Uttarakhand Anganwadi: उत्तराखंड की शांत और मनोरम वादियों में बसे ग्रामीण और शहरी अंचलों के भीतर जमीनी स्तर पर सामाजिक चेतना को जगाने के लिए एक अत्यंत व्यापक और संवेदनशील पहल का ताना-बाना बुना जा रहा है। राज्य के महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित व्यवस्थाओं को केवल सरकारी कार्यालयों की चारदीवारी से बाहर निकालकर सीधे उन घरों तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है, जहां वास्तव में सहायता, पोषण और मार्गदर्शन की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। इसी क्रम में प्रदेश के बीस हजार सड़सठ आंगनबाड़ी केंद्रों पर आंगन का मिलन नामक एक महत्वाकांक्षी और आत्मीय कार्यक्रम का आयोजन सुनिश्चित किया गया है। यह आयोजन सेवा संकल्प अभियान की उस विस्तृत श्रृंखला का अभिन्न हिस्सा है जिसका मूल उद्देश्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े परिवार की महिला और बच्चे तक सरकार की लोक कल्याणकारी नीतियों को पूरी पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ पहुंचाना है।

देहरादून स्थित विकास भवन सभागार में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में विभागीय मंत्री रेखा आर्या ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के आयोजन केवल कागजी औपचारिकताओं अथवा प्रशासनिक खानापूर्ति के लिए नहीं होने चाहिए। जब कोई व्यवस्था अपने नागरिकों के आंगन तक चलकर जाती है, तो उसके पीछे एक गहरा उत्तरदायित्व और आत्मीय भाव छिपा होना चाहिए। बैठक के दौरान प्रदेश के विभिन्न जनपदों के जमीनी आंकड़ों की समीक्षा की गई, जिसमें हरिद्वार और बागेश्वर जैसे महत्वपूर्ण जनपदों के प्रशासनिक और विभागीय अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े। इस संवाद ने यह दर्शाया कि सरकार राजधानी से लेकर सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों तक फैली अपनी सभी इकाइयों के साथ निरंतर जीवंत संपर्क बनाए हुए है। अधिकारियों द्वारा साझा किए गए विवरण के अनुसार, अकेले देहरादून जनपद में एक हजार नौ सौ सात, धर्मनगरी हरिद्वार में तीन हजार एक सौ उन्यासी और कुमाऊं के पर्वतीय अंचल बागेश्वर में आठ सौ चौंतीस आंगनबाड़ी केंद्र सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। इन सभी केंद्रों पर स्थानीय आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप इस मिलन समारोह की जमीन तैयार की जा रही है।
इस पूरे अभियान का केंद्र बिंदु यह विचार है कि आंगनबाड़ी केवल बच्चों के बैठने या दलिया बांटने की कोई निर्जीव जगह नहीं है, बल्कि यह वह सामाजिक धुरी है जहां से एक पूरे समाज के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और संस्कारों की नींव रखी जाती है। मंत्री रेखा आर्या ने अधिकारियों को कड़े और स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि पूरे आयोजन के दौरान किसी भी प्रकार की अव्यवस्था, भ्रम अथवा उदासीनता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनके अनुसार जब एक मां अपने छोटे से बच्चे की उंगली पकड़कर केंद्र की दहलीज पर कदम रखती है, तो उसके मन में सुरक्षा और सहयोग की गहरी उम्मीद होती है। यदि विभाग उस उम्मीद पर खरा नहीं उतर सका, तो ऐसे आयोजनों का कोई नैतिक औचित्य नहीं रह जाता। इसलिए सभी तैयारियां निर्धारित समयसीमा से पहले इस प्रकार पूरी की जाएं कि प्रत्येक नागरिक को यह अनुभव हो कि व्यवस्था उसके कल्याण के लिए पूरी निष्ठा से कार्यरत है।
आंगन का मिलन कार्यक्रम को जनसेवा के एक सशक्त माध्यम के रूप में परिभाषित करते हुए यह रेखांकित किया गया कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही दर्जनों जनकल्याणकारी योजनाएं अक्सर सही प्रचार-प्रसार और जागरूकता के अभाव में उन लोगों तक नहीं पहुंच पातीं, जिन्हें उनकी सबसे अधिक दरकार होती है। नंदा गौरा जैसी महत्वाकांक्षी योजना, मुख्यमंत्री महालक्ष्मी किट वितरण, किशोरी पोषण योजना, मातृ वंदना अभियान जैसी अनेकों व्यवस्थाएं तब तक अपने पूर्ण फल नहीं दे सकतीं जब तक कि लाभार्थी स्वयं उनके अधिकारों और प्रक्रियाओं से पूरी तरह परिचित न हों। इस कार्यक्रम के माध्यम से विभागीय कार्यकर्ता सीधे संवाद स्थापित करेंगे, फॉर्म भरने में सहायता देंगे, समस्याओं का मौके पर ही निराकरण करेंगे और एक ऐसा सहज मंच प्रदान करेंगे जहां महिलाएं बिना किसी झिझक के अपनी शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक समस्याओं पर बात कर सकें।

इस अभियान की सफलता केवल सरकारी अमले की दौड़-धूप पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसमें जनसहभागिता का पुट होना अनिवार्य है। बैठक में इस बात पर गहरा विमर्श किया गया कि कैसे स्थानीय जनप्रतिनिधियों, ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों, वार्ड सभासदों और विशेष रूप से अभिभावकों को इस प्रक्रिया में सीधे जोड़ा जाए। जब तक गांव का बुजुर्ग, युवा और जागरूक नागरिक इस बात को लेकर सचेत नहीं होगा कि उनके क्षेत्र के केंद्र में बच्चों को कैसा वातावरण मिल रहा है, तब तक संस्थागत सुधार की गति धीमी रहेगी। अभिभावकों की उपस्थिति इस मिलन को एक पारिवारिक उत्सव का रूप देगी, जहां बच्चे खेल-खेल में अपनी प्रतिभा दिखाएंगे, माताएं अपनी चिंताओं को विशेषज्ञों के सामने रखेंगी और स्थानीय प्रतिनिधि अपने स्तर पर समस्याओं के त्वरित समाधान का संकल्प लेंगे।
पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी राज्यों से काफी भिन्न और चुनौतीपूर्ण हैं। कहीं मीलों का पैदल रास्ता है, तो कहीं मौसम का भारी प्रकोप। ऐसे कठिन हालात में जो महिलाएं स्वास्थ्य और पोषण की अलख जगाए हुए हैं, वे हमारी आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां, सहायिकाएं और आशा बहनें हैं। मंत्री महोदया ने इस बात को भलीभांति समझा और अपने संबोधन में इस श्रमसाध्य कार्यबल की प्रशंसा करते हुए यह घोषणा की कि इस अभियान के दौरान उत्कृष्ट और समर्पित भाव से कार्य करने वाली कर्मियों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान केवल एक प्रशस्ति पत्र या औपचारिकता नहीं होगा, बल्कि यह इस बात की आधिकारिक स्वीकारोक्ति होगी कि विषम परिस्थितियों में समाज का निर्माण करने वाली इन बहनों का योगदान अनमोल है। जब किसी एक कार्यकत्री को उसके उत्कृष्ट सेवाभाव के लिए मंच पर सराहना मिलती है, तो वह दृश्य आसपास की अन्य दर्जनों बहनों के भीतर नए उत्साह, लगन और ऊर्जा का संचार करता है।
राज्य सरकार की नीतियों का उल्लेख करते हुए बैठक में स्पष्ट किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय पोषण और नारी सशक्तीकरण के विजन को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कुशल और संवेदनशील नेतृत्व में उत्तराखंड की धरती पर पूरी निष्ठा से उतारा जा रहा है। सरकार इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है कि आंगनबाड़ी केंद्रों का केवल ढांचागत उच्चीकरण ही न हो, बल्कि उनके भीतर एक ऐसा अनुकूल, सुरक्षित और प्रेरणादायी वातावरण तैयार किया जाए जहां बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास बिना किसी अवरोध के हो सके। आज के दौर में जब पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का महत्व अत्यधिक बढ़ चुका है, तब इन केंद्रों को आधुनिक खेल सामग्रियों, आकर्षक शिक्षण विधियों, शुद्ध पेयजल, स्वच्छ शौचालयों और पौष्टिक आहार की सुदृढ़ व्यवस्था से लैस करना शासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल हो चुका है।
प्रशासनिक जवाबदेही को सर्वोपरि रखते हुए मंत्री ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि निर्धारित दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन में किसी भी स्तर पर पाई गई शिथिलता को गंभीरता से लिया जाएगा। यदि किसी क्षेत्र से यह शिकायत मिलती है कि सामग्री समय पर नहीं पहुंची, केंद्र बंद पाया गया, या जनसंवाद केवल औपचारिकता बनकर रह गया, तो सीधे तौर पर संबंधित ब्लॉक और जनपद स्तरीय अधिकारियों से जवाब तलब किया जाएगा। यह सख्त रुख इस बात का परिचायक है कि सरकार अब योजनाओं के केवल क्रियान्वयन की घोषणा करके संतुष्ट नहीं होती, बल्कि उसके अंतिम परिणाम और नागरिकों की संतुष्टि को वास्तविक सफलता का पैमाना मानती है।

आंगन का मिलन कार्यक्रम का दूरगामी प्रभाव केवल एक दिन की गतिविधियों तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह एक निरंतर चलने वाली उस प्रक्रिया की शुरुआत है जिसके माध्यम से स्वास्थ्य, पोषण और प्रारंभिक बाल संरक्षण की दिशा में एक नया सामाजिक आंदोलन खड़ा हो सकता है। जब बीस हजार से अधिक केंद्रों पर एक साथ यह आवाज उठेगी कि हर गर्भवती महिला का उचित पोषण उसका अधिकार है, हर शिशु का समयबद्ध टीकाकरण अनिवार्य है, और हर किशोरी को स्वच्छता और सम्मान की पूरी सुविधा मिलनी चाहिए, तो समाज में व्याप्त कुपोषण और एनीमिया जैसी गंभीर समस्याओं पर स्वतः ही गहरा प्रहार होगा।
उत्तराखंड के विकास भवन में संपन्न हुई यह समीक्षा बैठक वस्तुतः उस प्रशासनिक इच्छाशक्ति का जीवंत प्रमाण है जो समस्याओं को दूर से देखने के बजाय उनके मूल में जाकर समाधान तलाशने पर विश्वास करती है। अब यह संपूर्ण दायित्व राज्य के विभागीय अधिकारियों, सुपरवाइजरों और जमीनी स्तर पर तैनात अमले के कंधों पर है कि वे इस दिशा-निर्देश को केवल एक सरकारी आदेश न मानकर अपने अंतर्मन की सेवा भावना से जोड़ें। समयबद्धता, स्वच्छता, गरिमा और अपनत्व के भाव के साथ जब यह कार्यक्रम प्रदेश के हर एक आंगन तक पहुंचेगा, तभी सही मायनों में सेवा संकल्प अभियान अपने पावन उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा और उत्तराखंड के नौनिहालों तथा नारी शक्ति का भविष्य अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और उज्ज्वल बन सकेगा।

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