर्पित निगरानी तंत्र उपलब्ध कराया जा सकेगा। यदि भारत सरकार से इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है, तो संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बाघों के आवागमन वाले मार्गों (टाइगर कॉरिडोर्स) की सुरक्षा, उन्नत ट्रैप कैमरों की स्थापना, त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की तैनाती और मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के आधुनिक उपायों को बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकेगा।

भविष्य की राह: संतुलन, संरक्षण और स्थानीय समुदायों का सुरक्षित सहअस्तित्व’आउटसाइड टाइगर रिजर्व’ का प्रस्ताव केवल बाघों के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसानों और वन्यजीवों के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का एक नया अध्याय लिखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के दिशानिर्देशों के तहत यदि किसी गैर-संरक्षित वन क्षेत्र में बाघों की स्थायी आबादी पाई जाती है, तो वहां की स्थानीय पारिस्थितिकी और मानवीय बस्तियों के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य हो जाता है। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने से अल्मोड़ा वन प्रभाग को विशेष वित्तीय सहायता मिलेगी, जिसका उपयोग ग्रामीणों के नुकसान के त्वरित मुआवजे, सौर ऊर्जा चालित बाड़ लगाने, और गांव स्तर पर सतर्कता समितियों के गठन के लिए किया जा सकेगा।

बिनसर और मोहान में बाघों की बढ़ती मौजूदगी यह स्पष्ट करती है कि प्रकृति अपने खोए हुए संतुलन को पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर रही है। हालांकि, इस सफलता का असली परीक्षण इस बात में है कि वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर इस बदलाव को कैसे स्वीकार करते हैं। डीएफओ दीपक सिंह के अनुसार, वन विभाग की टीमें पूरे मुस्तैदी के साथ धरातल पर काम कर रही हैं ताकि पर्यटकों का रोमांच भी बना रहे, बाघों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो और सबसे महत्वपूर्ण रूप से स्थानीय निवासियों का जीवन पूरी तरह सुरक्षित रहे। भारत सरकार को भेजा गया यह प्रस्ताव यदि धरातल पर उतरता है, तो यह न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए गैर-संरक्षित क्षेत्रों में बाघ संरक्षण का एक बेहतरीन और अनुकरणीय मॉडल साबित होगा।

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