Uttarakhand News: भारतीय संस्कृति के इतिहास में आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार की एक प्रणाली भर नहीं रहा, बल्कि यह प्रकृति, शरीर और मन के बीच संतुलन साधते हुए जीवन जीने की एक मुकम्मल कला है। जब यह चर्चा उत्तराखंड जैसी पावन धरा पर होती है, तो इसका महत्व स्वतः ही कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि हिमालय की यह गोद औषधीय वनस्पतियों, दिव्य जड़ी-बूटियों और ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है।
हाल ही में निदेशालय, आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाएं, उत्तराखंड के तत्वावधान में आयोजित आयुर्वेद दिवस का गरिमामय उत्सव इसी शाश्वत चेतना को आधुनिक संदर्भों में पुनः स्थापित करने का एक ठोस और सशक्त प्रयास बनकर सामने आया। इस भव्य समागम का केंद्रीय संदेश था, “आयुर्वेद अपनाएं, स्वस्थ निरोगी जीवन पाएं।” यह वाक्य मात्र एक औपचारिक नारा नहीं है, बल्कि उस जीवनदृष्टि का परिचायक है जिसकी आज की भागदौड़ भरी, तनावग्रस्त और मिलावटी दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता है। वर्तमान दौर में जब मनुष्य जीवनशैली जनित असाध्य विकारों, मानसिक तनाव और रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों से जूझ रहा है, तब हमारी प्राचीन चिकित्सा परंपरा एक सुरक्षित, प्राकृतिक और समग्र आश्रय बनकर उभरती है।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आयुर्वेद का लाभ किसी खास वर्ग या केवल संपन्न लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि यह समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे और आधुनिक वैज्ञानिक नवाचारों के साथ सामंजस्य बिठाकर कार्य करे। प्रातःकाल ग्यारह बजे जब कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, तो संपूर्ण वातावरण वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक दीप प्रज्वलन की सात्विक ऊर्जा से आलोकित हो उठा। दीप प्रज्वलन केवल एक परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि उस ज्ञान के प्रकाश का आह्वान था जो सदियों के अंधकार को चीरकर आज भी मानव जाति का पथ प्रदर्शन कर रहा है। इसके पश्चात मंचासीन अतिथियों का सत्कार भारतीय परंपरा के अनुरूप आत्मीयता से किया गया।
निदेशालय के निदेशक डॉ. आर.पी. सिंह ने अपने विचारोत्तेजक स्वागत संबोधन में समस्त अतिथियों, शोधार्थियों और चिकित्सकों का अभिनंदन किया। उन्होंने रेखांकित किया कि उत्तराखंड प्राकृतिक रूप से आयुर्वेद की राजधानी बनने की पूर्ण क्षमता रखता है। उन्होंने विभाग की प्रतिबद्धता दोहराई कि किस प्रकार योजनाओं को धरातल पर उतारकर जन-जन को इस प्राचीन ज्ञान से जोड़ा जा रहा है। किसी भी पारंपरिक विधा को जब तक एक स्पष्ट प्रशासनिक दिशा और सुदृढ़ नीतिगत समर्थन न मिले, तब तक वह समाज के निचले स्तर तक संस्थागत रूप से नहीं पहुंच पाती। इस दृष्टि से कार्यक्रम की मुख्य अतिथि और आयुष एवं आयुष शिक्षा सचिव, उत्तराखंड शासन, रंजना राजगुरु का संबोधन अत्यंत दूरगामी और व्यावहारिक था।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक स्वस्थ और समर्थ समाज की आधारशिला उसकी जीवनशैली पर टिकी होती है, और आयुष जीवनशैली इस संतुलन को साधने का सर्वोत्तम माध्यम है। जब तक नागरिक अपनी दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार को प्रकृति के नियमों के अनुकूल नहीं ढालेंगे, तब तक पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना असंभव है। सचिव ने इस बात पर विशेष बल दिया कि विभाग द्वारा संचालित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का दायरा केवल फाइलों या शहरों तक सीमित न रहे। विभागीय अमले की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि इन योजनाओं की जानकारी और इनका वास्तविक लाभ राज्य के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों, गांवों और सीमांत बस्तियों में रहने वाले प्रत्येक नागरिक तक पहुंचे।
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद को केवल बीमारी के समय उपयोग की जाने वाली दवा के रूप में नहीं, बल्कि दैनिक दिनचर्या के अनिवार्य अंग के रूप में स्थापित करने के लिए व्यापक जन-जागरूकता अभियानों की आवश्यकता है। जब आमजन यह समझ जाएगा कि छोटी-छोटी आदतों में सुधार करके बड़े-बड़े रोगों से बचा जा सकता है, तभी स्वस्थ समाज का स्वप्न साकार होगा। औपचारिक उद्बोधनों के उपरांत कार्यक्रम का सर्वाधिक ज्ञानवर्धक और बौद्धिक हिस्सा आरंभ हुआ, जहां आयुर्वेद के विभिन्न गूढ़ पक्षों को आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली और शोध के धरातल पर परखा गया।
वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि प्राचीन संहिताओं में लिखे सूत्रों को आज की वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के परिणामों से प्रमाणित किया जाए, ताकि विश्व भर में इस विधा पर भरोसा और अधिक मजबूत हो सके। तकनीकी सत्रों की श्रृंखला में डॉ. अनुप गक्खड़ ने “जीवनशैली जनित विकारों में आयुर्वेद” विषय पर अपना अत्यंत सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने वर्तमान दौर की विसंगतियों पर प्रकाश डालते हुए समझाया कि आज मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अनिद्रा और थायरॉइड जैसी बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं। इन रोगों का मुख्य कारण शरीर की जैविक घड़ी का बिगड़ना और अप्राकृतिक खानपान है।
एलोपैथिक चिकित्सा में अक्सर इन समस्याओं के केवल लक्षणों को दबाने का प्रयास किया जाता है, जबकि आयुर्वेद मूल कारण यानी त्रिदोष के असंतुलन और जठराग्नि की मंदता पर प्रहार करता है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार साधारण दिनचर्या में बदलाव, सम्यक आहार और योग-प्राणायाम के माध्यम से इन असाध्य मानी जाने वाली व्याधियों को जड़ से समाप्त या नियंत्रित किया जा सकता है। इसके बाद डॉ. प्रदीप भारद्वाज ने “रिसर्च एंड इनोवेशन इन आयुर्वेद” विषय पर अपने गहन शोधपरक विचार रखे। उन्होंने इस भ्रांति को सिरे से खारिज किया कि आयुर्वेद केवल पुरानी किताबों तक सीमित है।
उन्होंने बताया कि समकालीन युग में आयुर्वेद में क्लिनिकल ट्रायल्स, आधुनिक तकनीक, बायो-स्टैटिस्टिक्स और नैनोटेक्नोलॉजी के माध्यम से औषधियों की प्रभावकारिता को प्रमाणित किया जा रहा है। नवाचार के इस दौर में मानकीकृत अर्क, सटीक खुराक प्रणाली और साक्ष्य-आधारित चिकित्सा ही आयुर्वेद को विश्वस्तरीय स्वीकृति दिलाने का मार्ग प्रशस्त करेगी। उनका जोर इस बात पर था कि युवा चिकित्सकों और शोधकर्ताओं को अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित करने और पेटेंट की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हृदय स्वास्थ्य के गंभीर विषय पर वैद्य हर्ष सहगल ने “प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी इन आयुर्वेद” पर व्याख्यान दिया। आज के समय में जब युवा वर्ग में भी अचानक दिल का दौरा पड़ने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, तब हृदय की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। वैद्य सहगल ने समझाया कि आयुर्वेद में हृदय को केवल एक रक्त पंप करने वाला अंग नहीं, बल्कि चेतना और ओज का मुख्य केंद्र माना गया है। उन्होंने मानसिक तनाव, अत्यधिक चिंता और दूषित भोजन से हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन किया।

अर्जुन की छाल, पुष्करमूल जैसी जड़ी-बूटियों के संतुलित उपयोग, अभ्यंग और ध्यान के जरिए धमनियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने और दिल की बीमारियों से बचाव के प्राकृतिक उपायों पर उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला। आयुर्वेद की सबसे प्रसिद्ध और प्रभावी शोधन विधा पर डॉ. जे.एन. नौटियाल ने “आयुर्वेद में पंचकर्म का महत्व” विषय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंचकर्म केवल मालिश या स्पा थेरेपी नहीं है, बल्कि यह शरीर की प्रत्येक कोशिका से संचित विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की एक संपूर्ण जैव-रासायनिक प्रक्रिया है।
वमन, विरेचन, बस्ति, नस्य और रक्तमोक्षण के माध्यम से शरीर का गहरा शुद्धिकरण होता है। उन्होंने बताया कि विभिन्न जटिल और पुराने रोगों में जब सामान्य औषधियां काम करना बंद कर देती हैं, तब पंचकर्म शरीर को दोबारा प्रतिक्रिया देने योग्य बनाता है। यह विधा न केवल बीमार को स्वस्थ करती है, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घायु को भी बढ़ाती है। सत्र के अंतिम चरण में डॉ. राजीव कुरेले ने “धन्वंतरी पूजन—आयुर्वेद की शाश्वत परंपरा” विषय पर अपने विचार रखते हुए इस चिकित्सा पद्धति के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक आयाम को उजागर किया। उ
न्होंने बताया कि भगवान धन्वंतरी को आयुर्वेद का जनक और देवताओं का चिकित्सक माना गया है, जो समुद्र मंथन के समय अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। धन्वंतरी पूजन का आशय केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, मानव सेवा के प्रति समर्पण और रोग-मुक्ति के संकल्प का प्रतीक है। जब एक चिकित्सक सेवा भाव और करुणा के साथ चिकित्सा करता है, तो औषधि का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। दोपहर के बाद के सत्र में कार्यक्रम का वातावरण तब और भी अधिक ऊर्जावान हो गया जब अपराह्न साढ़े तीन बजे कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, आयुष एवं आयुष शिक्षा मंत्री श्री मदन कौशिक ने सभा को संबोधित किया। उनके उद्बोधन में सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, भविष्य की योजनाएं और जनसेवा का गहरा संकल्प स्पष्ट दिखाई दिया। उन्होंने घोषणा की कि सरकार आयुर्वेद के प्रकाश को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है। विकास का असली पैमाना यही है कि दूरदराज के पर्वतीय अंचलों में बैठा वह साधारण ग्रामीण, जिसके पास बड़े अस्पतालों तक जाने के साधन नहीं हैं, उसे उसके गांव के निकट ही गुणवत्तापूर्ण और सुलभ आयुर्वेदिक चिकित्सा मिल सके। मंत्री महोदय ने आत्मविश्वास से कहा कि वर्तमान समय आयुर्वेद के सर्वांगीण विकास के लिए सबसे अनुकूल दौर है।
आज देश के विभिन्न राज्य केंद्र सरकार के विजन के साथ मिलकर इस दिशा में अत्यंत सक्रियता से काम कर रहे हैं। भारत की इस प्राचीन विद्या ने पूरी दुनिया में अपनी विश्वसनीयता सिद्ध की है, और अब समय आ गया है कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर एक सुगठित आंदोलन का रूप दिया जाए। शिक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार और कौशल विकास चिकित्सा व्यवस्था की रीढ़ उसकी शिक्षा प्रणाली होती है। यदि चिकित्सकों की नई पीढ़ी कुशल, नैतिक और आधुनिक ज्ञान से संपन्न होगी, तभी यह विधा आगे बढ़ पाएगी। इस तथ्य को रेखांकित करते हुए आयुष मंत्री ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा के तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए निजी क्षेत्र में “आयुर्वेद शिक्षा बोर्ड” की स्थापना और एक एकीकृत पाठ्यक्रम तैयार किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना था कि वर्तमान समय में पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों के अध्ययन के साथ-साथ आधुनिक एनाटॉमी, फिजियोलॉजी और डायग्नोस्टिक उपकरणों के उपयोग का ज्ञान भी उतना ही जरूरी है। एक एकीकृत पाठ्यक्रम तैयार होने से छात्रों को आधुनिक जांच तकनीकों और प्राचीन निदान प्रणालियों का दोहरा लाभ मिलेगा, जिससे वे समाज को बेहतर सेवा दे सकेंगे। इसके साथ ही उन्होंने कार्यबल के कौशल विकास और सतत प्रशिक्षण कार्यक्रमों के महत्व को भी प्रमुखता से उठाया।
उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में नित्य नए अनुसंधान हो रहे हैं, इसलिए सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के चिकित्सकों, फार्मासिस्टों और पंचकर्म सहायकों को समय-समय पर अद्यतन प्रशिक्षण मिलना चाहिए। जब स्वास्थ्य कर्मियों का कौशल निखरेगा, तो अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में दी जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता स्वतः ही उच्च कोटि की हो जाएगी। उत्तराखंड के इस मंच से राष्ट्रीय एकता और अंतर-राज्यीय समन्वय का एक अनूठा संदेश भी दिया गया। आयुष मंत्री ने केरल जैसे राज्यों, जहां आयुर्वेद की परंपरा अत्यंत समृद्ध और व्यवस्थित है, सहित देशभर के इच्छुक चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का आह्वान किया कि वे इस राष्ट्रीय अभियान से जुड़ें।
विभिन्न राज्यों के अनुभवों, भौगोलिक विशिष्टताओं और पारंपरिक ज्ञान के साझाकरण से पूरे देश का आयुष ढांचा मजबूत होगा। उन्होंने आगे कहा कि भारत सरकार आज आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को हर स्तर पर प्रोत्साहित कर रही है। वैश्विक स्वास्थ्य मंचों पर भारत का नेतृत्व अब सर्वविदित है। ऐसे समय में उत्तराखंड शासन के विभागीय अधिकारियों, चिकित्सकों और कर्मचारियों का यह साझा दायित्व है कि वे आपसी समन्वय, समर्पण और अटूट निष्ठा के साथ काम करें, ताकि इस प्राचीन चिकित्सा पद्धति को वैश्विक मंच पर सर्वोच्च स्थान पर स्थापित किया जा सके। देवभूमि की जड़ी-बूटियों और यहां के ज्ञान का सही दोहन करके उत्तराखंड पूरे विश्व के लिए वेलनेस और हीलिंग का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है। कार्यक्रम के समापन सत्र में राज्य औषधि अनुज्ञापन प्राधिकारी, उत्तराखंड द्वारा समस्त गणमान्य अतिथियों, वक्ताओं, आयोजकों और उपस्थित जनसमूह के प्रति आभार व्यक्त करते हुए औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन दिया गया। इसके साथ ही आयुर्वेद दिवस का यह ऐतिहासिक, प्रेरणादायक और भविष्योन्मुखी आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह दिन केवल एक समारोह के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय चिकित्सा पद्धति को जन-कल्याण और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर करने के एक मजबूत संकल्प के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया।
CM Dhami News: जनसमस्याओं का त्वरित और समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करें – मुख्यमंत्री







