ताजा खबरें क्राइम लाइफस्टाइल मौसम खेल बॉलीवुड हॉलीवुड जॉब - एजुकेशन स्वास्थ्य राज्य देश विदेश राशिफल लाइफ - साइंस धर्म अन्य

---Advertisement---

Uttarakhand News: CM धामी ने 149 मेधावी बेटियों को बांटे स्मार्टफोन

On: October 12, 2026 3:34 AM
Follow Us:
Uttarakhand News: CM धामी ने 149 मेधावी बेटियों को बांटे स्मार्टफोन
---Advertisement---

Uttarakhand News: उत्तराखंड की धरती को केवल अपनी प्राकृतिक छटा और पवित्र तीर्थों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इस समाज की रीढ़ हमेशा से यहां की महिलाएं रही हैं। जंगल से घास का गट्ठर लाने से लेकर खेतों की मेड़ों को सींचने तक और चूल्हे की आग सुलगाने से लेकर बच्चों की कॉपियों पर नजर रखने तक, पहाड़ का जीवन सदियों से स्त्री के अदम्य साहस के सहारे ही गतिमान रहा है। इसी धरती पर जब अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर 149 मेधावी छात्राओं के हाथों में स्मार्टफोन थमाए गए, तो यह केवल एक तकनीकी उपकरण का उपहार नहीं था, बल्कि उस लंबे संघर्ष को एक नई दिशा देने का प्रयास था, जिसके सहारे पहाड़ की बेटियां सदियों से अपनी पहचान गढ़ने में जुटी हैं।

देहरादून के आईआरटीडी प्रेक्षागार में आयोजित बालिका शिक्षा प्रोत्साहन कार्यक्रम के दौरान जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में अपनी मेहनत के दम पर अव्वल आने वाली छात्राओं को सम्मानित किया, तो सभागार में गूंजती तालियों के बीच एक नए युग की आहट साफ सुनी जा सकती थी। चमोली की दुर्गम घाटियों से लेकर पिथौरागढ़ की ऊंची चोटियों तक और ऊधमसिंह नगर के मैदानी अंचलों से लेकर टिहरी-पौड़ी के सुदूर गांवों तक, इन बेटियों ने विषम परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और कठिन रास्तों के बीच पढ़ाई करके यह मुकाम हासिल किया है।

image 60
Photo-x Cm dhami distribute smartphone to students

मुख्यमंत्री का यह कहना कि सरकार केवल प्रमाणपत्र देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ना चाहती, बल्कि बेटियों के जन्म से लेकर उनकी उच्च शिक्षा और रोजगार तक की हर सीढ़ी पर मजबूत संबल बनकर खड़ी है, राज्य की नीतियों में आए एक बुनियादी बदलाव की ओर इशारा करता है। पहाड़ी क्षेत्रों में स्कूल तक पहुंचने के लिए आज भी कई किलोमीटर की उतराई और चढ़ाई तय करनी पड़ती है। बरसात के दिनों में उफनते गदेरे और सर्दियों में हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच जब कोई बेटी अपनी कॉपियों को पॉलीथिन में लपेटकर स्कूल जाती है, तो उसकी परीक्षा सिर्फ परीक्षा हॉल के भीतर नहीं, बल्कि हर रोज घर से निकलते ही शुरू हो जाती है। ऐसे परिवेश में जब बोर्ड परीक्षाओं की मेरिट सूची में इन बेटियों के नाम जगमगाते हैं, तो यह समाज के हर उस रूढ़िवादी विचार के चेहरे पर एक करारा तमाचा होता है जो मानता है कि बेटियां केवल घर संभालने के लिए बनी हैं।

डिजिटल शिक्षा के इस दौर में स्मार्टफोन अब किसी विलासिता का प्रतीक नहीं रह गया है, बल्कि यह ज्ञान, जानकारी और दुनिया भर के संसाधनों तक पहुंचने की सबसे जरूरी खिड़की बन चुका है। जो परिवार आर्थिक तंगी के चलते अपने बच्चों को महंगे कोचिंग संस्थानों या बड़े शहरों में भेजने का सामर्थ्य नहीं रखते, उनके लिए यह छोटा सा पर्दा एक समूची दुनिया का द्वार खोल देता है। अब एक छात्रा अपनी झोपड़ी या छोटे से पत्थर के मकान में बैठकर देश के श्रेष्ठ अध्यापकों के वीडियो व्याख्यान सुन सकती है, प्रतियोगी परीक्षाओं के पुराने प्रश्नपत्र हल कर सकती है और राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली प्रतियोगिताओं के फॉर्म समय रहते भर सकती है।

हालांकि इस पहल के साथ ही हमें धरातल की वास्तविकताओं को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। किसी भी तकनीकी उपकरण का सार्थक उपयोग तभी संभव हो पाता है जब उसके साथ आवश्यक बुनियादी ढांचा भी मजबूती से जुड़ा हो। उत्तराखंड के सीमांत और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की आंख-मिचौली आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई बार सिग्नल की तलाश में विद्यार्थियों को टीलों पर चढ़ना पड़ता है या पेड़ों के सहारे मोबाइल टिकाना पड़ता है। इसलिए यह पहल तभी अपने पूर्ण लक्ष्य को हासिल कर पाएगी जब संचार की बुनियादी व्यवस्था को भी उसी तत्परता के साथ सुधारा जाए। साथ ही, इंटरनेट के खुले संसार में बेटियों को साइबर सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता का पाठ पढ़ाना भी उतना ही जरूरी है, ताकि वे इस माध्यम का उपयोग केवल अपनी पढ़ाई और व्यक्तित्व निर्माण के लिए सुरक्षित रूप से कर सकें।

राज्य में बालिकाओं की शिक्षा और उनके संपूर्ण विकास को केवल एक योजना के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे एक लंबा नीतिगत ढांचा खड़ा किया गया है, जिसकी सबसे मजबूत कड़ी नंदा गौरा योजना है। भारतीय समाज के कई हिस्सों में कन्या के जन्म को लंबे समय तक चिंता और भविष्य के खर्चों के डर से जोड़कर देखा जाता रहा है। नंदा गौरा योजना इसी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विकार पर सीधा प्रहार करती है। इस योजना की बनावट ऐसी है कि यह बच्ची के जन्म के क्षण से ही परिवार को आर्थिक सहारा देती है, जिससे कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों पर रोक लगाने में मदद मिली है। इसके बाद जब वही बेटी बारहवीं कक्षा पास करके उच्च शिक्षा के दहलीज पर कदम रखती है, तो उसे दोबारा एकमुश्त आर्थिक सहायता दी जाती है।

यह आर्थिक मदद केवल बैंक खाते में आने वाली रकम नहीं होती, बल्कि यह उस माता-पिता के मन में यह विश्वास भरती है कि उनकी बेटी की पढ़ाई किसी भी हाल में बीच में नहीं छूटेगी। अक्सर देखा जाता है कि ग्रामीण परिवारों में आर्थिक तंगी का पहला शिकार बेटियों की पढ़ाई ही बनती है। पैसे की कमी होने पर बेटे को कॉलेज भेजने और बेटी का ब्याह रचा देने की जो पुरानी मानसिकता रही है, नंदा गौरा योजना उस चक्रव्यूह को तोड़ने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। यह योजना समाज को यह संदेश देती है कि बेटी बोझ नहीं, बल्कि परिवार और राज्य का मान-सम्मान है।

शिक्षा की चौखट पार करने के बाद जीवन की अगली और सबसे कठिन परीक्षा रोजगार के मोर्चे पर शुरू होती है। इस दिशा में उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य की महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में तीस प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की कानूनी व्यवस्था करना एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला माना जा सकता है। जब यह मामला कानूनी पेचीदगियों में उलझा था, तब सरकार ने विधानसभा के पटल पर विशेष विधेयक पारित करवाकर और राजभवन से उसे कानूनी रूप दिलवाकर यह साफ कर दिया था कि पहाड़ की महिलाओं के अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

पहाड़ का पुरुष अक्सर रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर पलायन कर जाता है, जिसके चलते गांव में पीछे छूट जाती हैं बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं। ऐसे में अगर राज्य की प्रशासनिक, शैक्षणिक और तकनीकी सेवाओं में स्थानीय महिलाओं की भागीदारी तय नहीं होगी, तो नीतियां कभी भी जमीनी दर्द को समझ नहीं पाएंगी। जब एक पहाड़ी बेटी खंड विकास अधिकारी, तहसीलदार, उप-जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी या शिक्षिका बनकर किसी दफ्तर में बैठती है, तो वह केवल अपनी कुर्सी नहीं संभालती, बल्कि वह उस दफ्तर में आने वाली हर ग्रामीण महिला की पीड़ा को अपनी खुद की पीड़ा समझकर उसका समाधान निकालने की संवेदनशीलता रखती है। यह आरक्षण केवल रोजगार का कोटा नहीं है, बल्कि यह निर्णय लेने वाली कुर्सियों पर महिलाओं की मौजूदगी को अनिवार्य बनाने की एक व्यवस्था है।

आर्थिक स्वावलंबन का एक दूसरा और बेहद जीवंत चेहरा हमें लखपति दीदी योजना के माध्यम से देखने को मिल रहा है। औपचारिक शिक्षा और सरकारी नौकरियों के दायरे से बाहर जो लाखों महिलाएं गांवों में रह रही हैं, उनके भीतर छिपा हुनर और श्रम सदियों से बिना किसी आर्थिक मूल्यांकन के खपता रहा है। स्वयं सहायता समूहों के ताने-बाने को मजबूत करके सरकार ने इन महिलाओं को सीधे बाजार, बैंकिंग व्यवस्था और स्वरोजगार से जोड़ दिया है। आज पहाड़ की महिलाएं केवल घरेलू काम तक सीमित नहीं हैं। वे झंगोरा, मंडुआ, चौलाई, बुरांश के जूस, पहाड़ी दालों, जैविक मसालों, हस्तशिल्प और रिंगाल के उत्पादों को तैयार करके उन्हें देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचा रही हैं।

जब किसी महिला के हाथ में अपनी खुद की कमाई का पैसा आता है, तो परिवार के भीतर उसके निर्णय लेने की क्षमता में जमीन-आसमान का अंतर आ जाता है। वह अपने बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए खुलकर खर्च कर सकती है, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों पर ध्यान दे सकती है और सबसे बढ़कर, उसे अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी दूसरे के सामने हाथ फैलाने की मजबूरी नहीं रहती। लखपति दीदी योजना का लक्ष्य हर सक्रिय महिला की वार्षिक आय को कम से कम एक लाख रुपये तक पहुंचाना है, और यह लक्ष्य महज कागजी नहीं है बल्कि कई विकासखंडों में महिलाएं इस आंकड़े को पार करके अपने परिवारों की गरीबी को हमेशा के लिए पीछे छोड़ चुकी हैं।

इन तमाम सकारात्मक प्रयासों और उत्साहजनक तस्वीरों के बीच एक सतर्क विश्लेषक की नजर से देखना भी आवश्यक है कि इस पूरी यात्रा में आगे कौन सी चुनौतियां खड़ी हैं। सरकारी योजनाएं कितनी भी उदार क्यों न हों, उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक उनका लाभ बिना किसी अड़चन के पहुंचे। कई बार सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में कागजी औपचारिकताओं, आय प्रमाण पत्रों की जटिलताओं और डिजिटल पोर्टलों की समझ न होने के कारण सबसे अधिक जरूरतमंद लोग योजनाओं की परिधि से बाहर छूट जाते हैं। प्रशासनिक तंत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी मेधावी छात्रा या जरूरतमंद महिला को योजना का लाभ लेने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें, बल्कि प्रशासन खुद उन तक पहुंचे।

बालिकाओं को दिए गए स्मार्टफोन से लेकर उनके बैंक खातों में जाने वाली सहायता तक, यह पूरी कवायद उस बड़े सामाजिक बदलाव की बुनियाद तैयार कर रही है जिसकी कल्पना एक विकसित भारत और आत्मनिर्भर उत्तराखंड के लिए की जाती है। जब एक बेटी पढ़ती है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं संवरता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पूरी दिशा बदल जाती है। उत्तराखंड की यह 149 मेधावी बेटियां उन हजारों-लाखों छोटी बच्चियों के लिए प्रेरणा की मशाल बन चुकी हैं, जो आज किसी प्राथमिक विद्यालय के टाट-पट्टी पर बैठकर अक्षरों को पहचानना सीख रही हैं। उनके मन में यह भरोसा जगा है कि अगर वे मेहनत करेंगी, तो राज्य की सरकार और समाज उनके सपनों को पंख देने के लिए पूरी ताकत से उनके पीछे खड़ा रहेगा।

पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आती, यह निराशावादी कहावत अब बीते कल की बात बनती जा रही है। आज पहाड़ की जवानी, खासकर उसकी नारी शक्ति, आधुनिक तकनीक, बेहतर शिक्षा और नीतिगत संबल के साथ अपनी धरती पर ही अपने भविष्य की नई इबारत लिख रही है। स्मार्टफोन की चमक से रोशन होते चेहरे, नंदा गौरा योजना के सहारे कॉलेज जाती छात्राएं, सरकारी दफ्तरों में अपनी पहचान बनाती युवतियां और स्वयं सहायता समूहों के जरिए अपनी तकदीर बदलती ग्रामीण महिलाएं, यह सब मिलकर उस नए उत्तराखंड की तस्वीर पेश कर रही हैं जहां बेटियां किसी की दया की मोहताज नहीं, बल्कि राज्य के विकास की मुख्य कर्णधार बन चुकी हैं। यह सफर अभी लंबा है, डगर में कई ढलानें और चढ़ाइयां हैं, लेकिन जब हौसलों में सच्चाई और नीतियों में ईमानदारी हो, तो हर दुर्गम शिखर को पार करके सफलता की मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।

Dehradun News: स्वच्छता पखवाड़ा- देहरादून रेलवे स्टेशन पर ‘रेल जन संवाद’ कार्यक्रम आयोजित

image 59

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment