Uttarakhand River Pollution : हिमालय की तलहटी में बसी दून घाटी अपनी प्राकृतिक सुषमा, शांत आबोहवा और सदियों पुरानी जलधाराओं के लिए विश्वभर में विख्यात रही है। परंतु तीव्र गति से होते शहरीकरण, अनियंत्रित निर्माण कार्यों और लगातार बढ़ती आबादी के दबाव ने इस शांत घाटी की जीवनरेखा मानी जाने वाली नदियों और प्राकृतिक नालों के अस्तित्व पर गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा कर दिया है। रिस्पना, बिंदाल, सुसवा और सोंग जैसी नदियां, जो कभी घाटी के पारिस्थितिकी संतुलन का आधार हुआ करती थीं, बीते कुछ दशकों में मानवीय उपेक्षा और ठोस अपशिष्ट के अवैज्ञानिक विसर्जन के चलते मौसमी नालों और कचरे के ढेरों में तब्दील होती दिखाई दी हैं। जब जलस्रोतों के भीतर सीधे तौर पर घरेलू अपशिष्ट, प्लास्टिक का अंबार और अनउपचारित सीवेज प्रवाहित होने लगे, तो यह केवल जल प्रदूषण का सामान्य विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह जनस्वास्थ्य, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दा बन जाता है। इसी विषम परिस्थिति को संज्ञान में लेते हुए देहरादून जिला प्रशासन ने अब एक अत्यंत कड़ा, जवाबदेह और सुधारात्मक रुख अख्तियार किया है।
देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने जनपद के संपूर्ण शहरी एवं उपनगरीय क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की चरमराती व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक बुलाई। इस बैठक में जनपद के सभी उप जिलाधिकारियों, नगर निगम, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया गया कि अब कागजी कार्यवाहियों और बैठकों के दौर से आगे बढ़कर धरातल पर ठोस परिणाम दिखाने का समय आ गया है। जिलाधिकारी ने सख्त लहजे में रेखांकित किया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर जारी किए गए दिशा-निर्देश कोई सामान्य सुझाव नहीं हैं, बल्कि वे कानूनन बाध्यकारी आदेश हैं जिनका हर हाल में अक्षरशः अनुपालन कराया जाना अनिवार्य है। सफाई व्यवस्था, अपशिष्ट के वैज्ञानिक निस्तारण और डंपिंग साइटों के संचालन में किसी भी स्तर पर होने वाली हीलाहवाली को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
प्रशासनिक समीक्षा के दौरान सबसे प्रमुख और चिंताजनक बिंदु यह उभरकर सामने आया कि दून घाटी की नदियों और उनके तटवर्ती इलाकों को कुछ असामाजिक तत्वों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और लापरवाह नागरिकों द्वारा अनधिकृत डंपिंग ग्राउंड बना दिया गया है। रात के अंधेरे में या सुनसान इलाकों का लाभ उठाकर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों, लोडर वाहनों अथवा व्यक्तिगत स्तर पर भारी मात्रा में ठोस कचरा, निर्माण सामग्री का मलबा और प्लास्टिक का कूड़ा सीधे जलधाराओं में उड़ेला जा रहा है। इस प्रवृत्ति पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए जिलाधिकारी ने समस्त संबंधित एजेंसियों को स्पष्ट आदेश दिए कि नदियों अथवा उनके किनारों पर कचरा फेंकने की किसी भी घटना पर अब केवल जुर्माना लगाकर खानापूर्ति नहीं की जाएगी। यदि कोई भी व्यक्ति, वाहन चालक या संस्था नदियों में कचरा डालते हुए पाई जाती है, तो उसके विरुद्ध सीधे सुसंगत धाराओं में प्राथमिक सूचना रिपोर्ट यानी एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
नदियों को मानवीय लापरवाही से बचाने के लिए केवल दंडात्मक कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि भौतिक अवरोध और निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करना भी उतना ही आवश्यक है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन ने जलधाराओं के उन सभी संवेदनशील और खुले हिस्सों को तत्काल चिन्हित करने का निर्देश दिया है जहां से अक्सर पुलों अथवा रास्तों से कचरा नीचे फेंका जाता है। इन सभी चिन्हित स्थानों पर मजबूत लोहे की सुरक्षा जालियां लगाई जाएंगी ताकि कोई भी व्यक्ति पुल या सड़क के किनारे खड़े होकर नदी में प्लास्टिक की थैलियां या अन्य अपशिष्ट सामग्री न फेंक सके। इसके साथ ही इन प्रमुख संवेदनशील स्थलों पर सीसीटीवी कैमरों और क्षेत्रीय निगरानी दलों के माध्यम से चौबीसों घंटे पैनी नजर रखी जाएगी। जब तक निगरानी व्यवस्था इतनी सुदृढ़ नहीं होगी कि नियम तोड़ने वाले के मन में पकड़े जाने का सीधा भय हो, तब तक जलस्रोतों की वास्तविक शुचिता बहाल नहीं की जा सकती।
ठोस अपशिष्ट के साथ-साथ तरल अपशिष्ट, विशेषकर सेप्टिक टैंकों से निकलने वाले मलमूत्र का अवैज्ञानिक निपटान भी नदियों के प्राकृतिक जल को दूषित करने का एक अत्यंत घातक कारण बनकर उभरा है। दून घाटी के कई ऐसे क्षेत्र हैं जो अब तक भूमिगत सीवरेज नेटवर्क से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। वहां के आवासीय भवनों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से सेप्टिक टैंकों की सफाई करने वाले निजी टैंकर कचरा उठाते हैं और लागत तथा समय बचाने के फेर में उस अत्यंत संक्रामक मानव अपशिष्ट को सीधे नदियों या खुले नालों में खाली कर देते हैं। इस घृणित और गैरकानूनी कार्यशैली पर अंकुश लगाने के लिए जिलाधिकारी ने सेप्टिक टैंकरों की जीपीएस ट्रैकिंग और नियमित भौतिक निगरानी की व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए हैं। अब किसी भी सेप्टिक टैंकर को मनमाने ढंग से अपशिष्ट बहाने की अनुमति नहीं होगी। यह अनिवार्य किया जा रहा है कि सेप्टिक टैंकों से एकत्रित किए गए संपूर्ण मलजल को केवल जल संस्थान द्वारा संचालित निर्धारित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों यानी एसटीपी तक ले जाया जाए, जहां उसका पूर्ण वैज्ञानिक उपचार होने के उपरांत ही निर्धारित मानकों के अनुसार निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा।
बल्क वेस्ट जनरेटर की होगी पहचान
देहरादून के डीएम डॉ. आशीष चौहान ने शहरी क्षेत्रों में बल्क वेस्ट जनरेटर को चिन्हित करने के निर्देश देते हुए कहा कि इन स्थानों पर कूड़े का उचित सेग्रीगेशन सुनिश्चित कराया जाए और गीले एवं सूखे कचरे का नियमानुसार निस्तारण किया जाए। उन्होंने निकाय अधिकारियों को कूड़ा प्रबंधन व्यवस्था की नियमित मॉनिटरिंग करने तथा निर्धारित मानकों के अनुरूप व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा।
उप जिलाधिकारी अपर्णा ढौंडियाल ने बैठक में बताया कि मा0 उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रकोष्ठ का गठन किया गया है। न्यायालय के आदेशों की प्रति सभी नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला पंचायत एवं छावनी परिषद के निर्वाचित प्रतिनिधियों तथा पार्षदों को उपलब्ध करा दी गई है।
उन्होंने बताया कि शहरी क्षेत्रों में बल्क वेस्ट जनरेटर को चिन्हित करने की कार्रवाई जारी है। सभी निकायों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारियों एवं संबंधित सदस्यों के साथ डंपिंग साइटों का संयुक्त निरीक्षण करने तथा कूड़ा प्रबंधन कार्यों के फोटोग्राफिक साक्ष्य निर्धारित पोर्टल पर प्रत्येक माह नियमित रूप से अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं। बैठक में विभिन्न डंपिंग साइटों पर कूड़ा निस्तारण संबंधी निरीक्षण की जानकारी भी प्रस्तुत की गई।
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