Uttarakhand Sir News: उत्तराखंड में लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव नागरिकों के मताधिकार और एक त्रुटिहीन, पारदर्शी मतदाता सूची पर टिकी होती है। जब तक निर्वाचक नामावली पूरी तरह से शुद्ध, निष्पक्ष और अद्यतन न हो, तब तक किसी भी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पूर्ण नहीं मानी जा सकती। इसी लोकतांत्रिक दायित्व को सुदृढ़ करने के क्रम में उत्तराखंड राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम की अध्यक्षता में मंगलवार को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सार्थक बैठक आयोजित की गई। इस उच्चस्तरीय विमर्श का मुख्य केंद्र बिंदु प्रदेश में संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम यानी एसआईआर की प्रगति, चुनौतियां और भावी कार्ययोजना रही। निर्वाचन तंत्र की यह स्पष्ट प्राथमिकता रही कि चुनाव प्रक्रिया को केवल प्रशासनिक अधिकारियों तक सीमित न रखकर सभी प्रमुख हितधारकों, विशेषकर राजनीतिक दलों के सुझावों और सहयोग से आगे बढ़ाया जाए।
सचिवालय स्थित निर्वाचन कार्यालय में संपन्न हुई इस बैठक में मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का प्राथमिक लक्ष्य एक ऐसा मतदाता डेटाबेस तैयार करना है जिसमें प्रत्येक योग्य नागरिक का नाम शामिल हो और किसी भी प्रकार की दोहरी या गलत प्रविष्टि के लिए कोई स्थान न बचे। विचार-विमर्श के दौरान भारत निर्वाचन आयोग द्वारा लिए गए ताजा निर्णयों से सभी दलों को अवगत कराया गया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जानकारी दी कि राज्य की भौगोलिक विषमताओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और विस्तृत सत्यापन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन की तिथि को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। अब राज्य में अंतिम निर्वाचक नामावली का प्रकाशन 3 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा। समय सीमा में इस विस्तार से अधिकारियों को प्रत्येक दावे और आपत्ति का जमीनी स्तर पर जाकर बारीकी से सत्यापन करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा, जिससे नामावली की शुद्धता शत-प्रतिशत सुनिश्चित की जा सकेगी।

बैठक में आंकड़ों की समीक्षा के दौरान यह तथ्य प्रमुखता से सामने आया कि निर्वाचन विभाग ने पुनरीक्षण के तहत जारी किए गए नोटिसों के निस्तारण में असाधारण गति से कार्य किया है। विभाग की ओर से प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य भर में कुल चौबीस लाख तीस हजार मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए थे। इन नोटिसों के सापेक्ष अब तक चौबीस लाख उनतीस हजार से अधिक मामलों की विधिवत और निष्पक्ष सुनवाई सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई है। प्रशासनिक मशीनरी द्वारा इतने बड़े पैमाने पर त्वरित और पारदर्शी सुनवाई का पूरा होना यह दर्शाता है कि निर्वाचन अमला नामावली के शुद्धिकरण को लेकर कितनी गंभीरता से काम कर रहा है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भी सुनवाई की इस त्वरित प्रक्रिया को सकारात्मक दृष्टि से देखा और इस बात पर सहमति जताई कि किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम बिना उचित पड़ताल और साक्ष्यों के सूची से बाहर नहीं होना चाहिए।
मतदाता सूची को अद्यतन करने की दिशा में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने, पुराने या अपात्र नामों को हटाने और पते अथवा विवरण में संशोधन से संबंधित फॉर्मों की स्थिति पर भी विस्तार से बातचीत हुई। अधिकारियों ने बैठक में बताया कि फॉर्म छह, फॉर्म सात और फॉर्म आठ के माध्यम से प्राप्त होने वाले दावों और आपत्तियों की सुनवाई भी युद्धस्तर पर चल रही है। अब तक ऐसे चालीस प्रतिशत से अधिक मामलों की सुनवाई पूरी हो चुकी है, जबकि शेष बचे आवेदनों पर भी निर्धारित समय सीमा के भीतर पारदर्शी तरीके से कार्रवाई की जा रही है। फॉर्म छह मुख्य रूप से नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़ा है, जिससे राज्य के युवाओं को मताधिकार मिल सके, वहीं फॉर्म सात के जरिए मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया संचालित होती है। फॉर्म आठ मतदाताओं के व्यक्तिगत विवरणों के सुधार और एक ही विधानसभा के भीतर स्थानांतरण के लिए उपयोग में लाया जाता है। इन तीनों श्रेणियों में आई आपत्तियों की क्रमबद्ध समीक्षा से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि केवल प्रामाणिक विवरण ही अंतिम सूची का हिस्सा बनें।
इस बैठक का एक अत्यंत तकनीकी और दूरगामी पहलू मतदाता सूची को आधुनिक डिजिटल निगरानी से जोड़ना रहा। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को आश्वस्त किया कि फर्जी या दोहरे मतदाताओं की समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए प्रदेश में डेमोग्राफिक सिमिलर एंट्री (डीएसई) और फोटो सिमिलर एंट्री (पीएसई) मॉड्यूल को प्रभावी रूप से लागू किया जाएगा। कई बार ऐसा देखने में आता है कि नाम, पिता का नाम और आयु में समानता होने के कारण या फोटो की एकरूपता के चलते एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक मतदान केंद्रों या विधानसभा क्षेत्रों में दर्ज रह जाता है। इस विसंगति को दूर करने के लिए आधुनिक सॉफ्टवेयर आधारित यह प्रणाली स्वचालित रूप से ऐसे संदिग्ध नामों को चिह्नित करेगी।
प्रशासन ने यह भी रेखांकित किया कि तकनीक के उपयोग के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की किसी भी सूरत में अनदेखी नहीं की जाएगी। यदि डीएसई या पीएसई मॉड्यूल के तहत किसी मतदाता का नाम समानता के दायरे में चिह्नित होता है, तो उसका नाम तत्काल प्रभाव से नहीं काटा जाएगा। इसके बजाय संबंधित मतदाता को विधिवत नोटिस जारी किया जाएगा और अपना पक्ष रखने अथवा प्रामाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए पूरे पंद्रह दिन का समय दिया जाएगा। पंद्रह दिनों की यह अवधि मतदाता को यह अवसर प्रदान करेगी कि वह स्थानीय बूथ लेवल अधिकारी या संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर सके। यदि मतदाता तय समय में वैध पहचान प्रस्तुत कर देता है, तो उसका नाम सही स्थान पर सुरक्षित रखा जाएगा और दोहरी प्रविष्टि को समाप्त किया जाएगा। इससे किसी भी नागरिक के मताधिकार का मनमाना हनन रोके जाने के साथ-साथ मतदाता सूची की विश्वसनीयता भी अटूट बनी रहेगी।
इस समन्वय बैठक की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसमें निर्वाचन विभाग के शीर्ष अधिकारियों के साथ-साथ राज्य के सभी प्रमुख मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने सीधे संवाद में भाग लिया। प्रशासनिक दल में मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम के साथ अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. विजय कुमार जोगदंडे, उप मुख्य निर्वाचन अधिकारी किशन सिंह नेगी और सहायक मुख्य निर्वाचन अधिकारी मस्तू दास उपस्थित रहे, जिन्होंने पुनरीक्षण के तकनीकी और प्रशासनिक पक्षों की विस्तृत जानकारी दलों के समक्ष रखी।

वहीं राजनीतिक बिरादरी से विभिन्न विचारधाराओं के प्रतिनिधियों ने रचनात्मक सुझाव प्रस्तुत किए। भारतीय जनता पार्टी की ओर से राजकुमार पुरोहित और एडवोकेट सतेंद्र जैन ने परिचर्चा में भाग लेते हुए प्रक्रिया को और सुलभ बनाने के सुझाव रखे। इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में पूर्व विधायक मनोज रावत ने जमीनी स्तर पर मतदाताओं को होने वाली व्यावहारिक समस्याओं और नोटिस वितरण प्रणाली की पारदर्शिता पर बल दिया। बहुजन समाज पार्टी की ओर से सत्यपाल, सतेंद्र और सतेंद्र चोपड़ा ने वंचित व दूरदराज के क्षेत्रों के मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा का विषय उठाया। आम आदमी पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में श्याम बाबू पांडेय और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) की ओर से अनंत आकाश ने भाग लेते हुए आधुनिक तकनीकों के निष्पक्ष क्रियान्वयन और जन-जागरूकता अभियानों को और अधिक प्रभावी बनाने पर अपने विचार रखे।
समीक्षा बैठक का यह समग्र माहौल यह सिद्ध करता है कि एक सशक्त लोकतंत्र के निर्माण में निर्वाचन तंत्र और राजनीतिक दलों के मध्य खुला संवाद कितना अनिवार्य है। 3 अक्टूबर 2026 की समय सीमा तय होने से अब राज्य के सभी संबंधित अधिकारियों, राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों और आम नागरिकों को मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है। निर्वाचन आयोग का यह समन्वित प्रयास निश्चित रूप से उत्तराखंड में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव व्यवस्था की नींव को और अधिक मजबूत करेगा, जिससे राज्य के प्रत्येक पात्र नागरिक को गर्व के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग करने का सशक्त अवसर प्राप्त हो सकेगा।









