Kailash Mansarovar Yatra News: सनातन धर्म में कैलाश मानसरोवर यात्रा को सबसे कठिन, दुर्गम और अलौकिक धार्मिक यात्राओं में से एक माना गया है। भगवान शिव के शाश्वत निवास स्थान कैलाश पर्वत के दर्शन और पवित्र मानसरोवर झील में स्नान करने की लालसा हर शिवभक्त के मन में होती है। इस वर्ष की कैलाश मानसरोवर यात्रा अब अपने पूरे शबाब पर है, और जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, हिमालय की दुर्गम कंदराओं में शिवभक्तों का उत्साह और उनकी गूंजती हुई ‘हर-हर महादेव’ की ध्वनि वातावरण को पूरी तरह से भक्तिमय बना रही है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और उत्तराखंड सरकार के संयुक्त प्रयासों से आयोजित हो रही इस यात्रा से जुड़ी हालिया रिपोर्टें बेहद उत्साहजनक हैं, जो देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं की प्रगति को दर्शाती हैं।
ताजा प्रशासनिक और जमीनी जानकारियों के अनुसार, कैलाश मानसरोवर यात्रियों का दूसरा दल तमाम आवश्यक औपचारिकताओं और सुरक्षा जांचों को पूरा करने के बाद आधिकारिक तौर पर चीनी सीमा में प्रवेश कर चुका है। इसके साथ ही, यात्रा के अग्रिम पड़ावों पर भी हलचल काफी तेज हो गई है। जहां एक तरफ तीसरे दल के श्रद्धालु भारतीय सीमा के अंतिम महत्वपूर्ण पड़ाव गुंजी बेस कैंप में पहुंच चुके हैं, वहीं यात्रा की शुरुआत करने वाला पहला दल इस समय तिब्बत (चीन) के नियंत्रण वाले क्षेत्र में भगवान भोलेनाथ के साक्षात स्वरूप कैलाश पर्वत की पवित्र परिक्रमा में लीन है। इन तीनों दलों की अलग-अलग पड़ावों पर मौजूदगी यह दर्शाती है कि इस वर्ष यात्रा का संचालन बेहद सुचारू और योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है।
दूसरे दल का चीनी सीमा में प्रवेश: तिब्बत की धरती पर कदम
कैलाश मानसरोवर यात्रा का दूसरा दल, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए चुनिंदा और शारीरिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ श्रद्धालु शामिल हैं, अपनी भारतीय सीमा की यात्रा को सफलतापूर्वक संपन्न कर चीन (तिब्बत) के भूभाग में प्रवेश कर चुका है। धारचूला और तवाघाट के दुर्गम रास्तों से होते हुए जब यह दल लिपुलेख दर्रे के करीब पहुंचा, तो वहां भारतीय सुरक्षा बलों और कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) के अधिकारियों ने उन्हें भावभीनी विदाई दी। सीमा पार करने के तुरंत बाद चीनी अधिकारियों और वहां की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा यात्रियों के पासपोर्ट, वीजा और मेडिकल सर्टिफिकेट्स की गहन जांच की गई, जिसके बाद उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति मिली।
चीनी सीमा में प्रवेश करने के बाद दूसरे दल के यात्रियों को तकलाकोट के रास्ते मानसरोवर झील की ओर ले जाया जा रहा है। तकलाकोट में चीनी प्रशासन की ओर से यात्रियों के रहने और उनके आव्रजन (इमिग्रेशन) की औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। इस दल के सदस्यों में चीनी सीमा पर पहुंचने के बाद एक अलग ही उत्साह देखा गया। हालांकि, अत्यधिक ऊंचाई वाले इन क्षेत्रों में ऑक्सीजन की कमी और बर्फीली हवाएं यात्रियों की शारीरिक परीक्षा लेती हैं, लेकिन बाबा बर्फानी के दर्शन की अटूट तड़प के आगे यह मुश्किलें बेहद बौनी साबित होती हैं। यह दल अब अगले दो दिनों में पवित्र मानसरोवर झील के तट पर पहुंचेगा, जहां वे सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना और पवित्र स्नान करेंगे।
तीसरे दल की गुंजी में आमद: उच्च हिमालयी क्षेत्र में खुद को ढालने की चुनौती
इस बीच, मुख्य भूमि से आगे बढ़ते हुए कैलाश मानसरोवर यात्रा के तीसरे दल ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। इस दल के सभी सदस्य उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित सामरिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पड़ाव ‘गुंजी’ पहुंच चुके हैं। गुंजी समुद्र तल से लगभग १०,३०० फीट की ऊंचाई पर स्थित एक बेहद खूबसूरत लेकिन चुनौतीपूर्ण घाटी है। यात्रा के नियमों और चिकित्सा प्रोटोकॉल के अनुसार, गुंजी केवल एक पड़ाव नहीं है, बल्कि यह यात्रियों के लिए ‘एक्लिमटाइजेशन’ (उच्च तुंगता के अनुकूल खुद को ढालने) का सबसे मुख्य केंद्र है।
अत्यधिक ऊंचाई पर जाने से पहले मानव शरीर को वहां के वातावरण, कम तापमान और विरल ऑक्सीजन के अनुकूल बनाना अनिवार्य होता है, जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में एक्लिमटाइजेशन कहा जाता है। तीसरे दल के यात्री यहां दो से तीन दिनों तक रुकेंगे। इस दौरान सेना के डॉक्टरों और आईटीबीपी (ITBP) के विशेषज्ञों द्वारा सभी यात्रियों की नियमित स्वास्थ्य जांच की जाएगी। उनके ब्लड प्रेशर, पल्स रेट और ऑक्सीजन सैचुरेशन लेवल की कड़ाई से निगरानी की जाती है। जो यात्री स्वास्थ्य मानकों पर पूरी तरह खरे उतरेंगे, उन्हें ही आगे लिपुलेख दर्रे की ओर बढ़ने की अनुमति दी जाएगी। गुंजी में रुके यात्री स्थानीय संस्कृति और प्रकृति का आनंद ले रहे हैं और अग्रिम कठिन चढ़ाई के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से खुद को तैयार कर रहे हैं।
पहले दल की कैलाश परिक्रमा शुरू: साक्षात शिवत्व की अनुभूति
इस पूरी यात्रा का सबसे गौरवशाली और आध्यात्मिक रूप से जादुई पल वह होता है, जब कोई श्रद्धालु कैलाश पर्वत की परिक्रमा शुरू करता है। इस समय यात्रा का पहला दल, जो काफी दिन पहले चीनी सीमा में प्रवेश कर चुका था और जिसने मानसरोवर झील की परिक्रमा व स्नान पूरा कर लिया है, वह अब कैलाश पर्वत की मुख्य परिक्रमा के अत्यंत कठिन चरण में है। कैलाश पर्वत की कुल परिक्रमा लगभग ५२ किलोमीटर लंबी है, जो बेहद ऊंचे, पथरीले और बर्फ से ढके रास्तों से होकर गुजरती है।
पहले दल के श्रद्धालु ‘दारचेन’ से अपनी पैदल परिक्रमा शुरू कर चुके हैं। इस परिक्रमा का सबसे कठिन हिस्सा ‘डोल्मा ला दर्रा’ माना जाता है, जो समुद्र तल से लगभग १८,६०० फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस बिंदु पर आकर बड़े से बड़े पर्वतारोहियों की सांसें भी फूलने लगती हैं, लेकिन शिवभक्त हाथ में लाठी लिए, जुबान पर ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हुए इस दुर्गम चढ़ाई को भी पार कर रहे हैं। पहले दल के कुछ सदस्यों ने सेटेलाइट फोन और आधिकारिक माध्यमों से संदेश भेजा है कि कैलाश पर्वत के अलौकिक दर्शन पाकर उनकी जीवन भर की थकान और सारे कष्ट एक पल में समाप्त हो गए हैं। चारों तरफ बिखरी बर्फ के बीच सूर्य की किरणें जब कैलाश के शिखर पर पड़ती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात भगवान शिव स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हों।
प्रशासनिक मुस्तैदी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
इतनी बड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की यात्रा को सुचारू रूप से संचालित करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए भारत सरकार का विदेश मंत्रालय, उत्तराखंड का स्थानीय प्रशासन, कुमाऊं मंडल विकास निगम और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) आपसी तालमेल के साथ दिन-रात काम कर रहे हैं। धारचूला से लेकर लिपुलेख दर्रे तक के पूरे भारतीय मार्ग पर सुरक्षा और संचार के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। हर पड़ाव पर वायरलेस सेट और सेटेलाइट संचार की व्यवस्था की गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति में यात्रियों को तुरंत मदद पहुंचाई जा सके।

कुमाऊं मंडल विकास निगम की ओर से यात्रियों के रहने, सात्विक भोजन और चिकित्सा सुविधाओं की बेहतरीन व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही, चीन की ओर से भी इस बार यात्रियों की सुरक्षा और उनके ठहरने के प्रबंधों में कुछ सुधार किए गए हैं, जिससे यात्रियों को वीजीए क्लीयरेंस और लॉजिस्टिक्स में कम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय लगातार बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से चीनी प्रशासन के संपर्क में है, ताकि सीमा पार कर चुके दूसरे दल और परिक्रमा कर रहे पहले दल को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या तकनीकी असुविधा का सामना न करना पड़े।









