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Foreign languages: विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण देने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की जाएः मुख्य सचिव

On: October 15, 2026 6:34 AM
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Foreign languages: विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण देने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की जाएः मुख्य सचिव
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Foreign languages: उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों से लेकर मैदानी कस्बों तक आज एक ऐसा युवा वर्ग तैयार हो रहा है जिसके भीतर असीम ऊर्जा, प्रतिभा और आगे बढ़ने की गहरी ललक मौजूद है। किंतु अक्सर भौगोलिक विषमताओं और अंतरराष्ट्रीय संपर्क की कमी के चलते यह युवा वर्ग अपनी स्थानीय सीमाओं में बंधकर रह जाता है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो दुनिया भर के विकसित देशों में जहां एक ओर कार्यबल की भारी कमी महसूस की जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारत जैसे युवा राष्ट्र से दक्ष मानव संसाधन की मांग लगातार बढ़ रही है। इस अंतरराष्ट्रीय समीकरण में भाषा सबसे बड़ा सेतु बनकर उभरती है। यदि हमारे युवाओं के पास पेशेवर योग्यता के साथ-साथ किसी अंतरराष्ट्रीय भाषा की दक्षता भी जुड़ जाए, तो उनके लिए अवसरों के अनंत द्वार खुल सकते हैं। इसी दूरगामी सोच को धरातल पर उतारने के उद्देश्य से उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन ने सचिवालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए राज्य में विदेशी भाषाओं के प्रशिक्षण की एक सुदृढ़ और व्यापक कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। यह पहल मात्र एक शैक्षणिक नवाचार नहीं है, बल्कि यह राज्य के युवाओं को सीधे वैश्विक बाजार की मांग से जोड़ने का एक ठोस आर्थिक और सामाजिक प्रयास है।

सचिवालय में आयोजित इस बैठक में विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गहन विचार-विमर्श करते हुए मुख्य सचिव ने इस बात पर विशेष बल दिया कि भाषा प्रशिक्षण को किसी अलग-थलग गतिविधि के रूप में न देखा जाए, बल्कि इसे एक वृहद कौशल विकास कार्यक्रम के रूप में विकसित किया जाए। उनका स्पष्ट मानना है कि जब तक भाषा शिक्षण को रोजगारपरक कौशलों के साथ एकीकृत नहीं किया जाएगा, तब तक इसका पूरा लाभ समाज के अंतिम छोर तक खड़े युवा तक नहीं पहुंच सकेगा। इस योजना का दायरा केवल बड़े शहरों के कुछ चुनिंदा महाविद्यालयों तक सीमित रखने के बजाय इसे स्कूली स्तर से लेकर तकनीकी संस्थानों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों, चिकित्सा और विशेष रूप से नर्सिंग क्षेत्र से जुड़े युवाओं तक विस्तारित करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। इसके साथ ही अन्य इच्छुक सामान्य युवाओं और कामकाजी लोगों के लिए भी इस व्यवस्था के अंतर्गत सीखने के मार्ग प्रशस्त किए जाएंगे, ताकि जो भी व्यक्ति अपने करियर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाना चाहता है, उसे राज्य के भीतर ही गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन मिल सके।

इस महत्वाकांक्षी योजना को व्यावहारिक रूप देने के लिए मुख्य सचिव ने कार्मिक एवं वित्त विभाग को निर्देश दिया है कि वे शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य और अन्य संबंधित विभागों के साथ निरंतर समन्वय स्थापित करें। किसी भी बड़ी नीतिगत पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके वित्तीय और प्रशासनिक तंत्र कितने पारदर्शी और व्यवस्थित हैं। कार्मिक और वित्त विभागों के संयुक्त प्रयासों से एक समग्र प्रस्ताव तैयार किया जाएगा जिसमें प्रशिक्षकों की व्यवस्था, पाठ्यचर्या का निर्धारण, तकनीकी संसाधन, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और बजट की संपूर्ण रूपरेखा शामिल होगी। मुख्य सचिव ने अधिकारियों को स्पष्ट शब्दों में चेताया कि यह योजना केवल कागजी प्रस्तावों तक सीमित न रहे, बल्कि इसका एकमात्र और स्पष्ट ध्येय प्रदेश के युवाओं को वास्तविक वैश्विक रोजगार की जरूरतों के अनुरूप तैयार करना होना चाहिए। दुनिया भर में किस भाषा के जानकारों की मांग सबसे अधिक है, किस देश में किस क्षेत्र के पेशेवरों की आवश्यकता है, इन सभी तथ्यों का सूक्ष्म विश्लेषण करके ही भाषा चयन और पाठ्यक्रम की रूपरेखा बनाई जाएगी।

प्रशिक्षण की कार्यप्रणाली को लेकर मुख्य सचिव का दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक और आधुनिक दिखाई देता है। उन्होंने निर्देश दिए कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम हाइब्रिड मॉडल पर आधारित होना चाहिए, जिसमें प्रत्यक्ष कक्षाओं के साथ-साथ ऑनलाइन माध्यम का भी पूरा उपयोग किया जाए। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां दूरस्थ गांवों और दुर्गम घाटियों में रहने वाले युवाओं के लिए प्रतिदिन जिला मुख्यालयों तक पहुंचना कठिन होता है, वहां डिजिटल और ऑनलाइन कक्षाएं वरदान साबित हो सकती हैं। उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल व्याख्यान, इंटरएक्टिव भाषा लैब्स और अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषा विशेषज्ञों के ऑनलाइन सत्रों के माध्यम से राज्य के किसी भी कोने में बैठा छात्र आसानी से जर्मन, जापानी, फ्रेंच, स्पैनिश या मंदारिन जैसी भाषाएं सीख सकेगा। प्रत्यक्ष कक्षाओं की अपनी अलग अहमियत होती है, जहां उच्चारण, संवाद शैली और सांस्कृतिक समझ का सीधा अभ्यास कराया जा सकता है। इसलिए इन दोनों माध्यमों के संतुलित समन्वय से एक ऐसा ढांचा तैयार किया जाएगा जो सुलभ भी हो और गुणवत्ता में भी किसी अंतरराष्ट्रीय संस्थान से कम न हो।

स्कूली शिक्षा के स्तर पर इस बदलाव की शुरुआत करने के लिए मुख्य सचिव ने शिक्षा विभाग को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने राज्य के सभी अटल उत्कृष्ट विद्यालयों और राजीव नवोदय विद्यालयों में अंग्रेजी के अतिरिक्त अन्य प्रमुख विदेशी भाषाओं के प्रशिक्षण की योजना तैयार करने को कहा है। अटल उत्कृष्ट विद्यालय और नवोदय विद्यालय राज्य में गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा के केंद्र माने जाते हैं, जहां मेधावी और साधनविहीन परिवारों के बच्चे भी पढ़ते हैं। यदि इन विद्यालयों में कक्षा छह या नौ के स्तर से ही छात्रों को विदेशी भाषाओं का बुनियादी परिचय मिलने लगे, तो विद्यालयी शिक्षा पूरी करते-करते वे किसी एक विदेशी भाषा में धाराप्रवाह हो सकते हैं। बचपन या किशोरावस्था में किसी नई भाषा को सीखने की क्षमता वयस्क अवस्था की तुलना में कहीं अधिक तीव्र होती है। जब ये छात्र अपनी बारहवीं की पढ़ाई पूरी करके निकलेंगे, तो वे सामान्य स्नातकों की तुलना में कई कदम आगे होंगे और उनके पास उच्च शिक्षा से लेकर अंतरराष्ट्रीय छात्रवृत्तियों तक के अनेक विकल्प पहले से खुले होंगे।

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Photo- विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण देने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की जाएः मुख्य सचिव

वर्तमान समय में कौशल विकास एवं सेवायोजन कार्यालय द्वारा देहरादून, अल्मोड़ा और बागेश्वर जैसे जिलों में कुछ सीमित स्तर पर विदेशी भाषा प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन केंद्रों पर मिले अनुभवों और युवाओं के उत्साह को देखते हुए मुख्य सचिव ने इन कार्यक्रमों का दायरा बढ़ाकर इन्हें पूरे प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए हैं। अब यह व्यवस्था राज्य के सभी तेरह जनपदों में लागू की जाएगी। प्रत्येक जिले में एक सुसज्जित विदेशी भाषा प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया जाएगा। इसके अलावा, कौशल विकास विभाग के तहत वर्तमान में संचालित हो रहे ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ को भी इस अभियान का मुख्य केंद्र बनाया जाएगा। सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में पहले से ही उन्नत तकनीकी संसाधन और कुशल प्रशिक्षक मौजूद हैं, जिनके साथ विदेशी भाषा के संकायों को जोड़कर एक एकीकृत प्रशिक्षण हब तैयार किया जा सकता है। इससे अलग से भारी भरकम नया ढांचा खड़ा करने में लगने वाले समय और धन की बचत होगी तथा उपलब्ध संसाधनों का शत-प्रतिशत सदुपयोग सुनिश्चित हो सकेगा।

इस पूरे विजन का सबसे संवेदनशील और व्यावहारिक पहलू रोजगार की वास्तविक मांग के साथ प्रशिक्षण को जोड़ना है। कई बार ऐसा देखा जाता है कि छात्र भाषा तो सीख लेते हैं, लेकिन उन्हें यह पता नहीं होता कि उस भाषा के बल पर नौकरी कहां और कैसे मिलेगी। मुख्य सचिव ने इस खाई को पाटने के लिए विशेष दिशा-निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि संबंधित विभागों को देश-विदेश में कार्यरत प्लेसमेंट एजेंसियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, दूतावासों और अंतरराष्ट्रीय मानव संसाधन संगठनों के साथ निरंतर संपर्क और समन्वय बनाए रखना होगा। जैसे ही किसी देश में भारतीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सामने आएं, राज्य की एजेंसियां तुरंत हमारे प्रशिक्षित युवाओं का डाटाबेस वहां उपलब्ध करा सकें। इसके साथ ही, प्रशिक्षण की गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर कसने के लिए युवाओं को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रमाणपत्र दिलाने पर जोर दिया गया है। जैसे जापानी भाषा के लिए जेएलपीटी अथवा जर्मन भाषा के लिए गोएथे-जर्टिफिकाट जैसे प्रतिष्ठित प्रमाणपत्र यदि युवाओं के पास होंगे, तो वीजा और रोजगार की प्रक्रिया अत्यंत सुगम और विश्वसनीय हो जाएगी।

स्थानीय बौद्धिक संपदा और संसाधनों के उपयोग को लेकर भी मुख्य सचिव ने एक बेहद अभिनव सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण अभियान के लिए बाहर से महंगे प्रशिक्षक ढूंढने के बजाय राज्य के अपने प्रमुख संस्थान, दून विश्वविद्यालय की क्षमताओं का उपयोग किया जाए। दून विश्वविद्यालय का स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस पूरे उत्तर भारत में अपनी उच्चस्तरीय विदेशी भाषा शिक्षा के लिए विख्यात है, जहां छात्र चीनी, जापानी, स्पैनिश, जर्मन और फ्रेंच भाषाओं में स्नातक, परास्नातक और शोध कार्य कर रहे हैं। मुख्य सचिव ने सुझाव दिया कि इन अध्ययनरत विद्यार्थियों को प्रशिक्षक या मेंटॉर के रूप में इस अभियान से जोड़ा जाए। इससे राज्य को बेहद ऊर्जावान, युवा और समर्पित प्रशिक्षक मिलेंगे जो स्कूली और तकनीकी छात्रों को उनकी ही भाषा में सरलता से विदेशी भाषा सिखा सकेंगे। बदले में, इन प्रशिक्षक विद्यार्थियों को उनके काम के लिए शैक्षणिक क्रेडिट, अनुभव प्रमाणपत्र अथवा उचित मानदेय दिया जाएगा, जिससे उनका अपना आत्मविश्वास बढ़ेगा और उन्हें शिक्षण का अमूल्य अनुभव प्राप्त होगा।

इस पूरी बैठक का संभवतः सबसे क्रांतिकारी निर्णय स्वास्थ्य और नर्सिंग क्षेत्र को विदेशी भाषा से जोड़ना है। मुख्य सचिव ने स्पष्ट निर्देश दिए कि राज्य के सभी सरकारी नर्सिंग कॉलेजों के पाठ्यक्रम में विदेशी भाषाओं के प्रशिक्षण को अनिवार्य या प्रमुखता से शामिल किया जाए। उन्होंने उल्लेख किया कि वर्तमान में उत्तराखंड के सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में लगभग छह सौ छात्र-छात्राएं नर्सिंग का गहन प्रशिक्षण ले रहे हैं। यदि इन नर्सिंग विद्यार्थियों को उनकी नियमित पढ़ाई के दौरान ही जर्मन, जापानी या अन्य प्रमुख यूरोपीय भाषाओं का विधिवत ज्ञान दे दिया जाए, तो उनके करियर की दिशा पूरी तरह बदल सकती है। आज जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में प्रशिक्षित नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों की अभूतपूर्व मांग है। इन देशों की आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है, जिसके चलते वहां कुशल, सेवाभावी और तकनीकी रूप से दक्ष स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भारी कमी हो गई है। भारतीय नर्सों की सेवा भावना और तकनीकी दक्षता की पूरी दुनिया में प्रशंसा होती है, लेकिन केवल भाषा की बाधा के कारण वे इन उच्च वेतन वाले अवसरों से वंचित रह जाती हैं। यदि उत्तराखंड के नर्सिंग छात्रों को कॉलेज स्तर पर ही संबंधित देश की भाषा में दक्ष कर दिया जाए, तो डिग्री पूरी होते ही वे अंतरराष्ट्रीय अस्पतालों में सम्मानजनक पदों और आकर्षक पैकेजों पर सेवाएं देने के योग्य बन जाएंगे।

यह कदम उत्तराखंड से होने वाले पलायन की गंभीर समस्या के समाधान में भी एक नई दृष्टि प्रदान करता है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से युवाओं का पलायन हमेशा से एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चिंता का विषय रहा है। रोजगार के अभाव में युवा बड़े शहरों की ओर रुख करते हैं जहां अक्सर उन्हें निम्न स्तर के कार्यों में कम वेतन पर कठिन परिस्थितियों में गुजर-बसर करनी पड़ती है। लेकिन यदि वही युवा एक कुशल तकनीशियन, नर्स या भाषा विशेषज्ञ के रूप में प्रशिक्षित होकर सीधे राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंच पर कदम रखता है, तो वह न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल देता है, बल्कि विदेशी मुद्रा के रूप में राज्य की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। विदेशों में काम करने वाले जब अपने गृह राज्य में पैसा भेजते हैं, तो उससे स्थानीय स्तर पर निर्माण, शिक्षा और व्यापार को भारी गति मिलती है। केरल और पंजाब जैसे राज्यों ने दशकों पहले इस शक्ति को पहचाना था और आज उनकी अर्थव्यवस्था में प्रवासी कामगारों का योगदान सर्वविदित है। उत्तराखंड अब इसी दिशा में एक सुनियोजित, संगठित और प्रशासनिक संरक्षण के साथ कदम बढ़ा रहा है।

पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र के दृष्टिकोण से भी विदेशी भाषा प्रशिक्षण उत्तराखंड के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। उत्तराखंड एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और आध्यात्मिक केंद्र है। ऋषिकेश को विश्व की योग राजधानी कहा जाता है, जहां हर साल यूरोप, अमेरिका, जापान, रूस और लैटिन अमेरिका से लाखों विदेशी पर्यटक और साधक आते हैं। इसके अतिरिक्त चारधाम यात्रा, फूलों की घाटी, औली और जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क जैसे विश्वप्रसिद्ध स्थलों पर भी विदेशी सैलानियों का भारी जमावड़ा रहता है। स्थानीय टूर गाइडों, होमस्टे संचालकों, होटल प्रबंधन के विद्यार्थियों और टैक्सी चालकों को यदि बुनियादी विदेशी भाषाओं का ज्ञान हो जाए, तो वे विदेशी पर्यटकों को कहीं बेहतर सेवाएं दे सकते हैं। इससे न केवल पर्यटकों का अनुभव सुखद होगा, बल्कि स्थानीय लोगों की आय में भी कई गुना वृद्धि होगी। संवाद की सहजता किसी भी पर्यटन उद्योग की सबसे बड़ी पूंजी होती है और विदेशी भाषाओं की समझ इस पूंजी को सशक्त बनाती है।

प्रशासनिक दृष्टिकोण से इस विशाल योजना का सफल क्रियान्वयन एक बड़ी चुनौती अवश्य है, किंतु मुख्य सचिव द्वारा दिए गए स्पष्ट निर्देशों और अंतर-विभागीय समन्वय की रणनीति से यह उम्मीद बंधती है कि यह योजना तेजी से धरातल पर उतरेगी। इसके लिए एक समर्पित नोडल एजेंसी का गठन किया जा सकता है जो समय-समय पर प्रशिक्षण की प्रगति, छात्रों की उपस्थिति, मूल्यांकन परीक्षाओं और प्लेसमेंट के आंकड़ों की निगरानी करेगी। जिला स्तर पर जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में निगरानी समितियां बनाई जा सकती हैं जो स्थानीय केंद्रों के संचालन और उनकी समस्याओं का तत्काल समाधान सुनिश्चित करेंगी। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त भाषा संस्थानों जैसे मैक्स मूलर भवन, एलायंस फ्रैंकेइस अथवा जापान फाउंडेशन के साथ औपचारिक समझौते करके पाठ्यक्रम और परीक्षा प्रणाली को और अधिक प्रामाणिक बनाया जा सकता है।

शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है। वह जमाना लद गया जब केवल डिग्रियों के आधार पर जीवन भर के रोजगार की गारंटी मिल जाती थी। आज का युग विशिष्ट कौशल, निरंतर सीखने की क्षमता और वैश्विक संवाद का है। जो समाज समय की इस पुकार को पहले पहचान लेता है, वही प्रगति की दौड़ में सबसे आगे रहता है। मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन की अध्यक्षता में लिया गया यह निर्णय इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उत्तराखंड का प्रशासनिक नेतृत्व भविष्य की चुनौतियों और अवसरों को भली-भांति समझ रहा है। जब राज्य का एक साधारण किसान या छोटे व्यापारी का बेटा अथवा बेटी सरकारी स्कूल या कॉलेज से निकलकर किसी विदेशी भाषा में पारंगत होकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाएगा, तब इस योजना की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होगी। यह कदम राज्य के मानव संसाधन को वैश्विक शक्ति में बदलने का एक साहसिक और युगांतरकारी प्रयास है, जो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की आर्थिक और सामाजिक नियति को एक नई ऊंचाई प्रदान करने की पूरी क्षमता रखता है।

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