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CM Dhami News: उत्तराखंड में फंसे ट्रैकर्स सीएम धामी पहुंचे आपातकालीन केंद्र, बचाव कार्य तेज

On: September 29, 2026 2:44 AM
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CM Dhami News: उत्तराखंड में फंसे ट्रैकर्स सीएम धामी पहुंचे
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CM Dhami News: देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुषमा, शांत वादियों और गगनचुंबी बर्फीली चोटियों के लिए संपूर्ण विश्व में विशिष्ट स्थान रखती है। देश और दुनिया के कोने-कोने से साहसिक खेलों के शौकीन, पर्वतारोही और प्रकृति प्रेमी इन दुर्गम शिखरों को छूने का सपना लेकर यहाँ खिंचे चले आते हैं। ट्रैकिंग और पर्वतारोहण केवल एक खेल अथवा शौक नहीं है, बल्कि यह मानव के अदम्य साहस, धैर्य और प्रकृति के साथ एकाकार होने की आध्यात्मिक यात्रा भी है। जब कोई पर्वतारोही समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित संकरे रास्तों, हिमनदों और बर्फीले तूफानों के बीच कदम बढ़ाता है, तो वह जानता है कि प्रकृति जितनी उदार है, उतनी ही अप्रत्याशित और कठोर भी हो सकती है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम कब करवट बदल ले, यह पूर्वानुमान लगाना आधुनिक मौसम विज्ञान के लिए भी अत्यंत जटिल कार्य साबित होता है।

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Photo- CM Dhami State Emergency Uttarkashi Rescue Operation

हाल ही में राज्य के उच्च हिमालयी इलाकों में अचानक बदले मौसमी चक्र, अप्रत्याशित हिमपात और तापमान में तीव्र गिरावट के कारण विभिन्न ट्रेक रूटों पर निकले ट्रैकर्स, माउंटेनियर्स और उनके साथ गए स्थानीय गाइड व पोर्टर्स संकट में फंस गए। पर्वतों के बीच जब सफेद चादर बिछ जाती है और बर्फीली हवाएं रफ्तार पकड़ती हैं, तो पगडंडियों के निशान मिट जाते हैं। मोबाइल नेटवर्क की गैर-मौजूदगी और खाद्य सामग्री की सीमित उपलब्धता के बीच हर बीतता क्षण जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा को धुंधला करने लगता है। ऐसी विकट मानवीय परिस्थिति में जब किसी राज्य का नेतृत्व स्वयं सामने आकर पूरी संवेदनशीलता और दृढ़ संकल्प के साथ कमान संभालता है, तो विपदा में घिरे प्रत्येक व्यक्ति और उनके चिंतित परिजनों के मन में सुरक्षा का अटूट विश्वास जाग उठता है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के आधिकारिक प्रवास पर थे। जैसे ही उन्हें प्रदेश के उच्च हिमालयी जनपदों, विशेषकर उत्तरकाशी और बागेश्वर में कई ट्रैकिंग दलों के भारी मौसम के बीच फंसने की प्राथमिक सूचना मिली, उन्होंने अपने अन्य सभी पूर्व-निर्धारित कार्यक्रमों को तत्काल सीमित किया और दून लौटते ही बिना किसी विश्राम अथवा औपचारिकता के सीधे आईटी पार्क स्थित राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र का रुख किया। हवाई अड्डे से सीधे आपदा कंट्रोल रूम पहुंचने का यह कदम केवल एक प्रशासनिक प्रोटोकॉल नहीं था, बल्कि यह उस संवेदनशील जननायक के दायित्व-बोध का सजीव प्रमाण था, जो संकट की घड़ी में अपनी जनता और राज्य में आए मेहमानों के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहता है।

राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र का माहौल सामान्य दिनों की तुलना में अत्यंत हलचल भरा और तनावपूर्ण था। स्क्रीन पर उपग्रह से प्राप्त मौसम के चित्र, जीपीएस ट्रैकिंग डेटा, जिलों से लगातार आ रही वायरलेस सूचनाएं और राहत दलों के समन्वय की आवाजें गूंज रही थीं। मुख्यमंत्री के पहुंचते ही पूरा प्रशासनिक अमला अतिरिक्त मुस्तैदी के साथ सक्रिय हो गया। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों के साथ आपातकालीन समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं, लेकिन निर्णयों में अद्वितीय स्पष्टता और दृढ़ता थी। उन्होंने अधिकारियों को सीधे शब्दों में आगाह किया कि यह समय किसी भी प्रकार की कागजी खानापूर्ति अथवा औपचारिकताओं में उलझने का नहीं है। जब जिंदगी और मौत का सवाल हो, तो प्रशासन का हर निर्णय त्वरित, निर्णायक और त्रुटिहीन होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि फंसे हुए प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षित और सकुशल वापसी सरकार की सर्वोच्च और निर्विवाद प्राथमिकता है।

बैठक के दौरान राज्य के आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने मुख्यमंत्री को वर्तमान वस्तुस्थिति का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। सचिव ने अवगत कराया कि विभिन्न ट्रेकिंग रूटों से प्राप्त ग्राउंड रिपोर्ट्स और जिला प्रशासन से संकलित आंकड़ों के अनुसार कुल 179 ट्रैकर्स और माउंटेनियर्स के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फंसे होने की पुष्टि हुई थी। यह कोई सामान्य इलाका नहीं था, बल्कि समुद्र तल से 12 हजार से 16 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित वे क्षेत्र थे जहां ऑक्सीजन की मात्रा पहले ही कम होती है और न्यूनतम तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है। इन 179 लोगों में से 136 पर्वतारोही उत्तरकाशी जनपद के विभिन्न कठिन ट्रेक पर थे, जबकि 43 लोग कुमाऊं मंडल के बागेश्वर जनपद के अंतर्गत आने वाले प्रसिद्ध पिंडारी ग्लेशियर और सुंदरढूंगा क्षेत्र के उच्च ट्रेक मार्गों पर मौजूद थे।

उत्तरकाशी की भौगोलिक संरचना अपनी विशिष्टता के साथ-साथ अत्यंत चुनौतीपूर्ण भी है। यहां के रास्ते खड़े ढलानों, गहरी खाइयों और घने जंगलों से होकर गुजरते हैं। मुख्यमंत्री ने उत्तरकाशी के अभियान पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए अधिकारियों से एक-एक दल की सही भौगोलिक स्थिति और स्वास्थ्य संबंधी स्थिति की जानकारी ली। अधिकारियों ने बताया कि उत्तरकाशी में त्वरित कार्रवाई करते हुए एसडीआरएफ, वन विभाग और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीमों ने अब तक 40 पर्वतारोहियों को सुरक्षित बेस कैंप तक पहुंचा दिया है। इन लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य परीक्षण के बाद आवश्यक भोजन, गर्म कपड़े और दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। वहीं एक दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि फंसे हुए 136 लोगों में से 40 अनुभवी पर्वतारोहियों के एक दल ने वर्तमान में रेस्क्यू कराने से इनकार कर दिया है। उस दल के पास पर्याप्त राशन, उच्च श्रेणी के तंबू और तकनीकी उपकरण मौजूद थे, जिसके चलते उन्होंने मौसम सामान्य होने पर अपनी तय यात्रा को आगे जारी रखने की इच्छा व्यक्त की।

मुख्यमंत्री ने इस संदर्भ में अधिकारियों को स्पष्ट हिदायत दी कि यद्यपि पर्वतारोहियों के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन प्रशासन उनकी स्थिति से अपनी आंखें नहीं फेर सकता। जो लोग अपनी यात्रा जारी रखना चाहते हैं, उन पर भी लगातार सैटेलाइट फोन, वायरलेस और स्थानीय गाइडों के माध्यम से 24 घंटे नजर रखी जाए। यदि मौसम पुनः बिगड़ता है अथवा उन्हें किसी आपात स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो बिना समय गंवाए उन्हें तुरंत निकाला जाना चाहिए। वहीं उत्तरकाशी के शेष बचे अन्य ट्रैकर्स, जो विषम परिस्थितियों के कारण आगे बढ़ने में असमर्थ थे, उन्हें निकालने के लिए अभियान को सुबह 6 बजे से पूरी ताकत के साथ फिर से शुरू करने की रणनीति तय की गई।

पहाड़ों में बचाव अभियान चलाना मैदानी इलाकों की तुलना में शत-प्रतिशत भिन्न होता है। यहां शाम 4 बजे के बाद तेज हवाएं, कोहरा और बादलों का जमावड़ा हवाई उड़ानों को पूरी तरह असंभव बना देता है। शाम के समय कम दृश्यता के चलते हेलीकॉप्टरों का संचालन भारी जोखिम भरा हो जाता है। इसी तकनीकी और सुरक्षात्मक कारण से हवाई अभियानों को अगले दिन की पहली किरण के साथ शुरू करने का व्यावहारिक निर्णय लिया गया। मुख्यमंत्री ने सीधे उत्तरकाशी के जिलाधिकारी से फोन पर वार्ता की और धरातल की वास्तविक कठिनाइयों को समझा। जिलाधिकारी ने बताया कि ग्राउंड टीमें पूरी तरह तैयार हैं और भोर होते ही सबसे पहले उन संवेदनशील पॉकेट्स में हेलीकॉप्टरों को उतारा जाएगा जहां लोगों के स्वास्थ्य बिगड़ने अथवा ठंड की चपेट में आने की आशंका सबसे अधिक है।

मुख्यमंत्री ने इस पूरे महा-अभियान में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण जोड़ा। उन्होंने अधिकारियों को कड़े शब्दों में निर्देशित किया कि रेस्क्यू अभियान केवल पर्यटकों अथवा बाहरी पर्वतारोहियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके साथ गए स्थानीय गाइडों, पोर्टर्स (सामान ढोने वाले स्थानीय युवाओं) और खच्चर संचालकों की सुरक्षा को भी ठीक उसी स्तर पर सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। इतिहास गवाह है कि कई बार उच्च हिमालयी अभियानों में स्थानीय पोर्टर्स को उपेक्षित कर दिया जाता है, जबकि वे ही पर्वतारोहियों की रीढ़ होते हैं। मुख्यमंत्री का यह निर्देश उत्तराखंड के उन मेहनतकश युवाओं के प्रति गहरी संवेदना को दर्शाता है जो अपनी जान जोखिम में डालकर इन साहसिक अभियानों को सफल बनाते हैं। उन्होंने कहा कि संसाधन सीमित होने का कोई बहाना नहीं चलेगा, जितनी भी अतिरिक्त जरूरतें हों, उन्हें तत्काल पूरा किया जाए।

हवाई बचाव अभियान को निर्णायक रूप देने के लिए मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया कि आपदा प्रबंधन विभाग और नागरिक उड्डयन विभाग के समन्वय से कुल 8 अत्याधुनिक हेलीकॉप्टरों को पूरी तरह तैनात कर दिया गया है। इन हेलीकॉप्टरों को देहरादून, उत्तरकाशी और चमोली के विभिन्न अग्रिम हेलीपैडों पर अलर्ट पर रखा गया है ताकि मौसम खुलते ही वे एक साथ कई दिशाओं से उड़ान भर सकें। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि यदि मौसम में थोड़ा सा भी सुधार दिखे, तो हवाई संसाधनों का उपयोग बिना किसी देरी के शत-प्रतिशत क्षमता के साथ किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने एक दूरदर्शी और जीवनरक्षक निर्देश देते हुए विशेष हेली एंबुलेंस को भी स्टैंडबाय मोड पर रखने का आदेश दिया। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हाइपोथर्मिया और एक्यूट माउंटेन सिकनेस (फेफड़ों व मस्तिष्क में पानी भरना) जैसी घातक बीमारियों का खतरा सबसे अधिक रहता है। ऐसे में यदि किसी पर्वतारोही की तबीयत अचानक गंभीर होती है, तो हेली एंबुलेंस के माध्यम से उसे सीधे एम्स ऋषिकेश अथवा देहरादून के बड़े चिकित्सालयों में तत्काल स्थानांतरित किया जा सकेगा।

समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री का दृष्टिकोण केवल तात्कालिक संकट के निवारण तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने इस बात पर गहरा बल दिया कि उत्तराखंड पूरे देश का मुकुट है और यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु, पर्यटक और पर्वतारोही की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की नैतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी है। उन्होंने सभी सीमांत जनपदों के जिलाधिकारियों, पुलिस अधीक्षकों और एसडीआरएफ के कमांडेंटों को स्पष्ट आदेश जारी किए कि वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में अति-संवेदनशील ट्रेक मार्गों पर विशेष निगरानी चौकियां स्थापित करें। भविष्य में बिना पूर्ण चिकित्सकीय जांच, बिना आधुनिक संचार उपकरणों और बिना पंजीकृत गाइडों के किसी भी दल को उच्च हिमालयी व जोखिम भरे मार्गों पर जाने की अनुमति न दी जाए। प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन पूर्व-चेतावनी प्रणालियों, स्थानीय मौसम नेटवर्क और कड़े नियमों के अनुपालन से जनहानि के जोखिम को शून्य पर जरूर लाया जा सकता है।

आपदा प्रबंधन केंद्र में आयोजित इसी उच्चस्तरीय बैठक के दूसरे चरण में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्तमान में संचालित ऐतिहासिक चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं की भी बिंदुवार समीक्षा की। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की आर्थिकी, आस्था और सांस्कृतिक अस्मिता की प्राणवायु है। लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धामों के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। मुख्यमंत्री ने यात्रा मार्गों पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पेयजल की उपलब्धता, विश्राम स्थलों की स्थिति और सड़क परिवहन के सुचारु संचालन की विस्तृत जानकारी ली। उन्होंने कहा कि यात्रा मार्गों पर श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं होनी चाहिए और प्रशासन का व्यवहार पूरी तरह सहयोगी और मानवीय होना चाहिए।

इस समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री ने एक अत्यंत संवेदनशील और पर्यावरणीय दृष्टि से अनिवार्य मुद्दे पर अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया, जो कि चारधाम और उच्च हिमालयी धार्मिक व पर्यटन स्थलों पर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का है। लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आगमन के साथ ही पहाड़ों की नाजुक पारिस्थितिकी पर भारी दबाव पड़ता है। प्लास्टिक कचरा, खाद्य सामग्री के अवशेष और अजैविक अपशिष्ट यदि अनियंत्रित ढंग से हिमालय की नदियों, बुग्यालों और घाटियों में फेंके जाएं, तो यह न केवल पर्यावरण के लिए विनाशकारी है, बल्कि हमारी देवतुल्य आस्था पर भी गहरा आघात है।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट रूप से चेताया कि अब समय आ गया है जब हम कचरा प्रबंधन के पारंपरिक और तात्कालिक तौर-तरीकों से आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि यात्रा सीजन के दौरान अस्थायी तौर पर कचरा साफ कर देना काफी नहीं है। हमें आने वाले दशकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक दीर्घकालिक, वैज्ञानिक और स्थायी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लान तैयार करना होगा। उन्होंने नगर निकायों, जिला पंचायतों, वन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आपसी तालमेल बैठाकर एक समग्र कार्ययोजना बनाने का आदेश दिया। इस योजना में कचरे के उद्गम स्थल पर ही पृथक्करण, कंपैक्टर मशीनों की स्थापना, प्लास्टिक कचरे की रीसाइक्लिंग और रि-साइकिल न होने वाले कचरे के सुरक्षित निस्तारण की वैज्ञानिक विधियों को शामिल किया जाना अनिवार्य है।

मुख्यमंत्री का यह मानना है कि उत्तराखंड का आर्थिक विकास और उसका पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए। यदि हिमालय का पर्यावरण नष्ट हो गया, तो पर्यटन और तीर्थाटन का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। इसलिए धामों की दिव्यता, पवित्रता और नैसर्गिक सौंदर्य को बनाए रखना प्रत्येक नागरिक और प्रशासनिक अधिकारी का साझा कर्तव्य है। उन्होंने तीर्थ पुरोहितों, स्थानीय व्यापार मंडलों, होटल एसोसिएशनों और स्वयंसेवी संस्थाओं को भी इस स्वच्छता महा-अभियान में सक्रिय भागीदार बनाने पर बल दिया। जब तक जनचेतना जागृत नहीं होगी और जनसहभागिता नहीं जुड़ेगी, तब तक कोई भी सरकारी नीति पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकती।

बैठक के अंतिम चरण में मुख्यमंत्री ने राज्य की संपूर्ण प्रशासनिक मशीनरी को 24 घंटे सतर्क रहने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि चाहे पुलिस विभाग हो, स्वास्थ्य महकमा हो, लोक निर्माण विभाग हो अथवा राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ)—सभी विभागों को एक साझा सूत्र में बंधकर काम करना होगा। किसी भी आपातकालीन स्थिति में सूचना का आदान-प्रदान सेकंडों में होना चाहिए ताकि राहत दल बिना किसी संशय के तुरंत घटनास्थल की ओर कूच कर सकें। संवेदनशील क्षेत्रों में वायरलेस नेटवर्क की मजबूती, ड्रोन कैमरों द्वारा दुर्गम इलाकों की रेकी और मौसम विभाग के साथ लगातार समन्वय बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया।

देहरादून के आईटी पार्क स्थित कंट्रोल रूम से मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए ये त्वरित और कड़े निर्देश यह दर्शाते हैं कि एक संवेदनशील सरकार किस प्रकार संकट के समय अपनी जनता के साथ हर कदम पर मौजूद रहती है। दिल्ली से उतरते ही विश्राम त्याग कर सीधे आपदा कक्ष में पहुंचकर राहत कार्यों की स्वयं कमान संभालना प्रशासनिक अधिकारियों में भी एक नए उत्साह और तत्परता का संचार करता है। जब शीर्ष नेतृत्व स्वयं एक-एक व्यक्ति की सलामती के लिए गंभीर हो, तो निचले स्तर पर किसी भी प्रकार की लापरवाही या लेटलतीफी की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।

हिमालय की बर्फीली वादियों में फंसे पर्वतारोहियों के लिए सुबह का सूरज केवल एक नई भोर लेकर नहीं आएगा, बल्कि राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों, अदम्य साहसी बचाव कर्मियों और आसमान में गूंजते हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट के साथ नई जिंदगी की उम्मीद लेकर आएगा। उत्तराखंड सरकार का यह त्वरित और संवेदनशील कदम निश्चित रूप से राज्य में आने वाले हर पर्यटक और नागरिक के मन में यह विश्वास गहरा करता है कि देवभूमि में विपदा चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उनकी सुरक्षा और गरिमा की रक्षा के लिए शासन का संकल्प सदैव अडिग है।

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