Illegal Garbage News: देहरादून की शांत वादियां और हरी-भरी पहाड़ियां लंबे समय से पर्यटकों और स्थानीय निवासियों के आकर्षण का केंद्र रही हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में अनियंत्रित शहरीकरण, बढ़ती आबादी और आधुनिक जीवनशैली के दुष्प्रभावों ने इस खूबसूरत दून घाटी की आबोहवा में प्लास्टिक का ऐसा जहर घोल दिया है जो न केवल प्राकृतिक जलस्रोतों को चोक कर रहा है बल्कि यहां की उपजाऊ मिट्टी और जैव विविधता के लिए भी एक गंभीर संकट बन चुका है। सड़कों के किनारे, सूखी बरसाती नदियों में और खाली पड़े प्लाटों पर अचानक उग आने वाले कूड़े के ढेर इस बात की गवाही देते हैं कि हम अपनी सुविधा के नाम पर अपनी ही प्रकृति का कितना नुकसान कर रहे हैं। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने अब पूरी तरह से कमर कस ली है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने कड़े शब्दों में साफ कर दिया है कि दून में अब किसी भी सूरत में अनधिकृत डंपिंग और प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो लोग चोरी-छिपे सड़कों पर या खुले मैदानों में कचरा फेंककर निकल जाते हैं, उन्हें यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि अब वे प्रशासन की सीधी निगरानी में हैं। पकड़े जाने पर न केवल भारी जुर्माना लगेगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी गंभीर धाराओं के तहत कानूनी शिकंजा भी कसा जाएगा।
देहरादून कलेक्ट्रेट में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी का रुख बेहद सख्त और स्पष्ट था। उन्होंने स्पष्ट किया कि माननीय उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों का पालन केवल फाइलों में बंद रहने के लिए नहीं है, बल्कि इसे धरातल पर पूरी सख्ती और पारदर्शिता के साथ लागू किया जाना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि प्लास्टिक प्रतिबंध के नाम पर बाजार में छोटी-मोटी दुकानों या रेहड़ी-पटरी वालों पर चालानी कार्रवाई करके खानापूर्ति कर ली जाती है। कुछ दिन हो-हल्ला मचता है और फिर कुछ हफ्तों बाद हालात जस के तस हो जाते हैं। इस ढर्रे को पूरी तरह खारिज करते हुए जिलाधिकारी ने निर्देश दिए कि इस बार की लड़ाई केवल सतही चालानों तक सीमित नहीं रहेगी। प्रशासन अब इस समस्या की जड़ पर प्रहार करेगा। इसका मतलब है कि प्लास्टिक के उत्पादन, उसके कच्चे माल की सप्लाई, गोदामों में भंडारण, थोक वितरण और अंत में उपभोक्ता स्तर पर उपयोग तक फैली पूरी चेन को एक साथ ध्वस्त किया जाएगा। जब तक स्रोत पर ही लगाम नहीं लगेगी, तब तक बाजारों में इसका बिकना बंद नहीं हो सकता।
इसी रणनीति के तहत राज्य कर विभाग के अधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिए गए हैं कि वे जिले की सीमाओं के भीतर संचालित सभी संबंधित औद्योगिक इकाइयों और कारखानों का तुरंत स्थलीय निरीक्षण करें। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन इकाइयों को गैर-प्रतिबंधित सामग्री बनाने की अनुमति है, वे कहीं आड़ लेकर प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक का निर्माण तो नहीं कर रही हैं। इसके लिए कच्चे माल की खरीद, इनवॉइस, उत्पादन क्षमता और तैयार माल के वितरण से जुड़ी हर रसीद की बारीकी से जांच की जाएगी। यदि किसी भी फैक्ट्री में अवैध प्लास्टिक का स्टॉक मिला या फिर खातों में हेराफेरी पाई गई, तो संबंधित इकाई को सील करने के साथ-साथ भारी जुर्माना और लाइसेंस रद्दीकरण की प्रक्रिया तत्काल शुरू कर दी जाएगी। बाजारों में जो संगठित नेटवर्क रात के अंधेरे में या गुप्त गोदामों के जरिए प्रतिबंधित पॉलीथिन और थर्माकोल उत्पादों की खेप पहुंचाता है, उस सप्लाई चेन को तोड़ने के लिए खुफिया तंत्र को भी सक्रिय कर दिया गया है।
कार्रवाई का दूसरा बड़ा मोर्चा शहर के भीतर अनधिकृत रूप से विकसित हो रही डंपिंग साइट्स के खिलाफ खोला गया है। शहर के रिहायशी इलाकों के आसपास, नदी-नालों के किनारों और खाली पड़े सरकारी या निजी भूखंडों पर कूड़ा फेंकने की प्रवृत्ति एक खतरनाक आदत बन चुकी है। जिलाधिकारी ने सभी उपजिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में बल्क वेस्ट जनरेटरों को तत्काल चिन्हित करें। होटल, रेस्टोरेंट, बैंक्वेट हॉल, बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, निजी अस्पताल और व्यावसायिक संस्थान जो प्रतिदिन भारी मात्रा में कचरा पैदा करते हैं, वे कानूनी रूप से अपने कचरे के पृथक्करण और वैज्ञानिक निस्तारण के लिए उत्तरदायी हैं। जो भी व्यावसायिक इकाई नियमों का उल्लंघन करके अपने कचरे को सड़क किनारे या सुनसान जगहों पर फेंकवा रही है, उसके खिलाफ न केवल नगर निगम स्तर पर दंडात्मक कार्रवाई होगी, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रावधानों के तहत पानी और बिजली के कनेक्शन काटने तक की संस्तुति की जाएगी। एसडीएम को निर्देश दिए गए हैं कि वे ऐसी सभी अवैध डंपिंग साइटों की सूची तैयार करें, वहां पड़े कचरे को तत्काल उठवाकर उसका नियमानुसार निस्तारण करवाएं और उन स्थानों पर चेतावनी बोर्ड तथा सीसीटीवी कैमरों की निगरानी सुनिश्चित करें।
नगर निगम और स्थानीय नगर निकायों की कार्यप्रणाली पर भी जिलाधिकारी ने कड़ी नजर रखी है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि प्रशासन ने निकायों को मैनपावर, वाहन और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए हैं। इन संसाधनों की मौजूदगी के बावजूद यदि किसी इलाके में कचरा कई दिनों तक सड़ता हुआ पाया जाता है या फिर खुले में जलाया जाता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी संबंधित क्षेत्रीय अधिकारियों और सफाई निरीक्षकों की होगी। संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने का दौर अब खत्म हो चुका है। लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ सेवा नियमावली के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी ताकि व्यवस्था में अनुशासन और जवाबदेही स्थापित हो सके।
पर्वतीय और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए ब्लॉक और न्याय पंचायत स्तर पर लगाई गई कॉम्पेक्टर मशीनों के संचालन की स्थिति पर भी विशेष समीक्षा की गई। इन मशीनों को स्थापित करने का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे को संपीड़ित करके रीसाइक्लिंग के लिए तैयार करना था ताकि परिवहन की लागत कम हो और कचरा इधर-उधर न बिखरे। जिलाधिकारी ने साफ तौर पर पूछा कि स्थापित की गई मशीनों में से कितनी वास्तव में चालू हालत में हैं और अब तक उनसे कितने मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरे का निस्तारण किया गया है। कालसी क्षेत्र का उदाहरण सामने आने पर, जहां मशीन तक कचरा पहुंचाने में भारी लागत और व्यावहारिक दिक्कतों की शिकायत आई थी, जिलाधिकारी ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना सोचे-समझे और जमीनी हकीकत को जाने बिना साइट चयन करने वाली टीम की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। गैर-जिम्मेदाराना योजना बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच बिठाकर दंडात्मक कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं, जिससे यह संदेश गया है कि सरकारी धन की बर्बादी पर अब किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
लेकिन इस पूरी प्रशासनिक मुस्तैदी के बीच एक बड़ा मानवीय पहलू भी है जिसकी ओर जिलाधिकारी ने बेहद संवेदनशीलता से ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि डंडे के जोर पर या केवल चालान काटकर किसी शहर को हमेशा के लिए स्वच्छ नहीं बनाया जा सकता। पर्यावरण संरक्षण की यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब शहर का प्रत्येक नागरिक इसे अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझे। सिंगल यूज प्लास्टिक हमारे पर्यावरण, हमारी मिट्टी, मवेशियों और अंततः माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे अपने भोजन और पानी तक पहुंच चुका है। जब तक आम जनमानस में इस खतरे के प्रति गहरा बोध नहीं होगा और उनकी दैनिक आदतों में बदलाव नहीं आएगा, तब तक कोई भी अभियान शत-प्रतिशत सफल नहीं हो सकता। इसके लिए आवश्यक है कि लोग कपड़े और जूट के थैलों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, प्लास्टिक के गिलासों और प्लेटों के स्थान पर पारंपरिक और पुन: प्रयोज्य बर्तनों का उपयोग करें और घर में ही गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करके सफाई मित्रों को सौंपें।
इस जनआंदोलन को जमीन पर उतारने के लिए नगर निगम देहरादून के सभी सौ वार्डों में तैनात किए गए सेक्टर अधिकारियों को दोहरी भूमिका निभानी होगी। एक तरफ जहां उन्हें लगातार गश्त लगाकर अनधिकृत डंपिंग और प्लास्टिक बिक्री पर रोक लगानी है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों, महिला स्वयं सहायता समूहों, व्यापारियों और शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर व्यापक जागरूकता अभियान भी चलाना होगा। सेक्टर अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने वार्ड के हर नुक्कड़ पर नजर रखें, जहां भी कूड़ा जमा होने की संभावना दिखे, वहां तत्काल विशेष सफाई करवाएं और स्थानीय निवासियों को कचरा प्रबंधन के प्रति सजग करें।
देहरादून केवल एक प्रशासनिक राजधानी नहीं है, बल्कि यह लाखों लोगों का घर और हिमालय के प्रवेश द्वार का एक संवेदनशील हिस्सा है। यदि आज हम अपने कचरे और प्लास्टिक के प्रति सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल कंक्रीट और कचरे का जंगल ही मिलेगा। जिला प्रशासन की यह सख्त पहल एक स्पष्ट चेतावनी भी है और एक खुला आमंत्रण भी। चेतावनी उन मुट्ठी भर लोगों के लिए है जो कानून को ताक पर रखकर शहर की खूबसूरती और स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं, और आमंत्रण उन तमाम जागरूक नागरिकों के लिए है जो अपनी दून घाटी को फिर से हरा-भरा, स्वच्छ और सांस लेने योग्य बनाना चाहते हैं। अब समय आ गया है कि हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि न तो हम खुद सड़क पर प्लास्टिक फेंकेंगे और न ही किसी दूसरे को अपनी धरोहर को गंदा करने देंगे।
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