Dehradun News: पहाड़ों की ठंडी हवाओं और सीढ़ीदार खेतों की हरीतिमा के बीच स्थित सुवाखोली का शांत वातावरण उस दिन एक नई उमंग और हलचल से भरा हुआ था। सदियों से पर्वतीय अंचलों में जीवन यापन की सबसे बड़ी चुनौती खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाना रही है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, मौसम की मार, सीमित सिंचाई संसाधन और जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों के बीच जब कोई ठोस पहल सीधे खेतों की मेढ़ तक पहुंचती है, तो वह केवल एक सरकारी आयोजन नहीं रह जाती, बल्कि किसानों की उम्मीदों को नई दिशा देने वाला पड़ाव बन जाती है। सुवाखोली में सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत आयोजित कृषक रथ का शुभारंभ ऐसा ही एक महत्वपूर्ण अवसर बनकर उभरा, जहां उत्तराखंड के कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्री गणेश जोशी ने बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित होकर कृषक रथ को हरी झंडी दिखाई और पर्वतीय किसानों के भीतर आत्मनिर्भरता का एक नया विश्वास जगाया।

इस अवसर पर मंच से लेकर सभा स्थल तक का दृश्य अत्यंत सजीव था। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे ग्रामीण काश्तकार, महिलाएं और युवा किसान अपनी समस्याओं के समाधान और सरकारी पहलों को प्रत्यक्ष रूप से जानने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहे थे। कृषि मंत्री ने न केवल कृषक रथ को रवाना किया, बल्कि विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत चयनित लाभार्थियों को सीधे चेक बांटे, आधुनिक कृषि यंत्र सौंपे और बदलते मौसम के अनुकूल उन्नत किस्म के बीज प्रदान किए। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि अब योजनाएं सचिवालय के वातानुकूलित कमरों और फाइलों के पन्नों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका वास्तविक वितरण समाज के उन सीधे-सादे श्रमवीरों के हाथों में हो रहा है जो दिन-रात पसीना बहाकर धरती का सीना चीरते हैं।
इस पूरे अभियान की आत्मा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय दर्शन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनकल्याणकारी सेवा भाव से जुड़ी हुई है। कृषि मंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में संचालित यह सेवा पखवाड़ा केवल औपचारिक कार्यक्रमों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि समाज के सबसे पिछले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक शासन की हर योजना का लाभ पहुंचाने का एक ठोस संकल्प है। अंत्योदय का वास्तविक अर्थ ही यही है कि जब तक अंतिम पंक्ति में खड़े निर्धन किसान, सीमांत काश्तकार और सुदूर पहाड़ी ढलानों पर खेती कर रही महिला को उसका हक और सरकारी संबल नहीं मिल जाता, तब तक विकास की यात्रा अधूरी मानी जाएगी। इसी विचार को धरातल पर उतारने के लिए सुवाखोली से रवाना हुआ यह कृषक रथ एक गतिशील पाठशाला और संवाद सेतु के रूप में काम करेगा।
भारत की आत्मा गांवों में बसती है और देश की साठ से सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के संदर्भ में यह बात और भी अधिक संवेदनशील हो जाती है, क्योंकि यहां खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि गांवों के अस्तित्व और पलायन की रोकथाम की सबसे मजबूत दीवार है। यदि पहाड़ों में खेत आबाद रहेंगे, तो घर आबाद रहेंगे और तभी पहाड़ का पानी तथा जवानी दोनों अपने प्रदेश के निर्माण में काम आ सकेंगे। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की धामी सरकार का साझा दृष्टिकोण खेती को घाटे के सौदे से उबारकर एक सम्मानित और लाभकारी उद्यम में बदलना है।

कृषक रथ का मुख्य उद्देश्य सूचना के अभाव को समाप्त करना है। अक्सर पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों तक यह जानकारी समय पर नहीं पहुंच पाती कि सरकार ने उनके लिए कौन सी सब्सिडी योजनाएं शुरू की हैं, मिट्टी की जांच कैसे कराई जा सकती है, या नई फसलों के लिए बीज और तकनीकी मार्गदर्शन कहां से मिल सकता है। सुवाखोली से चला यह रथ गांव-गांव, तोक-तोक और ढाणियों तक पहुंचेगा। इसके माध्यम से विशेषज्ञ किसानों के बीच बैठेंगे, उनकी स्थानीय भाषा और बोली में उनसे बात करेंगे, उनकी शंकाओं का समाधान करेंगे और उन्हें यह समझाएंगे कि आधुनिक कृषि केवल बड़े मैदानी फार्मों का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि छोटी जोतों पर भी नवाचार के माध्यम से उत्पादन को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
उत्तराखंड की भौगोलिक विविधता कृषि विविधीकरण के लिए एक वरदान की तरह है। राज्य सरकार इसी दिशा में बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है। परंपरागत गेहूं और धान की फसलों के साथ-साथ अब उच्च मूल्य वाली फसलों जैसे कीवी, ड्रैगन फ्रूट और राज्य के पारंपरिक मिलेट्स यानी मंडुवा, झंगोरा, चौलाई और गहत को वैश्विक पहचान दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। कभी गरीबों का अनाज समझे जाने वाले मोटे अनाज आज अपनी पौष्टिकता के दम पर देश-विदेश के बड़े बाजारों में प्रीमियम दामों पर बिक रहे हैं। सरकार इन फसलों के उत्पादन, वैज्ञानिक पैकेजिंग और विपणन पर विशेष ध्यान दे रही है, जिससे काश्तकारों को उनकी उपज का पूरा और उचित मूल्य मिल सके।
इसके साथ ही राज्य में एरोमा मिशन एक नई आर्थिक क्रांति का सूत्रधार बन रहा है। कृषि मंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया कि लगभग इक्यानवे हजार किसानों को औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती से जोड़ने का लक्ष्य तय किया गया है। लैवेंडर, रोज़मेरी, लेमनग्रास, डेमस्क रोज़ और कैमोमाइल जैसी फसलें न केवल कम पानी और बंजर भूमि में आसानी से उगती हैं, बल्कि इन्हें जंगली जानवर जैसे बंदर और जंगली सूअर भी नुकसान नहीं पहुंचाते। यह पर्वतीय किसानों की उस सबसे बड़ी पीड़ा का एक व्यावहारिक समाधान है, जिसके कारण कई किसानों ने अपने खेतों को बंजर छोड़ दिया था। एरोमा मिशन के तहत किसानों को न केवल पौधे और तकनीकी सहायता दी जा रही है, बल्कि तेल निष्कासन की इकाइयां स्थापित करके सीधे बाजार से जोड़ने की व्यवस्था भी की जा रही है।
संरक्षित खेती यानी पॉलीहाउस तकनीक भी पर्वतीय अंचलों में कृषि का स्वरूप बदल रही है। सीढ़ीदार खेतों में मौसम की अनिश्चितता, ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश से फसलों को बचाकर बेमौसमी सब्जियां उगाना अब संभव हो चुका है। सरकार द्वारा पॉलीहाउस स्थापना पर दी जा रही भारी सब्सिडी के कारण छोटे किसान भी शिमला मिर्च, चेरी टमाटर, खीरा और रंग-बिरंगे फूलों की खेती करने लगे हैं। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं, बल्कि दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों की मंडियों में उत्तराखंड की जैविक और ताजी सब्जियों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
आधुनिक खेती की नींव वैज्ञानिक समझ पर टिकी होती है। सुवाखोली के कार्यक्रम में कृषि मंत्री ने मृदा स्वास्थ्य और संतुलित पोषण प्रबंधन पर विशेष जोर दिया। अंधाधुंध रासायनिक खादों के प्रयोग से मैदानों की उपजाऊ जमीनें बंजर होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं, लेकिन उत्तराखंड का अधिकांश पर्वतीय क्षेत्र आज भी प्राकृतिक रूप से जैविक है। इस प्राकृतिक पूंजी को संजोए रखना और मिट्टी की जांच कराकर केवल आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलित प्रयोग करना बेहद जरूरी है। कृषि विभाग द्वारा गांव-गांव में मृदा स्वास्थ्य कार्ड बांटे जा रहे हैं, जिससे किसानों को यह स्पष्ट पता चल सके कि उनकी मिट्टी को किस तत्व की आवश्यकता है। इससे खेती की अनावश्यक लागत घटती है और पैदावार की गुणवत्ता में अप्रत्याशित सुधार होता है।

जल संरक्षण की दिशा में भी नए प्रयोग किए जा रहे हैं। पहाड़ों में पानी के प्राकृतिक स्रोत यानी धारे और नौले जलवायु परिवर्तन के कारण सूख रहे हैं। ऐसे समय में स्प्रिंकलर, ड्रिप इरिगेशन और रेनवाटर हार्वेस्टिंग जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को अपनाना समय की सबसे बड़ी मांग है। कम पानी में अधिक फसल लेने की यह तकनीक किसानों को सूखे के संकट से बचाती है। कृषक रथ के माध्यम से किसानों को इन जल संरक्षण तकनीकों की व्यावहारिक कार्यप्रणाली से परिचित कराया जाएगा, ताकि वे सीमित संसाधनों में भी अधिकतम उत्पादन हासिल कर सकें।
रोग और कीट प्रबंधन के क्षेत्र में भी जैविक और समेकित पद्धतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर नीम आधारित घोल, जैविक फफूंदनाशक और फेरोमोन ट्रैप के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे न केवल मिट्टी और भूजल की शुद्धता बनी रहती है, बल्कि उपभोक्ता को भी विषमुक्त खाद्यान्न प्राप्त होता है। जब फसल पूरी तरह विषमुक्त और जैविक प्रमाणित होती है, तो उसका मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई गुना अधिक मिलता है, जिसका सीधा आर्थिक लाभ हमारे किसान भाई-बहनों की जेब तक पहुंचता है।
सुवाखोली में आयोजित इस कार्यक्रम का एक अत्यंत मानवीय और भावनात्मक पहलू यह भी था कि इसमें शासन और जनता के बीच की दूरियां मिटी हुई नजर आईं। जब कृषि मंत्री गणेश जोशी स्वयं किसानों के बीच पहुंचे, उनसे उनकी समस्याओं पर आमने-सामने बात की और लाभार्थियों को मंच पर बुलाकर सम्मानपूर्वक चेक और उन्नत बीज प्रदान किए, तो इससे किसानों में यह गहरा विश्वास पैदा हुआ कि राज्य का नेतृत्व उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। यह विश्वास किसी भी नीति के सफल क्रियान्वयन की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त होती है।
उत्तराखंड के विकास का मार्ग खेतों की मेढ़ों और खलिहानों से होकर ही गुजरता है। केवल सड़कों और बड़े ढांचों के निर्माण से पहाड़ों का समग्र विकास संभव नहीं है, जब तक कि उन पहाड़ों में रहने वाले मूल निवासी आर्थिक रूप से सशक्त, आत्मनिर्भर और स्वावलंबी न बनें। डबल इंजन की सरकार का मूल संकल्प भी यही है कि केंद्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का सीधा समन्वय हर झोपड़ी और हर खेत तक पहुंचे।
सुवाखोली से रवाना हुआ यह कृषक रथ केवल लोहे और पहियों से बना एक वाहन नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर उत्तराखंड के निर्माण का एक चलता-फिरता प्रतीक है। यह रथ हर उस किसान के दरवाजे तक पहुंचेगा जो निराशा के दौर से गुजर रहा था, यह हर उस युवा को खेती में भविष्य दिखाएगा जो रोजगार की तलाश में शहर की ओर भागने की सोच रहा था, और यह हर उस महिला का संबल बनेगा जो सुबह से शाम तक खेतों में कठिन परिश्रम करती है। आधुनिक तकनीक, सरकारी सहयोग, पारदर्शी व्यवस्था और किसानों की अटूट मेहनत का यह संगम निश्चित रूप से आने वाले समय में उत्तराखंड को देश के सबसे अग्रणी और समृद्ध कृषि राज्यों की पंक्ति में खड़ा करेगा। सुवाखोली से उठी यह नई चेतना पर्वतीय खेती के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्धि और स्वाभिमान का एक नया मार्ग प्रशस्त करेगी।
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