Uttarakhand CM Dhami Sugar black marketing News: दैनिक जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं में शामिल मिठास जब बाजार के अनियंत्रित चक्र और मुनाफाखोरी की भेंट चढ़ने लगे, तो इसका सीधा असर आम आदमी की रसोई के बजट पर पड़ता है। भारत जैसे देश में, जहां हर पर्व, अनुष्ठान, पारिवारिक आयोजन और सामान्य दिनचर्या की शुरुआत एक प्याली मीठी चाय से होती है, वहां चीनी केवल एक वस्तु नहीं बल्कि सामाजिक सरोकार और जीवनशैली का अभिन्न अंग बन चुकी है। हाल के सप्ताहों में उत्तराखंड की मंडियों में चीनी की दरों में जो अप्रत्याशित उछाल देखा गया, उसने न केवल घरेलू उपभोक्ताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं, बल्कि शासन और प्रशासन के नीतिगत तंत्र को भी पूरी तरह सक्रिय कर दिया। बाजार में माल की भौतिक कमी न होते हुए भी यदि कीमतें एकाएक चढ़ने लगें, तो यह बात किसी से छिपी नहीं रहती कि कहीं न कहीं वितरण श्रृंखला के भीतर अनुचित भंडारण और कृत्रिम संकट पैदा करने की प्रवृतियां काम कर रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार के सख्त दिशा-निर्देशों के अनुरूप उत्तराखंड के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग ने राज्यभर में बड़े थोक खरीदारों और व्यावसायिक उपभोगकर्ताओं के लिए चीनी के भंडारण पर एक नया कानूनी शिकंजा कस दिया है।
इस नई व्यवस्था का सबसे केंद्रीय और निर्णायक बिंदु यह निर्धारित किया गया है कि अब कोई भी बड़ा व्यावसायिक संस्थान या थोक व्यापारी अपनी वास्तविक आवश्यकता के पंद्रह दिनों से अधिक का स्टॉक अपने पास जमा नहीं रख सकेगा। इस नीतिगत निर्णय का उद्देश्य किसी व्यापारिक उद्यम के सामान्य कामकाज में बाधा डालना नहीं, बल्कि बाजार में मांग और आपूर्ति के सहज प्रवाह को निर्बाध बनाए रखना है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में जब बड़े संस्थान अपनी भावी जरूरतों के नाम पर महीनों का कच्चा माल पहले से ही गोदामों में कैद कर लेते हैं, तो खुले बाजार में सामान्य दुकानदारों और आम जनता के लिए उपलब्ध माल का अनुपात तेजी से गिर जाता है। जब उपलब्ध माल कम दिखता है, तो कीमतें स्वतः ऊपर भागने लगती हैं, जिसका लाभ केवल मुट्ठी भर बड़े जमाखोर उठाते हैं और नुकसान करोड़ों सामान्य नागरिकों को उठाना पड़ता है। उत्तराखंड सरकार ने इस संवेदनशील नस को पहचानते हुए समय रहते वह प्रशासनिक हस्तक्षेप किया है, जिसकी मांग जमीन पर लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
इस व्यवस्था की परिधि में कौन आता है, इसे लेकर भी सरकार ने पूरी तकनीकी और व्यावहारिक स्पष्टता रखी है। यह नियम उन सभी थोक खरीदारों, विनिर्माताओं और बड़े प्रतिष्ठानों पर प्रभावी होगा, जिनकी मासिक खपत या खरीद दस मीट्रिक टन या उससे अधिक है। दस मीट्रिक टन का पैमाना कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। इसमें बड़े मिष्ठान निर्माता, शीतल पेय इकाइयां, बेकरी उद्योग, होटल श्रृंखलाएं और वे थोक व्यापारी शामिल होते हैं, जो सीधे मिलों से रैक के जरिए भारी मात्रा में माल उठाते हैं। इन सभी इकाइयों को अब अपने मासिक बहीखाते, दैनिक उपभोग और गोदाम में मौजूद बोरियों का ऐसा पारदर्शी हिसाब रखना होगा, जिससे यह सिद्ध हो सके कि उनके पास रखा गया स्टॉक आगामी पंद्रह दिनों के निर्धारित उपभोग से रत्ती भर भी अधिक नहीं है। यदि किसी भी प्रतिष्ठान के परिसर में इस सीमा से अधिक चीनी का ढेर पाया जाता है, तो उसे सीधे तौर पर जमाखोरी और कालाबाजारी की श्रेणी में रखकर कठोर कानूनी धाराओं के तहत दंडित किया जाएगा।

सरकारी व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना प्रायः यह रही है कि नियम तो बहुत कड़े बना दिए जाते हैं, परंतु उनकी निगरानी केवल कागजी रिपोर्टों तक सीमित रह जाती है। इस बार शासन ने इस पारंपरिक ढर्रे को पूरी तरह बदलते हुए दोहरी निगरानी प्रणाली लागू की है। प्रशासन अब केवल खुदरा या थोक व्यापारियों के गोदामों के मुहाने पर खड़े होकर जांच नहीं करेगा, बल्कि वह सीधे चीनी मिलों के गेट पर नजर गड़ाए बैठा है। राज्य के भीतर चलने वाली मिलों और बाहरी राज्यों से उत्तराखंड में चीनी की आपूर्ति करने वाली मिलों से यह प्रमाणित रिकॉर्ड मांगा जा रहा है कि उन्होंने पिछले महीनों में किस-किस बल्क उपभोक्ता को कितना-कितना टन माल बेचा है। जब मिल के प्रस्थान रजिस्टर का मिलान व्यापारी के आवक रजिस्टर और फिर उसके गोदाम के भौतिक सत्यापन से किया जाएगा, तो हेराफेरी की कोई भी गुंजाइश स्वतः समाप्त हो जाएगी। यह व्यवस्था उस पुरानी लीकेज को पूरी तरह बंद कर देती है, जहां कागजों पर माल रास्ते में दिखाया जाता था और वास्तव में वह किसी गुप्त तहखाने या गोदाम में दबा पड़ा रहता था।
राजधानी देहरादून में इस प्रशासनिक सख्ती का असर जमीन पर सबसे पहले और सबसे मुखर रूप में देखने को मिल रहा है। दून घाटी और उसके आसपास के व्यापारिक केंद्रों में पिछले कुछ समय से चीनी के खुदरा भाव जिस तेजी से चढ़ रहे थे, उसने प्रशासनिक महकमे की नींद उड़ा दी थी। जिलाधिकारी के स्पष्ट और कड़े आदेशों के बाद उपजिलाधिकारी की अगुवाई में विशेष प्रशासनिक और खाद्य आपूर्ति टीमों का गठन किया गया है। ये टीमें बिना किसी पूर्व सूचना के प्रमुख थोक मंडियों, आढ़तों, ट्रांसपोर्ट नगर के गोदामों और बड़े हलवाई प्रतिष्ठानों पर दबिश दे रही हैं। इन छापों का उद्देश्य केवल भय पैदा करना नहीं, बल्कि स्टॉक रजिस्टर की वास्तविक बोरियों से मिलान करना, क्रय-विक्रय के बिलों की तिथियों की पड़ताल करना और यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी कारोबारी तय पंद्रह दिन की सीमा का उल्लंघन न कर रहा हो। राजधानी में शुरू हुई इस सख्त धरपकड़ ने उन बिचौलियों के हौसले पस्त कर दिए हैं, जो त्योहारी मौसम या पर्यटन सीजन की आड़ में माल रोककर अनुचित मुनाफा कमाने का ताना-बाना बुन रहे थे।
देहरादून से उठी यह प्रशासनिक लहर अब हरिद्वार, उधम सिंह नगर, नैनीताल और अन्य जिलों की ओर भी बढ़ चुकी है। विशेष रूप से तराई के वे इलाके, जहां स्वयं चीनी मिलें स्थापित हैं और जहां से भारी मात्रा में चीनी पहाड़ी जिलों के लिए भेजी जाती है, वहां जिला पूर्ति अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। पहाड़ी जनपदों में परिवहन की कठिनाइयों और मौसम की अनिश्चितता के नाम पर प्रायः व्यापारी माल का अतिरिक्त भंडारण कर लेते हैं और फिर दूरदराज के गांवों में मनमाने दामों पर बिक्री करते हैं। नई व्यवस्था के तहत यदि किसी दुर्गम क्षेत्र के लिए भी अतिरिक्त भंडारण की आवश्यकता पड़ती है, तो उसके लिए संबंधित उपजिलाधिकारी और जिला पूर्ति अधिकारी से विधिवत अनुमति लेनी होगी और उसका सार्वजनिक ब्योरा दर्ज करना होगा। बिना पूर्व सूचना और आधिकारिक अनुमति के किया गया कोई भी अतिरिक्त भंडारण सीधे तौर पर जब्ती और मुकदमे की जद में आएगा।
आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो चीनी का बाजार अत्यंत संवेदनशील होता है। थोक मंडियों में कुछ पैसों की घट-बढ़ भी खुदरा बाजार में पहुंचकर कई रुपयों का रूप ले लेती है। जब कोई बड़ा खरीदार अपनी क्षमता से दोगुना या तिगुना माल गोदाम में रोक लेता है, तो वह बाजार में एक मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करता है। छोटे दुकानदार को लगता है कि पीछे से माल खत्म हो रहा है, इसलिए वह भी ऊंची कीमत पर खरीदारी करने को विवश होता है। अंततः इस पूरी श्रृंखला का अंतिम बोझ उस मजदूर, कर्मचारी और सामान्य परिवार पर पड़ता है, जिसकी आय सीमित है लेकिन बुनियादी जरूरतें अपरिहार्य हैं। सरकार का यह त्वरित और कठोर हस्तक्षेप उसी मनोवैज्ञानिक भय को तोड़ने का काम कर रहा है। जब बाजार को यह स्पष्ट संदेश मिल जाता है कि प्रशासन का डंडा सक्रिय है और गोदामों में बंद माल बाहर निकाला जाएगा, तो जमाखोर घबराकर खुद ही माल बाजार में उतारने लगते हैं, जिससे कृत्रिम तेजी ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।
व्यापारिक समुदाय के एक हिस्से में इस प्रकार के औचक छापों और भंडारण सीमाओं को लेकर कुछ असहजता और संशय भी देखा जाता है। व्यापारियों का तर्क होता है कि अचानक आपूर्ति बाधित होने या मिलों के बंद होने की स्थिति में उनके पास पर्याप्त बैकअप होना चाहिए ताकि उनका उत्पादन या व्यवसाय न रुके। परंतु सरकार का यह नियम उद्योग को ठप करने के लिए नहीं बनाया गया है। पंद्रह दिन की अवधि किसी भी सुचारु आपूर्ति श्रृंखला के लिए एक पर्याप्त और संतुलित समय माना जाता है। आधुनिक लॉजिस्टिक्स, डिजिटल ई-वे बिल और चौबीसों घंटे चलने वाले परिवहन तंत्र के दौर में किसी भी मिल से माल मंगाने में तीन से पांच दिन से अधिक का समय नहीं लगता। ऐसे में पंद्रह दिन का बफर स्टॉक रखना किसी भी व्यावहारिक व्यवसाय के लिए न तो घाटे का सौदा है और न ही जोखिम का। असल समस्या उन तत्वों को हो रही है जिनकी व्यापारिक रणनीति ही बाजार में अभाव पैदा करके मुनाफा निचोड़ने पर टिकी होती है।
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की यह जिम्मेदारी केवल छापेमारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे दैनिक आधार पर कीमतों के उतार-चढ़ाव की सार्वजनिक निगरानी भी करनी होगी। मंडियों में दिन की शुरुआत में तय होने वाले थोक भाव और मोहल्लों की दुकानों पर बिकने वाले खुदरा भाव के बीच के अंतर को कम करना ही इस नीति की वास्तविक सफलता का पैमाना होगा। इसके लिए तहसील स्तर पर शिकायत निवारण प्रकोष्ठों को सक्रिय किया जाना चाहिए ताकि यदि किसी सुदूर क्षेत्र में कोई दुकानदार एमआरपी से अधिक दाम वसूले या चीनी की अनुपलब्धता का बहाना बनाकर कालाबाजारी करे, तो उपभोक्ता सीधे प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचा सके।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील सीमांत और पर्यटन प्रधान राज्य में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की स्थिरता कानून-व्यवस्था और सामाजिक शांति से भी सीधे जुड़ी होती है। यहां हर वर्ष लाखों तीर्थयात्री और पर्यटक पहुंचते हैं, जिससे भोजन और पेय पदार्थों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। यदि ऐसे में आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतों में अनियंत्रित उछाल आता है, तो इसका नकारात्मक संदेश पूरे देश में जाता है। देहरादून से लेकर सीमांत पिथौरागढ़ और चमोली तक हर नागरिक को उचित मूल्य पर और बिना किसी रुकावट के आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराना लोककल्याणकारी राज्य का बुनियादी दायित्व है।
चीनी के भंडारण पर लगाई गई यह पंद्रह दिन की सीमा और प्रशासन की जमीनी मुस्तैदी एक सकारात्मक और स्वागतयोग्य प्रशासनिक कदम है। यह उन सभी तत्वों के लिए एक साफ और कड़ा संदेश है जो जनसामान्य की दैनिक आवश्यकताओं को अपनी लालच का जरिया बनाने की फिराक में रहते हैं। जब तक भौतिक सत्यापन की यह प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता, निरंतरता और बिना किसी राजनीतिक या व्यापारिक दबाव के जारी रहेगी, तब तक बाजार में मिठास की किल्लत नहीं होगी और न ही किसी आम परिवार के बजट पर कृत्रिम महंगाई का कड़वा घूंट पीने की नौबत आएगी। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस निगरानी को केवल तात्कालिक छापों तक सीमित न रखकर एक स्थायी और पारदर्शी नियामक व्यवस्था में किस तरह तब्दील करता है।








