Uttarakhand Police Constable Resigns Viral News In Hindi: देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे सीजीपी आंदोलन के दौरान एक ऐसा वाकया सामने आया जिसने शासन और प्रशासन के गलियारों में सनसनी फैला दी। उत्तराखंड पुलिस में तैनात रहे कांस्टेबल शेर सिंह ने सार्वजनिक रूप से मंच पर खड़े होकर सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने जनसमूह को संबोधित करते हुए अपनी वर्दी से उत्तराखंड पुलिस का बैज उतारा और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अभिजीत दीपके के हाथों में सौंप दिया। मंच से उन्होंने दावा किया कि वे अब पुलिस की नौकरी त्याग चुके हैं और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इस आंदोलन का हिस्सा बनने आए हैं। अपने भाषण के दौरान शेर सिंह ने शहीद भगत सिंह के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जिंदगी केवल अपने दम पर जी जाती है और क्रांति विचारों से जन्म लेती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अपने हक की आवाज उठाना बागी होना कहलाता है, तो वे बागी बनने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस घटना के बाद वहां मौजूद लोगों ने उनके समर्थन में जोरदार नारेबाजी की और इस वाकये की चर्चा सोशल मीडिया से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक फैल गई।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के तुरंत बाद उत्तराखंड पुलिस विभाग का आधिकारिक बयान सामने आया, जिसने मामले की पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी। कुमाऊं परिक्षेत्र की पुलिस महानिरीक्षक निवेदिता कुकरेती ने इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करते हुए एक विस्तृत बयान जारी किया। आईजी कुमाऊं ने साफ तौर पर बताया कि कांस्टेबल शेर सिंह कोई त्यागपत्र देने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि वह काफी समय से बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के अपनी ड्यूटी से गायब चल रहा था।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार शेर सिंह बीती अट्ठाइस जून से बिना बताए गैरहाजिर चल रहा था। विभाग द्वारा इस अनुशासनहीनता के संबंध में उससे लिखित जवाब मांगा गया था, लेकिन उसकी तरफ से कोई संतोषजनक उत्तर या स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया। बार-बार चेतावनी और प्रक्रियात्मक अवसरों के बावजूद जब सिपाही ने कोई जवाब नहीं दिया, तब विभागीय नियमों के तहत कार्रवाई करते हुए उसे बीस जुलाई को सेवा से निलंबित कर दिया गया था। आईजी कुमाऊं ने स्पष्ट किया कि निलंबन की कार्रवाई पहले ही पूरी की जा चुकी थी, ऐसे में मंच पर जाकर इस्तीफा देने का नाटक केवल लोगों का ध्यान भटकाने और खुद को एक पीड़ित या क्रांतिकारी के रूप में पेश करने की एक सोची-समझी रणनीति मात्र है।
आपराधिक पृष्ठभूमि और कुख्यात गैंगस्टर प्रवीण वाल्मीकि से संबंध
आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती ने सिपाही शेर सिंह के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड का खुलासा करते हुए बताया कि उसका अतीत निष्कलंक नहीं रहा है। वह पहले भी कई गंभीर आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त पाया जा चुका है और उत्तराखंड के एक बेहद खूंखार एवं कुख्यात आपराधिक गैंग के साथ सीधे तौर पर जुड़ा रहा है। जांच में यह बात सामने आ चुकी है कि शेर सिंह का संपर्क हरिद्वार और रुड़की क्षेत्र के कुख्यात गैंगस्टर प्रवीण वाल्मीकि से रहा है। प्रवीण वाल्मीकि एक ऐसा नाम है जिसके खिलाफ उत्तराखंड के हरिद्वार और देहरादून जिलों के विभिन्न थानों में हत्या, हत्या के प्रयास, रंगदारी, अपहरण और कीमती जमीनों पर अवैध कब्जे जैसे दर्जनों संगीन मामले दर्ज हैं। वर्तमान समय में प्रवीण वाल्मीकि अदालत द्वारा सुनाई गई सजा के तहत जेल की सलाखों के पीछे बंद है और वहीं से अपना गिरोह संचालित कर रहा था।
पुलिस की विस्तृत तफ्तीश से यह बात उजागर हुई कि जेल में बंद होने के बावजूद प्रवीण वाल्मीकि एक संगठित आपराधिक गिरोह चला रहा था। इस गिरोह में उसके मुख्य सहयोगियों के रूप में मनीष बॉलर, हसन अब्बास जैदी और खुद उत्तराखंड पुलिस का सिपाही शेर सिंह शामिल थे। यह पूरा गिरोह मिलकर स्थानीय आम जनता और कमजोर वर्ग के लोगों को डरा-धमकाकर उनकी बेशकीमती जमीनों पर अवैध कब्जा जमाता था और उससे भारी मात्रा में अवैध धन जुटाता था। पुलिस की वर्दी में होने के कारण शेर सिंह इस गिरोह के लिए एक ढाल का काम करता था और अपने पद तथा प्रभाव का दुरुपयोग करके पीड़ितों पर दबाव बनाता था, ताकि वे पुलिस या अदालत का दरवाजा न खटखटा सकें।
पीड़ित विधवा महिला का मामला और सिपाही की भूमिका
शेर सिंह और प्रवीण वाल्मीकि गिरोह की क्रूरता का एक बेहद संवेदनशील मामला रुड़की क्षेत्र से सामने आया था। रुड़की की रहने वाली एक असहाय और पीड़ित विधवा महिला के परिवार को इस गिरोह ने अपना निशाना बनाया। अतीत में इस विधवा महिला के भाई और देवर को प्रवीण वाल्मीकि गैंग के गुर्गों द्वारा गोली मार दी गई थी, ताकि वे डर के मारे अपनी जमीन छोड़ दें। इस भयावह और हिंसक घटना के बाद वह महिला अपने बच्चों की जान बचाने के लिए रुड़की छोड़कर किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर रहने के लिए मजबूर हो गई। महिला की मजबूरी और अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए शेर सिंह और उसके साथी बदमाशों ने उस पीड़ित महिला की जमीन पर जबरन कब्जा जमा लिया और कूटरचित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उसे किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया।
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जब पीड़ित महिला को अपनी जमीन के फर्जीवाड़े और अवैध बिक्री की भनक लगी, तो उसने इसका विरोध करने का प्रयास किया। इसके बाद शुरू हुआ खाकी और खाकी के आड़ में छिपे अपराधियों के गठजोड़ का असली खेल। उत्तराखंड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर तैनात रहते हुए शेर सिंह ने अपने सरकारी पद का न केवल दुरुपयोग किया, बल्कि अपराधियों का खुलकर साथ दिया। उसने सितारगंज जेल में बंद गैंगस्टर प्रवीण वाल्मीकि से कई बार मुलाकात की और जब वाल्मीकि को रुड़की कोर्ट में पेशी के लिए लाया जाता था, तब भी शेर सिंह वहां पहुंचता था। सिपाही शेर सिंह ने पीड़ित महिला को डरा-धमकाकर रुड़की कोर्ट परिसर में लाया और वहां कुख्यात अपराधी प्रवीण वाल्मीकि के सामने खड़ा करके पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दिलवाई। सिपाही का मुख्य मकसद महिला पर दबाव बनाकर उसके द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमों को वापस करवाना था। इस पूरी साजिश के जरिए जमीन को बेचकर जो भी अवैध मुनाफा कमाया गया, उसे गैंग के अन्य सदस्यों के साथ सिपाही शेर सिंह ने भी आपस में बांटा।
गिरफ्तारी, अदालती कार्रवाई और वर्तमान स्थिति
सिपाही शेर सिंह की इन आपराधिक गतिविधियों की भनक जब उच्च अधिकारियों को लगी और पीड़ित पक्ष द्वारा सबूत पेश किए गए, तो कानून का शिकंजा उस पर कसना शुरू हुआ। इस पूरे मामले में हरिद्वार जिले के गंगनहर थाने में मुकदमा अपराध संख्या 415/25 दर्ज किया गया। यह प्राथमिकी भारतीय दंड विधान की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान प्रतिभूति की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 471 (फर्जी दस्तावेज का असली के रूप में उपयोग), 120बी (आपराधिक साजिश) के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 111(2बी), 351(2) और 352 के तहत पंजीकृत की गई।

मामले की निष्पक्ष जांच करते हुए पुलिस टीम ने पर्याप्त और ठोस साक्ष्य जुटाए। सबूतों के आधार पर पंद्रह सितंबर दो हजार पच्चीस को उत्तराखंड पुलिस ने अपने ही सिपाही शेर सिंह को गिरफ्तार कर लिया और उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया। कई महीनों तक जेल में बंद रहने के बाद, शेर सिंह के वकीलों ने अदालत में जमानत याचिका दाखिल की। इसके पश्चात सात नवंबर दो हजार पच्चीस को माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल द्वारा उसे सशर्त जमानत प्रदान की गई, जिसके बाद वह जेल से बाहर आया।
जमानत पर बाहर आने के बाद से ही शेर सिंह पुलिस विभाग की नजरों में था और लगातार गैरहाजिर चल रहा था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन में शामिल होकर और वर्दी का बैज उतारकर उसने खुद को एक पीड़ित कर्मचारी के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, ताकि उसकी पुरानी आपराधिक पृष्ठभूमि पर पर्दा पड़ सके। हालांकि, पुलिस प्रशासन द्वारा पूरी केस हिस्ट्री सार्वजनिक किए जाने के बाद अब यह स्पष्ट हो चुका है कि यह मामला केवल एक सिपाही के असंतोष या इस्तीफे का नहीं है, बल्कि इसके पीछे आपराधिक साठगांठ, धोखाधड़ी और विभागीय निलंबन का एक पूरा इतिहास जुड़ा हुआ है। पुलिस विभाग का कहना है कि कानून के अनुसार शेर सिंह के खिलाफ आगे की विभागीय और कानूनी प्रक्रिया जारी रखी जाएगी।









