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Dehradun News: जिला कारागार की महिला बंदियों के लिए व्यक्तित्व विकास एवं ग्रूमिंग प्रशिक्षण की पहल

On: October 13, 2026 5:48 AM
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Dehradun News: जिला कारागार की महिला बंदियों के लिए व्यक्तित्व विकास एवं ग्रूमिंग प्रशिक्षण की पहल
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Dehradun News: कारागार की ऊंची दीवारें और लोहे के भारी फाटक अक्सर समाज के लिए एक ऐसे अंत का प्रतीक मान लिए जाते हैं, जिसके बाद किसी व्यक्ति के जीवन में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं बचती। भारतीय समाज में आज भी जेल को केवल दंड भुगतने की एक अंधेरी कोठरी के रूप में देखा जाता है। विशेष रूप से जब बात महिला बंदियों की आती है, तो यह त्रासदी और अधिक गहरी हो जाती है। सामाजिक तिरस्कार, पारिवारिक उपेक्षा, आत्मग्लानि और भविष्य को लेकर उपजी अनिश्चितता एक महिला के भीतर के आत्मविश्वास को पूरी तरह तोड़ देती है। ऐसे में कानून, समाज और मानवीय संवेदनाओं का यह साझा दायित्व बन जाता है कि वे इन बंदियों को केवल अपराध या परिस्थिति के चश्मे से न देखें, बल्कि उनके भीतर छिपी मानवीय गरिमा को सहेजते हुए उन्हें एक नई जिंदगी की ओर लौटने का मार्ग दिखाएं। इसी संवेदनशील और प्रगतिशील सोच को धरातल पर उतारते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, देहरादून ने एक ऐसी अनूठी और प्रेरणादायी पहल की है, जो सुधारात्मक न्याय प्रणाली के इतिहास में एक मील का पत्थर कही जा सकती है।

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Photo- Dehradun Grooming training for female prison inmates

देहरादून स्थित जिला कारागार में निरुद्ध 44 महिला बंदियों के जीवन में सकारात्मकता, नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार करने के उद्देश्य से एक विशेष ब्यूटी एवं ग्रूमिंग कौशल प्रशिक्षण सत्र का आयोजन किया गया। यह आयोजन केवल बाहरी साज-सज्जा या रूप-रंग को निखारने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दर्शन छिपा हुआ था। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक अवसाद और एकाकीपन के साए में रहता है, तो वह सबसे पहले अपनी स्वयं की देखभाल करना छोड़ देता है। स्वयं के प्रति उपेक्षा धीरे-धीरे आत्मसम्मान की समाप्ति में बदल जाती है। इस मनोवैज्ञानिक सच्चाई को समझते हुए प्राधिकरण ने प्रसिद्ध ब्यूटी संस्थान क्लाउड-9 यूनिसैक्स सैलून देहरादून के साथ हाथ मिलाया और जेल परिसर के भीतर ही एक ऐसा मंच तैयार किया, जहां ये महिलाएं अपने अस्तित्व को फिर से पहचान सकें।

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Photo- Dehradun Grooming training for female prison inmates

इस गरिमामयी कार्यक्रम की रूपरेखा जिला न्यायाधीश देहरादून हरीश कुमार गोयल के कुशल दिशा-निर्देशन में तैयार की गई थी। न्यायपालिका की यह सोच स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि न्याय का वास्तविक अर्थ केवल अदालत के कमरों में बैठकर फैसले सुनाना नहीं है, बल्कि उस फैसले के बाद समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक सुधारात्मक दृष्टि पहुंचाना भी है। जब न्याय व्यवस्था स्वयं आगे बढ़कर सुधारात्मक कदमों की निगरानी करती है, तो प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर एक बड़ा बदलाव जन्म लेता है। इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव सीमा डुंगराकोटी ने कार्यक्रम के दौरान जिस विचार को सबके सामने रखा, वह आधुनिक समाजशास्त्र और मानवाधिकारों की मूल आत्मा को छूता है। उनका स्पष्ट मानना था कि कारागार सुधार की अवधारणा केवल कागजी विधिक सहायता या वकीलों की उपलब्धता तक सीमित नहीं रह सकती। इसका वास्तविक विस्तार तब होता है जब हम बंदी के व्यक्तित्व में सकारात्मक रूपांतरण लाने और उसे रिहाई के बाद समाज में सिर उठाकर जीने के साधन उपलब्ध कराने के लिए ठोस कदम उठाते हैं।

क्लाउड-9 की वरिष्ठ अधिकारी मिली थावानी की कुशल अगुवाई में विशेषज्ञ दल ने जेल के भीतर मौजूद सभी 44 महिला बंदियों को व्यक्तिगत स्वच्छता, त्वचा की देखभाल, हेयरकट, क्लीनअप, थ्रेडिंग और वैक्सिंग जैसी बुनियादी एवं आधुनिक सौंदर्य सेवाओं से रूबरू कराया। प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने महिलाओं को केवल सेवाएं ही नहीं दीं, बल्कि उन्हें यह भी सिखाया कि किस तरह वे स्वयं की देखभाल कर सकती हैं और इन कौशलों को भविष्य में अपनी आजीविका का साधन बना सकती हैं। जिस समय कैंची, कंघी और क्रीम के स्पर्श से इन महिलाओं के चेहरे खिल रहे थे, उस समय जेल की उस नीरस हवा में एक नई ताजगी महसूस की जा सकती थी। कई महिलाओं के चेहरे पर वर्षों बाद एक सहज मुस्कान तैरती दिखी। यह मुस्कान केवल इसलिए नहीं थी कि उनका रूप संवर रहा था, बल्कि इसलिए थी क्योंकि उन्हें यह महसूस कराया गया था कि वे भी समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनका अस्तित्व अभी भी आदरणीय है।

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Photo- Dehradun Grooming training for female prison inmates

सुधारात्मक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि किसी भी व्यक्ति को उसके अतीत की गलतियों या परिस्थितियों का आजीवन बंधक नहीं बनाया जा सकता। परिस्थितियां चाहे जैसी भी रही हों, इंसान के भीतर सुधार की संभावना कभी समाप्त नहीं होती। महिला बंदियों के लिए यह पहलू और भी संवेदनशील हो जाता है क्योंकि भारतीय पारिवारिक और सामाजिक परिवेश में एक बार जेल जा चुकी महिला को दोबारा स्वीकार करना बहुत कठिन माना जाता है। ऐसे में यदि उसके पास कोई व्यावहारिक हुनर न हो और उसका आत्मबल पूरी तरह टूट चुका हो, तो जेल से बाहर आने के बाद उसका जीवन और अधिक नारकीय हो जाता है। ब्यूटी और वेलनेस एक ऐसा उभरता हुआ क्षेत्र है, जिसमें बहुत कम पूंजी के साथ भी कोई महिला सम्मानपूर्वक अपना काम शुरू कर सकती है या किसी संस्थान में रोजगार पा सकती है। इस प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाओं के भीतर यह विश्वास रोपा गया है कि रिहाई के बाद वे किसी पर बोझ बनने के बजाय अपने हुनर के दम पर अपनी तकदीर स्वयं लिख सकती हैं।

कानूनी सहायता संस्थाओं के संदर्भ में अक्सर यह मान लिया जाता है कि उनका काम केवल कानूनी धाराएं समझाना और अदालती पैरवी तक सीमित है। किंतु देहरादून विधिक सेवा प्राधिकरण ने इस पारंपरिक परिभाषा को तोड़ते हुए यह सिद्ध किया है कि मानवाधिकारों की रक्षा का दायरा मानवीय संवेदनाओं और जीवन स्तर के उत्थान से सीधे जुड़ा है। जब तक एक बंदी मानसिक रूप से स्वस्थ, सम्मानित और आत्मनिर्भर महसूस नहीं करेगा, तब तक कानून के प्रति उसका विश्वास दृढ़ नहीं हो सकता। विधिक सेवा संस्थानों का परम दायित्व वंचित और हाशिए पर खड़े वर्गों तक हर उस माध्यम से पहुंचना है, जिससे उनके जीवन में मानवीय गरिमा की पुनः प्रतिष्ठा हो सके।

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इस पूरे अभियान में कॉर्पोरेट और निजी संस्थानों की सामाजिक जिम्मेदारी का भी एक बेहतरीन उदाहरण देखने को मिला। क्लाउड-9 सैलून और उनकी प्रतिनिधि मिली थावानी ने जिस संवेदनशीलता और समर्पण के साथ जेल की महिलाओं के बीच जाकर यह कार्य किया, वह समाज के अन्य सक्षम वर्गों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण है। जब निजी क्षेत्र के विशेषज्ञ अपनी सेवाएं वंचित तबकों तक पहुंचाने के लिए सरकारी तंत्र के साथ जुड़ते हैं, तो बदलाव की गति कई गुना बढ़ जाती है। प्राधिकरण द्वारा व्यक्त किया गया आभार इसी सामूहिक सहभागिता का प्रमाण है, जो यह संदेश देता है कि समाज के पुनर्निर्माण में हर नागरिक और संस्था की आहुति आवश्यक है।

देहरादून जिला कारागार की यह पहल केवल एक दिन की गतिविधि नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक दृष्टिकोण का आरंभ है जो भविष्य में बंदियों के कौशल विकास, मानसिक स्वास्थ्य सुधार और सामाजिक पुनर्वास के नए द्वार खोलेगा। जब ये महिलाएं अपनी सजा पूरी करके कारागार से बाहर निकलेंगी, तो उनके हाथों में केवल रिहाई का प्रमाण पत्र नहीं होगा, बल्कि उनके भीतर एक संवरा हुआ आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का एक व्यावहारिक हुनर भी होगा। सलाखों के पार से शुरू हुआ यह छोटा सा बदलाव आने वाले समय में समाज की मुख्यधारा में एक बड़ा और सकारात्मक उजाला बनकर फैलेगा।

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Photo- Dehradun Grooming training for female prison inmates

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