ताजा खबरें क्राइम लाइफस्टाइल मौसम खेल बॉलीवुड हॉलीवुड जॉब - एजुकेशन स्वास्थ्य राज्य देश विदेश राशिफल लाइफ - साइंस धर्म अन्य

---Advertisement---

Dehradun News: ‘देहरादून अगेंस्ट ड्रग्स मैराथन’ को कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने किया फ्लैग ऑफ

On: September 28, 2026 4:02 AM
Follow Us:
Dehradun News: ‘देहरादून अगेंस्ट ड्रग्स मैराथन’ को कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने किया फ्लैग ऑफ
---Advertisement---

Dehradun News: सुबह की ठंडी और ताजी बयार जब दून घाटी की तलहटियों से टकराकर शहर के चौराहों से गुजरती है, तो आमतौर पर देहरादून एक शांत, सुकून भरे मिजाज में अंगड़ाई लेता दिखाई देता है। मगर इस सुबह की हवा में सिर्फ सुकून नहीं, बल्कि एक अदम्य ऊर्जा, एक जिद और अपने भविष्य को बचाने की सामूहिक ललक महसूस हो रही थी। हजारों की तादाद में जूते सड़क पर एक लय में पड़ रहे थे, सीने में धड़कते दिल एक साझा संकल्प से भरे थे और जुबां पर केवल एक ही गूंज थी—रन फॉर लाइफ, से नो टू ड्रग्स। अवसर था ‘डीएडी 2.0 – देहरादून अगेंस्ट ड्रग्स मैराथन 2026’ का, जिसे प्रदेश के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह केवल कुछ किलोमीटर की साधारण दौड़ नहीं थी, बल्कि नशे के उस अदृश्य जाल के खिलाफ एक जोरदार हुंकार थी, जिसने पिछले कुछ वर्षों में हमारी देवभूमि की शांत फिजाओं में जहर घोलने की नापाक कोशिश की है।

image 190
Photo- Minister Ganesh Joshi Flag Off Fitness Marathon 

मैराथन के शुरुआती बिंदु पर जब कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी पहुंचे, तो उनके चेहरे पर केवल एक जनप्रतिनिधि की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अभिभावक की गहरी चिंता और उम्मीद साफ झलक रही थी। उन्होंने जब सफेद झंडी लहराई, तो उसके पीछे युवाओं का जो सैलाब दौड़ा, उसने यह साबित कर दिया कि जब किसी समाज की युवा पीढ़ी अपने अस्तित्व पर मंडराते खतरे को पहचान लेती है, तो बदलाव की रफ्तार को कोई रोक नहीं सकता। मंत्री जोशी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए बेहद मार्मिक और व्यावहारिक शब्दों में इस बात को रेखांकित किया कि नशा केवल एक व्यक्ति के शरीर को खोखला नहीं करता, बल्कि वह पूरे परिवार की खुशियों, उसकी आर्थिक रीढ़ और अंततः समूचे समाज की बुनियाद को हिलाकर रख देता है। उनका यह कहना कि नशामुक्त देहरादून और नशामुक्त उत्तराखंड का सपना केवल सरकारी विज्ञापनों या पुलिस के डंडों से पूरा नहीं हो सकता, बल्कि इसे जनभागीदारी के जरिए एक जनांदोलन बनाना होगा, वहां मौजूद हर माता-पिता और युवा के दिल को छू गया।

नशे की समस्या आज किसी एक शहर, राज्य या तबके तक सीमित नहीं है, लेकिन जब यह समस्या उत्तराखंड जैसी पावन भूमि को अपनी गिरफ्त में लेने की कोशिश करती है, तो दर्द और ज्यादा गहरा हो जाता है। सदियों से संतों, तपस्वियों, बहादुर सैनिकों और कुदरती खूबसूरती के लिए जानी जाने वाली यह घाटी अचानक सिंथेटिक ड्रग्स, स्मैक और तमाम तरह के नशीले पदार्थों की अवैध मंडियों के निशाने पर कैसे आ गई, यह एक ऐसा सवाल है जो हर संवेदनशील नागरिक को झकझोरता है। तेजी से होता शहरीकरण, पहाड़ों से मैदानों की ओर बढ़ता पलायन, अंधी दौड़ में पीछे छूटते पारंपरिक पारिवारिक मूल्य और आधुनिक जीवनशैली का मानसिक दबाव—इन सबने मिलकर हमारी युवा पीढ़ी के सामने एक ऐसा खालीपन पैदा कर दिया है, जिसे भरने के लिए कई बार भटके हुए कदम नशे की गर्त में उतर जाते हैं।

ऐसी नाजुक परिस्थितियों में दून यूथ फाउंडेशन द्वारा आयोजित यह ‘डीएडी मैराथन’ उम्मीद की एक बेहद चमकदार किरण बनकर उभरी है। संस्था के आयोजकों ने इस आयोजन की रूपरेखा केवल एक खेल प्रतियोगिता के तौर पर नहीं, बल्कि एक सामाजिक उपचार के रूप में तैयार की। मैराथन में सिर्फ पेशेवर धावक ही शामिल नहीं हुए, बल्कि स्कूल और कॉलेज के छात्र, युवतियां, सेना और अर्धसैनिक बलों के जवान, वरिष्ठ नागरिक और गृहणियां भी कंधे से कंधा मिलाकर दौड़ीं। हर उम्र और वर्ग के लोगों का यह संगम इस बात का पुख्ता प्रमाण था कि नशा अगर एक साझा संकट है, तो उसके खिलाफ लड़ाई भी साझी ही होगी। विभिन्न दूरी और श्रेणियों में आयोजित इस दौड़ ने शहर के मुख्य मार्गों को एक जीवंत रंगमंच में तब्दील कर दिया, जहां हर कोई एक दूसरे की हिम्मत बढ़ा रहा था और पसीने की हर बूंद के साथ यह संदेश दोहरा रहा था कि जिंदगी से बढ़कर कोई नशा नहीं हो सकता।

कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने अपने संबोधन में जिस सबसे अहम नुक्ते पर जोर दिया, वह था युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ना। जब किसी समाज के नौजवानों के पास खेलने के मैदान नहीं होते, जब उनके पास अपनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को व्यक्त करने के लिए रचनात्मक मंच नहीं होते, तब निराशा और भटकाव बहुत तेजी से पैर पसारता है। मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर हमें अपने बच्चों को नशे की अंधेरी गलियों में जाने से रोकना है, तो हमें उन्हें खेल के मैदानों, योग की कक्षाओं, संगीत के सुरों और फिटनेस की संस्कृति की ओर लौटाना होगा। एक स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है, और जिस युवा ने नियमित कसरत की थकान के बाद मिलने वाले प्राकृतिक आनंद को महसूस कर लिया हो, वह कभी भी किसी रासायनिक नशे का गुलाम नहीं बन सकता।

इस मैराथन का जमीनी प्रभाव केवल उस दिन के कुछ घंटों तक सीमित नहीं रहने वाला है। सड़क पर दौड़ते उन हजारों युवाओं को देखकर यह विश्वास गहरा होता है कि हमारी आने वाली पीढ़ी पूरी तरह से लापरवाह या दिशाहीन नहीं है। उसे बस एक सही नेतृत्व, एक सुरक्षित माहौल और खुले मंच की दरकार है। आयोजकों ने जिस संजीदगी के साथ इस पूरे कार्यक्रम का समन्वय किया, उसमें उत्तराखंड के भविष्य के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता साफ नजर आई। कार्यक्रम में मौजूद डॉक्टरों और मनोचिकित्सकों ने भी अनौपचारिक बातचीत में इस बात को स्वीकारा कि दौड़ने और एरोबिक गतिविधियों से मस्तिष्क में एंडोर्फिन और डोपामाइन जैसे हार्मोनों का प्राकृतिक स्राव होता है, जो तनाव, चिंता और अवसाद को दूर भगाने में रामबाण साबित होते हैं। आज की तारीख में डिप्रेशन और अकेलापन युवाओं को नशे की ओर धकेलने वाले सबसे बड़े छिपे हुए कारण हैं, और मैराथन जैसी गतिविधियां उस मानसिक अकेलेपन को तोड़कर सामूहिक अपनेपन का अहसास कराती हैं।

प्रशासनिक स्तर पर भी इस आयोजन के बड़े मायने हैं। जब सरकार के वरिष्ठ मंत्री इस प्रकार के अभियानों में सीधे तौर पर सड़क पर उतरते हैं, तो इससे पुलिस और खुफिया तंत्र को भी एक सख्त संदेश जाता है कि नशे के सौदागरों के खिलाफ किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2025-2026 तक राज्य को नशामुक्त बनाने का जो व्यापक संकल्प लिया है, उसकी सफलता की असली कसौटी ऐसे ही सामुदायिक आयोजनों की निरंतरता में छिपी है। केवल तस्करों को जेल भेजने से समस्या की जड़ खत्म नहीं होगी; हमें मांग के उस चक्र को भी तोड़ना होगा जो युवाओं के बीच नशे की खपत को बढ़ाता है। मांग तभी टूटेगी जब युवा न केवल खुद नशे को ना कहेगा, बल्कि अपने आसपास किसी दोस्त या साथी को इस दलदल में फंसने से बचाने के लिए एक सजग पहरेदार की तरह खड़ा रहेगा।

मैराथन के समापन पर पदक जीतने वाले विजेताओं के चेहरों पर जो चमक थी, वह किसी भी महंगे नशे के नकली सुरूर से कहीं अधिक वास्तविक, पावन और प्रेरक थी। लेकिन इस दौड़ में हर वह व्यक्ति विजेता था जिसने सुबह की सुस्ती को त्यागकर अपने जूतों के फीते कसे और समाज को यह बताया कि वह नशे के खिलाफ इस निर्णायक जंग में चुप बैठने वाला नहीं है। दून यूथ फाउंडेशन का यह प्रयास एक मिसाल है कि कैसे नागरिक समाज और शासन मिलकर एक बड़ी सामाजिक बुराई के खिलाफ असरदार दीवार खड़ी कर सकते हैं।

देहरादून की धरती से उठा यह संकल्प अब केवल इस शहर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसकी गूंज ऋषिकेश, हरिद्वार, नैनीताल, अल्मोड़ा और सीमांत चमोली-पिथौरागढ़ की घाटियों तक पहुंचनी चाहिए। जब तक उत्तराखंड के हर गांव, हर कस्बे और हर मोहल्ले का युवा खेल, फिटनेस और आत्मनिर्भरता को अपने जीवन का मूलमंत्र नहीं बना लेता, तब तक यह अभियान रुकना नहीं चाहिए। कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी की मौजूदगी और हजारों धावकों के इस अभूतपूर्व जज्बे ने यह साफ कर दिया है कि देवभूमि ने नशे के खिलाफ एक खुली जंग का ऐलान कर दिया है—एक ऐसी जंग, जिसमें जीत सिर्फ और सिर्फ हमारे युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की होगी।

Uttarakhand News: लैंड फ्रॉड के 56 मामलों की समीक्षा, 8 में FIR के निर्देश

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment