CM Helpline: लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनसमस्याओं का समयबद्ध, निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण समाधान ही किसी भी संवेदनशील प्रशासन की वास्तविक पहचान होता है। जब शासन की कल्याणकारी योजनाएं और जनहित से जुड़ी घोषणाएं केवल फाइलों के पन्नों में सिमट कर रह जाएं, तो जनता का विश्वास प्रशासनिक तंत्र से डगमगाने लगता है। इसी विश्वास को सुदृढ़ करने और तंत्र में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के उद्देश्य से देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने कलेक्ट्रेट सभागार में एक अत्यंत महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज आम जनमानस की शिकायतें और मुख्यमंत्री द्वारा की गई विभिन्न विकास योजनाओं की घोषणाओं के क्रियान्वयन की वर्तमान प्रगति थी। जिलाधिकारी ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि जनता से जुड़े मामलों में लेटलतीफी, गैर-जिम्मेदारी और अनावश्यक औपचारिकता किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं की जाएगी।

बैठक के प्रारंभ से ही जिलाधिकारी का रुख अत्यंत गंभीर और तल्ख रहा। उन्होंने विभिन्न विभागों के अधिकारियों की कार्यप्रणाली की बिंदुवार पड़ताल करते हुए यह रेखांकित किया कि सरकारी सेवाओं का मूल आधार जनसेवा है। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि शिकायतों के निस्तारण में केवल संख्यात्मक आंकड़े बढ़ाने की प्रवृत्ति पर तत्काल विराम लगना चाहिए। अक्सर यह देखा जाता है कि पोर्टल पर किसी शिकायत को निस्तारित दिखाने की होड़ में उसकी मूल समस्या को अनसुलझा छोड़ दिया जाता है। जिलाधिकारी ने इस कार्यशैली पर गहरा ऐतराज जताते हुए कहा कि निस्तारण की गुणवत्ता और नागरिक का वास्तविक संतोष ही किसी विभाग की कार्यकुशलता का एकमात्र पैमाना माना जाएगा।
सीएम हेल्पलाइन की समीक्षा के दौरान यह तथ्य उजागर हुआ कि कई विभागों में शिकायतें 36 दिन से लेकर 180 दिन यानी करीब छह माह तक बिना किसी ठोस प्रगति के लंबित पड़ी हुई हैं। इस घोर प्रशासनिक शिथिलता पर जिलाधिकारी ने गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने सभी संबंधित विभागाध्यक्षों को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए निर्देश दिया कि वे ऐसी तमाम पुरानी शिकायतों की प्राथमिकता के आधार पर गहन समीक्षा करें और मात्र दो दिन के भीतर विस्तृत आख्या कलेक्ट्रेट को उपलब्ध कराएं। उन्होंने अधिकारियों को सचेत किया कि यह रिपोर्ट मात्र एक पन्ने की औपचारिक टिप्पणी नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें इस बात का स्पष्ट और तर्कसंगत ब्योरा दर्ज होना चाहिए कि इतने लंबे समय तक मामले को क्यों अटकाया गया और उसका स्थायी समाधान कब तक सुनिश्चित होगा।

डिजिटल जनसुनवाई प्रणालियों में सबसे बड़ी विसंगति शिकायतों को ‘फोर्स क्लोज’ करने की सामने आती रही है। कई बार ऐसा होता है कि जब किसी जटिल समस्या का समाधान विभाग तय समय सीमा में नहीं कर पाता, तो तकनीकी या प्रक्रियात्मक आधार पर शिकायत को जबरन बंद कर दिया जाता है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने इस अनैतिक और लापरवाह परिपाटी पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश दिया। उन्होंने व्यवस्था दी कि अब से जिस किसी भी शिकायत को फोर्स क्लोज की श्रेणी में डाला जाएगा, उसके साथ संबंधित विभागाध्यक्ष का स्वहस्ताक्षरित प्रमाणपत्र संलग्न करना अनिवार्य होगा। इस प्रमाणपत्र में यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित करना होगा कि समस्या का विधिक या व्यावहारिक समाधान किन ठोस कारणों से संभव नहीं हो सका अथवा की गई कार्रवाई का वास्तविक धरातल क्या है।
प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देने की दिशा में यह कदम मील का पत्थर साबित हो सकता है। यदि कोई अधिकारी बिना उचित जांच, बिना शिकायतकर्ता से संवाद किए या बिना ठोस आधार के किसी प्रकरण को बंद करने का प्रयास करेगा, तो व्यक्तिगत तौर पर उसकी जवाबदेही तय की जाएगी। जिलाधिकारी ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि पोर्टल पर लाल से हरा निशान बना देने भर से कर्तव्य की इतिश्री नहीं समझी जाएगी। शिकायतकर्ता को प्रत्यक्ष रूप से यह महसूस होना चाहिए कि शासन ने उसकी परेशानी को संवेदनशीलता से सुना और नियमानुसार उसका समुचित हल निकाला। इस नई व्यवस्था से अधिकारियों की जवाबदेही सीधे तौर पर फाइल और डिजिटल पोर्टल दोनों पर सुनिश्चित होगी।
बैठक का दूसरा सर्वाधिक अहम पहलू मुख्यमंत्री घोषणाओं की प्रगति की समीक्षा का रहा। वर्ष 2025 से लंबित चली आ रही घोषणाओं की धीमी गति पर जिलाधिकारी ने विशेष रूप से अप्रसन्नता प्रकट की। मुख्यमंत्री स्तर से की जाने वाली घोषणाएं राज्य के समग्र विकास, बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण और दूरदराज के क्षेत्रों में जनसुविधाओं के विस्तार से सीधे जुड़ी होती हैं। ऐसे में यदि ये परियोजनाएं महीनों तक विभागीय लालफीताशाही और स्वीकृतियों के फेर में फंसी रहें, तो इससे विकास की गति सीधे तौर पर बाधित होती है। इस संदर्भ में जिलाधिकारी ने लचर प्रदर्शन करने वाले विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दिए।
कारण बताओ नोटिस जारी करने के साथ ही उन्होंने सभी कार्यदायी संस्थाओं और संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे लंबित घोषणाओं के क्रियान्वयन हेतु एक स्पष्ट, व्यावहारिक और चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करें। हर परियोजना के लिए एक निश्चित समयसीमा तय की जाए ताकि कार्यों की नियमित और वास्तविक मॉनिटरिंग संभव हो सके। जिलाधिकारी ने आगाह किया कि समीक्षा की यह प्रक्रिया अब लगातार चलेगी और यदि तय समयसीमा के भीतर धरातल पर काम दिखाई नहीं दिया, तो केवल पत्राचार तक सीमित न रहकर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
उत्तराखंड जैसे भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से संवेदनशील राज्य में अंतरविभागीय समन्वय की कमी अक्सर विकास कार्यों में बड़ी बाधा बनती है। सड़क, पेयजल, विद्युत, वन भूमि हस्तांतरण और लोक निर्माण से जुड़े कई ऐसे मामले होते हैं जहां एक विभाग की अनापत्ति के बिना दूसरा विभाग आगे नहीं बढ़ पाता। जिलाधिकारी ने बैठक में इस समन्वय शून्यता पर भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने सभी विभागीय प्रभारियों को आपस में सतत संवाद बनाए रखने और संयुक्त स्थलीय निरीक्षण करने के निर्देश दिए ताकि फाइलें विभागों के बीच महीनों तक धूल न फांकें। किसी भी जनहितकारी योजना में दूसरे विभाग की अनुमति या तकनीकी अड़चन को बहाना बनाकर काम रोकने की प्रवृत्ति को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया गया।
इस पूरी कवायद का सार केवल प्रशासनिक आंकड़ों को दुरुस्त करना नहीं, बल्कि शासन की कल्याणकारी मंशा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन जनसंवाद का एक ऐसा सेतु है जिसके जरिए एक सामान्य नागरिक बिना किसी बिचौलिए या सिफारिश के सीधे सरकार तक अपनी गुहार लगा सकता है। यदि इस तंत्र में भी आम आदमी को निराशा हाथ लगे, तो पूरी सुशासन व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान का यह सख्त हस्तक्षेप इस बात का परिचायक है कि देहरादून प्रशासन अब जनसमस्याओं के निस्तारण में गति, गुणवत्ता और मानवीय दृष्टिकोण को सर्वोपरि रखने के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है। आने वाले दिनों में दो दिन की दी गई मियाद और फोर्स क्लोज के कड़े नियमों का असर जिले के प्रशासनिक तंत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देने की उम्मीद है।
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